गंगोत्री हिमनद के गलित अपवाह के विलम्बित अभिलक्षण

Submitted by Hindi on Thu, 12/22/2011 - 11:17
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011
हिमालय के अधिकांश बेसिनों के काफी क्षेत्रों में हिम एवं हिमनदों से आच्छादित क्षेत्र होता है। इनसे निकलने वाली नदियों में, मौसम के अनुसार, मई के महीने में हिमनदों के पिघलने से अपवाह का प्रारम्भ होता है। हिमनदों से गलित अपवाह उस समय अपवाह को बढ़ाता है जब नदियों में अपवाह कम होता है इस प्रकार यह जल उपलब्धता में आने वाली कमी की पूर्ति करता है। हिमनद से पिघलता हुआ पानी पिघलने के कुछ अन्तराल बाद हिमनद के स्नाऊट पर प्रकट होता है। अपवाह के विलम्बन अभिलक्षण को अधिकतम अपवाह तक पहुँचने के समय (tp) एवं अपवाह की उत्पत्ति के समय एवं स्नाऊट पर प्रकट होने के समय के अन्तराल (te) में समयानुसार आने वाले परिवर्तनों के अध्ययन द्वारा समझा जा सकता है।

वर्तमान अध्ययन में गढ़वाल हिमालय में स्थित गंगोत्री हिमनद (हिमनद क्षेत्रफल 286 वर्ग कि.मी. कुल निकास क्षेत्रफल 556 वर्ग कि.मी.) के गलित अपवाह के विलम्बन अभिलक्षणों का अध्ययन किया गया है। इस उद्देश्य हेतु हिमनद के स्नाऊट (गोमुख) के पास लगभग 4000 मीटर पर तापमान एवं अपवाह के आंकडे़ मई 2004 से अक्टूबर 2004 तक एकत्र किये गये। इस प्रकार के अध्ययनों में साफ मौसम वाले दिनों के जलालेख एवं तापमान में दैनिक परिवर्तन महत्वपूर्ण सूचना प्रदान करते हैं। अपक्षरण काल के प्रारम्भ में मौसमी हिम आवरण की उपस्थिति के कारण हिमनदों में अपर्याप्त जलनिकासी तंत्र एवं अधिक सुदृढ़ भंडारण क्षमता के कारण, गलित अपवाह अधिक विलम्बित अभिलक्षण प्रदर्शि‍त करता है जिसके कारण जच एवं जम का मान अधिक होता है। अपवाह विलम्बंन प्राचलों की अपवाह अनुपात से तुलना से स्पष्ट पता चलता है कि समय अन्तराल (te) एवं अधिकतम तक पहुँचने का समय (tp) अपवाह में परिवर्तन से प्रतिलोमतः सह सम्बन्धित हैं।

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