घटते वन

Submitted by editorial on Wed, 06/20/2018 - 12:30
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डाउन टू अर्थ, जून, 2018

वनोन्मूलनवनोन्मूलन मार्च 2018 में जारी नेशनल फॉरेस्ट पॉलिसी के ड्राफ्ट के अनुसार, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की पारिस्थितिकी और आजीविका सुरक्षा के लिये देश में वनों के तहत कम-से-कम 33 प्रतिशत भूमि होनी चाहिए। हालांकि, आज देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 21 प्रतिशत से कुछ अधिक क्षेत्र पर वनाच्छादित है। परन्तु वास्तविकता यह है कि देश के 18 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के कुल क्षेत्रफल में वन भूमि की हिस्सेदारी 33 फीसदी से भी कम है।

प्रस्तुत ड्राफ्ट पॉलिसी 30 साल पहले जारी की गई मौजूदा नीति को प्रतिस्थापित करेगी। इसके अनुसार मृदा-क्षरण और भू विकृतिकरण को रोकने के लिये पहाड़ी इलाकों के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का कम-से-कम 66 प्रतिशत हिस्सा वनाच्छादित होना चाहिए, जिससे इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। लेकिन देश के 16 पहाड़ी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में फैले 127 पहाड़ी जिलों में कुल क्षेत्रफल के केवल 40 प्रतिशत हिस्से पर वनाच्छादित हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर (15.79 प्रतिशत), महाराष्ट्र (22.34 प्रतिशत) और हिमाचल प्रदेश (27.12 प्रतिशत) के पहाड़ी जिलों का सबसे कम हिस्सा वनाच्छादित है।

हालांकि, इंडियन स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2017 भले ही 2015 से 2017 के बीच कुल वन क्षेत्र में 0.2 फीसदी की मामूली वृद्धि को दर्शाती है। लेकिन हाल ही में प्रकाशित कई रिपोर्टों से पता चला है कि यह वृद्धि प्राकृतिक वन क्षेत्र के बढ़ने के कारण न होकर वाणिज्यिक बागानों के बढ़ने के कारण हुई है जो कि ओपन फॉरेस्ट कैटेगरी में आते हैं।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र में अधिकतम जंगल है। इन राज्यों में पिछले तीन सालों में जंगल कम हुए हैं। मध्य प्रदेश में 12 वर्ग किलोमीटर जंगल कम हुए हैं। कृषि भूमि में वृद्धि, विकास कार्य में तेजी, डूब क्षेत्र का इजाफा और राज्य में खनन प्रक्रिया में तेजी इसके कारण रहे। इन्हीं कारणों से छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी जंगल कम हुए हैं।

मानवीय हस्तक्षेप से खतरा

भारत में 2015 से 2017 के बीच वन क्षेत्र में 0.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद इस वृद्धि के तरीके को लेकर कई आशंकाएँ जताई गई हैं। सबसे पहली बात तो यह कि इस बढ़त का मुख्य भाग ‘ओपन फॉरेस्ट श्रेणी’ में हुआ है। व्यावसायिक पौधारोपण भी इसी श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं। यह इजाफा भी समशीतोष्ण वनों की कीमत पर हुआ है। ये वृक्ष मुख्य तौर पर मानवीय बस्तियों के पास पाये जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि प्राकृतिक वनाच्छादित क्षेत्र का स्थान अब व्यावसायिक जंगल ले रहे हैं। यही नहीं सघन श्रेणी के वनों की मात्रा में भी भारी गिरावट आई है।

जंगल का दायरा

मध्य प्रदेश (77.414 वर्ग किलोमीटर) अरुणाचल प्रदेश (66,964 वर्ग किलोमीटर) एवं छत्तीसगढ़ (55.547 वर्ग किलोमीटर) भारत के उन राज्यों में से हैं जहाँ वन बहुलता में पाये जाते हैं। चिन्ता की बात यह है कि इन क्षेत्रों में काफी कमी आई है और समय आ गया है कि अब नीति निर्धारक इस पर ध्यान दें। चिन्ता का एक और विषय भी है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य देश के कुल वनाच्छादित क्षेत्र का एक चौथाई हिस्सा हैं। किन्तु सिर्फ 2015 से 2017 के दौरान उसमें कुल 630 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। यह इसलिये भी चिन्ता का विषय है क्योंकि यह क्षेत्र विश्व के 18 जैव विविधता वाले क्षेत्रों के तहत आता है।

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