गढ़गंगा संसद : संस्कृति मंत्री को भी सिर्फ जनान्दोलन से ही उम्मीद

Submitted by Hindi on Mon, 12/03/2012 - 09:57
गंगा संसद में गंगा की अविरलता और निर्मलता को लेकर कई पहलुओं पर चर्चा हुई। गंगा प्रदूषण, अतिक्रमण और शोषण के परिदृश्य व समाधान वही थे, जिनका उल्लेख लंबे अरसे से कई मंचों व दस्तावेजों में होता रहा है। असल प्रश्न यही था कि सब कुछ ज्ञात है, तो समाधान की दिशा में हम आगे बढ़ते क्यों नहीं? इस पर चिंतन करते हुए गंगा संसद ने तय किया कि समाज द्वारा स्वयं निगरानी मोर्चा संभाले बगैर बात बनेगी नहीं। भारत सरकार के मंत्री पद पर रहते हुए कोई समाज से आंदोलन शुरू करने का आह्वान करे; इस बात के कई मायने लगाये जा सकते हैं। कोई इसे सरकार के खिलाफ बयान मान सकता है, तो कोई दलगत विद्रोह। आप इसका कुछ भी मतलब लगायें, लेकिन भारत सरकार की वर्तमान संस्कृति मंत्री ने गंगा रक्षा के लिए एक बड़ा आंदोलन शुरू करने का आह्वान कर दिया है। गढ़मुक्तेश्वर में गंगा संसद का शुभारंभ करते हुए भारत सरकार की संस्कृति मंत्री श्रीमती चन्द्रेश कुमारी कटोच ने यह आह्वान किया। उन्होंने बता दिया कि अगर दिल हिंदोस्तानी है और सही जगह पर है, तो वह गंगा के लिए न धड़के.. यह हो ही नहीं सकता। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस-किस का दिल सही जगह पर नहीं है।

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार की संस्कृति मंत्री श्रीमती चन्द्रेश कुमारी कटोच 25 नवबंर, 2012 को गंगा संसद का शुभारंभ करने गढ़मुक्तेश्वर पहुंची थीं। गढ़मुक्तेश्वर दिल्ली से 90 कि.मी. दूर स्थित है। गढ़मुक्तेश्वर-पश्चिम उत्तर प्रदेश में गंगा यात्रा मार्ग का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। गढ़मुक्तेश्वर में 25 से 28 नवबंर, 2012 तक नियोजित गंगा संसद एक दिन पहले 27 नवबंर को सिमटकर भी एक साथ कई संदेश देने में सफल रही। यह गंगा संसद स्थानीय जलबिरादरी द्वारा आयोजित की गई थी। जलबिरादरी जलपुरुष के नाम से विख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के नेतृत्व में गठित पानी के मसलों पर संवेदनशील व्यक्तियों और संगठनों का एक साझा प्लेटफार्म है। जलबिरादरी के आमंत्रण पर संस्कृति मंत्री निजी दौरे पर सीधे बृजघाट पहुंची। गंगा किनारे पूजा-अर्चना की। मेला परिसर में फैली पॉलीथीन थैली कचरा देख चिंता व्यक्त की। स्नानार्थी तथा संसद... दोनों को अलग-अलग संबोधित किया और वापस लौट गईं। न कोई सिक्योरिटी! न ताम-न झाम!!

अपने संबोधन में गंगा को भारतीय संस्कृति का मूल बताते हुए श्रीमती कटोच ने गंगा से जुड़े राजीव गांधी के सपने को साकार करने का निजी संकल्प जताया। हालांकि इसके लिए संस्कृति मंत्री ने मंत्रालय स्तर पर सहयोग की हरसंभव संभावना तलाशने का वचन दिया, लेकिन चेताया भी कि गंगा की निर्मलता-अविरलता के मसले को सिर्फ कानून या सरकार के भरोसे छोड़ने से सफलता मिलने वाली नहीं। संस्कृति मंत्री ने राजस्थान के विश्नोई समाज की महिलाओं द्वारा अपने प्राण गंवाकर भी पेड़ों की रक्षा के प्रेरक व ऐतिहासिक प्रसंग का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि गंगा रक्षा के अभियान को सरकार और नगरपालिका सफल नहीं कर सकते; इसके लिए हम एक बड़ा आंदोलन शुरू करें। उद्घाटन मौके पर पहुंचे गुरुकुल पूठ के सर्वेसर्वा स्वामी धर्मेश्वर ने भी स्थानीय उद्योगों व सरकारों के रवैये को देखते हुए जनान्दोलन को जरूरी बताया।

नदी काम में हम सब पार्टनर: ए. बी. स्वामी
राज्यसभा सांसद श्री ए.बी. स्वामी ने चेताया -’’आप नदियों से पहचाने जाते हैं। यदि इस नदी को नहीं बचा सके, तो सभ्यता मर जायेगी। नदी के काम के लिए हम सब पार्टनर हैं।’’

गंगा संस्कृति ही भारतीय संस्कृति – हेमभाई
असम के प्रख्यात सर्वोदयी कार्यकर्ता हेमभाई ने तो गंगा जनजागरण के लिए अपना एक वर्ष देने तक की इच्छा जताई। उन्होंने कहा कि उत्तर-पूर्व में गंगा नहीं है, लेकिन वहां शायद ही कोई घर होगा, जहां गंगाजल न हो। हमे कभी नहीं भूलना चाहिए कि गंगा संस्कृति ही भारतीय संस्कृति है। हेमभाई ने चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी को कई स्थानों पर बांधे जाने का भारत सरकार द्वारा खुलकर विरोध न करने तथा अरुणाचल प्रदेश में 168 बांधों को लेकर अपनी चिंता से भी गंगा संसद को अवगत कराया।

गंगा संसद का शुभारंभ करतीं संस्कृति मंत्री चन्द्रेश कुमारी कटोचगंगा संसद का शुभारंभ करतीं संस्कृति मंत्री चन्द्रेश कुमारी कटोचगंगा को स्थानीय निकायों के भरोसे नहीं छोड़ सकते: मेरठ सांसद
मेरठ सांसद राजेन्द्र अग्रवाल ने नदियों के प्रति स्थानीय निकायों के गैरजिम्मेदाराना रवैये पर चिंता जताते हुए कहा कि गंगा जिनकी प्राथमिकता नहीं है, गंगा को उन स्थानीय निकायों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। किसी न किसी को पूरी तरह गंगा प्रदूषण मुक्ति की जिम्मेदार बनाना होगा। इसके लिए नीतिगत बदलाव जरूरी हैं।

गंगा की सांस्कृतिक महत्ता को नजरअंदाज न करे सरकार: राजेन्द्र सिंह
संस्कृति मंत्री के हाथों शुभारंभ कराकर गंगा संसद के आयोजक यह संदेश देने में भी सफल रहे कि गंगा.. महज आर्थिकी, आजीविका, पर्यावरण और सभ्यता का विषय नहीं है, भारत की सांस्कृतिक अस्मिता के सृजन में भी इसकी अद्वितीय भूमिका है। संसद ने नाराजगी व्यक्त की कि अब तक की सरकारों ने योजना-परियोजनाओं का नियोजन करते वक्त गंगा के सांस्कृतिक आधार को नजरअंदाज किया है। सरकारें अभी भी बस! गंगा किनारे के शहरों में पाइप लाइन बिछाने और ट्रीटमेंट प्लांट में लगी हैं। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण में संस्कृति मंत्रालय तथा समाज के धार्मिक-सांस्कृतिक वर्ग को प्रतिनिधित्व न दिया जाना भी इस बात की तसदीक करता है कि सरकार गंगा की सांस्कृतिक महत्ता को नजरअंदाज कर रही है। सरकार अपनी गलती सुधारे और यथाशीघ्र संस्कृति मंत्री तथा गंगा समाज के सांस्कृतिक प्रतिनिधियों को प्राधिकरण व योजनाओं में शामिल करे। जलपुरुष राजेन्द्र सिंह द्वारा उठाई इस मांग पर गंगा संसद ने तो सहमति की मोहर लगाई ही, गंगा संसद का शुभारंभ कर भारत सरकार की संस्कृति मंत्री ने भी एक तरह से सहमति ही जताई है।

गढ़ को सांस्कृतिक नगरी और मेले को मिले राज्य स्तरीय मेले का दर्जा- स्वामी धर्मेश
माघ पूर्णिमा, गंगा दशहरा, आषाढ़ पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, बैकुंठ चतुर्दशी.... अलग-अलग तिथियों पर गंगा में अलग-अलग स्थान पर स्नान का पौराणिक महत्व बताया गया है। कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान का सर्वाधिक महत्व गढ़मुक्तेश्वर में माना जाता है। गढ़मुक्तेश्वर में दीपावली के अगले दिन यानी भैया दूज से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक पूरे एक पखवाड़े मेला चलता है। आसपास के जिलों के लोग तो शुरू की तारीखों से ही अपनी-अपनी बुग्गियों-ट्रैक्टरों पर खाने का सामान, बिस्तर, ईंधन लादकर सपरिवार यहां आ जमते हैं। 15 दिनों के लिए पूरा मेला परिसर कई तरह की गतिविधियों का संगम बन जाता है। एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के तीन दिन में बढ़कर यह मेला 25-30 लाख की संख्या पार कर लेता है। पश्चिमोत्तर भारत में मृतक की भस्म विसर्जन के लिए हरिद्वार के बाद गढ़गंगा को ही प्रमुखता प्रदान की जाती है। बावजूद इसके सांस्कृतिक नगरी के रूप में विकास को लेकर न तो गढ़ को ही कोई शासकीय मान्यता मिली और न ही मेले को।

गंगा संसद में गढ़ को सांस्कृतिक नगरी के रूप में विकसित करने तथा मेले को राज्य स्तरीय मेले के शासकीय दर्जे को लेकर उठी मांग को संस्कृति मंत्री के समक्ष रखते हुए स्वामी धर्मेश्वर ने उम्मीद जताई कि वह अवश्य ही कोई निर्णय करेंगी। दिलचस्प था कि मांग के अगले ही दिन उ.प्र. सरकार के एक मंत्री श्री कमाल अख्तर द्वारा गढ़ को पहचान दिलाने के संकल्प का समाचार अखबारों में पढ़ने को मिला।

नहरों पर निर्भरता घटाये बगैर गंगा प्रदूषण मुक्ति की बात अव्यावहारिक - अनिल गौतम
लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक श्री अनिल गौतम ने एक प्रस्तुति के जरिए यह बताने की कोशिश की कि बिजनौर से नरोरा तक औद्योगिक व कत्लखानों का प्रदूषण को कोई कन्नौज-कानपुर से कमतर न आकें। उन्होंने कहा कि बैक्टीरियोफैजेज नामक जीवाणु गंगा की अमृत शक्ति का मूलाधार है। यह जीवाणुओं का 95 प्रतिशत गंगा की मूलधारा के ऊपरी हिस्से में ही पाये जाते हैं। टिहरी बांध के नीचे के गंगाजल में बैक्टीरियोफैजेज की मौजूदगी मात्र पांच प्रतिशत ही बचती है। हरिद्वार में गंगनहर और फिर उसके बाद बिजनौर से लेकर नरोरा तक गंगा का अपना पानी तो नहरों में बंट जाता है। आगे की गंगा में गंगाअमृत बचेगा कैसे? यह प्रश्न उठाते हुए श्री गौतम ने राय दी कि यदि गंगा को प्रदूषण मुक्त करना है, तो गंगा में इसकी प्रदूषणनाशिनी शक्ति वाला जल अधिक से अधिक मात्रा में बहने देना होगा। यह तभी संभव है, जब नहरों पर सिंचाईं की निर्भरता घटे। इस पर विचार करना चाहिए और सिंचाई के वैकल्पिक माध्यमों को समृद्ध करने पर लगना चाहिए। अंततः वर्षाजल संचयन पर जोर ही इसके रास्ते खोलेगा।

श्री गौतम ने कहा कि सीवेज का पानी खेती में उपयोग हो सकता है। उसे नहरों में बहाया जाना चाहिए। उन्होंने ताज्जुब व्यक्त किया कि जो पानी नदी के मुख्य प्रवाह में बहने देना चाहिए, उसे हम नहरों में बहाते हैं और जो सीवेज नहरों में बहाना चाहिए, उसे हम नदी के मुख्य प्रवाह में बहा देते हैं। इस क्रम को उलटना होगा।

सरकार की ओर निहारना छोड़ गंगा निगरानी मोर्चा खुद संभाले समाज
गंगा संसद में गंगा की अविरलता और निर्मलता को लेकर कई पहलुओं पर चर्चा हुई। गंगा प्रदूषण, अतिक्रमण और शोषण के परिदृश्य व समाधान वही थे, जिनका उल्लेख लंबे अरसे से कई मंचों व दस्तावेजों में होता रहा है। असल प्रश्न यही था कि सब कुछ ज्ञात है, तो समाधान की दिशा में हम आगे बढ़ते क्यों नहीं? इस पर चिंतन करते हुए गंगा संसद ने तय किया कि समाज द्वारा स्वयं निगरानी मोर्चा संभाले बगैर बात बनेगी नहीं। जरूरी है कि गंगा व समस्त सहायक धाराओं पर प्रदूषण नियंत्रण हेतु जननिगरानी तंत्र खड़ा किया जाये। संगठन अपने-अपने स्तर पर इस काम में जुटें। संसद में पधारे कई संगठन प्रतिनिधियों ने इस बाबत निजी पहल का वादा भी किया। अगली पीढ़ी को नदी सरोकारों से जोड़ने के लिए श्रीनिवास द्वारा कर्नाटक में चलाये जा रहे लोकशिक्षण की एक प्रस्तुति ने भी कार्यकर्ताओं को रास्ता दिखाया।

संसद खुद पहुंची समाज के द्वार
इस संसद में एक अच्छी बात यह हुई कि जब स्थानीय समुदाय अपेक्षित संख्या में संसद में नहीं पहुंचा, संसद में शामिल होने दूसरे स्थानों ने आये लोगों के साथ संसद संवाद करने खुद स्थानीय समुदायों के बीच जा पहुंची। गंगा संसद ने मेरठ के मुक्कदमपुर मेले के साथ गंगा पार तिगड़ी आदि इलाके में लगे गंगा मेले में पधारे लोगों से संवाद किया। काश! देश की संसद भी जनता से संवाद करने कभी जनता के द्वार जाये।
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