ग्रामीणों! गाँव खाली करो कि जानवर आते हैं

Submitted by Hindi on Fri, 08/07/2015 - 15:51
Source
नैनीताल समाचार, 1 दिसम्बर 1998

वन नीतियों का अनुसरण कर हमारी सरकारों द्वारा भी उत्तराखण्ड में जनता को वनों से बेदखल कर राष्ट्रीय पार्कों, वन्य जीव विहारों की स्थापना कर वनाधारित ग्राम्य जीवन छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। रोजगार व विकास के नाम पर पलायन को बढ़ावा दिया जा रहा है और धन का लालच दिखाकर बेरोजगार शिक्षित युवाओं को विश्व बैंक द्वारा पोषित ऐसी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश हो रही है।

विनसर वन्य जीव विहार से प्रभावित गाँवों में ग्रामीणों के विरोध के बीच ‘इको डेवलेपमेंट माइक्रो प्लानिंग’ के तहत कोशिशें प्रारम्भ हो गई हैं। यह योजना 85 गाँवों में चलाई जानी है। वन्य जीव प्रतिपालक, लखनऊ इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं।

वन्य जीव विहार के कर्मचारी प्रत्येक गाँव में ‘पारिस्थितिकी विकास समिति’ का गठन कर वन्य जीव विहार के पक्ष में समझौता कराने के उद्देश्य से ग्रामीणों को प्रेरित करने में जुटे हैं। इस समिति में प्रभावित गाँवों के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य नामित होगा। सदस्यों द्वारा अध्यक्ष सहित पाँच सदस्यों को कार्यकारिणी के लिये चुना जाना है। संरक्षित वन क्षेत्र के प्रबन्धक द्वारा वनविद् (फॉरेस्टर) को सदस्य सचिव-कोषाध्यक्ष तथा एक एन.जी.ओ. (स्वयंसेवी) प्रतिनिधि को नामित किया जाएगा। साद सदस्यों की इस ‘पारिस्थितिकी विकास समिति’ में नियमानुसार आरक्षण की भी व्यवस्था है।

सरसरी तौर पर यह योजना अत्यन्त जन कल्याणकारी प्रतीत होती है। पर इसका मुख्य उद्देश्य संरक्षित वन क्षेत्र के भीतर बसे गाँवों को उजाड़कर इसे जानवरों का आवास बनाना है। इसी कोशिश में विकास व रोजगार का सब्जबाग दिखाकर ग्रामीणों के विरोध को ठंडा करने की कोशिश की जा रही है।

इस योजना को समझने के लिये कॉर्बेट टाइगर रिजर्व द्वारा प्रकाशित वन्य जीव परीक्षण संगठन उ. प्र. के बुलेटिन नं.2 का अवलोकन करना आवश्यक है। ‘इको डेवलपमेट माइक्रोप्लानिंग विधि और प्रारूप’ नामक यह बुलेटिन संरक्षित वन क्षेत्रों में इको डेवलपमेंट कार्यक्रम से जुड़े अधिकारियों व कर्मचारियों के मार्गदर्शन के लिये तैयार की गई है। बुलेटिन के कुछ अंश इस प्रकार हैं-

“... संरक्षित क्षेत्र के भीतर बसे गाँवों को भी चयन प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाएगा। परन्तु ऐसे ग्रामों में स्थायी निर्माण कार्यों पर प्रतिबन्ध होगा। ऐसे गाँवों में माइक्रोप्लानिंग द्वारा केवल उन्हीं कार्यों को चुना जाएगा जिनसे ग्रामवासियों में रोजगार के लिये योग्यताएँ बढ़ें व वे विस्थापन के लिये प्रोत्साहित हों।”

“... माइक्रोप्लान वन विभाग व पारिस्थितिकी विकास समिति के बीच समझौते का आधार है और इस समझौते की सभी शर्तों का इसी भाग में उल्लेख किया जाता है। अतः इस कार्य पर भी पर्याप्त ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। विशेषकर यह सुनिश्चित करने को कि समझौते की शर्तें समिति के सभी सदस्यों को स्वीकार हों।”

उपरोक्त अंशों से स्पष्ट होता है कि इको डेवलमेंट माइक्रोप्लानिंग योजना का उद्देश्य प्रभावित गाँवों में रोजगार व विकास के नाम पर पलायन को बढ़ावा देना तथा गाँवों को जनविहीन कर देना है। साथ ही ‘पारिस्थितिकी विकास समिति’ का गठन कर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अनुपालन में एक ऐसा लिखित समझौता कराना है, जो ग्रामीणों की धीरे-धीरे अपने परम्परागत अधिकारों से वंचित कर सके और वे वन्य जीव विहारों, राष्ट्रीय पार्कों से हो रही परेशानियों के विरोध में आवाज न उठा सकें। बुलेटिन के पृष्ठ 33 में समिति की जिम्मेदारी भी तय की गई है, जिसके अनुसार (1) वनों के भीतर व बाहर आने वाले वन्य जीवों की सुरक्षा में सहायता करना (2) अनधिकृत प्रवेश, चराई, अतिक्रमण, अग्नि, शिकार, चोरी अथवा वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत अन्य अपराधों की रोकथाम में वन विभाग के कर्मचारियों को सहयोग देना।

बुलेटिन के अन्त में ‘शिल्टांग फॉरेस्ट विलेज माइक्रोप्लान’ का एक चार्ट दिया गया है। इसमें दर्शाया गया है कि योजना के क्रियान्वयन के दौरान प्रतिवर्ष ग्रामीणों को अपने पालतू पशु कम करने होते हैं। कृत्रिम गर्भाधान, बछड़ों की नसबन्दी तथा बकरियों को बेच देना होगा। कृषि बागवानी के बजाय चारा विकास पर ज्यादा जोर दिया गया है। इस योजना में हिंसक जानवरों से ग्रामीणों के जानमाल की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के अधिकारियों, वन्य जीव प्रतिपालक, लखनऊ तथा वन्य जीव विहार के कर्मचारियों से पूछताछ करने के उपरान्त प्रतीत होता है कि विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित इस योजना में कुछ वर्षों तक ही धन की व्यवस्था होगी तत्पश्चात् ग्रामीणों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाएगा।

औपनिवेशिक वन नीतियों का अनुसरण कर हमारी सरकारों द्वारा भी उत्तराखण्ड में जनता को वनों से बेदखल कर राष्ट्रीय पार्कों, वन्य जीव विहारों की स्थापना कर वनाधारित ग्राम्य जीवन छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। रोजगार व विकास के नाम पर पलायन को बढ़ावा दिया जा रहा है और धन का लालच दिखाकर बेरोजगार शिक्षित युवाओं को विश्व बैंक द्वारा पोषित ऐसी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश हो रही है। लेकिन इस तरह की कोशिशें अन्ततः उत्तराखण्ड के भविष्य के लिये खतरनाक साबित होंगी।

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