गंगा के साथ-साथ

Submitted by Hindi on Tue, 02/21/2012 - 17:27
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पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011

बनारस जिले में गंगा-वरुणा संगम के समीप पर स्थित सरायी गोहना गांव में गंगा द्वारा भूमि कटान से कई मकान कट रहे हैं। यहां गंगा गांव को दक्षिण की ओर से काट रही है। कई साल पहले एक स्वयंसेवी संस्था को गांव के तीन ओर भूमि दे दी गई। इस कारण गांववासियों को फैलने का स्थान भी मुहैया नहीं हो पा रहा है। गोमती-गंगा के संगम पर बसे इसी जिले के कैथी गांव की 2290 एकड़ भूमि गोमती की धारा परिवर्तन के कारण कट गई थी, जिससे जिला गाजीपुर के पटना गांव व कैथी के बीच बरसों तक तनाव चलता रहा। यदाकदा उनके बीच झगड़े भी हुए हैं।

गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा नदी के जलागम क्षेत्र में चिपको आंदोलन को जन्म देने वाली संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल हर साल कुछ चुने हुए गांवों में पर्यावरण संवर्द्धन शिविर लगती है। बंजर और उजाड़ बन रही धरती और उस कारण जूझ रहे जन-जीवन में हरियाली लाने वाले इन शिविरों में आसपास और दूर-दूर के गांवों शहरों और राज्यों से लोग आकर अपना पर्यावरण संवारने में हाथ बंटाते हैं। कुछ नये लोग अपने क्षेत्र में भी ऐसे काम शुरू करने की कोशिश करते हैं। सन् 1986 के नवंबर-दिसंबर में बेमरू और लांजी गांवों में आयोजित एक ऐसे ही पर्यावरण संवर्द्धन शिविर में गोपेश्वर कॉलेज में कानून पढ़ाने वाले गूरू ज्ञानसिंह आए थे। श्री सिंह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के हैं। शिविर में भाग लेने के बाद उन्हें लगा कि ऐसा काम गाजीपुर में भी चलना चाहिए। उन्होंने हम सबको गाजीपुर जनपद में पर्यावरण संवर्द्धन व पेड़ लगाने के लिए जन चेतना जगाने के लिए यात्रा का निमंत्रण दिया था। बातचीत आगे बढ़ी तो लगा कि न केवल गाजीपुर, बल्कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गाजीपुर, बलिया जिलों तथा बिहार के छपरा और पटना जिलों में गंगा और उसके आसपास के गांवों का पर्यावरण समझा जाए और इन जिलों के गांवों के युवाओं में वृक्ष चेतना जगाने के लिए पदयात्रा की जाए।

ऐसी किसी पदयात्रा का दल बड़ा हो तो सबकी व्यवस्था आदि की झंझटें बढ़ जाती हैं। इसलिए तय किया कि पदयात्री दल छोटा ही रहेगा ताकि ज्यादा से ज्यादा समय लोगों से बातचीत करने व गंगा के बारे में अधिकतम जानकारी जुटाने में लग सके। यह निश्चय किया गया कि हर सदस्य अपने आने-जाने का खर्च खुद उठायेगा और शेष यात्रा जन आधारित होगी। इस पदयात्रा में मेरे तथा गुरू ज्ञानसिंह के अलावा चार सदस्य और थे। एक राकेश काला गढ़वाल विश्वविद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाते हैं। दो श्री अशोक कुमार कांटू गोपेश्वर कॉलेज (चमोली) में पढ़ाते हैं। वैसे वे कश्मीर के अनंतनाग के रहने वाले हैं। तीसरे और चौथे सदस्य अरुण नेगी और ओमप्रकाश भट्ट गोपेश्वर कॉलेज के छात्र हैं। ये दोनों इस पदयात्रा से पहले गंगोत्री और बदरीनाथ से हरिद्वार तक की गंगा पदयात्रा कर चुके हैं। यों तो कोई 12-13 युवा साथी इस यात्रा में शरीक होना चाहते थे, लेकिन टोली को छोटा ही रखने के फैसले के कारण सब साथ नहीं हो सके।

उधर विश्वविद्याल का शरदकालीन अवकाश 14 जनवरी को समाप्त हो रहा था और इधर जिस दिन कॉलेज खुल रहे थे, उसी दिन से यात्रा आरंभ होने वाली थी। इसलिए राकेश काला ने यात्रा के लिए अर्जित अवकाश लिया। गुरू ज्ञान सिंह पहले ही बनारस आ गए थे। दल के अन्य सदस्यों के बनारस पहुंचने पर पता चला कि श्री सिंह की मां के पैर में गंभीर चोट लगने के कारण स्थानीय अस्पताल में भर्ती किया गया है। इस दुर्घटना के बावजूद वे 14 जनवरी की सुबह सारनाथ आ गए। यहां महाबोधि मंदिर से गगा यात्रा का शुभारंभ होना था। 13 जनवरी 1987 की रात्रि को सारनाथ पहुंच गए थे। अगले दिन प्रातः ब्रह्म मुहुर्त में हमने भगवान बुद्ध के दर्शन किए। वहां यात्रा आरंभ करने से पूर्व महाबोधि सोसाइटी के बनारवन जी द्वारा शुभारंभ किया गया। उन्होंने हमें शुभकामना संदेश देते हुए कहा कि “इतिहास साक्षी है कि नदियों के किनारों पर राजाओं और भिखारियों ने पेड़ रोपे थे। इस तरह से भारत में पुराने जमाने से ही वृक्षारोपण संस्कार हैं। बुद्ध को ज्ञान और प्रभु का आशीर्वाद बोधिवृक्ष के नीचे ही प्राप्त हुआ था।

वृक्ष संपूर्ण जगह, जीव जन्तुओं के जीवन और इस जीवन को बरकरार रखने के लिए जरूरी हैं। पेड़ों से वातावरण साफ रहता है और स्वच्छ हवा बहती है। जिससे मन शांत रहता है। मित्रता, प्रेम और बंधुत्व के भाव जागृत होते हैं। पेड़ों से लोगों का जीवनयापन भी होता है। धरती ठंडी रहती है। जिससे जीवनदायिनी जलराशि का निर्माण होता है। इसलिए पेड़ और जल के लिए यहां यात्रा हो रही है। मेहनत कर रहे हैं। एक अच्छे कार्य पर निकले हैं। भगवान बुद्ध आपकी अवश्य मदद करेंगे।” दल ने यात्रा के दौरान गंगा और उसकी सहायक नदियों वरुणा, गोमती, गांर्गी, बैसो, मगही, घाघरा, गोही, गंडक के तटवर्ती इलाके में स्थित स्कूलों, कॉलेजों, गांवों की चौपालों व नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से 40 स्थानों पर हिमालय, गंगा, मिट्टी और पेड़ों के आपसी रिश्तों पर चर्चा की और पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। तीन स्थानों पर स्थानीय लोगों की भागीदारी द्वारा हिमालय में वन संरक्षण और संवर्द्धन के लिए चल रहे चिपको आंदोलन एवं पेड़ लगाने वे उसकी सुरक्षा को प्रदर्शित करती हुई रंगीन स्लाइडें भी दिखाई गई।

यात्रा दल ने उत्तर प्रदेश के बनारस, गाजीपुर, बलिया तथा बिहार के सारण तथा पटना जिलों के प्रदूषण और गंगा व उसकी सहायक नदियों द्वारा बाढ़, भूमि कटाव, धारा परिवर्तन, जल जमाव आदि समस्याओं से अत्यधिक प्रभावित और संवेदनशील इलाकों को चिंहित किया गया और इनके चित्र भी लिए। बनारस जिले में गंगा-वरुणा संगम के समीप पर स्थित सरायी गोहना गांव में गंगा द्वारा भूमि कटान से कई मकान कट रहे हैं। यहां गंगा गांव को दक्षिण की ओर से काट रही है। कई साल पहले एक स्वयंसेवी संस्था को गांव के तीन ओर भूमि दे दी गई। इस कारण गांववासियों को फैलने का स्थान भी मुहैया नहीं हो पा रहा है। गोमती-गंगा के संगम पर बसे इसी जिले के कैथी गांव की 2290 एकड़ भूमि गोमती की धारा परिवर्तन के कारण कट गई थी, जिससे जिला गाजीपुर के पटना गांव व कैथी के बीच बरसों तक तनाव चलता रहा। यदाकदा उनके बीच झगड़े भी हुए हैं। पता चला कि अब न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण इस समय कैथी गांव वाले इस जमीन पर काश्तकारी कर रहे हैं। पर तनाव जारी है। और गांव में पी.ए.सी अभी तैनात है। इसके पास ही खरोना गांव के कई मकान गोमती द्वारा कटे दिखाई दिए।

हर साल बाढ़ से बचने के लिए ग्रामवासियों द्वारा अस्थायी बांध बनाया जाता है और वे ही लोग हर तरह से उसकी दिन-रात रखवाली करते रहते हैं। बाढ़ के समय सबसे बड़ा संकट चारे का होता है। चारा न मिलने से पशुओं की हानि भी होती है। यह गांव पांच बड़े भागों में बंट गया है ये टीले ऊंचाई पर बसने को मजबूर हैं। शेरपुर कॉलेज में ही शिवगोविंद उपाध्याय ने बताया कि कुछ वर्ष पहले लगभग 2000 एकड़ भूमि में जंगल था। उसके कारण गांव भी सुरक्षित था और खूब चारा उपलब्ध था इसलिए पशुधन भी बहुत था। गांव में खूब घी दूध था। अब जंगल कटने के बाद गंगा का वेग तीव्र होता जा रहा है, बाढ़ बढ़ रही है और गांव की हालत खराब हो चली है।

सुगापुर, गाजीपुर के पास गंगा नदी एक मोड़ में बहती है। मोड़ वाले स्थान नदी प्रवाह, धारा परिवर्तन और तीव्र भूमि कटान में अधिक योगदान देते हैं। यहां पर गंगा कटान मौनीधाम की पक्की बुनियाद के कारण रुका हुआ है। लेकिन अब वह पुराना होने से कमजोर पड़ रहा है। उसके पश्चिम की ओर मिट्टी कटान जारी है। गंगा के इस संवेदनशील मोड़ से 100 मीटर की दूरी पर ईंट भट्टों का काम चल रहा है। यदि गंगा का कटाव यहां तेज हुआ तो भट्टों के गड्ढों द्वारा गंगा की धारा परिवर्तन करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। यहां ग्राम समाज की भूमि पर वन विभाग ने वृक्षारोपण किया है। वहीं गंगा के किनारे स्थित मौनीधाम के पास एक विशाल अमराई की अंधाधुंध कटाई की बात भी मालूम हुई। ईट भट्टों के पास यह भी देखने को मिला कि दर्जनों बड़े-बड़े पेड़ों के चारों ओर की मिट्टी इस प्रकार हटा दी गई है कि कुछ दिनों बाद ये पेड़ खुद गिर जाए। यह ट्री कटिंग कानून से बचने का नया रास्ता है। इस गांव में बातचीत के बाद लोगों ने गांव समाज की 100 एकड़ भूमि पर पेड़ लगाने की इच्छा व्यक्त की। इन गांव वालों का कहना है कि यदि गंगा द्वारा हो रहे कटाव को न रोका गया तो आगे धारा परिवर्तन हो सकता है, जिससे सैकड़ों गांव, जिनकी आबादी लगभग 80 हजार के पास होगी, दुष्प्रभावित होंगे।

इसी इलाके में करंडा का ताल है जो लगभग 115 किलोमीटर लंबा और 6 किलोमीटर चौड़ा है। यह निचले क्षेत्र में है तथा तीन ओर से गंगा से घिरा है। यहां पर मुख्य धारा तो लगभग 3 किलोमीटर दूर चली गई है। पर एक धारा ताल को छूती हुई बह रही है। यहां भी धाराओं के बीच निकली भूमि आसपास के गांवों में विवाद का कारण बनती है। दक्षिण में नुरनपुर के पास भूमि कटान तेजी से हो रहा है। एक छोटा गांव तो डूब भी गया है। यहां पर गंगा रोमन अक्षर यू के आकार में है। यदि स्थिति नियंत्रित नहीं की गई तो धारा परिवर्तन होता रहेगा। धारा परिवर्तन से निकली भूमि का कब्जा करने के लिए कभी आपस में लाठी व गोली चलने की नौबत भी आ जाती है। हर समय तनाव बना रहता है और आपसी रिश्तों में कटुता बढ़ रही है।

गंगा फिरोदपुर, गोसपुर में 80 अंश में मुड़ती है, जिसके कारण वहां के अधिकांश परिवारों की जमीन कट गई है। इसी गांव के एक किसान बंशरोपन यादव ने बताया कि बाढ़ और कटाव में उनकी 26 बीघा जमीन चली गई। अब उनके पास केवल 2 बीघा जमीन ही बची है। उनके शब्द मार्मिक है- “भैया हमारा नसीब ही फूट गया है, इससे तो मरना ही अच्छा है।” लोग भाग कर शहरों में चले गए हैं। हर साल होने वाले भूमि कटाव से रातों-रात भूमिहर, भूमिहीन बन जाते हैं। गोसपुर, मठिया, डगरपुर, वालिसपुर, पिपर्रा, नगवां, बलुआ की जमीन भी कट रही है। लोगों से पता चला कि कई परिवारों के द्वारा बनाए मकान नष्ट हो गए हैं। एक किसान ने बताया कि बाढ़ का पानी चढ़ने पर वे अपने दरवाजे मिट्टी से बंद करते जाते हैं। सारा सामान छोड़कर जान बचाने के लिए ऊपरी इलाके की ओर भाग जाते हैं। बाढ़ के दिनों में शौच के लिए बांस का मकान बनाना पड़ता है। कभी-कभी पेड़ों पर ही रहना पड़ता है। शेरपुर कॉलेज मे पता चला कि कॉलेज का फर्नीचर भी बह जाता है। गांव वालों ने भय के साथ यह बताया कि दस साल पहले गंगा गांव से 6-7 किलोमीटर दूर थी, अब तो केवल डेढ़ किलोमीटर ही रह गई है।

गांव दक्षिण पूर्व और पश्चिम में गंगा से घिरा है पर कुछ ऊंचाई पर बसा है। हर साल बाढ़ से बचने के लिए ग्रामवासियों द्वारा अस्थायी बांध बनाया जाता है और वे ही लोग हर तरह से उसकी दिन-रात रखवाली करते रहते हैं। बाढ़ के समय सबसे बड़ा संकट चारे का होता है। चारा न मिलने से पशुओं की हानि भी होती है। यह गांव पांच बड़े भागों में बंट गया है ये टीले ऊंचाई पर बसने को मजबूर हैं। शेरपुर कॉलेज में ही शिवगोविंद उपाध्याय ने बताया कि कुछ वर्ष पहले लगभग 2000 एकड़ भूमि में जंगल था। उसके कारण गांव भी सुरक्षित था और खूब चारा उपलब्ध था इसलिए पशुधन भी बहुत था। गांव में खूब घी दूध था। अब जंगल कटने के बाद गंगा का वेग तीव्र होता जा रहा है, बाढ़ बढ़ रही है और गांव की हालत खराब हो चली है। शेरपुर में ही बताया कि यहां जनार्दन राय ने 20 साल पूर्व सवा लाख पेड़ लगाए। इसमें आम, कटहल, शीशम, बेर, जामुन, सेमल जैसी स्थानीय प्रजाति के पेड़ थे। हजारों पेड़ तो आज भी खड़े हैं। शेरपुर गांव में हमने देखा कि घर-घर में बैराज बना है। पहले चौके में पिर देहल पर फिर कमरा फिर मुंडेर।

बलिया जिले के सुरही और बसंतपुर के लोगों ने जानकारी दी कि बिहार सरकार ने गंगा के किनारे बांध बनवाया है। इससे पानी टकराकर उत्तर प्रदेश में गंगा के ऊपरी किनारे पर फैलता है तथा भूमि कटान को रोक देता है। इस तरफ अभी बांध नहीं बना है। वाराणसी से सारण जिले तक यात्रा मार्ग के आसपास लम्बी पट्टियों में आम, बांस, बेर, बेल, कटहल, शीशम, बबूल आदि के वृक्ष दिखाई दिए। ये सारे पेड़ ग्रामीणों द्वारा लगाए गए हैं। लेकिन मोटर रोड के किनारे और कहीं-कहीं उत्तर प्रदेश में सामाजिक वानिकी के अंतर्गत बबूल और यूकेलिप्टस के पेड़ लगे दिखाई दिए।

इस इलाके में बाढ़ के कारण दो प्रकार की भूमि है- दियारा और बांगर। दियारा वह क्षेत्र जहां तक बाढ़ का पानी प्रति वर्ष जाता है। बांगर जहां सिंचाई की जाती है और यह बाढ़ के अंतर्गत नहीं आता। ग्राम नरही के पास मगही नदी भी पिछले 15 सालों से जमीन काट रही है। लोगों ने गड्डा परगना के बारे में बताया। इसमें गाजीपुर तथा बलिया जिले के सैकड़ों गांव आते हैं। यह क्षेत्र बाढ़ से अधिक प्रभावित होता है तथा तबाही मच जाती है। बमनौली सागरपानी के बीच का क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है। कुछ स्थान तो लगभग कट ही गए हैं। दन्द्रपुर दमनपुर गांवों की रक्षा के लिए बनाए गए बांध बुरी हालत में हैं। गंगा और टोंस नदियों के बीच का फासला बहुत बढ़ गया है। यहां का बांध अगली बरसात में सुरक्षा दे सकेगा इसमें संदेह हैं। गांव के लोग इस आशंका से ग्रस्त लगे। ज्ञात हुआ कि गांवों के पास का गंगा का छोड़न बरसात में मुख्य धारा का रूप ले लेता है। गंगा टोंस के संगम का वस्याना गांव अब मोटर रोड के पास आकर बस गया है। वह सागर पाली में आता है।

बिहार के सारण जिले के गरीब टोला गांव में लोगों से बातचीत के दौरान मालूम हुआ कि बाढ़ कटान से जनजीवन प्रतिवर्ष ग्रस्त होता जाता है। अनिश्चितता और तबाही से बचने के लिए लोग इस क्षेत्र को छोड़ कर गंगा पार रिवेलगंज में बसते जा रहे हैं। इस कस्बे की काफी जनसंख्या बाढ़ भूमि कटाव से विस्थापित है। सारी बस्ती सड़क के किनारे छप्पर में बस रही है। बसतपुर-सलख चक से नया गांव, जो सारण जिले का भाग है, में बाढ़ व भूमि कटाव की विभीषिका और कहर का रूप दिखाई दिया। बसतपुर में गंगा गांव से एकदम लग कर बह रही है तथा कटाव रोकने का कोई उपचार नजर नहीं आता। गंगा के तट पर जाने का रास्ता पूछने पर एक महिला ने बड़े रुदे कंठ तथा दुःखी भाव से बताया कि गंगा ने उसका घर बहा दिया। सलना चक गांव में कटान लगभग 100 मीटर भीतर की ओर हो गया है। इससे लगभग 20 मकान बह गए हैं। ऐतिहासिक गांधी कुटी एकदम खतरे में है। कटाव के किनारे पर ही विशाल अमराई है। यहां पर आम के बाग का एक हिस्सा एवं इससे जुड़े मकान तथा एक मस्जिद भी गंगा कटाव के कारण नष्ट हो रही है।

बाढ़ रोकने के लिए बल्लियां लगाकर उधर व्यवस्था तो की गई है। गांव के लोगों ने जगह-जगह मिट्टी के बांध भी बनाए हैं। इसी गांव की हरिजन बस्ती की हालत दर्दनाक है। आधा घर रह गया है और आधा घर बह गया है। बचे हुए मकान भी कटाव से ज्यादा दूर नहीं हैं। बरसात में गंगा तटवासियों की दुर्दशा की कल्पना की जा सकती है। यह भी मालूम हुआ की बाढ़ कटान की लगातार चल रही स्थिति से तंग आकर लोग शहरों की ओर जा रहे हैं, जिससे रोजी-रोटी की व्यवस्था हो सके। इसी क्षेत्र के गोपालपुर आदि गांवों की हालत भी दुःखद है। लोग बाढ़ कटान को नियति मान कर चल रहे हैं। इसमें उनके मकान, भूमि की हानि लगातार हो रही है। हल्दिया चक का 128 वर्ग मील इलाका गंगा गंडक के बीच बाढ़ से बेहद प्रभावित है।

बलिया जिले के सुरही और बसंतपुर के लोगों ने जानकारी दी कि बिहार सरकार ने गंगा के किनारे बांध बनवाया है। इससे पानी टकराकर उत्तर प्रदेश में गंगा के ऊपरी किनारे पर फैलता है तथा भूमि कटान को रोक देता है। इस तरफ अभी बांध नहीं बना है। वाराणसी से सारण जिले तक यात्रा मार्ग के आसपास लम्बी पट्टियों में आम, बांस, बेर, बेल, कटहल, शीशम, बबूल आदि के वृक्ष दिखाई दिए। ये सारे पेड़ ग्रामीणों द्वारा लगाए गए हैं। लेकिन मोटर रोड के किनारे और कहीं-कहीं उत्तर प्रदेश में सामाजिक वानिकी के अंतर्गत बबूल और यूकेलिप्टस के पेड़ लगे दिखाई दिए। बिहार में सामाजिक वानिकी में बबूल और शीशम के पेड़ सड़क, बांध और रेलवे लाइन के किनारे रोपे गए हैं। जगह-जगह लोगों ने बताया कि पहले गंगा के किनारे घने जंगल थे पर ये धीरे-धीरे नष्ट किए गए। आज कुछ स्थानों को छोड़कर ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिला।

अनेक व्यावसायिक विकास कार्यों के कारण गंगा का हरा कवच लगभग घट चुका है। शेरपुर में 30-40 वर्ष पहले 2000 एकड़ क्षेत्र में घना जंगल फैला था। इसी प्रकार गायघाट में भी जंगल काफी घना था। धीरे-धीरे लोगों ने जंगलों को काटकर आवास, कृषि आदि कार्यों के लिए इनका विनाश कर दिया था। इधर सब कुछ कट रहा है और उधर बनारस गंगा की सफाई का कार्य हो रहा है। लल्लू नाविक ने राजघाट पर बताया कि गंदगी अब काफी कम है लेकिन राजघाट के नाले की सफाई होना शेष है। झुग्गी झोपड़ी वाले किनारे का प्रयोग शौच के लिए कर रहे हैं क्योंकि उनके पास इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है। वरूणा नदी भी काफी गंदगी गंगा में बहाकर ला रही है।

गायघाट में स्थानीय मल्लाहों ने बताया कि पहले उन्हें मछली मारने के परंपरागत अधिकार प्राप्त थे लेकिन अब तो ठेका कोई बड़ा आदमी लेता है और गरीब मछुवारों की आय का आधा हिस्सा ठेकेदार की जेब में चला जाता है। दूसरी ओर गंगा में मछलियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। ऐसा पिछले कुछ वर्षों से तेजी से हुआ है। विजय साहती आदि मल्लाहों से बात करने पर उन्होंने इसके तीन कारण बताए –पहले यह कि मशीन से बुने बारीक जालों के उपयोग के कारण मछलियों के छोटे-छोटे बच्चे तक पकड़ाई में आ जाते हैं। दूसरे मछुवारों की संख्या भी बढ़ी है। तीसरे फरक्का बांध बन जाने के कारण मछलियाँ ऊपर की ओर आती हैं। मल्लाहों ने बताया कि पहले जहां दिनभर में 10-12 किलो मछली मिल जाती थी, वहां आज दो-तीन किलो से ही संतोष करना पड़ता है।

गंगा न केवल उत्तरी भारत के असंख्य लोगों को पीने का जल, सिंचाई की सुविधा, परिवहन, आजीविका के अन्य स्रोत प्रदान करती है, वरन् संपूर्ण भारत की संस्कृति, समृद्धि और हरियाली की प्रतीक होने के कारण देश की हृदय रेखा भी कही जाती है। गंगा के उत्तरी जलग्रहण क्षेत्र हिमालय में पिछले 30-40 वर्षों से जंगलों का जो विनाश हुआ, उससे गंगा की बौखलाहट बाढ़, मिट्टी कटाव आदि के रूप में हर वर्ष भयंकर रूप धारण करती जा रही है। यदि साद को रोकने के लिए अति प्राथमिकता के आधार पर कोई काम नहीं किया तो इसके भयंकर दुष्परिणाम दूर नहीं हैं। इसके कारण करोड़ों लोगों का जीवन दुष्प्रभावित होगा। कृषि व्यवस्था पर प्रभाव पड़ेगा और हर वर्ष गंगा द्वारा हजारों लोगों के बार-बार विस्थापन की समस्या बढ़ती जाएगी। दूसरी ओर गंगा और उसकी सहायक नदियों में बढ़ने वाली साद की मात्रा इस बात का संकेत है कि इनमें बने हुए तथा निर्माणाधीन जलाशय और सिंचाई और विद्युत परियोजनाओं का भविष्य भी अनिश्चित है। इसलिए-

1. गंगा और उसकी सहायक नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र हिमालय में किसी भी किस्म के व्यावसायिक कटान को मिट्टी और जल संरक्षण की दृष्टि से पूर्ण रूप से बंद कर दिया जाए, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों के परंपरागत वन अधिकार जारी रखे जाएं और उनको न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की छूट हो।
2. गंगा घाटी में रहे सहे जंगलों को सुरक्षित घोषित किया जाए।
3. नंगी और वृक्षविहीन धरती पर स्थानीय प्रजाति तथा स्थानीय उपयोग का वृक्षारोपण स्थानीय कार्यकारी शक्ति की भागीदारी से युद्ध स्तर पर चलाया जाए।
4. गंगा घाटी में गंगा के अगल-बगल के क्षेत्रों में गाछी, बाग, जिसे परंपरागत रूप से लगाने के लोगों में संस्कार हैं, का तेजी से विस्तार किया जाए तथा ग्रामीणों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जाए।
5. गंगा घाटी की ऊसर भूमि और बांधों के किनारे सघन वृक्षारोपण किया जाए, जिससे गंगा के किनारे एक हरा बांध या हरित दीवार खड़ी की जा सके जो गंगा की धारा को नियंत्रित करने के साथ लोगों की जरूरत को पूरा करने तथा उनकी आर्थिक उन्नति करने में भी सहयोग देगी।
6. बांधों के किनारे की सरकारी भूमि पर स्थानीय प्रजाति के पेड़ों के पट्टे भूमिहीनों और किसानों को दिए जाएं।
7. हरी दीवार के निर्माण के लिए कार्यकारी युवा शक्ति, जो कि स्कूलों कॉलेजों, नेहरू युवा केंद्रों, युवक मंगल दलों और स्वयंसेवी संस्थाओं में बिखरी पड़ी है, को एक सूत्र में जोड़कर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत लगाया जाए।
8. गंगा द्वारा जिला गाजीपुर के सुगापुर, जिला बलिया के इंद्रपुरा से थमनपुर (उत्तर प्रदेश) और सारण जिले के मलखा चक से नया गांव (बिहार) तक में हो रहे मिट्टी कटाव, जल भराव आदि संकटों से निपटने के लिए अति प्राथमिकता के आधार पर ठोस उठाए जाएं।
9. आज गंगा नदी गाजीपुर जनपद में नंदगंज स्थित डिस्टिलरी और चीनी मिल के रसायन आदि बहा कर ले जा रही हैं। इसके लिए ट्रीटमेंट प्लांट या अन्य कोई आवश्यक तकनीकी हस्तक्षेप की सख्त जरूरत है। इसी प्रकार गाजीपुर की अफीम फैक्टरी के जहर का भी कुछ किया जाना चाहिए। गाजीपुर के नौ छोटे-बड़े गंदे नालों को ट्रीटमेंट के बाद ही गंगा में छोड़ा जाए।
10. गंगा घाटी के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से गंगा में प्रदूषण और पर्यावरणीय सुधार के प्रति जनचेतना जागृत करने के कदम उठाए जाएं।
11. इन समस्त कार्यक्रमों को समन्वित रूप से लागू करने के लिए केंद्रीय गंगा प्राधिकरण या इसी प्रकार की एक राष्ट्रीय स्तर की समंवय समिति बने, जो नदियों के द्वारा किए जाने वाले भूमि कटान, धारा परिवर्तन आदि को नियंत्रित करने में दिशा दे सके।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निर्देश पर गंगा को साफ करने का जो कार्यक्रम बना है वह महत्वपूर्ण है, लेकिन इस कार्यक्रम के क्षितिज का विस्तार प्रदूषण के अतिरिक्त मिट्टी, पानी, वनस्पति के बचाव और उनके संवर्द्धन की मूलभूत समस्या से भी जोड़ा जाना चाहिए।

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