गोदावरी में गिरेंगे पहाड़

Submitted by Hindi on Sat, 04/20/2013 - 10:50
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पर्वत पर्वत, बस्ती बस्ती पुस्तक से साभार, प्रथम संस्करण 2011
गोदावरी और उसकी सहायक नदियां एक ओर महाराष्ट्र के नासिक और औरंगाबाद, गोदिया और नागपुर के आस-पास का जल समेटती है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के बस्तर जनपद से होकर इंद्रावती और उड़ीसा के भू-भाग से सबरी नदी भी गोदावरी में समाहित होती है। गोदावरी देश की दूसरी बड़ी नदी है और दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी है। पूर्वीघाट, दंडकारण्य की पहाड़ियों और जंगलों से छोटे-छोटे नालों तक का पानी समेटती हुई, गोदावरी नदी 910 मील बह कर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। जंगल आदिवासियों का मायका है। इनकी पूरी जिंदगी को जंगल से अलग कर देख पाना मुश्किल है। प्रकृति ने इनके आस-पास में जंगल इस तरह उगाए हैं कि इन्हें भोजन, पानी और आवास की पूरी सामग्री आसानी से मिल जाती है। इस सदी के मध्य तक आदिवासी इलाके और यहां के लोग अलग-थलग थे। उन तक पहुंच पाना कठिन था। इसके कारण पहाड़ों और आदिवासियों ने मानव परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों की हिफाज़त की। हिफाज़त विविधता और जटिलता के साथ अपने पर्यावरण से जुड़ी है। इधर कुछ सालों में राजस्व कमाने की होड़ और बड़े-बड़े कारख़ानों के पेट पालने के लिए अछूत जंगलों को भी नष्ट किया गया। पहाड़ियों को काट-काट कर जंगलों के दोहन के लिए सड़कें बनाई गई। जनता की ज़मीन को काट कर पगडंडियां बना दी गई। इससे पहाड़ों में भूस्खलन, मिट्टी का क्षरण और जोती ज़मीन का टूटना शुरू हो गया है। इससे दोआब और मैदानी क्षेत्र मिट्टी के जमाव और बाढ़ के कारण नष्ट हो रहे हैं। पर्वतीय ज़मीन और वहां के आदिवासियों की समस्याएं दिनों-दिन विकट होती जा रही हैं। पहाड़ों में पर्यावरण की खराबी अब मैदानों की ओर बढ़ कर और भी लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित करने लगी है। अभी तक हिमालय से निकलने वाली गंगा और ब्रह्मपुत्र में इस ख़राबी को देखा जाता था। किंतु पिछले साल 1986 गोदावरी की बाढ़ से अकेले पूर्वी गोदावरी जनपद के 2417 वर्ग किलोमीटर इलाके में बसने वाले 16 लाख से ज्यादा लोगों की तबाही हुई। दर्जनों बड़ी-बड़ी योजनाओं पर बुरा असर पड़ा और करोड़ों की विकास योजनाएं चौपट हुई।

मध्य प्रदेश के बस्तर, उड़ीसा के कोरापुर और महाराष्ट्र के चंद्रपुर जनपदों के जंगलों और छोटी-छोटी पहाड़ियों से लेकर आंध्रप्रदेश के दंडकारण्य और पूर्वी-घाट के पहाड़ों में आदिवासी और जनजातीय लोगों की रिहायश है। यह इलाक़ा गोदावरी का मायका भी है। पिछले दस सालों में अकेले पूर्वी गोदावरी के वन-प्रभागों में ग्यारह हजार से ज्यादा हेक्टेयर में पेड़ों की कटाई हुई। कारखाने वालों ने लट्ठों के ढुलान के लिए बिना सोचे-समझे पहाड़ियों को काट-काट कर सड़कों का जाल बिछाया। यह क्रम गोदावरी और उसकी सहायक धाराओं-सबरी, सिलेरू, पामलेरू, इंद्रावती आदि – के जलग्रहण इलाके के पहाड़ों और जंगलों में आज भी जारी है।

मुझको पिछले दिनों गोदावरी के आसपास के इलाकों की यात्रा के बाद अनुभव हुआ कि गोदावरी के जलग्रहण इलाकों में यदि इसी तेजी के साथ वन-विनाश जारी रहा तो गोदावरी की अगस्त 1986 की बौखलाहट फिर सामने आ सकती है। गोदावरी और उसकी सहायक नदियां एक ओर महाराष्ट्र के नासिक और औरंगाबाद, गोदिया और नागपुर के आस-पास का जल समेटती है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश के बस्तर जनपद से होकर इंद्रावती और उड़ीसा के भू-भाग से सबरी नदी भी गोदावरी में समाहित होती है। गोदावरी देश की दूसरी बड़ी नदी है और दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी है। पूर्वीघाट, दंडकारण्य की पहाड़ियों और जंगलों से छोटे-छोटे नालों तक का पानी समेटती हुई, गोदावरी नदी 910 मील बह कर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

मैंने गोदावरी का कार्यक्रम गंगा के किनारे सारनाथ से पटना की यात्रा के समय बना लिया था। मैं रेल से 13 अप्रैल 1987 को राजमुंदरी पहुंचा। इस यात्रा में राजमुंदरी में गोदावरी के दर्शन हुए थे। लगभग दो किलोमीटर चौड़े पाट के इस तरफ पूर्वी गोदावरी जनपद और उस तरफ पश्चिम गोदावरी जनपद है। राजमुंदरी इस इलाके का सांस्कृतिक और शैक्षिक केंद्र माना जाता है। राजमुंदरी का असली नाम राजमहेंद्रपुरम है। यहां बीरेश लिंगम एक प्रसिद्ध समाज सुधारक हुए हैं। उन्होंने शिक्षा और महिला जागरण का कार्य किया था।

राजमुंदरी से गोदावरी का डेल्टा शुरू हो जाता है। इसके दक्षिण में धवलेश्वरम में आज से 125 साल पहले एक अंग्रेज इंजीनियर कार्टर ने एनिकट (बांध) बनवाया था। यह भी बताया गया है कि अगस्त की बाढ़ में इस बैराज को नुकसान पहुंचा था। 16 अगस्त को धवलेश्वरम में गोदावरी का जलस्तर 22 फीट ऊंचा हो गया था। राजमुंदरी में कई छोटे-छोटे कारख़ानों के साथ एक कागज़ का कारखाना भी है। राजमुंदरी से रंपचौड़वरम के रास्तों में दर्जनों लोग साईकिल पर लकड़ी के गट्ठर बांध कर राजमुंदरी की तरफ दौड़ लगाते नजर आते हैं। यह काम हमेशा का ही है। जहां पर बस्तियां हैं सड़क के किनारे इस तरह के गट्ठर देखने को मिलेंगे ही।

रंपचौड़वरम मंडल का मुख्यालय है और आदिवासी कल्याण कार्य का संचालन यहीं से होता है। आदिवासी कल्याण के परियोजना अधिकारी मनोहर प्रसाद पिछले तीन सालों से आदिवासियों की ज़मीन पर फलों की खेती करने का काम सफलतापूर्वक चला रहे हैं। इसमें आदिवासी खूब रूचि ले रहे हैं। आदिवासी कल्याण विकास के तहत पिछले तीन सालों में 7333 परिवारों ने एक-एक हेक्टेयर ज़मीन में पेड़ों की खेती शुरू कर दी है। इस काम में विभाग सहयोगी और मार्गदर्शी की भूमिका अदा कर रहा है। बाकी काम आदिवासी खुद कर लेते हैं।

रंपचौड़वरम से देवीपट्नम तीस किलोमीटर है। देवीपट्नम गोदावरी के किनारे-किनारे बसा है। लगभग तीन हजार की आबादी है। यह इलाक़ा पिछले साल पूरी तरह से डूब गया था। किनारे पर जो पक्के मकान हैं उनकी छतों पर बाढ़ के पानी के निशान प्रलंयकारी बाढ़ की याद दिला रहे हैं। देवीपट्नम में गोदावरी की ओर इशारा करते हुए 80 साल की अम्मीयमा बताती हैं कि पिछले साल बाढ़ का पानी उसकी झोपड़ी से तीन मीटर ऊपर चढ़ गया था। बाढ़ में उसका सब कुछ बर्बाद हो गया था। वह जान बचाने के लिए पहाड़ी पर भाग गई थी। अब गोदावरी के किनारे-किनारे ज़मीन कटी हुई तो साफ दिख रही है।

पामलेरू नदी और उसी की सहायक धारा सोकलेरू डोम कोंडा (पहाड़ी) से निकलती है। इस नदी के आर-पार बड़े-बड़े पेड़ उखड़ कर आए हैं। मोरमिल्ली से लगभग 30 किलोमीटर आगे की पहाड़ी के बीच में पामलेरू के दोनों किनारों का पाट जो यहां पर ज्यादा चौड़ा है, अस्थायी बांध के द्वारा मलबा छोड़ता हुआ दिख रहा है। चौड़े से पाट के तटों पर सैकड़ों पेड़, जिनके ठूंठ कटे हुए हैं और जड़ों सहित उल्टे-सुल्टे दिखाई दे रहे हैं। इस चौड़े से पाट में साद और मलबा 30-40 फीट ऊंचाई तक फैला हुआ है। इसकी लंबाई 3-4 किलोमीटर से कम नहीं होगी। इसके आसपास बाई से पुलिंगीकाबजा और सवितिवागु नाले मिलते हैं।देवीपट्नम से पीछे हटकर एक दो किलोमीटर दूर तक सात-आठ फीट की ऊंचाई तक साद भरी हुई दिख रही है। साद को साफ करने और मकान बनाने का काम भी इस बीच शुरू कर दिया गया है। गोदावरी के पश्चिम में सिंहमपल्ली और पोलबरम से कुछ दूरी पर पोलबरम बांध बनने वाला है, जिसके तहत 250 गाँवों के एक लाख से ज्यादा लोगों के डूब क्षेत्र में आने की आशंका है। इससे आगे बढ़ने पर दारगुरम के आसपास आनमपल्ली के प्राकृतिक जंगलों को पूरी तरह काट कर वन विभाग वाले अब फिर से रोप रहे हैं। इसी तरह काकवाड़ा के आसपास के जंगलों को भी 1984 से काटा जा रहा है। इसकी जगह टीक की रोपाई की जा रही है। दूर-दूर तक जंगल पूरी तरह सफाचट किया गया है। यहां जगह-जगह एपी पेपर मिल के ट्रकों से लट्ठों को ले जाने के लिए सड़क खोदी गई है। जंगल कटाई से स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलने से पेड़ लगाने के काम में इस इलाके में कुछ ढिलाई है। काकवाड़ा में बैठक के दौरान कुछ लोगों ने नाराज़गी जताई कि रंपाचौड़वरम की प्लाइवुड फ़ैक्टरी वाले आम के पेड़ काट लेते हैं। आम के पेड़ों के कटान से आदिवासियों के पेट पर संकट आ रहा है। लंकापाकला गांव के पास पूरे पेड़ काट दिए गए हैं। पहाड़ियां ऐसी लग रही हैं जैसे चोटी को छोड़कर बाकी दाढ़ी बाल बना दिए गए हों। काकवाड़ा के 80 आदिवासियों पर पोडू झूम खेती करने के कारण मामला दर्ज किया गया। इस इलाके में जंगलों और मकानों के आसपास इमली के पेड़ बहुतायत में हैं। इमली को पूरे गांव के लोग एक साथ इकट्ठा करते हैं। उसका विपणन गिरीजन विपणन सहकारी समिति के जरिए होता है। रामनवलसा गांव में बांस पर आधारित टोकरी आदि के उद्योग गाँववालों ने शुरू किए हैं। पर लोगों की शिकायत है कि वन विभाग वाले उन्हें बांस का उपयोग करने से रोकते हैं। इसी तरह बुसीगुड़म गांव में बढ़ईगिरी के प्रशिक्षण के लिए जो थोड़ी सी लकड़ी की जरूरत थी, उसे भी देने से मना कर दिया गया। तब उन्हें नीलाम में बेची जाने वाली लकड़ी खरीदनी पड़ी। लेकिन लोगों का कहना है कि उन्हें स्थानीय उद्योगों के लिए सस्ते मूल्य पर वनोपज मिलनी चाहिए।

गांव के ही चंदेला पांडुरेड्डी दुखी होकर कहते हैं कि उनके यहां पानी का बड़ा संकट है। वे आगे कहते हैं पहाड़ तो हमें दे दिया है, पर पेड़ तथा ज़मीन वन विभाग के कब्ज़े में हैं। लोग परेशानी में हैं। यहां यह भी जानकारी मिली कि आस-पास जंगल में कुछ युवकों का शिविर है जो मार्क्सवादी और लेनिनवादी संगठन से जुड़े हैं। वे समय-समय पर आकर लोगों का मनोबल बढ़ाते रहते हैं। यह भी जानकारी मिली की लोग नई चीजों को, जिनमें अनाज और फल मुख्य रूप से हैं, तब तक नहीं खाते हैं जब तक कि पूजा न कर लें। इसे कोतुलपडंगा (अनाज का उत्सव) कहते हैं। इस इलाके की पहाड़ियां दो हजार से ढाई फीट तक ऊंची हैं। इसमें लोग पांडू (झूम खेती) करते हैं। फसल में सामा, ज्वार, बबली, कंदी (मूंग), औरया आदि अनाज होता है। इमली और मामड़ी (आम) के अलावा मदी, चप्पू, कुरमान, जिलगू और बूसीफल होता है। ये गांव वालों के बहुउपयोगी पेड़ हैं। कंद में भी किद्दुम्मा, कंडा, सिडीडुम्मा, रावी आदि होते हैं। इस इलाके के आदिवासियों को कोंडारेड्डी (पहाड़ी रेड्डी) कहते हैं। वाल्मिकी लोग भी हैं, जो असरदार माने जाते हैं। गांव के चारों ओर जंगल बहुतायत में देखने को मिलेगा। लेकिन इस बीच ये हरे-भरे सदाबहार प्राकृतिक जंगल चौपट किए जा रहे हैं। साथ ही बांस भी पूरी तरह से काटा जा रहा है। यह बांस आंध्रप्रदेश कागज़ कारखाना राजमुंदरी को दो सौ तिरसठ रुपये प्रति टन के भाव बेचा जाता है। जबकि खुले में पंद्रह सौ रुपये प्रति टन के भाव से बेचा जाता है। यह भी पता चला है कि कागज़ के कारखाने को बांस की कमी हो गई है। इसलिए पिछले दस सालों से बांस के साथ-साथ कढ़ी (प्लाइवुड) का भी इस्तेमाल शुरू हो गया है। इस इलाके में तेंदू भी होता है। जंगल काटने में कोंडारेड्डियों को थोड़ी बहुत मजदूरी मिल जाती है। पर ज्यादातर अपने में ही मस्त रहते हैं। उन्होंने अभी अपनी जरूरतें ज्यादा बनी बढ़ाई हैं। पता चला है कि आजकल नीरा निकालते हैं। यह जिलगू पेड़ से निकाला जाता है। इसे पीते हैं, और उसके बाद खूब खुलकर बोलते हैं।

कोंडारेड्डियों से बात करने पर पचा चला कि उनका जीवन जंगली उत्पादों पर निर्भर रहता है। जरूरत भी कम है। उसी में संतोष कर लेते हैं। अनाज के लिए पोडू कर लेते हैं। इमली और झाडू को बेच कर नमक और कपड़ा खरीद लेते हैं। अब आम, रीठा, इमली आदि के प्राकृतिक जंगलों को नष्ट कर ऐसे पेड़ लगाए जा रहा हैं जो आदिवासियों के काम के नहीं हैं। पता चला है कि वन विभाग को एक हेक्टेयर जंगल के पेड़ों को कटवाने में दो लाख तक आय हो जाती है। लेकिन इसका कोई मूल्य नहीं है। इन जंगलों को नष्ट होने से जिस गति से भूक्षरण और भूस्खलन बढ़ रहा है, गोदावरी पर उसका किस तरह का असर पड़ेगा, यह पिछले साल की बाढ़ जता चुकी है।

एक जंगलात अधिकारी ने बताया कि अब तक एक ही प्रभाग से 8 हजार हेक्टेयर से ज्यादा ज़मीन के जंगलों को पूरी तरह साफ करके उनकी जगह टिकाऊ सफेदा के पेड़ लगाए गए हैं। काकीनाडा वन प्रभाग में 6 रेंज है और अनुमान है कि पिछले तीन सालों में 3 हजार हेक्टेयर के जंगल चौपट किए गए और अब एक सौ हेक्टेयर जंगल हर साल एक रैंज काट रहा है।

मारेडुमिल्ली मंडल प्रज्ञा परिषद का मुख्यालय हैं। यहां से आगे पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। मारेडुमिल्ली से आगे पहाड़ियों पर बसे गांव के लिए ऊबड़-खाबड़ सड़क कागज़ के कारखाने और प्लाइवुड फ़ैक्टरी वालों ने अपने ट्रकों को लाने ले जाने के लिए बना रखी है। इन पहाड़ियों से गोदावरी की सहायक धारा पामलेरू नदी (सांप जैसी) बहती है और इसी की अनेकों धाराएं अलग-अलग पहाड़ियों का जल समेटती हुई इसमें मिलती हैं। रास्ते में जगह-जगह प्राकृतिक जंगलों को काट कर टीक रोपा गया है। कहीं-कहीं सफेदा के पेड़ भी रोपे गए दिखाई दिए। रास्ते में भूस्खलन भी आस-पास की पहाड़ियों पर दिखाई दिया।

रास्ते में पोडू के लिए साफ किए गए छोटे-छोटे पेड़ एक किनारे धराशाई किए गए मिले। कहीं-कहीं तो पोडू वाली ज़मीन पर आग लगी थी। ज्यादातर भागों में पोडू वाले इलाके जलकर काले और बीच-बीच में राख से सफेद हो गए थे। ये इलाके बड़े डरावने लग रहे थे। पोडू के बीच-बीच में आम के पेड़ खड़े दिखाई दिए। बताया जाता है कि इधर चोरी या चुपके से निकालने की कोई बात है नहीं। कटहल के पेड़ रास्ते में फलों से लदे हुए दिखाई दिए। लोगों के अपने मकानों के आस-पास भी इन पेड़ों की बहुतायत है। जंगली पेड़ों के फल तो सब मिलकर तोड़ते हैं और बराबरी का उपयोग करते हैं।

लोग बताते हैं कि इन नदियों के जलागम वाले पहाड़ों में पिछले चार पांच साल में जंगलों का सफ़ाया किया गया। भीमवरम और चिंतलपुड़ी कूप भी काटा गया। इन दोनों कूपों में तीन साल से जंगल कट रहे हैं। यहां पहले कटने के लिए कूप का चुनाव करते हैं। फिर ट्रक के आने जाने के लिए सड़क बनाते हैं। इसमें स्थानीय लोगों ज़मीन को काटकर भी सड़क बनाई जाती है। विरोध करने वालों को लालच देकर मुंह बंद कर दिया जाता है। रिजर्व फॉरेस्ट में भी इस तरह की गड़बड़ी की जानकारी मिला। पामलेरू नदी और उसी की सहायक धारा सोकलेरू डोम कोंडा (पहाड़ी) से निकलती है। इस नदी के आर-पार बड़े-बड़े पेड़ उखड़ कर आए हैं। मोरमिल्ली से लगभग 30 किलोमीटर आगे की पहाड़ी के बीच में पामलेरू के दोनों किनारों का पाट जो यहां पर ज्यादा चौड़ा है, अस्थायी बांध के द्वारा मलबा छोड़ता हुआ दिख रहा है। चौड़े से पाट के तटों पर सैकड़ों पेड़, जिनके ठूंठ कटे हुए हैं और जड़ों सहित उल्टे-सुल्टे दिखाई दे रहे हैं। इस चौड़े से पाट में साद और मलबा 30-40 फीट ऊंचाई तक फैला हुआ है। इसकी लंबाई 3-4 किलोमीटर से कम नहीं होगी। इसके आसपास बाई से पुलिंगीकाबजा और सवितिवागु नाले मिलते हैं। इन नालों में भी ऐसा लग रहा है कि पहाड़ के पहाड़ टूट कर आ गए हों। इधर पामलेरू के दाई ओर अभी भी जंगल कटान जारी है। ट्रक के ट्रक यहां से रोज लकड़ी काट कर ले जाते हैं। जंगल काटने के लिए आए हुए मज़दूर मुरल्ला जग्गाराव और मुरलावाल रेड्डी कहते हैं कि वे गुडखेल, कालवा और आकूमामड़ी कोटा में पिछले कई सालों से जंगल काट रहे हैं।

पामलेरू की कुछ ऊंचाई पर आकुमामिदिकोटा गांव है। यहां पर भी पामलेरु की अगस्त की बाढ़ के प्रलयंकारी दृश्य आज भी दिखाई दे रहे हैं। यहां पर गांव के लोगों के सालों से पाले संतरों के बाग भी चौपट हुए। उनकी जगह पर अब रेत ही रेत है। सब उजड़ गया है। छूट गया केवल प्रलय का प्रतीक रोखड़। यहां पर पुलिस का निगरानी केंद्र भी है। यह केंद्र इन पहाड़ियों में मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों से जुड़े कार्यकर्ताओं पर निगरानी रखने के लिए है। इस तरह का एक केंद्र इससे भी दूर पहाड़ियों के बीच होने की भी जानकारी मिली।

आकुमामिदिकोटा गांव का मुखिया कोंडला शम्भू रेड्डी बताता है कि अगस्त 1986 की वह रात काली रात थी। गांव के चारों ओर बाढ़ का पानी भर गया था। भूस्खलन हो रहा था। पेड़ों से नदी का मुंह भी बंद हो गया था। बाढ़ के समय गांव के 15 एकड़ में फैले फलदार पेड़ बर्बाद हो गए थे। धान की खेती खराब हुई। जंगली जानवर भी मारे गए। वे बताते हैं कि बंदर बहुतायत में मारे गए। मोटे-मोटे सांप और मछलियाँ भी मरीं। लोग बताते हैं कि इन नदियों के जलागम वाले पहाड़ों में पिछले चार पांच साल में जंगलों का सफ़ाया किया गया। भीमवरम और चिंतलपुड़ी कूप भी काटा गया। इन दोनों कूपों में तीन साल से जंगल कट रहे हैं। यहां पहले कटने के लिए कूप का चुनाव करते हैं। फिर ट्रक के आने जाने के लिए सड़क बनाते हैं। इसमें स्थानीय लोगों ज़मीन को काटकर भी सड़क बनाई जाती है। विरोध करने वालों को लालच देकर मुंह बंद कर दिया जाता है। रिजर्व फॉरेस्ट में भी इस तरह की गड़बड़ी की जानकारी मिली।

आकुमामिदिकोटा से 6 किलोमीटर आगे बंदा गांव है। बंदा के रास्ते में आते हुए दो नाले मिले। बहुत बौखलाए हुए थे। एक ओर सवितिबागू और दूसरी ओर को पेडिंलबागू बहती है। दूर-दूर तक पेड़ कटे हैं। पोडू के लिए जहां-तहां आग लगी है। बंदा गांव वालों के बाग भी नष्ट हुए। जगह-जगह भूस्खलन दिखाई दे रहा था। यहां भी बहुत तबाही हुई लेकिन गांव कुछ ऊंचाई पर है, इसलिए नुकसान कम हुआ। इस गांव में आवास योजना के तहत शासन की ओर से मकान बनाने का काम चल रहा है। इस म को आदिवासी कल्याण विभाग वाले करवा रहे हैं। इस गांव में सौर उर्जा से स्ट्रीट लाइट के खंभे भी देखने को मिले। इधर फल के पेड़ों की खेती का विस्तार भी हुआ है। इस इलाके से पहले बांस काटकर कागज़ के कारखाने के लिए ले जाते रहे थे।

पोडू के बारे में बताते हैं कि यहां स्थाई रूप से अनाज के लिए खेत बनाना संभव नहीं है। मिट्टी बह गई है। लाल छोटे-छोटे पत्थर हैं। पोडू करने से पेट भरने के लिए हो जाता है। यदि पोडू वाली ज़मीन में फलदार पेड़ हो जाए तो उससे फिर मारेडमिड्डी से चावल खरीद सकते हैं। पोडू वाली ज़मीन में संतरे के पेड़ लगाएंगे तो कुछ साल तक कुछ नहीं होगा। जबकि पोडू में तो छह-माह में ही कुछ न कुछ मिल जाता है। यहां पर इमली के पेड भी कम दिखे, कटहल और आम के पेड़ खूब मिले।

बंदा के कनिवाड़ा जाने के लिए पहाड़ी चढ़नी पड़ती है। यह लगभग साढ़े तीन हजार फुट ऊंची होगी। इसके रास्ते में भी भूस्खलन के मलबे को पार करके जाना पड़ा। पहाड़ की चोटी से कनिवाड़ा की सीमा शुरू हो जाती है। यह गांव टोलों में बंटा है। पुलिस बंदलों, जाजिवलिसा, पडविधी, गंदरलू, बोसिविधि, पैदवोध गिंजीकुडा, कनिवाड़ा में कुछ खेत चौरस हैं। कहीं सिंचाई भी होती है। इन खेतों को देखकर लगता है कि हम कुमाऊं की पहाड़ियों के बीच हैं। यहां के जंगलों में जंगली जानवरों में भेड़, हिरण, खरगोश, जंगली मुर्गी, परडी, जकी, वौड, पंडी, गुआ और पिकड़ी भी पाई जाती हैं। जंगलों के सिकुड़ने के साथ जंगली जानवर कम होते जा रहे हैं। कोणनीलम रेड्डी बताता है कि जंगलात वाले इधर आते नहीं हैं। पटवारी भी नहीं आता है। कांग्रेस वाले और तेलगूदेशम वाले भी नहीं आते। आसपास कुछ कम्युनिस्टों का अड्डा था। वे लोग शांतिराजु के साथी थे। उनके आने के बाद पुलिस उन्हें सताने लगी। इसलिए उनके कष्ट बढ़ गए हैं। उनका समर्थन करने के बहाने पूछताछ के कारण लोग परेशान होते थे। एक आदमी को नक्सली कहकर पकड़ना चाहते थे। पांच सौ रुपया और एक बकरी देनी पड़ी, तब जाकर छोड़ा। यह बात पिछले साल की थी। 70 पुलिस वाले आए थे। एक के घर में तीन युवकों को पकड़ा, खूब पीटा भी। उन्हें भी नक्सली कह कर गांव के बाहर ले गए। उनका क्या हुआ पता नहीं?

इस कारण ठेकेदारों की शरण में भी यहां के लोगों को जाना पड़ता है। एक दूसरे गांव का किस्सा इस तरह सुनने को मिला। एक दफा पुलिस ने कुछ गांव वालों को नक्सलियों को शरण देने के आरोप में पकड़ लिया था। तब लोग भाग कर जंगल के ठेकेदारों के पास गए। जिसने उन्हें एक हजार रुपया दिया। तब उन्होंने अपने लोगों को पुलिस की हिरासत से छुड़वाया। इस प्रकार ठेकेदारों की गिरफ़्त में इस इलाके के लोग आते रहते हैं। फिर ठेकेदार मनमाने ढंग से अपने नाम ज़मीन का और जंगल का पट्टा करवा लेते हैं।

कहते हैं कि कम्युनिस्ट कार्यकर्ता प्रचार करते हैं कि सरकारी लोग मदद नहीं करते। इसलिए मुकाबला करना चाहिए। सरकार के साथ भिडंत करनी चाहिए। चुप रह कर कुछ नहीं होगा। जंगलात के लोग आएं तो उनसे डरो नहीं, रिजर्व फॉरेस्ट में भी पोडू करो। लोग बताते हैं कि उनके पास पोडू कम नहीं है। अब तो वे अधिक पोडू करने के लिए तैयार नहीं हैं।

इस गांव में कई युवतियां की प्रसव से पहले मृत्यु हो जाती है। नज़दीक में कहीं अस्पताल तो है ही नहीं। जड़ी बूटी से अब पूरा इलाज होता नहीं। इस तरह न रास्ता ही है, जो अस्पताल तक जा सके। कहते हैं कि अस्पताल तो चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर होना ही चाहिए।

पोडू के बारे में सीधे-सीधे कहने में तो लोगों को अच्छा नहीं लगता एक भाई ने कहा कि हमारा पोडू तो सबको अखर रहा है। पर क्या यह भी सोचा गया कि जो वन विभागा बेतहाशा ढंग से जंगल कटान कर रहा है, उसके मुकाबले में हमारा पोडू कुछ भी नहीं है। हम सदियों से पोडू करते आ रहे हैं। वन विभाग वाले तो अभी पांच दस बरस से एक तरफ़ा वन विनाश कर रहे हैं। दूसरी ओर वन विभाग और तथाकथित वैज्ञानिकों का एक तबका आदिवासियों और इनकी चलित खेती (पोडू) की प्रथा को वनों के विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराता है।

पहाड़ी को लांघकर पैदामाडूलू गांव होते हुए तागकामिड़ी जाने पर रास्ते में जगह-जगह भूस्खलन नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि पहाड़ी पर किसी ने नाखून मार दिए हों। दर्जनों भूस्खलन हुए हैं। चौड़े तो कम है पर लंबे काफी है। इसके कारण नाले भी रुके हुए होंगे, ऐसे लक्षण साफ दिखाई देते थे। एक ओर आज भी भूस्खलन का भयावह रूप दिखाई दे रहा था। दूसरी ओर पोडू के कारण पहाड़ियों पर लगी आग का दृश्य और भी डरावना लग रहा था। यहां पर सड़क के चिह्न भी कहीं-कहीं दिखाई दे रहे थे। कांदीबाड़ा से गोपुलताता मामड़ी छह किलोमीटर दूर है। एक नाले के किनारे किनारे इमली और कटहल के पेड़ बहुतायत में दिख रहे थे। पोडू वाली ज़मीन पर भी इनकी अलग पहचान दिख रही थी। लोग बताते हैं कि गिरिजन इन पेड़ों को बचा के रखते हैं। छोटी-छोटी पहाड़ियां हैं। इधर भी पोडू वाली ज़मीन पर आग लगाने का काम जारी है। एक जगह हल्ला हो रहा था। पता चला कि ये लोग पोडू के पेड़ काटने से पहले पूजा करते हैं और जब ये पेड़ सूख जाते हैं, उन पर आग लगाने से पहले आवाज लगाते हैं और कहते हैं “औ चीम लारा, पामु लारा सतकोटि जीवलारा, डोकू लारा मंद लारा, कुंडेचेनुक अग्गुजु, पडेतुनाम्म तपू कोंडी”। यानी ओ चीटियों, ओ सांपो और सहस्त्र करोड़ जीवों, हम यहां आग लगा रहे हैं। आप यहां से भाग जाइए। इसके बाद पोंडू वाली ज़मीन पर आग छोड़ते हैं।

गोपुलताता मामड़ी गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर उसी पहाड़ी के दूसरी तरफ के ढाल पर पिछली अगस्त में भारी भूस्खलन हुआ था। इसमें मलबे के नीचे सादल आदिय्या, उसकी पत्नी बंगारम्मा और एक साल की लड़की यंगरम्मा दब कर मर गई थी। सादल आदिय्या के तीन छोटे-छोटे बच्चे छूट गए। यहां पर इस मलबे से गांववासियों के संतरे तथा कटहल के दर्जनों पेड़ नष्ट हो गए थे।

पहाड़ी को लांघकर पैदामाडूलू गांव होते हुए तागकामिड़ी जाने पर रास्ते में जगह-जगह भूस्खलन नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि पहाड़ी पर किसी ने नाखून मार दिए हों। दर्जनों भूस्खलन हुए हैं। चौड़े तो कम है पर लंबे काफी है। इसके कारण नाले भी रुके हुए होंगे, ऐसे लक्षण साफ दिखाई देते थे। एक ओर आज भी भूस्खलन का भयावह रूप दिखाई दे रहा था। दूसरी ओर पोडू के कारण पहाड़ियों पर लगी आग का दृश्य और भी डरावना लग रहा था। यहां पर सड़क के चिह्न भी कहीं-कहीं दिखाई दे रहे थे। पता चला कि यह सड़क भी राजमुंदरी कागज़ कारखाने वाले ने ही बांस और लकड़ी के ढुलान के लिए बंदा से गिजिवाड़ा-बैगीवाड़ी तक बनाई गई थी। पहाड़ी दूसरे ढाल पर इस मोटर सड़क से चालीस-पचास फीट नीचे पुज्जुमोदि गांव है।

उसके आगे हमको एक पहाड़ की चोटी लांघनी पड़ी। यहां भी चारों ओर से भयंकर भूस्खलन का नज़ारा दिखाई दिया। इस दरवंदल पहाड़ पर पेपर के कारखाने वाले के ट्रक के लिए पगडंडिया खोद-खोद कर निकाली गई हैं। यहां नीचे दारवंडल कालवा (नाला) पूरा मिट्टी और पत्थर के ढेरों से दूर तक भरा हुआ है। जिसमें अलग-अलग नाले भूस्खलन का मलबा बिछाए हैं। बीच-बीच में बची हुई ज़मीन पर कोंडारेड्डियों ने अपनी झोपड़ियां फिर बनाई है। बंदा गांव के मुखिया चिनुकु रेड्डी बताते हैं कि पुल्लिसंगुडी तक पेपर मिल वालों ने पांच साल तक कटान किया। एक कोंडारेड्डी तैश में आकर कहता है कि जंगलात के लोग तो पूरे पहाड़ के जंगल नष्ट कर रहे हैं। वह तो किसी को बुरा नहीं लग रहा है, जो हमारे बुजुर्ग सदियों से पोडू करते आ रहे हैं और आज हम भी कर रहे हैं वह सब की आंख की किर-किरी बना हुआ है।

चावड़ीकोटा (बौद्धलंका) के प्रधान पल्लाराम रेड्डी ने कहा कि उन्होंने पोडू वाली भूमि से फलदार पेड़ लगाने शुरू कर दिए हैं। यह काम आदिवासी समग्र विकास एजेंसी के सहयोग से किया जा रहा है। अभी तक उनके क्षेत्र के 144 परिवारों ने अपनी पोडू वाली ज़मीन में फलदार पेड़ लगा दिए हैं। वे कहते हैं कि पोडू करना उतना अच्छा नहीं है। न यह अच्छी आदत है। उनके यहां परचून की दूकान भी है। बौद्धलंका में आश्रम विद्यालय भी है। आस-पास के गाँवों के लड़के यहां छात्रावास में रहकर पढ़ाई करते हैं।

यह इलाक़ा जंगल के बीच में हैं, पर पहाड़ भी सटे हैं। एक व्यक्ति बताता है कि उनके गांव तक नक्सली नहीं आते। न उन पर नक्सलियों का प्रभाव है। कोंडा (पहाड़ी) रेड्डी पिछड़े हैं, इसलिए उन पर नक्सलियों का उतना असर है। विश्वास प्रकट करते हैं कि पेड़ों की खेती के विस्तार से कोंडारेड्डियों की हालत में सुधार हो जाएगा।

इस क्षेत्र में आदिवासियों और जंगलों के शोषण के बारे में कई जानकारियाँ मिली। मनोहर प्रसाद बताते हैं कि कई आदिवासियों के नाम पर कई-कई हेक्टेयर ज़मीन है। जिसमें विकसित जंगल खड़े हैं। इन पर आजकल बिचौलियों की गिद्ध निगाह लगी हुई है। बाहर के लोग गिरिजन को फुसलाकर कुछ सौ रुपये देकर के अपने नाम पर अधिकार पत्र के लिए अंगूठा लगवा देते हैं। मनमाने ढंग से इस तरह की ज़मीन के जंगलों को काट कर लाखों रुपये कमा लेते हैं।

इस गड़बड़ी को रोकने के लिए पूर्व गोदावरी के कलेक्टर ने कदम उठाए तो उनके खिलाफ अदालत में भी मामला गया। बाद में पाया गया कि कलेक्टर का कदम उचित था और यह भी सोचा गया है कि यदि गिरिजनों को वास्तव में खेती के लिए ज़मीन चाहिए तो जो नंगी बिना पेड़ की धरती है, उसे दिया जा सकता है। पर यह तो गिरिजानों की ज़मीन पर खड़े जंगल को बर्बाद करने की चाल मात्र है। यह भी जानकारी मिली कि इसी तरह की एक हेक्टेयर ज़मीन के जंगल का निलाम वन विभाग वाले दो लाख रुपया तक में करते हैं। वहीं गिरिजन से केवल कुछ सौ रुपये देकर अधिकार ले लिया जाता है। पर इस बीच इस पर रोक लगी हुई है। इससे पहले सैकड़ों एकड़ ज़मीन के ऊपर के जंगल खत्म कर दिए गए हैं और इस नए कदम के तहत नौ मामले रोक लिए गए हैं। चिंतलपुड्डी जंगल के आस-पास टेकेदार ने इस तरह की भूमि के पट्टे हथियाए थे। खम्मम जनपद के चिंतूर जाते हुए रास्ते में बारामूरू में नामक स्थान पर राजमुंदरी पेपर मिल्स का 30 एकड़ में ट्रौपिकल-पाईन का प्रयोग केंद्र सन् 1971 से शुरू हुआ था। इसमें चीड़, सुबबुल, गुमड़ी और बांस के पेड़ उगाए जा रहे हैं। शायद इस प्रयोग के बाद और भूमि हथियाने की मंशा है। यहां से थोड़ी ही दूरी पर पामेरु नदी पर बारामूरू पुल बना हुआ है। अगस्त 1986 की बाढ़ में पानी इस पुल से ऊपर पहुंच गया था। पुल को नुकसान भी हुआ। इसके आगे पामलेरू नदी में दूर तक बाढ़ से उखड़ते हुए पेड़ों का अंबार दिखाई दे रहा है। नागेश्वर राव बताता है कि उसके मकान समेत यहां पर चार मकान बह गए थे। वे भाग कर दूर चले गए थे।

यहां दूर आठ-दस किलोमीटर बारामुरू-सतलवाड़ा सीरिज के तहत पहाड़ के प्राकृतिक जंगलों को नष्ट कर मीलों लंबाई तक सफेदा, चीड़ और टीक का प्लांटेशन किया गया है। प्राकृतिक हरे-भरे और सदाबहार जंगल को नष्ट करके रेयन और कागज़ के कारखाने लगाने के लिए यह किया गया होगा। इसमें यह नहीं सोचा गया कि इन वन्य जीवनों का वास स्थल तथा जल छाराओं का उद्गम भी इन्हीं घने जंगलों में होता है। इनके विनाश का सीधा असर तो इन पर पड़ेगा ही अपितु वहां की धरती की गड़बड़ी भी बढ़ेगी।

आदिवासियों की ज़मीन को सुरक्षित रखने के लिए यह जरूरी है कि गैर आदिवासी को उस ज़मीन पर उसकी किसी भी तरह की उपज को भूमि को भूमि से सीधे हथियाने का अधिकार न हो। जरूरी होने पर उसको उचित मूल्य का प्रबंध शासन करें। वृक्षारोपण के लिए जरूरी है कि स्थानीय भौगोलिक परिस्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रजाति के पेड़ लगाए जाने चाहिए। इस काम में स्थानीय ग्रामीणों को नर्सरी से लेकर के पेड़ लगाने के कार्यों से सीधा संबंध जोड़ा जाना चाहिए।

खम्मम जिले की तरफ टाइगर कैंप के आसपास भी सफेदा ही सफेदा का प्लांटेशन है। जिसकी कटाई भी चालू हो गई है। यह भी कागज़ के कारखाने के पेट के लिए तैयार किया गया है। जिस तेजी के साथ प्राकृतिक जंगल को पूरी तरह से नष्ट कर सफेदा के प्लांटेशन में बदला जा रहा है, यह चिंता की बात है। यह तो धरती, जीव-जंतु और गिरिजनों के लिए घातक अपराध है जो बिना सोचे-समझे अभी भी जारी है। चिंतूर में छोटे-छोटे संगठन बने हैं जो न्याय के लिए संघर्ष करते हैं। मुख्य रूप से आदिवासियों के लिए गोदावरी में प्रस्तावित पोलवरम बांध के बारे में लोग बहुत चिंतित हैं। इस बांध के तहत अकेले आंध्रप्रदेश के 233 गांव डूब में आएंगे। सवा लाख लोग प्रभावित होंगे। कहते हैं – इस काम से यहां का आदमी प्रभावित होगा, संस्कृति नष्ट होगी। इस बांध के फायदे तो गिनाए जा रहे हैं, लेकिन डूबने वालों को भी पूछना चाहिए। लोग कहते हैं कि पैसा मत दो, पहले पुनर्वास करो। फिर बांध बनाओ।

चिंतूर खम्मम जनपद में आता है। यहां के जंगल भी भद्राचलम पेपर मिल्स के लिए तेजी से काटे जा रहे हैं। चिंतूर के आस-पास भी प्राकृतिक जंगल खत्म से हैं। चिंतापल्ली में प्लाइवुड का एक कारखाना लगाया जा रहा है। इसके कारण आगे से इस क्षेत्र में आमों की कटाई का संकट बढ़ेगा। चिंतूर गोदावरी की सहायक धारा सबरी के किनारे बसा है। यहां से कुछ ही दूरी पर सबरी और सिलेरू का संगम है। संगम का क्षेत्र तीन राज्यों का विभाजन करता है। एक ओर आंध्र प्रदेश का खम्मम जनपद, दूसरी ओर मध्य प्रदेश का बस्तर जनपद का कोटा गांव और तीसरी ओर सबरी और सिलेरु के बीच उड़ीसा का कोरापुट जनपद है। पता चला है कि 1986 की बाढ़ में चिंतूर का मंडल पूरा पानी में डूब गया था। चिंतूर के मोहनराम बताते हैं कि सिलेरू में बाढ़ ज्यादा आई और सबरी में भी आई। इन नदियों में पेड़ बह कर आए। पशु और मृत जंगली जानवर भी बहकर आए। कई गांव डूब गए थे।

कुनवरम में सबरी गोदावरी में समाहित हो जाती है। लगता है कि सबरी में जल राशि अधिक है। इसमें अनेकों बांस के पेड़ बहाकर राजमुंदरी की ओर ले जाए जा रहे थे। संगम के बीच की ज़मीन चट्टानी है। कुनवरम तक दूर-दूर तक मछुवारे अपनी नावों को लेकर पहुंच जाते हैं।

लौटकर रंपचौड़वरम आए तो पता चला कि दिन में सौ आदिवासियों ने यहां पर एक जुलूस निकाला, जिसमें जंगल की कटाई रोकने के लिए सहायक कलेक्टर को ज्ञापन दिया गया था। इसकी अगुवाई डाक्टर शिवराम कृष्णन ने की।

जरूरी है कि प्राथमिकता के आधार पर बिना सोचे समझे प्राकृतिक जंगलों की सफाचट कटाई को रोका जाना चाहिए। जंगलों के आम के पेड़ों को भी सुरक्षित घोषित किया जाना चाहिए। ऐसे काम बंद किए जाने चाहिए, जिनसे आदिवासियों के परंपरागत संबंध पर ठेस लगती हो। आदिवासी समंवित विकास एजेंसी द्वारा चलाए गए पेड़ों की खेती के काम को और बढ़ावा दिया जाए। पोडू को पेड़ों की खेती में बदलने की अग्रगामी योजना बनाई जाए। इमली की तरह ही आदिवासी क्षेत्रों के फल कटहल, झाडू और अन्य उपज के विपणन का सुनिश्चित प्रबंध हो। वनों पर आधारित छोटे-छोटे ग्रामोद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, इसके लिए कच्चा माल पूंजी एवं तकनीकी सहायता दी जाए। आदिवासी पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवा कर विस्तार किया जाना चाहिए। ऐसे कार्यकर्ताओं की नियुक्ति करनी चाहिए जो कि यहां के लोगों एवं धरती का सम्मान करते हों। इसके लिए विशेष कैडर और सुविधाएँ मुहैया की जानी चाहिए। प्रतिबद्ध स्वयंसेवी संस्थाओं का सहयोग विकास कार्यों में लिया जाना चाहिए। हर गांव को पैदल बटिया जैसी जरूरी सुविधा से जोड़ा ही जाना चाहिए।

आदिवासियों की ज़मीन को सुरक्षित रखने के लिए यह जरूरी है कि गैर आदिवासी को उस ज़मीन पर उसकी किसी भी तरह की उपज को भूमि को भूमि से सीधे हथियाने का अधिकार न हो। जरूरी होने पर उसको उचित मूल्य का प्रबंध शासन करें। वृक्षारोपण के लिए जरूरी है कि स्थानीय भौगोलिक परिस्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रजाति के पेड़ लगाए जाने चाहिए। इस काम में स्थानीय ग्रामीणों को नर्सरी से लेकर के पेड़ लगाने के कार्यों से सीधा संबंध जोड़ा जाना चाहिए।

गोदावरी और उसकी सहायक नदियों के जलागम के पहाड़ियों और वहां के लोगों के संरक्षण और विकास के लिए कोशिश आज बहुत जरूरी है। पर्वतीय ज़मीन के प्रयोग और विकास के संबंध में फैसले लेने वालों की गलत योजनाओं के खतरों के प्रति आगाह किया जाना चाहिए। इसके लिए अनुभव जनित, विज्ञान सम्मत ज्ञान की जरूरत है। यह भी जरूरी है कि नेता योजना बनाने वाले और पर्वतवासी साथ मिलकर इस विनाश को रोके और लोगों के कल्याण, पर्वतीय पर्यावरण और संसाधनों के विकास के बीच एक समुचित संतुलन को मिलकर खोज निकालें।

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