गांवों को जगाता एक शिक्षक

Submitted by Shivendra on Sat, 08/14/2021 - 17:50
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6 जुलाई 2003,जनसत्ता

 महिला मंगल दल कार्यकर्ताओं के साथ उनके प्रेरणास्त्रोत मोहन चंद्र कांडपाल,फोटो:पानी बोओ

आमतौर पर किसी स्कूल शिक्षक की दिनचर्या घर से स्कूल आने-जाने तक सीमित रहती है। लेकिन ‘आदर्श इंटर कॉलेज, सुरईखेत (अल्मोड़ा)’ में रसायन शास्त्र के शिक्षक मोहन चंद्र कांडपाल अपवाद हैं। पर्यावरण एवं चेतना के अभियान में लगे हैं उनका अभियान द्वाराहाट और भिकियासैंण विकास खंडों के लगभग 50 गांवों में फैल चुका है मोहन कांडपाल कानपुर से एमएससी पास करने के बाद जब अपने गांव लौटे तो सौभाग्य से उन्हें अपने गांव सुनाड़ी के समीप विद्यालय में नौकरी मिल गई। उन्होंने शीघ्र ही यहां ‘पर्यावरण चेतना मंच’ बनाकर गोष्ठियों, रैलियों, प्रतियोगिताओं के माध्यम से विद्यार्थियों में पर्यावरण की चेतना लाने का कार्य आरंभ कर दिया। बहुत समय तक यह काम साथी अध्यापकों, स्थानीय दुकानदारों के चंदे से होता रहा। पर्यावरण सुधार के इस अभियान को स्कूल से बाहर गांव तक ले जाने के साथ ही रचनात्मक कार्यों को बढ़ाने के लिए अधिक संसाधनों और मार्गदर्शन की जरूरत पड़ी तो उन्होंने ‘उत्तराखंड सेवा निधि, अल्मोड़ा’ से संपर्क साधा। इसके साथ ही समान सोच वाले अन्य स्थानीय लोगों को जोड़कर ‘पर्यावरण शिक्षण एवं ग्रामोत्थान समिति’ ‘सीड’ के नाम से एक संस्था बनाई।

‘सीड’ आज 15 गांवों में बालवाड़ियां चला रही है। इनमें ढाई से 5 साल तक के बच्चों को न सिर्फ रोजाना 4 घंटे देखभाल की जाती है, बल्कि तरह-तरह के खेलों, बाल-कार्यों, भावगीतों इत्यादि के जरिए उनको पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों सबसे बढ़-चढ़कर अपनी मिट्टी से प्रेम करना सिखाया जाता है। ‘एक बनेंगे, नेक बनेंगे’ ‘मिलकर के हम काम करेंगे’ और ‘आज हिमालय जागेगा, दूर कुल्हाड़ा भागेगा।’ जैसे नारे पूरे गांव को एकता के सूत्र में बांधने का काम बखूबी करते रहे हैं। प्राइमरी में पढ़ रहे बच्चों के लिए शाम को गांव में संध्या केंद्र चलाते हैं, यहां बच्चे न सिर्फ अपने स्थानीय परिवेश के बारे में चर्चा करते हैं, बल्कि नन्हें हाथों से गांव के झरने, नौले-धारे आदि की साफ करने का, पॉलिथीन के बेकार थैली में पेड़-पौधे लगाने जैसा कार्य करके बड़ों को प्रेरणा दे रहे हैं। कांडे गांव की जानकी कांडपाल बताती हैं कि घर में पड़ी प्लास्टिक की थैली खाली होते ही बच्चों में उसे पाने की होड़ मची रहती है।

गांव की स्वच्छता भी पर्यावरण का ही अंग है लोगों को यह समझाने के साथ ही ‘सीड’ ग्रामीण परिवारों को शौचालय बनाने के लिए आंशिक रूप से आर्थिक मदद और फाइबर-ग्लास की बनी शौचालय सीट प्रोत्साहन स्वरूप देती है। पीढ़ियों से खुले में शौच करने के आदी रहे लोगों को शौचालय बनाने को बताना, शुरू में मुश्किल काम लगता था। लेकिन अब ग्रामीण इसके फायदे को भली-भांति समझने लगे हैं। मोहन कांडपाल बताते हैं कि अब तक 33 गांव में करीब 600 परिवारों को संस्था ने आंशिक आर्थिक मदद की है, जबकि सैकड़ों अन्य परिवारों ने इससे प्रेरित होकर बिना किसी अनुदान के ही खुद अपने लिए शौचालय बनवाए हैं।

सीड की चेतना से लगभग तीन दर्जन गांव की सुरक्षा, वनीकरण इत्यादि कार्यक्रमों में महिला संगठनों का पूरा सहयोग है।

रणा गांव में महिला संगठन ने पुराने नौलों का जीर्णोद्धार करने के लिए 2 किलोमीटर की चढ़ाई तक रेता, बजरी और सीमेंट का ढुलान किया। शिलंग की महिलाओं ने गांव की सामूहिक भूमि में वृक्षारोपण के लिए  जालली की नर्सरी से 15 से 20 किलो वजन के पौधे अपने सिर पर रखकर 1 किलोमीटर खड़ी चढ़ाई चढ़ीं। अब तो बहुत सारे महत्वपूर्ण काम बिना किसी परियोजना या पैसों के ही हो रहे हैं। 18 गांव में महिला संगठन के सामूहिक प्रयासों द्वारा मुक्त सार (पालतू मवेशियों को मरने के लिए खुला छोड़ देने की प्रथा) को बंद कर दिया गया है। इससे खेतों में खड़ी फसल घास, छोटे-बड़े पेड़-पौधे बच पा रहे हैं। महिला संगठनों की ओर से किए गए वनीकरण की सुरक्षा भी बिना किसी छेड़छाड़ के संभव हो पाई है। सभी महिला संगठनों ने अपने सदस्यों से पैसे जमा करके कोष बनाए हैं। जिससे वे जरूरत पड़ने पर अपने सदस्यों को उधार देते हैं। अपने सदस्यों को देने के बाद बचे पैसों से सामूहिक जरूरत को चीजों दरी, कंबल, शामियाना इत्यादि जोड़ते हैं, जिनको वे किराए पर उठाते हैं। शराबियों तथा जुआरियों को जिनसे पहाड़ की महिलाएं अधिक परेशान हैं समझा बुझाकर या जुर्माना लगाकर अंकुश लगाने का प्रयास ज्यादातर महिला संगठनों ने किया है।

शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर पारस्परिक सहयोग की भावना बहुत बढ़ी है। मिसाल के तौर पर शिलंग गांव में किसी परिवार में होने वाले कामकाज को महिला संगठन ही निभाता है। बदले में जब वह परिवार पुरस्कार के रूप में कुछ धनराशि महिला संगठन को देता है, जिसे कोष में जमा कर दिया जाता है। किसी महिला पर अत्याचार होता है तो संगठन से दूर करने को तत्पर रहता है। वे महिलाएं अब अत्याचार को चुपचाप सहने के लिए तैयार नहीं हैं। बालवाड़ी से जुड़कर मुझमें अब जवाब देने की हिम्मत आ गई है यह बात एक शिक्षिका बड़े गर्व से बताती हैं। प्राइमरी प्राइमरी पाठशाला सही वक्त पर क्यों नहीं खुले? बिजली का खराब ट्रांसफर अभी तक बदला क्यों नहीं गया? जंगलात वाले गांव की जरूरतों को अनदेखी करके चौड़ी पत्तियों वाली प्रजातियों के बदले चीड़ के पेड़ क्यों लगा रहे हैं? ऐसे सवाल अब गांव की सीधी सीधी-सच्ची और अनपढ़ महिलाएं भी उठा रही हैं। कांडे की महिलाओं ने तो वन विभाग द्वारा लगाए गए चीड़ के पेड़ों को उखाड़ फेंका और उन्हें बांज के पेड़ लगाने को विवश कर दिया। बहुत सारे ग्रामीण लड़कियों ने आस्था से जुड़कर वर्षों पहले अधूरी छोड़ दी गई स्कूली पढ़ाई को फिर से आगे बढ़ाया है और अधिक उम्र के कारण अब खुद पढ़ लिख सकने में असमर्थ महिलाएं भी शिक्षा का महत्व समझ गई हैं। श्रीमती निर्मला देवी कहती हैं कि ‘लड़की पढ़-लिखकर कुछ बन जाती है, तो जिंदगी में जलालत के तले दबना नहीं पड़ता।’

मोहन मास्टर साहब स्वीकार करते हैं कि गांव के पुरुषों का इन कार्यक्रमों में उतना जुड़ाव नहीं रहा जितना कि अपेक्षित था।लेकिन दूनागिरी क्षेत्र में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा कर हो रहे अवैध खनन के खिलाफ आंदोलन में द्वाराहाट महाविद्यालय के छात्रों ने मास्टर साहब का पूरा सहयोग दिया। सुरईखेत इंटर कॉलेज में आज 5 से 10 साल पुराने जो बांज के पेड़ दिखाई दे दे रहे हैं, वे उन विद्यार्थियों की कड़ी मेहनत का फल हैं, जो चार किलोमीटर दूर रणा की नर्सरी से पौधे लेकर के आए और रोपने के बाद उनकी देखभाल करते रहे।

अपने कार्य क्षेत्र के गांव में ‘मोहन मास्टर साहब’ और ‘पर्यावरण वाले मास्टर साहब’ के नाम से मशहूर इस अध्यापक के जुनून का ही नतीजा है कि एक नहीं बल्कि 50 गांवों में शिक्षा और पर्यावरण सुधार के प्रति लोगों में अभूतपूर्व जागृति आई है।