गंगा के सवाल पर निर्णायक लड़ाई

Submitted by RuralWater on Sat, 07/30/2016 - 15:49

.भले ही 07 जुलाई 2016 को ‘मिशन फॉर क्लिन गंगा’ कार्य योजना का उद्घाटन केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती, केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी हरिद्वार पहुँचकर कर गए हों मगर गंगा की अविरलता और सांस्कृतिक, आध्यात्मिक के सवाल आज भी खड़े हैं। मोदी सरकार की ‘गंगा मिशन’ कार्य योजना कब परवान चढ़ेगी यह तो समय ही बता पाएगा परन्तु वर्तमान का ‘विकास मॉडल’ गंगा की स्वच्छता और अविरलता को लेकर नए सिरे से सवाल खड़ा कर रहा है।

सवाल यह है कि मौजूदा विकास के मॉडल में क्या गंगा अविरल बहेगी? क्या गंगा का पानी स्वच्छ हो जाएगा? यहाँ आम राय यह बताती है कि यदि गंगा अविरल बहेगी तो गंगा का पानी स्वतः ही स्वच्छ हो जाएगा। यदि गंगा के बहाव को विकास के नाम पर बाधित किया जाता है तो गंगा जहाँ अपना प्राकृतिक स्वरूप खो देगी वहीं गंगा की स्वच्छता का हश्र स्पष्ट नजर आएगा।

यह आरोप सच है कि ‘गंगा एक्शन प्लान’ में 4000 करोड़ रुपए खर्च हुए, फिर भी गंगा की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई। वर्तमान में ‘नमामी गंगे’ के नाम से भी 1500 करोड़ खर्च होने की सम्भावनाएँ सरकारी स्तर से बताई जा रही है। वैसे भी यह घोषणा ‘मिशन फॉर क्लिन गंगा’ कार्य योजना के उद्घाटन के दौरान केन्द्रीय राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी हरिद्वार पहुँचकर कर की।

कुल मिलाकर करोड़ों खर्च करने से कुछ ठेकेदारों/कम्पनियों को रोजगार जरूर मिल जाएगा मगर गंगा की अविरलता और स्वच्छता के सवाल इसलिये खड़े रहेंगे कि गंगा के प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़खानी करने से गंगा अविरल नहीं बहेगी और गंगा अविरल नहीं बहेगी तो गंगा की स्वच्छता और पवित्रता भी समाप्त हो जाएगी।

यही सवाल साल 2001 में अटल जी की सरकार के दौरान बनाई गई मुरली मनोहर जोशी कमेटी के तत्काल के अध्यक्ष डॉ. जीडी अग्रवाल ने उठाए थे। उन्होंने बाकायदा गंगा के प्राकृतिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विषयों से लेकर गंगा के पानी के वैज्ञानिक महत्ता पर इस समिति को 137 पेज की रिपोर्ट प्रस्तुत करके यह आगाह किया था कि वर्तमान के विकास के मॉडल में गंगा अविरल नहीं बह सकती और गंगा अविरल नहीं बहेगी तो स्वच्छता और पवित्रता के सवाल पर बात करनी बेईमानी होगी। यह उनका अध्ययन भी था और उनका अनुभव भी था।

उल्लेखनीय हो कि डॉ. जीडी अग्रवाल मनेरीभाली फेज-1 जलविद्युत परियोजना की वैज्ञानिकों के एक दल के टीम लीडर थे। सो उन्हें भी तत्काल इसलिये इस कार्य को छोड़ना पड़ा जब गंगा की अविरलता को सरकारी वैज्ञानिक विकास का हवाला देकर कुचलने का प्रयास कर रहे थे। यही हश्र उनके साथ साल 2001 में हुआ।

उन्हें अपना इस्तीफा मुरली मनोहर जोशी के हाथों मजबूरन थमाना पड़ा। इसलिये कि गंगा जल की प्रदूषण-विनाशिनी क्षमता पर जो तत्काल अटल जी के सरकार में श्री जोशी के नेतृत्व में गंगा के सवाल पर कमेटी बनी थी की रिपोर्ट को वे सार्वजनिक करवाना चाहते थे ताकि गंगा के आबाद क्षेत्र में रह रहे लोगों को मालूम हो कि गंगा पर बन रही परियोजनाओं के विकास के मानक उनके अनुरूप हैं कि नहीं।

यदि नहीं तो स्थानीय लोग क्या चाहते हैं। ऐसा वैज्ञानिक डॉ. जीडी अग्रवाल चाहते थे। मगर सत्ता की लोलुपता श्री जोशी पर इतनी सवार थी कि ना तो डॉ. जीडी अग्रवाल के इस्तीफे पर कोई सुनवाई हुई और ना ही श्री जोशी वाली कमेटी कभी गंगा के सवाल पर आगे बढ़ पाई।

गौरतलब हो कि तब से वे लगातार ‘गंगा संरक्षण’ के लिये गोमुख से लेकर गंगासागर तक अलग-अलग जगह आन्दोलन, प्रेस वार्ता व जन संगठनों के साथ मिलकर गंगा की अविरलता के लिये संघर्ष करते रहे और अन्ततः उन्हें वर्ष 2008 में उत्तरकाशी के केदारघाट पर अनशन करना पड़ा।

इन दिनों उनकी माँग गंगा अविरलता व गंगा की पवित्रता के सवाल पर अडिग थी इन्हीं दिनों उन्होंने पुनः 2001 में बनाई गई मुरली मनोहर जोशी वाली समिति की सिफारिशों को सूचना के अधिकार कानून के तहत माँगी, जो उन्हें आधी-अधूरी ही उपलब्ध करवाई गई। 137 पेज वाली रिपोर्ट से पेज न. - 28, 29, 30 व 87 से लेकर 93 तक पेज गायब किये गए या उपलब्ध ही नहीं करवाए गए।

इस बात का जिक्र उन्होंने वर्ष 2008 में तत्काल प्रधानमंत्री और प्रेस को एक पत्र लिखकर किया। उनकी माँग थी कि गंगा जल की विलक्षण प्रदूषण नाशिनी क्षमता पर गहन अध्ययन और शोध कार्य कम-से-कम छः माह तक करवाए जाये। तब तक बाँध के निर्माण कार्य भी रोक दिये जाये। यही नहीं इस अध्ययन के स्पष्ट और निर्णायक परिणाम के अनुसार गंगा पर बाँध बनने चाहिए कि नहीं इस पर सरकार गम्भीरता से आगे की कार्यवाही करे।

जग-जाहिर है कि गोमुख से गंगासागर तक 2525 किलोमीटर बहने वाली गंगा नदी वर्तमान के विकास के कारण संकट में है। कहीं उसके बहाव को रोका जा रहा है तो कहीं उसे भयंकर तरीके से निजी स्वार्थों के लिये प्रदूषित किया जा रहा है। इस कारण गंगा के आस-पास की बसासत भयभीत है और खतरे में है।

स्वामी चिदात्मन जी महाराज कहते हैं कि गंगा पर आश्रित समुदाय का रिश्ता तब कायम रह सकेगा जब गंगा की अविरलता कायम रहेगी। पर्यावरणविद जलपुरुष राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि हमारी गंगा माई है, हमारी कमाई भी है, लेकिन वह डीसी वाशिंगटन और विश्व बैंक की कमाई नहीं है। उनका विरोध विश्व बैंक और डीसी वाशिंगटन और डीसी वाशिंगटन की कमाई बनाने से रोकने का है। गंगा एक तरह से सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक नदी है।

भारतीय संवैधाानिक व्यवस्था में जब से वह राष्ट्रीय नदी घोषित हुई, वह धर्मनिरपेक्ष नदी घोषित हो गई है। उन्होंने कहा कि 4 नवम्बर 2008 को भारत सरकार ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित किया है। यदि अब गंगा राष्ट्रीय नदी है तो अविरलता और निर्मलता कायम करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है।

यदि राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने वालों को सजा मिलती है तो राष्ट्रीय नदी का अपमान करने वालों को सजा क्यों नहीं? मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा का राष्ट्रीय प्रोटोकॉल भूल गए। जब उन्हें वोट लेना था तो गंगा उनके लिये माँ थी।

गोमुख से गंगासागर तक साइकिल यात्रा करने वाली पत्रकार अजाना घोष का कहना है कि थोड़ी बहुत शुद्धिकरण तो गंगा खुद ही करती है। उसके अन्दर स्वयं शुद्धिकरण की क्षमता है परन्तु यदि अप्राकृतिक ढंग से गंगा की अविरलता पर छेड़खानी होगी तो उसके दुष्परिणाम दिखाई देने लग रहे हैं। जो भविष्य में भयंकर प्राकृतिक आपदा को अंजाम देनी वाली है।


नदी में बहुत से सूक्ष्म वनस्पति होते हैं जो सूरज की रोशनी में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन बनाते हैं, गन्दगी को सोखकर ऑक्सीजन मुक्त करते हैं। इसी प्रकार बहुतेरे जीव जन्तु भी सफाई करते रहते हैं। लेकिन उद्योगों के प्रदूषण के कारण गंगा में तथा अन्य नदियों में भी जगह-जगह डेड जोन बन गए हैं। कहीं आधा किलोमीटर, कहीं एक किलोमीटर तो कहीं दो किलोमीटर के डेड जोन मिलते हैं। यहाँ से गुजरने वाला कोई जीव-जन्तु या वनस्पति जीवित नहीं बचता। जब फैक्टरियों का गन्दा पानी, मैकडेबल डिसलरी, तेल शोधक कारखाना, ताप बिजली घर और रासायनिक अवशेष नदी में गिरते हैं। तब इसका सबसे बुरा असर नदी के आस-पास रहने वाले समाज और अन्य प्राणियों पर पड़ता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि गंगा नदी में प्रदूषण बढ़ने से कटैया, फोकिया, राजबम, थमैन, झमंड, स्वर्ण खरैका, खंगशी, कटाकी, डेंगरास, करसा गोधनी, देशारी जैसी 60 देशी मछलियों की प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं।



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