ग्रामीणों ने रची नई मिसाल

Submitted by Hindi on Sat, 04/04/2015 - 14:33
Source
परिषद साक्ष्य धरती का ताप, जनवरी-मार्च 2006

एक तरफ जहाँ सन्थाल परगना में वन माफियों की बढ़ती सक्रियता से साल दर साल वन क्षेत्र कम पड़ते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ एक गाँव ऐसे भी हैं, जहाँ ग्रामसभा संगठनों ने अपने संगठित प्रयास से वन सुरक्षा और उसके विकास की ऐसी मिसाल रची है जो गाँव की ग्राम सभाओं के लिये ही नहीं बल्कि सरकार व वन विभाग के लिए भी गौरतलब और अनुकरणीय है। उन्हीं कुछ एक गाँवों में से एक गाँव दौंदिया है। दुमका जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर एक हरिजन आदिवासी बहुल गाँव।

निःसन्देह जिस काम को बेहिसाब खर्च करने के बाद भी सरकार और वन विभाग करने में असफल रहा है, उस काम को दौंदिया गाँव के गामीणों ने अपने सामूहिक प्रयासों से बखूबी कर दिखाया है। दुमका से 10 किलोमीटर दूर दुमका-पाकुड़ मुख्य सड़क मार्ग के किनारे लगभग 100 एकड़ भूमि पर लगे बहुमूल्य पेड़ों का अस्तित्व इस बात का जीता-जागता प्रमाण है। उक्त सम्बन्ध में बातचीत करने पर दौंदिया गाँव के लोगों ने बताया कि आज से लगभग 10-12 साल पहले वन विभाग के रवैये और वन माफियों की साजिश से जब जंगल उजड़ गये तो जलावन की लकड़ियों का घोर अभाव होने लगा और उसके लिए लोगों को घास-फूस एवं सूखे पत्तों पर निर्भर होना पड़ता था। थोड़े-बहुत जंगल जो आस-पास बचे-खुचे थे भी, उस पर वन विभाग के आतंक और रवैये से उनका अधिकार उनके हाथों से जाता रहा। इस कारण लोग दुखी और परेशान थे।

ऐसी परिस्थिति में गाँव के लोगों ने बैठक करके अपने-अपने हिस्से की बंजर जमीन पर पेड़ लगाने का निर्णय लिया। सुखद संयोग कि उनके इस निर्णय को साकार करने में उस क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्था एग्रेरेरियन एसिस्टेन्ट एसोसिएशन ने सहयोगी की भूमिका निभाई। उक्त संस्था ने वेस्ट लैण्ड डेवलपमेन्ट बोर्ड से ग्रामीणों को आर्थिक मदद दिलायी। इससे उत्साहित होकर लोगों ने सामूहिक प्रयास से लगभग 100 एकड़ बंजर भूमि पर विभिन्न प्रकार के कीमती व फलदार पेड़ लगाये जो न आज सिर्फ बड़े होकर हरियाली बिखेरते हवा में झूम रहे हैं बल्कि गाँव की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान कर रहे हैं। एग्रेरेरियन संस्था द्वारा उक्त कार्य के लिये बनायी गयी ग्राम समिति के सदस्य बाबूराम मुर्मू के अनुसार आज दौंदिया गाँव के वैसे लोग जिनके पास खेती लायक जमीन नहीं थी, आज सैकड़ों कीमती पेड़ों के मालिक बन गये हैं।

गाँव के लोग इस बात से खुश हैं कि पेड़ों के लग जाने से न सिर्फ भूमि का क्षरण रुक गया है बल्कि आस-पास स्थित तालाबों और जोरियों में काफी दिनों तक भी जल भरा रहता है, जिससे आस-पास की जमीनों पर लोग थोड़ी-बहुत खरीफ फसल भी उगा लेते हैं। साथ ही, समय-समय पर पेडों की छँटनी से गाँव वालों को अब सालों भर जलावन के लिये पर्याप्त लकड़ियाँ भी मिल जाती हैं। महिलाएं बताती हैं कि पहले इसी जलावन के लिए दिन भर भटकना पड़ता था और काफी मशक्कत के बाद लम्बी दूरी तय करने पर बोझा भर लकड़ी इकट्ठा हो पाती थी। बरसात के दिनों में तो स्थिति बहुत खराब हो जाती थी। घर में अनाज रहने पर भी जलावन के अभाव में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जलता था। लेकिन आज गाँव वालों के संगठित प्रयास से स्थिति बदली है। फलस्वरूप जंगल से कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ उन्हें मिलने शुरू हो गए हैं।

इनमें लघु वन उत्पादन के तहत लोग ताड़, खजूर, आम, कटहल, जामुन, अमड़ा, महुआ आदि आस-पास के हाट-बाजारों में बेचकर छोटी-छोटी आय प्राप्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दोना, पत्तल, चटाई, झाड़ू पंखा, डलिया आदि भी पर्याप्त मात्रा में बनाकर बेचने का कारोबार कर रहे हैं। बातचीत में ग्राम प्रधान ने बताया कि गाँव वालों ने मिलकर तय किया है कि वे पेड़ों का व्यावसायिक उपयोग अर्थात उनकी बिक्री नहीं करेंगे। यह पूछे जाने पर कि बिना चहारदीवारी और घेराबन्दी के गाँव से इतनी दूर इतने बड़े भू-भाग पर पेड़ों की सुरक्षा किस प्रकार की गयी तो लोगों ने बताया कि ग्रामवासियों द्वारा अलग-अलग समूह का गठन किया गया, जिसमें हरेक घर से एक सदस्य होता था। प्रत्येक समूह में 8 से 10 लोग होते थे जो बारी-बारी से दिन-रात पौधों की देखभाल करते थे। पशुओं और लोगों द्वारा अगर कभी पौधों को नुकसान किया जाता तो बैठक करके लोग दोषी पर 5 पेड़ लगाने का जुर्माना किया जाता था। इस देखभाल में महिलाओं ने बड़ी सक्रिय भूमिका निभायी। जिस महिला के जितने बच्चे वह उनके नाम पर उतने पेड़ लगाती थी और अपने बच्चों की तरह पेड़ों की देखभाल करती थी। वह भी दिन में जल्दी ही घर-गृहस्थी का काम-धाम निपटाकर वहाँ आकर बैठती और वहीं दोना, पत्तल, चटाई आदि बनाती तथा जलावन के लिए पत्ते बटोरती।

वन प्रबन्धन एवं विकास हेतु सरकार की वर्तमान नीति और ग्राम समितियों के प्रति वन विभाग के रवैये को लेकर बातचीत करने पर कुछ जानकार ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि वन संरक्षण व संवर्द्धन के प्रति ग्राम समितियों की उदासीनता के कई कारण हैं। झारखण्ड राज्य 1988 में निर्मित वन नियमों में कई ऐसे नियम हैं जिन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। संकल्प-पत्र के अनुसार संयुक्त वन प्रबन्धन समिति में 18 निर्वाचित सदस्य तथा 7 पदेन सदस्य की बात कही गई है। निर्वाचित सदस्यों में सदस्य सचिव का पद वन विभाग के लिए आरक्षित है और पदेन सदस्य में मुखिया, सरपंच, मानकी मुण्डा, परगनैत, मांझी जैसे स्थानीय प्रतिनिधियों को रखने का प्रावधान है लेकिन अफसोस कि वह व्यवहारिक रूप से जमीन पर पूरी तरह लागू नहीं होता।

संयुक्त वन प्रबन्धन समिति को ग्रामीण विकास वन विकास समिति करने हेतु कुल आय का 90 प्रतिशत ग्रामीण समितियों के माध्यम से खर्च करना है। शेष 10 प्रतिशत राशि वन विभाग के संचालन हेतु सुनिश्चित की गई है। परन्तु समिति को विघटित करने का अधिकार वन पदाधिकारी को प्राप्त है, जो समिति के प्रजातांत्रिक पद्धति के अनुकूल नहीं दिखता है। वन सीमाओं में पकड़ी गयी सामग्रियों, लकड़ियों से प्राप्त जुर्माना का अधिकार समिति को प्राप्त है। परन्तु बगैर वन पदाधिकारी के यह नहीं किया जा सकता है। यानी कहा जाये तो वन संरक्षण समिति के सदस्य जोखिम उठाकर वन संरक्षण करें और यदि आय का प्रश्न आये तो वैसी स्थिति में वन विभाग के पदाधिकारी की सहमति अनिवार्य है। इस तरह के कई स्थान हैं जहाँ समिति के सदस्यों को शक पैदा होता है, जिसके कारण वे लोग खुले दिल से वन संरक्षण के लिये आगे नहीं आते और वन विभाग तथा समिति की गतिविधियों के प्रति उदासीन रहते हैं।

बातचीत के क्रम में जब सरकार से उनकी अपेक्षाओं को लेकर चर्चा की गई तो कई महत्वपूर्ण बातें उभरकर सामने आई। गाँव के लोग चाहते हैं कि जंगल के संरक्षण-संवर्द्धन के लिये ग्रामसभाओं को जिम्मेवारी मिलनी चाहिये। झारखण्ड में वन विभाग का नया नक्शा बनाना चाहिये ताकि आमलोगों को जानकारी मिल सके कि किस गाँव में कितना जंगल है। साथ ही, संयुक्त वन प्रबन्धन को ग्राम सभा में ही समाहित कर दिया जाना चाहिए और वनों के संरक्षण, विकास तथा इस्तेमाल के लिए वनों का स्वामित्व वन क्षेत्र के गाँवों को सौंप दिया जाना चाहिये। इसके अलावे लघु वन उत्पादों पर स्थानीय लोगों का अधिकार स्वीकार किया जाना चाहिये तथा इन उत्पादों का उन्हें पूरा बाजार मूल्य मिलना चाहिये, तभी सरकार के वन प्रबन्धन सम्बन्धी गितिविधियों में ग्रामीणों या समिति के लोगों की सहभागिता होगी और वे वन संरक्षण-संवर्द्धन के प्रति सक्रिय व सजग होंगे।

गौरतलब है कि सरकारी व्यवस्था से परे झारखण्ड में स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रयास से हजारों समितियों का गठन किया गया है, पर उस पर वन विभाग की मुहर लगाने के लिये अथक प्रयास करना पड़ता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अभी तक सरकार के आंकड़े में 517 समितियाँ ही पन्जीकृत की गई हैं। बावजूद इसके, समितियाँ अपने ढँग से कार्य कर रही हैं और कहीं-कहीं तो दौंदिया जैसी मिसाल भी रच रही हैं।

इस तरह कुल मिलाकर देखा जाये तो जहाँ एक तरफ सरकार की वर्तमान वन नीति और वन विभाग के रवैयों से दुखी और आतंकित लोग समिति में रहकर भी समिति की गतिविधियों के प्रति उदासीन और निष्क्रिय हैं, तो दूसरी तरफ अपनी परम्परागत पद्धति, सोच और संगठित प्रयास से वन संरक्षण-संवेदन की ऐसी अद्भुत मिसाल रच रहे हैं, जो सरकार और सम्बन्धित विभाग के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। हाँ, यह सच है कि ऐसी बेहतर स्थिति हर जगह नहीं है, लेकिन सच यह है कि दौंदिया जैसे भी कई गाँव है जहाँ इस तरह संगठित प्रयास से कई वैसे महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय कार्य हुए हैं, जो सरकारी तन्त्र लाखों-करोड़ों खर्च करके भी करने में असफल रहा है।

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