गंगा रिपोर्ट- दोहरे मानदंड: विरोधाभासी रवैया

Submitted by Hindi on Mon, 04/22/2013 - 12:38

पर्यावरणीय प्रवाह संबंधी सिफ़ारिशें


सहमति के तमाम बिंदुओं के बावजूद रिपोर्ट को फेल घोषित करने का यह एक बड़ा आधार है। सच यह है कि दूसरे राज्य गंगा में चाहे कितना ही पानी छोड़े, गंगाजल को अक्षुण्णता प्रदान करने का दम देवभूमि में ही है। गंगा की अक्षुण्ण शक्ति का आधार हैं ‘बैक्टिरियोफॉज’ नाम के जीवाणुओं की विशाल संख्या। बैक्टिरियोफॉजेज बांधों की झीलों में बंधकर नष्ट हो जाते हैं। ये बैक्टिरियोफॉजेज नदी के तलछट में मौजूद होते हैं। तलछट के साथ ये बैक्टिरियोफॉजेज भी बांध की झील में बैठ जाते हैं। नीरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भागीरथी में पीछे से आने वाले तलछट का 90 फीसदी टिहरी की झील में बैठ जाता है। मात्र 10 फीसदी ही आगे जाता है। नदी का मतलब ही होता है - प्रवाह। रिपोर्ट नदी को ‘मछली क्षेत्र’ और ‘गैर मछली क्षेत्र’ में बांटकर देखती है। तद्नुसार साल के अलग-अलग महीनों में बांधों द्वारा न्यूनतम 30 से 20 प्रतिशत पानी छोड़े जाने का निर्देश देती है। इसकी हर पल की निगरानी स्वयं परियोजना को सौंपती है। निगरानी का अन्य स्तर स्वतंत्र एजेंसी को बनाती है और प्रथम पांच वर्ष वार्षिक निगरानी की औपचारिकता मंत्रालय को सौंपती है। रिपोर्ट दिसंबर से मार्च के बीच गंगा में 50 प्रतिशत तक पानी छोड़ने की एक अलग सिफारिश भी करती है। लेकिन यह सिफारिश सिर्फ नदी स्नान आदि विशेष सामाजिक मौक़ों तक के लिए सीमित है। रिपोर्ट उत्तराखंड में 6,942 मेगावाट से अधिक बिजली उत्पादन को अनुमति देने के पक्ष में नहीं है। रिपोर्ट ने छह नदियों पर भविष्य में किसी नई परियोजना को मंजूरी न देने की बात करती है: धौलीगंगा, नयार, बालगंगा, अस्सी गंगा, बिरही गंगा और भयंदर गंगा।

रिपोर्ट फेल क्यों?


प्रश्न यह है कि क्या इन तमाम एहतियातों से गंगा की अक्षुण्ण शक्ति बच जायेगी? नहीं! सहमति के तमाम बिंदुओं के बावजूद रिपोर्ट को फेल घोषित करने का यह एक बड़ा आधार है। सच यह है कि दूसरे राज्य गंगा में चाहे कितना ही पानी छोड़े, गंगाजल को अक्षुण्णता प्रदान करने का दम देवभूमि में ही है। गंगा की अक्षुण्ण शक्ति का आधार हैं ‘बैक्टिरियोफॉज’ नाम के जीवाणुओं की विशाल संख्या। बैक्टिरियोफॉजेज बांधों की झीलों में बंधकर नष्ट हो जाते हैं। ये बैक्टिरियोफॉजेज नदी के तलछट में मौजूद होते हैं। तलछट के साथ ये बैक्टिरियोफॉजेज भी बांध की झील में बैठ जाते हैं। नीरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भागीरथी में पीछे से आने वाले तलछट का 90 फीसदी टिहरी की झील में बैठ जाता है। मात्र 10 फीसदी ही आगे जाता है। नदी का मतलब ही होता है - प्रवाह। रुके हुए पानी की ऑक्सीजन क्षमता बहुत कम हो जाती है। ऐसे में बैक्टिरियोफॉजेज कैसे जिंदा रहें? यानी टिहरी के बाद भागीरथी में अमृत जल बने रहने की क्षमता आज मात्र 10 फीसदी ही बची है। सोचिए, यदि एक बांध का आंकड़ा यह है, तो रिपोर्ट द्वारा धाराओं का 70 से 80 फीसदी तक पानी रोक लेने की दी गई इजाज़त के बाद क्या होगा? देवप्रयाग की गंगा में तो बैक्टिरियोफॉजेज बचेंगे नहीं। यानी गंगा में जल तो होगा, अमृत नहीं।

असामान्य नदी: सामान्य नज़रिया


गंगा एक असामान्य नदी है। दरअसल, इस रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि इसका रवैया गंगा के साथ भी सामान्य नदी जैसा ही है। रिपोर्ट नदी को 60 प्रतिशत तक प्रभावित करने की इजाज़त देती है। इसे ‘प्रभावित’ करने का साफ-साफ मतलब दुष्प्रभावित करना है। रिपोर्ट इसके लिए गंगा की मूल धाराओं को भी नहीं छोड़ती। रिपोर्ट जिन धाराओं पर आगे और परियोजनाओं को मंजूरी नहीं देने की बात करती है, उनमें से कई पर पहले से ही परियोजनाएं हैं। मां धारी देवी के मंदिर की गढ़वाल में सबसे अधिक मान्यता है। रिपोर्ट इसके विस्थापन को रोकने का कोई प्रयास नहीं करती। उसका प्रयास बन चुकी परियोजना को जारी रखने की जुगत बताने का है। दो नदी परियोजनाओं के बीच की दूरी कितनी हो? रिपोर्ट इस पर चुप्पी साध लेती है। यह तो चरने के लिए चारागाह खुला छोड़ देने जैसा है। बांध परियोजना मालिक भी तो यही चाहते हैं।

दोहरे मानदंड


इसे रिपोर्ट की चालाकी कहा जाना चाहिए कि रिपोर्ट की तात्कालिक सिफारिशों का आधार कुछ और है और दूरगामी सिफारिशों का आधार कुछ और। आई आई टी, कानपुर संचालक मंडल के अध्यक्ष श्री एम. आनंदकृष्णन की अध्यक्षता में गठित गंगा ज्ञान आयोग ने पर्यावरणीय प्रवाह के निर्धारण के लिए ‘फ्लो ड्युरेशन कर्व’ यानी प्रवाह-अवधि संबंध को आधार बनाने की अनुशंसा की थी। प्रो. जी. डी अग्रवाल भी इसके सदस्य थे। वह इसी आधार पर गंगा में हर पल-हर स्थान पर न्यूनतम 50.1 प्रतिशत प्रवाह की मांग करते हैं। अंतरमंत्रालयी समूह की सदस्य सुनीता नारायण ने साल के पहले छह महीने न्यूनतम 50 और बाकी छह महीने 30 का प्रस्ताव रखा था। लोक विज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक श्री अनिल गौतम ने मुझसे हुई निजी बातचीत में ‘बिल्डिंग ब्लाक मैथेडोलॉजी’ को गंगा जैसी नदी के लिए सर्वश्रेष्ठ आधार कहा। राजेन्द्र सिंह ने इसी आधार पर गंगा को ‘ए श्रेणी’ की नदी घोषित करने की मांग की थी। दिलचस्प समूह भी मानता है कि लंबे समय में पर्यावरण प्रवाह के निर्धारण का आधार ‘बिल्डिंग ब्लाक मैथडोलॉजी’ ही होना चाहिए। लेकिन वह तात्कालिक सिफारिश का आधार ‘मीन सीजन फ्लो एप्रोच’ को बनाता है। यह आधार बांधों को तुलना में अधिक पानी रोकने और कम पानी छोड़ने की छूट देता है। यह दोहरा मानदंड क्यों? गौर करने की बात है कि दूरगामी सिफ़ारिशें गंगा पर्यावरणीय प्रबंधन योजना-2020 बनाने वाले आई आई टी संकाय के लिए हैं। योजना जब बनेगी, तब बनेगी; तात्कालिक सिफारिशों की आड़ में बांध परियोजनाएं तो अभी ही गंगा का सत्यानाश कर डालेंगी। दोहरे मानदंड की मंशा इस बर्बादी की छूट देना है।

विरोधाभासी रवैया


अस्सी गंगा पर बनी बिजली परियोजनाएं छोटी हैं; 4.5 से 9 मेगावाट उत्पादन वाली। बावजूद इसके उनके कारण जुलाई से सितंबर, 2012 के बीच बड़ी बर्बादी हुई। बह गए खेतों और मर गए मज़दूरों का मंजर उत्तराखंडवासियों को अभी भी याद है। बेरिकार्ड हुए मृत मज़दूरों के रिकार्ड को लेकर आवाजें अभी भी उठती रहती है। संगम चट्टी पर फैले मलबे के ढेर असल कहानी अभी भी कहते ही रहते हैं। लेकिन उत्तराखंड के अधिकारी इससे सबक नहीं लेते। समूह अध्यक्ष श्री बी के चतुर्वेदी से उनकी मांग थी कि 25 मेगावाट तक की परियोजनाओं को समूह की सिफारिशों से न बांधा जाये। रिपोर्ट इसे मंज़ूर नहीं करती, लेकिन छोटी परियोजनाओं को अनुशासित रखने के बारे में कोई स्पष्ट निर्देश भी नहीं देती। हां! संशोधन व डिज़ाइन में बदलाव की एवज में परियोजनाओं को बिजली दर बढ़ाने का मौका अवश्य देती है। यही इस रिपोर्ट का विरोधाभास है।

प्रदूषण नियंत्रण के मोर्चे पर फेल होने का बड़ा कारण शोधन संयंत्रों की क्षमता से ज्यादा कचरे की आवक, उन्हें 24 घंटे बिजली का न मिलना, डीजल की वैकल्पिक व्यवस्था के बावजूद चोरी तथा उपचारित जल के पुनरुपयोग न होना रहा है। रिपोर्ट इसकी चिंता तो करती है; रिपोर्ट प्रदूषण नियंत्रण के बारे में प्रदूषक बाध्य करने के बारे में भी कहती है, लेकिन कोई ठोस नीतिगत उपाय नहीं सुझाती। ‘जीरो डिस्चार्ज’ का संकल्प रिपोर्ट में है ही नहीं। गंगा प्रवाह से 500 मीटर दूरी तक निर्माण प्रतिबंधित करने का इलाहाबाद हाईकोर्ट के शानदार आदेश के बावजूद रिपोर्ट ने नदी और उद्योग के बीच की दूरी के बारे साफ-साफ कहने की हिम्मत नहीं जुटाती। वाष्पन के कारण गंगा बेसिन अकेले में पानी के नुकसान का आंकड़ा कम नहीं है। बुदेलखंड जैसे इलाकों में तो यह 40 प्रतिशत तक दर्ज किया गया है। बांधों की झीलों में रुके पानी का वाष्पन कम किया जा सकता है। इसे कम करके प्रवाह बढ़ाया जा सकता है। रिपोर्ट इसका जिक्र तक नहीं करती।

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