हाथ से छूटा पारस

Submitted by admin on Fri, 05/16/2014 - 14:30
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गांधी मार्ग, मई-जून 2014

जो गांधी के साथ के थे- उनके अनुयायी ही नहीं बल्कि उस कोटि के लोग जिनसे गांधी सलाह-मशविरा करते थे। गांधी के साथ जिए लोग भी थे और गांधी में जिए लोग भी थे। गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी भी थे और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी भी। वे भी थे जो गांधी के कुजात वारिस कहलाने में गर्व करते थे और वे भी थे जो कदम-दर-कदम गांधी की तरफ चल रहे थे।

विज्ञान भी कहता है और अध्यात्म भी कि जो तत्व एक बार अस्तित्व में आ गया है वह कभी पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता है। उसका रूप बदल जाता है तो हमें पहचानने में दिक्कत होती है। विज्ञान कहता है कि वैज्ञानिक विश्लेषण करें हम तो उस बदले रूप-स्वरूप के भीतर छिपे उस मूल तत्व को फिर पा भी सकते हैं, फिर से पहचान भी सकते हैं। अध्यात्म कहता है कि दोषरहित साधना हो, गहरी हो और सिर्फ सत्यान्वेषण ही उसका साधन भी हो और साध्य भी, तो बदले स्वरूप में छिपे उस मूल तत्व को आप पा व पहचान सकते हैं।

सेवाग्राम की इस धरती पर हमारे मिलने, बैठने और अभी से एक सहचिंतन शुरू करने का प्रयोजन विज्ञान व अध्यात्म की इस दृष्टि को आत्मसात करना है। हमने यहीं अपना गांधी पाया था और यहीं कहीं हमने उसे खो भी दिया है! हम उसे यहीं कहीं पा भी लेंगे! शर्त है कि पूर्वाग्रहों और तोतारटंतों से आगे निकलें! जैसे अपने मैले कपड़े हम खुद ही साफ करते हैं, वैसी तटस्थ एकाग्रता और वृत्ति की हमें आज जरूरत है। हमें ये दोनों मिलें, इस मिट्टी से मैं आपके साथ ऐसी प्रार्थना करता हूं।

कोई 64 बरस बीत गए, जब हमने अपने गांधी की हत्या की थी। हत्या एक व्यक्ति की होती तो अब तक समय की धूल में दब गई होती। कितने ही इतिहास नायकों की हत्या इतिहास के पन्नों में ऐसी दबी है कि कोई उनकी चर्चा भी नहीं करता।

लेकिन मारे जा कर भी गांधी सारी दुनिया में जिंदा है। क्योंकि वह एक व्यक्ति की नहीं, एक संभावना की हत्या थी। संभावनाएं मनुष्य को मार कर खत्म नहीं की जा सकती हैं। गांधी की हत्या हमें यह सिखाती है। गांधी किस संभावना के प्रतीक थे? संभावना एक ऐसे युद्ध की, जिसमें रक्त न बहे; संभावना एक ऐसी स्वतंत्रता की कि जिसमें सबसे अंतिम आदमी सबसे पहले सबल हो; संभावना ऐसे समाज की जिसमें अवसर व प्रतिष्ठा की समानता हो; संभावना ऐसी संपन्नता की कि जिससे समता स्थापित हो।

इसमें से पहली संभावना ऐसी रही कि जिसे गांधी अंतिम हद तक सिद्ध कर सके। अहिंसा के नए-नए प्रयोग होते ही रहेंगे और उनसे नई-नई सिद्धियां भी होती रहेंगी। लेकिन अहिंसा एक विकल्प है, इसे अब सिद्ध करने की जरूरत नहीं रही।

स्वतंत्रता, सामाजिकता और संपन्नता के तीनों विकल्पों को आज भी किसी गांधी का इंतजार है। हम यह भी कह सकते हैं और गांधी के शब्दों में ही कह सकते हैं कि मन और रणनीति दोनों स्तरों पर आप अहिंसक नहीं बनेंगे तो स्वतंत्रता, सामाजिकता और संपन्नता भी नहीं पा सकेंगे। दुनिया में जहां भी, जितने भी पूंजीवादी, साम्यवादी प्रयोग हुए हैं और एक विचित्र किस्म का जो घालमेलवादी प्रयोग हमने अपने यहां किया है, वे सभी बताते हैं कि अशुद्ध और अनुपयुक्त साधनों से आप शुद्ध व उपयुक्त सिद्धी नहीं पा सकते हैं। सोवियत संघ के बिखरने, अमेरीकी ढंग की अर्थ व्यवस्था के चरमराने और हमारे अपने वामपंथियों की सरकारों का चाल-चलन देखने के बाद साधन व साध्य की बहस भी विराम पा गई है।

यहां भी अनुभव गांधी के पक्ष में गवाही दे रहा है।

यह आयोजन किसी की कमी या गलती निकालने के लिए नहीं है। हम गांधी को पहचानने में और इसलिए कि उनके पीछे या उनके साथ चलने में चूके कहां, इसे पहचानने की हमारी कोशिश का फल है यह आयोजन। गांधी के बाद भी हमारे साथ वे लोग थे, जो गांधी के साथ के थे- उनके अनुयायी ही नहीं बल्कि उस कोटि के लोग जिनसे गांधी सलाह-मशविरा करते थे। गांधी के साथ जिए लोग भी थे और गांधी में जिए लोग भी थे। गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी भी थे और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी भी। वे भी थे जो गांधी के कुजात वारिस कहलाने में गर्व करते थे और वे भी थे जो कदम-दर-कदम गांधी की तरफ चल रहे थे। मैं उस पीढ़ी का हूं जिसने न गांधी को देखा है, न सुना है और न उनके साथ चला है, लेकिन अपनी तीव्रता और प्रतिबद्धता में गांधी के बारे में मेरा दावा किसी से कम नहीं है, ऐसे लाखों लोग तब भी थे, आज भी हैं।

फिर देश उस रास्ते गया कैसे जो गांधी से दूर ही नहीं जाता है बल्कि उनसे विपरीत भी जाता है?

इस सवाल के दो जवाब हो सकते है: एक तो यह कि गांधी और उनका रास्ता उतना ही सही था जितना सिद्ध हुआ; जो हुआ, इससे अधिक इस रास्ते में कुछ था ही नहीं कि जिसे सिद्ध होना था! इसलिए जो था नहीं, वह मिलता कैसे? गांधी के ऐसे विश्लेषक देश में हैं!

दूसरा जवाब यह है कि गांधी को समझने में, उनको समझाने में और उसके अनुरूप कार्यक्रमों की खोज करने में, रणनीति तैयार करने में हम सभी प्रकार के गांधीजनों की सामूहिक विफलता हुई! हम जो चाहते रहे, वह करते नहीं रहे; हम जो करते रहे, उसमें से गांधी सिद्ध नहीं होने थे। नहीं हुए।

क्या हम ऐसी सामूहिक विफलता के कारणों की खोज कर सकते हैं? खुद में उसे पहचान सकते हैं और उसे स्वीकार कर सकते हैं? इतनी तटस्थता से गांधी के आईने के सामने खड़े हो सकते हैं कि इसमें जो दिखाई देगा, उसे बगैर किसी हीले-हवाले के कबूल करेंगे और फिर सोचेंगे कि अब आगे किधर, कैसे और क्यों जाना है?

संगीति की अवधारणा जिस बुद्ध-परंपरा से निकली है वह भी ऐसे ही संकट में से उभरी थी। बुद्ध जा चुके थे। बुद्ध को मानने वाले रह गए थे। सबके पास अपनी-अपनी पसंद के बुद्ध तो थे लेकिन बुद्ध कहीं थे नहीं- या कि सबकी पकड़ से छूटते जा रहे थे। तब एक सामूहिक खोज के लिए वे सब जुटे जो तथागत के खोते जाने से विकल थे, जो आहत थे कि बुद्ध ने जो कहा, किया और चाहा वह सब हमारे होते हुए भी इतना वायवीय और इतना अव्यावहारिक क्यों हुआ जा रहा है।

हम कुछ उसी भूमिका में यहां बैठें। किसी का दोष नहीं, किसी कार्यक्रम की खोज नहीं, किसी आंदोलन की रणनीति नहीं, अपनी विफलता के बिंदुओं को पहचानना... इसमें से आगे का कुछ पाथेय मिलता हो तो उसे विनम्रता से आत्मसात करना।

गोली खाने से पहले गांधी स्वयं ऐसे ही एक आयोजन की तैयारी में लगे थे। तारीखें ही तय नहीं की थीं उन्होंने, बल्कि प्रतिभागियों की सूची भी बनाई थी। गांधी अपने लोगों के साथ सेवाग्राम में बैठने वाले हैं, इस खबर से दिल्ली में सनसनी फैली हुई थी। नई सरकार को पता तो था ही कि आजादी के बाद से जो कुछ, जिस तरह चला है उससे बापू असहमत भी हैं, खिन्न भी हैं और कुछ विकल भी। और गांधी की विकलता असहायता नहीं होती है, यह सभी जानते थे। इसलिए इस खबर से घबराहट फैली थी। लेकिन नाथूराम की तीन गोलियों ने रास्ता निकाल दिया। कुर्सी की सत्ता वाले भी और गांधी की सत्ता वाले भी गांधी की कसौटी से बच गए थे तब।

आज हम उससे न बचें बल्कि अपनी गरदन और अपनी बुद्धि दोनों उनके सामने धरें।

गांधी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि वे अत्यंत साधारण-सी भाषा में, अत्यंत साधारण से हाव-भाव से अत्यंत असाधारण बातें, कार्यक्रम हमारे सामने रखते थे। हम उसमें से साधारणता ग्रहण कर लेते थे क्योंकि वह आसान भी पड़ती थी और हमारी समझ में भी आती थी। वे असाधारण बातें हाशिए पर छूट जाती थीं, जिनमें गांधी की अपनी प्रतिभा भरी होती थी। जयप्रकाशजी ने एक बार कहा भी था कि हम सब किताबें पढ़-पढ़ कर तैयार हुए थे इसलिए हमें जवाहरलाल एकदम अपने लगते थे, क्योंकि वे भी किताबों से ही बाहर आए थे। और इधर सामने हमारे एक ऐसा मुश्किल आदमी था जो किताबों से बाहर की बातें करता था- ऐसी बातें कि जिन पर किताबें लिखी जाएं।

गांधी बेहद नए थे- खतरनाक की हद तक मौलिक। यह हम दुनिया भर को समझाते रहे लेकिन खुद समझ नहीं सके। हम यह भूल गए कि हम गांधी को जिस तरह समझ रहे हैं अगर वह सही समझ है तो गांधी ने आजादी के बाद यह क्यों कहा कि हमने जिस अहिंसा का पालन किया, वह कमजोरों की अहिंसा है; और यह भी कि उन्हें जिसकी सफलता का श्रेय दिया जा रहा है, उससे उन्हें लज्जा आती है। हम यह क्यों नहीं समझ पाए कि आजादी के कुछ ही दिनों बाद जब रचनात्मक कार्यकर्ताओं की बैठक में गांधीजी से शिकायत की गई कि यह सरकार तो हमारी कुछ सुनती ही नहीं है, तब गांधीजी ने यह कठोर बात क्यों कही कि उनकी कल्पना का रचनात्मक काम सरकार के दरवाजे पर बैठकर, उसका मुंह जोहने से सिद्ध नहीं होगा। हम दूसरों से कहते रहे कि गांधीजी कहने के लिए कोई बात नहीं कहते थे, जो भी कहते थे उसका निश्चित आशय होता था। तब फिर हम ही गांधीजी की कही अधिकांश बातों के बारे में इतने असावधान क्यों रहे?

यह सब गहरे आत्मविश्लेषण की मांग करता है। गांधी का काम करने वाले हम सबने यह तो नहीं समझ लिया कि हम गांधीजी की जो बातें दूसरों से कहते हैं, वे हमारे लिए नहीं हैं? गांधी आजाद भारत के 7 लाख गांवों के लिए 7 लाख जिंदा शहीदों की मांग करने का हौसला प्रकट करते रहे लेकिन हमने उनमें से एक बनने का हौसला प्रकट नहीं किया।

संगीति की अवधारणा जिस बुद्ध-परंपरा से निकली है वह भी ऐसे ही संकट में से उभरी थी। बुद्ध जा चुके थे। बुद्ध को मानने वाले रह गए थे। सबके पास अपनी-अपनी पसंद के बुद्ध तो थे लेकिन बुद्ध कहीं थे नहीं- या कि सबकी पकड़ से छूटते जा रहे थे। तब एक सामूहिक खोज के लिए वे सब जुटे जो तथागत के खोते जाने से विकल थे, जो आहत थे कि बुद्ध ने जो कहा, किया और चाहा वह सब हमारे होते हुए भी इतना वायवीय और इतना अव्यावहारिक क्यों हुआ जा रहा है।

गांधी जब तक रहे हमें खींच-खींच कर खतरों में उतारते रहे। गाली से गोली तक के सामने हमें करते हुए वे कभी हिचकिचाए नहीं। 1915 में भारत लौटने के बाद से 1947 तक जो आदमी हर कदम लड़ता ही रहा और अपनी हर लड़ाई में हममें से लाखों को खींचता-झोंकता रहा, गांधी के जाते ही हमने लड़ाई का वह रास्ता एकदम ही छोड़ दिया। हम कहते जरूर रहे कि गांधी ने पिटीशन देने वाली, अंग्रेजों से मेलजोल बढ़ा कर अपना छोटा-मोटा काम निकलवाने वाली कांग्रेस को धो-मांज कर व्यापक लड़ाई का हथियार बनाया। लेकिन हमारे मन में वही कांग्रेस बैठी रही और गांधी के जाते ही हमने गांधी में जो सबसे आसान था, वह अपने लिए चुन लिया। गांधी के सारे राजनीतिक सहयोगी सरकार में यहां-वहां अपनी जगह खोज कर बैठ गए; हम सब उन लोगों के आसपास की जगहें पकड़ बैठे। यहां हम गुण-मात्र के भेद में न पड़ें, अपने मानस को टटोलें। गांधी भी इसे किसी हद तक पहचानते थे तभी तो यह कहा कि ये लोग मेरी कीमत सिर्फ इसीलिए करते हैं कि मैं एक लड़वैया हूं। जब सीधी लड़ाई का मौका आता था तो कांग्रेस गांधी के पास दौड़ती थी, जब वह दौर खत्म हो जाता था तब वह गांधी से दूरी बनाकर चलती थी। उन्हें बाहर का आदमी जैसा बना दिया जाता था और उन्हें हिमालय चले जाने तक की सलाह दी जाती थी।

हमारा रवैया इससे कुछ बहुत अलग नहीं था। सत्याग्रह वगैरह के बारे में आजादी के बाद सरकारी तर्क यह बनाया गया कि अब आजादी मिली गई है। अपनी सरकार बन गई है तो सत्याग्रह का कोई मतलब नहीं रहा। सरकार जो भी जरूरी है वह करेगी, आप उसकी मदद करें। हमने दूसरी तरफ से यह सिद्धांत बनाया कि हमारी भूमिका सही सोचने में मदद की होगी। यह सही नजरिया था लेकिन इस गलती के साथ कि सही सोचने में आप उसकी ही मदद कर सकते हैं जो भूल या भ्रमवश गलती कर रहा हो और जो सही रास्ते पर आने को तत्पर हो। लेकिन राज्य-सत्ता का अपना चरित्र इससे भिन्न होता है और वह जो करती है उसे ही सही मानती है, इसलिए उसे सही का अहसास कराने के लिए जनमत के दबाव की जरूरत हमेशा और लगातार बनी रहती है। अगर लोकतंत्र दो सत्ताओं के मेल से बनने वाली व्यवस्था है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि एक सत्ता 24 घंटे अपनी ताकत बढ़ाती रहे,सारा समाज-जीवन अपनी मुट्ठी में कसती रहे और दूसरी सत्ता गाफिल रहे या इधर-उधर कुछ कर संतोष मानती रहे?

गांधी ने अपनी रणनीति और कार्यक्रमों के द्वारा उन बहुत सारे द्वैतों को समाप्त कर दिया जो हमारे मनों में और समाज में रूढ़ हो चले थे। हिंसा के संदर्भ में अहिंसा और कायरता का सवाल उन्होंने आईने की तरह साफ कर दिया था। जब वे कायरता और हिंसा में से चुनाव की बात उठा कर हिंसा को चुनने की बात करते हैं तब वे हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं, हमारे अंदर की कायरता पर चोट करते हैं। कायरता को हिंसा-अहिंसा के संदर्भ में सीमित कर नहीं देखें हम, जीवन में हमेशा आसान व सुरक्षित विकल्प स्वीकारने के संदर्भ में देखें। तभी हम यह समझ सकेंगे कि गांधीजी के जाते ही हम सब गांधी से दूर क्यों जा पड़े। खतरों में उतरना और उनसे खेलना अहिंसा की अनिवार्य शर्त है। हम दुनिया भर को समझाते रहे कि अहिंसा के पालन में हिंसा से ज्यादा साहस की जरूरत पड़ती है। लेकिन वह साहस हमारे अपने जीवन में प्रकट नहीं हुआ।

अध्यात्म और आंदोलन भी परस्पर विरोधी भाव थे। गांधी ने दोनों को जोड़ दिया और कहा कि मैं राजनीति का अध्यात्मीकरण कर रहा हूं। इसलिए प्रार्थना, सामूहिक प्रार्थना और वह भी सर्वधर्म प्रार्थना उनके अध्यात्म का प्रकट रूप बन गया। वे घोर अंधकार में राजनीतिक कदमों के लिए ईश्वर का संकेत जोहते थे और उन्मत्त भीड़ को विवेकशील बनाने के लिए उपवास का आध्यात्मिक हथियार संभालते थे। क्रांति की उनकी साधना में कोई दीवार थी ही नहीं।

संघर्ष और रचना गांधी-पद्धति के अनिवार्य तत्व हैं, जिनकी हमारी समझ बनी नहीं। गांधी ने इन दोनों के बीच कोई दीवार रखी ही नहीं बल्कि दोनों को एक दूसरे का अभिन्न बना दिया था। कोई द्वैत नहीं! समाज में रूढ़ हो चुके मूल्यों को बदलना अगर क्रांति है तो जिन ढांचों पर ये रूढ़ मूल्य टिके हैं और रस खींचते हैं, उन ढांचों को ढहाना गांधी का रचनात्मक काम है। जिन कार्यक्रमों से ऐसा नहीं होता है, वे दूसरे कुछ भी हों, गांधी के रचनात्मक काम नहीं हैं। लेकिन हमने रचनात्मक काम के भी टुकड़े बना लिए और अपने-अपने टुकड़ों से चिपक कर, उसे ही पूर्णता का दर्जा दे दिया। यह आसान रास्ता था।

हमने इन सबका महिमामंडन भी बहुत किया कि इसने गुड़ बनाने में, इसने नीरा निकालने में तो इसने खादी बनाने में, इसने गोरक्षा में तो इसने सांप्रदायिक सौहार्द के गाने-गाने में, इसने जैविक खेती और प्राकृतिक खाद बनाने में तो इसने राष्ट्रभाषा का प्रचार करने में अपनी सारी जिंदगी निकाल दी। हम खुद से और ऐसा करने वालों से यह पूछना भूल ही गए कि जिंदगी तो निकाल दी लेकिन हाथ क्या आया? एक ही साधे सब सधे वाली बात भी इतनी उछाली गई कि किसी को यह याद ही नहीं रहा कि आखिर साधना क्या था! साधनी तो एक ऐसी अभिनव क्रांति थी न, जिसका विहंगावलोकन गांधी ने करवाया था। वह सधी नहीं और हम कहीं, कुछ दूसरा ही साधते रहे। इसलिए रचनात्मक नाम से किए जा रहे हमारे सारे काम यथास्थिति को मजबूत बनाने में लग गए और हम लगातार पराश्रयी होते गए। खादी-ग्रामोद्योग का हमारा सारा काम राज्य की बैसाखी पर खड़ा है और दूसरे रचनात्मक काम हमारी व्यक्तिगत साधना के विषय बन गए हैं, समाज परिवर्तन के नहीं हैं। यह अकारण नहीं है कि हमारे नये-पुराने अधिकांश लोग एनजीओ बनाकर अपनी गाड़ी खींचते नजर आते हैं। यह खुद को भ्रम में रखकर, यथास्थिति को मजबूत बनाने का सबसे आसान रास्ता है।

ऐसा अक्सर होता है कि गांधी जैसा कोई दुर्घर्ष व्यक्ति आता है और हमें अपने दायरे से खींच कर बाहर निकाल लेता है। हम अकबर इलाहाबादी के बुद्धू मियां की तरह मुश्त-ए-खाक होते हुए भी आंधी के बल पर आसमान छू लेते हैं। लेकिन देखते यह हैं कि उस आंधी के लौटते ही, जाने-अनजाने हम फिर अपने पुराने दायरे में लौट आते हैं और उसका औचित्य भी खोज लेते हैं। यह बताता है कि क्रांति के गांधी-संदर्भ से जब आप जुड़ते हैं तब कितने स्तरों पर, लगातार खुद से ही लड़ना पड़ता है। गांधी इस अर्थ में भी दूसरे सारे क्रांतिकारियों से अलग व आगे जाते हैं कि वे खुद को, हमारी प्रार्थना के उस वाक्य की तरह, ‘क्रांति का वाद्य’ बनाने को जुटे रहते हैं। हमारे यहां कपड़ों से लेकर खाने तक में बहुत आग्रह-दुराग्रह हुआ, लेकिन हमारा आंतरिक जगत बहुत खाली ही बना रहा।

आजादी के बाद गांधी का कोई ऐसा काम भी हो सकता है कि जिसे सरकार नहीं करेगी, नहीं कर सकेगी; और किसी दूसरी शक्ति को आगे आ कर, संगठित होकर वह काम करना होगा- हमें इसका अहसास नहीं था; और अगर था भी तो वह कैसे होगा, इसकी कोई साफ समझ नहीं थी।

ऐसे में सामने आए विनोबा। यही सेवाग्राम था जहां गांधी की उत्तर-क्रिया के बाद गांधी के उत्तराधिकारी जमा हुए थे। यह बहुत अच्छा हुआ था कि उस आयोजन में गांधी के दोनों धड़े मौजूद थे- सरकार वाले भी और सरोकार वाले भी! गांधी होते तो यह आमना-सामना अलग तरह से हुआ होता, क्योंकि वह गांधी की संपूर्णता थी जिसके अब टुकड़े बन रहे थे। हमने अपनी कमजोरी या अधूरी समझ से चाहे जितने टुकड़े गांधी कर लिए हों, गांधी संपूर्ण थे। अंग्रेजों के राजनीतिक और सांप्रदायिक शक्तियों, सांप्रदायिक दांव-पेचों का सामना करने वाला और ग्राम-सफाई की जुगत खोजने वाला, खादी फैलाने वाला और मैनचेस्टर के मिल कामगारों के बीच जाकर उन्हें स्वदेशी का पाठ पढ़ाने वाला गांधी एक ही है। उसके टुकड़े नहीं हैं। अपनी इस संपूर्णता के कारण गांधी जिस तरह की समग्रता साध पाते थे, हमारे लिए संभव नहीं हुआ क्योंकि हमने अपनी सुविधा व पसंदगी देखकर गांधी का कोई एक हिस्सा चुना। उस क्रांति को जिस समग्रता की जरूरत थी, वह उसे हमसे नहीं ली।

इस आयोजन के संदर्भ में गोपालकृष्ण गांधी तथा आत्माराम सरावगी द्वारा संपादित जिस किताब का जिक्र किया गया है, उसे आप ध्यान से देखेंगे तो मेरी बात ज्यादा साफ हो सकेगी। वहां सबसे साफ दृष्टि सत्ता वालों की है। वे असंदिग्ध शब्दों में कहते हैं कि अब न आपकी कोई भूमिका बची है और न कोई क्रांति जैसा मसला है। गांधी अपना काम कर के गए। उनका आभार। अब हमें असली काम करना है। गांधीवालों की बातों से उकताए हुए जवाहरलाल कहते हैं कि आप लोग जड़ की बात तो करते नहीं हैं, सिर्फ ऊपरी बातों में, जिसमें वे सारा रचनात्मक काम समेट लेते हैं, फंसे रहते हैं! उस आयोजन में जवाहरलाल, मौलाना आजाद व राजेंद्र बाबू जब-जब बोलते हैं, यह साफ कर देते हैं कि अब हमें गांधी वाले किसी पचड़े में पड़ना नहीं है। यह था गांधी के सरकारी वारिसों का रवैया।

दूसरी धारा की कोई खास पहचान उस आयोजन में बनती नहीं है। सिवा इसके कि गांधी के खास लोग भी गांधी-दर्शन व पद्धति के बारे में कितनी धुंधली समझ रखते थे। अहिंसा का दर्शन और अहिंसक कार्य-पद्धति दुनिया के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी बहुत नई व बहुत टेढ़ी पड़ती है, यह उस सभा के विवरण से साफ उभरता है। इसलिए हम देखते हैं कि सभी के सभी वहां विनोबा पर अपना गांधी आरोपित करने की कोशिश करते हैं।

गांधी का छूटा हुआ धनुष जब विनोबा ने उठाया तब उनका विश्लेषण यह था कि देश का रचनात्मक जगत लस्त-पस्त पड़ा था। इसे उठाना, खड़ा करना और सक्रिय करना- यह सब उन्होंने अपूर्व कौशल से किया। विनोबा में गांधीजनों को अपने होने का मतलब भी मिला और अपने करने की दिशा भी मिली। मुझे यह तक कहने में थोड़ी-भी झिझक नहीं है कि यदि विनोबा नहीं होते- और इतने अनोखे व अमूल्य नहीं होते तो आजादी के बाद महात्मा गांधी ऐसी जीवित संभावना भी नहीं होते। भूदान-ग्रामदान की परिकल्पना से लेकर ग्रामस्वराज्य के भव्य दर्शन तक और उसके व्यावहारिक कदमों तक के निर्धारण में विनोबा अप्रतिम हैं। जैसे क्रांति का कलाकार रोज-रोज कुछ नया आंक रहा हो, नए-नए रंग भर रहा हो। लेकिन क्रांति नए-नए रंग भरने से ही पूरी नहीं होती है, उसमें पुराने, अनावश्यक रंगों को पोंछना-हटाना-मिटाना भी शामिल होता है।

बनाना और मिटाना दोनों गांधी ने एक साथ साधा था और क्योंकि क्रांति के इतिहास से उन्होंने समझा था कि इन दोनों में जितनी दूरी रहेगी, प्रतिक्रांतिकारी ताकतें उतनी जल्दी व आसानी से अपनी जगह बना लेंगी। वे इस बारे में बहुत सावधान हैं और इसलिए राजनीतिक आजादी की लड़ाई लड़ते हुए भी वे समाज जीवन के हर प्रसंग,पहलू को छूते-छेड़ते नजर आते हैं वे हमारे सामने अपने निजी व सामूहिक जीवन का उदाहरण भी रखते हैं ताकि देश की आजादी की उनकी कल्पना का खाका भी हमारे मन में बनता चले।

गांधी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि वे अत्यंत साधारण-सी भाषा में, अत्यंत साधारण से हाव-भाव से अत्यंत असाधारण बातें, कार्यक्रम हमारे सामने रखते थे। हम उसमें से साधारणता ग्रहण कर लेते थे क्योंकि वह आसान भी पड़ती थी और हमारी समझ में भी आती थी। वे असाधारण बातें हाशिए पर छूट जाती थीं, जिनमें गांधी की अपनी प्रतिभा भरी होती थी।

गांधी के बाद, उस दिशा में हुए विनोबा और जयप्रकाश के आंदोलनात्मक प्रयोगों से एक ही सवाल उभरता है, और शायद सबसे बड़ा व बुनियादी सवाल उभरता है कि लोकतंत्र और जन आंदोलन का कोई रिश्ता है या नहीं? एक तर्क यह रहा है कि आजादी मिल गई है तो अब आंदोलन जैसा कुछ करने की जरूरत नहीं है, जो करेगी अपनी सरकार करेगी और जितना वह करेगी, वही काफी होगा और अपना नसीब होगा!

यह तर्क खूब चलाया गया और सुविधासंपन्न वर्ग ने इसे हाथों-हाथ लिया। सत्ताधारी पार्टी अपनी सरकार संभाले और उसके कार्यकर्ता जनता में सरकार के हर सही-गलत कदम का समर्थन तैयार करें, यह एक भूमिका अपनाई गई।

दूसरी भूमिका विपक्ष से जोड़ कर देखी गई कि जिसमें सरकार को गलत साबित करना और उसके प्रति जन असंतोष पैदा करना जरूरी माना गया। आजादी के तुरंत बाद विपक्ष की यह भूमिका कुछ हद तक चली भी।

हम देखते हैं कि जैसे-जैसे विपक्ष ने भी यहां-वहां सत्ता का स्वाद चखा, दलीय आंदोलन की यह रही-सही भूमिका भी खत्म होती गई। सबने यह समझ लिया कि आंदोलन के कठिन रास्ते को छोड़कर, सत्ता पाने के दूसरे आसान तरीके भी हैं। उन्हें इससे भी बड़ी प्रतीति तो यह हुई कि आपका आंदोलन और उसके मुद्दे ही किसी प्रेतबाधा की तरह आपके साथ चिपक जाते हैं और आप जब सत्ता-सुख भोगने की स्थिति में होते हैं, तब आंदोलन के मुद्दे जनता के हाथ में आपके खिलाफ हथियार बन जाते हैं। इसलिए हमारे लोकतंत्र के विकास-क्रम में धीरे-धीरे एक सत्ताधारी जमात तैयार हुई है जो कुर्सी पर बैठने के तमाम रास्ते जानती है और आपस में ऐसे तालमेल भी रखती है कि हम सभी मिलकर सत्ता-सुख भोग सकें। कुर्सी कभी तुम्हारे पास, कभी हमारे पास लेकिन सत्ता-सुविधा में कोई कमी नहीं।

यूगोस्लाविया में साम्यवादी क्रांति की सफलता के बाद मार्शल टीटो को सत्ता मिली तो उसके थोड़े से अनुभव के बाद ही उनके दाहिने हाथ-से माने जाने वाले मिलोवान जिलास को लगने लगा था कि क्रांति कहीं किनारे रह गई है और हम कुछ दूसरा ही करने लगे हैं। टीटो से उनका मतभेद बढ़ने लगा और फिर एक दिन जिलास को जेल में डाल दिया गया। जिलास ने सत्ता के उस थोड़े-से अनुभव से सीख कर जो किताब जेल में ही लिखी उसे नाम दिया- ए न्यू क्लास। उन्होंने पाया कि एक नया वर्ग ही बन गया है जो आपस में सत्ता की बंदरबांट करके क्रांति को धता बताने लगा है। तो गांधी के आंदोलन से जुड़े लोगों के हाथ में आई व्यवस्था हो कि वोट से बनी लोकतांत्रिक व्यवस्था हो कि साम्यवादी व्यवस्था हो (तानाशाही की बात नहीं कर रहा हूं क्योंकि वह तो जनता की गर्दन पर बैठने के नाम से ही सत्ता लेती है।) सत्ता ही उसका इष्ट बन जाती है। यह दुष्चक्र कैसे टूटे और लोकतंत्र का लोक इसकी नियामक शक्ति कैसे बने, इसकी खोज ही आज के संदर्भ में गांधी की क्रांति है।

गांधी की समझ और अपने अनुभव से जयप्रकाश नारायण ने 1974 के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन के संदर्भ में लोकतंत्र और जन आंदोलन के अंतरसंबंधों की अपूर्व व मौलिक व्याख्या की। उन्होंने यह आधारभूत मान्यता प्रस्थापित की कि जन आंदोलन की ताकत से ही लोकतंत्र गतिमान और विकसित हो सकता है। अगर जन आंदोलन की लहर नहीं रहती है तो लोकतंत्र शासन की एक व्यवस्था मात्र बन कर जड़ भी हो जाता है और जनविरोधी भी। उन्होंने यह भी स्थापित किया कि अगर सरकार ईमानदार व प्रगतिशील है तो वह जन आंदोलनों से शक्ति अर्जित करती है और वे सारे काम कर गुजरती है जो सामान्यतः यथास्थितिवादी ताकतों के दबाव में वह नहीं कर पाती है। वे यह सिद्ध कर सके कि सरकार जन विरोधी है या जन हितकारी, इसकी कसौटी यह है कि वह जन आंदोलनों के संदर्भ में क्या रवैया रखती है।

संपूर्ण क्रांति के आंदोलन के दौरान वे विपक्ष से भी और कांग्रेस से भी यही कहते रहे कि जन आंदोलन को अपनी ताकत बनाओ, उससे विरोध मोल मत लो! मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री चुनने के बाद, संसद के सेंट्रल हाॅल में जो छोटा-सा संबोधन उन्होंनेकिया था, उसमें इसे अत्यंत मार्मिक शब्दों में अभिव्यक्त भी किया और मोरारजी देसाई से यह वचन भी लिया कि सत्ता व जनता में विरोध की स्थिति जब भी बने, सत्ता को पीछे हटना चाहिए।

इंदिरा गांधी ने भी और जिन्हें जयप्रकाश ने सत्ता तक पहुंचाया उन पूर्व कांग्रेसियों, समाजवादियों और जनसंघियों ने भी इसे नहीं समझा। परिणाम यह आया कि 1977 में एक सत्ता उखड़ गई, दूसरी आ गई। लेकिन लोकतंत्र के गतिशास्त्र में कोई नया तत्व दाखिल नहीं हो सका। स्थिति यहां से भी पलटी जा सकती थी लेकिन तब 1977 का जयप्रकाश 1974 वाला भी नहीं बचा था। वे इंदिरा गांधी की चंडीगढ़ की नजरबंदी में मिले अत्यंत पीड़ादायक रोग से निढाल एक घायल, बीमार क्रांतिनायक की पीड़ा भोग रहे थे और संपूर्ण क्रांति का अपना कोई ऐसा प्रौढ़ नेतृत्व विकसित नहीं हुआ था जो इसकी दिशा खोज पाता। देश के परिवर्तनकारी मानस में वह घाव आज भी रिसता है।

लोकतांत्रिक ढांचे में जब आप जन आंदोलन के दबाव से परिवर्तन की कोई लहर उठाते हैं तब आपके हाथ में विकल्प क्या-क्या होते हैं, इस पर गहराई से सोचने की जरूरत है। हिंसा नहीं करनी है और लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर काम करना है, ऐसी दो मर्यादाएं अगर आपने स्वीकार कर ली हैं तब आंदोलन के रास्ते अत्यंत संकरे हो जाते हैं। सत्ता आपको थका देने की, आपको विफल साबित करने की, यथास्थिति वाली ताकतों को उभार कर, आपको आपस में लड़ा देने की हर कोशिश में लग जाती है। सत्ता ने अपने लिए कोई मर्यादा कबूल नहीं की होती है सिवा इसके कि उसे येनकेन प्रकारेण अपनी सत्ता बनाए रखनी है और दूसरी किसी राजनीतिक ताकत को उभरने नहीं देना है। इसलिए जन आंदोलन को कुचलने, बदनाम करने या अपने ही पतित प्रवाह में उसे खींच लाने की रणनीति बनाई जाती है।व्यापक जन समर्थन का बार-बार प्रमाण देने के बाद भी अगर कोई व्यवस्था जिद ठान बैठे कि वह न कुछ सुनेगी और न कुछ करेगी, तो आंदोलनकारी क्या करें? हिंसा के रास्ते सत्ता पर कब्जा करने वाला दर्शन जो जवाब देता है उसे भगत सिंह जैसों ने बहरों को सुनाने वाले धमाके का नाम दिया था, नक्सली-माओवादी उसे छह इंच छोटा करने का नाम देते हैं। जो इस रास्ते को निरर्थक व बांझ मानते हैं, उन्हें क्या करना चाहिए? गांधी भी इस सवाल से जूझते हैं लेकिन उनके पास संदर्भ आजादी की लड़ाई का था। आजादी चाहिए, इस मांग के पीछे जन समर्थन है या नहीं, ऐसा सवाल अर्थहीन हो जाता है। लेकिन नमक आंदोलन के वक्त गांधी भी जन समर्थन का पूरा प्रमाण देते हैं। और सरकार उनकी एक नहीं सुनती है तो वे एक-एक कर ऐसे कदम खोजते हैं जिससे सत्ता से उनका सीधा आमना-सामना हो। यहां तक कि वे अचानक धरसाना की तरफ जाने का कार्यक्रम घोषित करदेते हैं। यह लोक विरोधी सत्ता से संवाद का उनका सत्याग्रही तरीका था।

आज ऐसी सत्ता से संवाद कैसे हो, इसका जवाब हमें देना है। इसे गांधी के साथ जुड़ने की मजबूरी मानें हम या चुनौती।

राजनीतिक दल हम बनाएंगे नहीं, सत्ता में हम जाएंगे नहीं तो फिर लोगों के साथ होने और उन्हें साथ लेने की हमारी रणनीति जन आंदोलन के अलावा दूसरी क्या होगी? गांधी के पास मैं इसका कोई दूसरा जवाब नहीं पाता हूं। एक ऐसा बड़ा जनांदोलन जो देश को हिला दे, उतनी ऊर्जा अभी हममें नहीं है। लेकिन कई छोटे-छोटे जनांदोलनों को दिशा देकर समाज व सरकार में जो चल रहा है उससे इंकार का व्यापक मानस बनाना संभव है। इंकार की इस अभिव्यक्ति में से बड़े आंदोलन की संभावना प्रकट होगी। यह वह दबाव खड़ा करेगा जिसकी खोज विनोबा ने की थी और जिसकी संभावना जयप्रकाश ने प्रकट की थी।

ऐसा अक्सर होता है कि गांधी जैसा कोई दुर्घर्ष व्यक्ति आता है और हमें अपने दायरे से खींच कर बाहर निकाल लेता है। हम अकबर इलाहाबादी के बुद्धू मियां की तरह मुश्त-ए-खाक होते हुए भी आंधी के बल पर आसमान छू लेते हैं। लेकिन देखते यह हैं कि उस आंधी के लौटते ही, जाने-अनजाने हम फिर अपने पुराने दायरे में लौट आते हैं और उसका औचित्य भी खोज लेते हैं।

हमारी सारी संस्थाएं, आश्रम, रचनात्मक कार्यक्रम श्रीहीन हुए जा रहे हैं क्योंकि उनमें और उनके साथ लोक नहीं है। ये निस्तेज होकर बुझ ही जाएंगी क्योंकि इनका असली प्रयोजन जिस लोकशक्ति को संगठित व सक्रिय करना था, वही सिरे से छूट गया है। हम यह ठीक से समझें ताकि गांधी-विनोबा-जयप्रकाश के नाम से जो संस्थाएं बनीं और जिनके संविधान-कार्यक्रम आदि के बारे में जो कुछ अलग-अलग बातें निर्धारित की गईं, उन सबका संदर्भ यह था कि सर्वोदय का एक बड़ा आंदोलन समाज में खड़ा था। कोई शून्य नहीं बना हुआ था। विनोबा, जयप्रकाश, दादा धर्माधिकारी, धीरेंद्र भाई जैसे विराट लोग कश्मीर से कन्याकुमारी तक पहुंच रहे थे, एक हलचल बनी हुई थी। इन बड़े लोगों के बाद की जमात भी अपनी तरह से इन्हें मजबूत बनाने में लगी थी। इसलिए तब संस्थाएं, आश्रम, रचनात्मक कार्य, खादी जगत आदि अपने-अपने तरह के कामों में लगे रह सकते थे। तब जयप्रकाश किसी गांधी विद्या संस्थान से कह सकते थे कि अपने शोध की दिशा सर्वोदय आंदोलन के सदंर्भ में मोडि़ए। आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। कोई ऐसा आंदोलन बचा नहीं है। हम जो कर रहे हैं वह खुद को और अपनी पहचान को बचाने की कमजोर-सी कोशिश भर है। लेकिन दिक्कत यह है कि क्रांति की कसौटी पर हमारे ये सारे प्रयास जब कसे जाते हैं तब वे हमारी छवि कुछ और ही बना देते हैं। जब भीतर-बाहर ऐसा रेगिस्तान फैला हो तब सबकी भूमिकाएं बदल जाती हैं, बदल जानी चाहिए।

गांधी ने रचनात्मक काम में लगे अपने साथियों को बैरक में रखी सेना कहा था। सन् 1942 में उन्होंने इस सेना को भी मर मिटने का निर्देश दिया था। आज उससे भी बुरी अवस्था है। आदेश देने वाला कोई गांधी है भी नहीं। अब तो भीतर से ही प्रेरणा भी आनी है और चुनौती भी और उसका स्वीकार भी! वह अगर नहीं आ रही है तो कोई कनेक्शन जरूर ढीला है। खुद से सख्ती करने की जरूरत है।

जयप्रकाश ने हमारी सुविधा के लिए जन आंदोलन की एक आसान चैकड़ी बनाकर हमें दी है- विचार, संगठन, रचना और संघर्ष! ये अलग-अलग नहीं हैं, ये टुकड़े नहीं हैं, ये एक दूसरे के विकल्प नहीं हैं। ये एक के बाद दूसरा भी नहीं हैं। ये आपस में गुंफित हैं। आप इनमें से किसी भी छोर से काम शुरू करेंगे, अगर दृष्टि साफ है तो आप इन चारों को एक साथ छुएंगे। आप गांधी-विचार का संदर्भ लेकर कहीं भी, कोई भी काम शुरू करें, ये चारों एक साथ निकल कर सामने आएंगे और आपसे जवाब मांगेंगे। गांधी का संदर्भ हो तो ऐसा संघर्ष हो ही कैसे सकता है जो नया रचता नहीं हो; और ऐसी रचना कैसे सिद्ध होगी जिसके बारे में समाज में व्यापक व गहरा शिक्षण नहीं हो और कोई शिक्षण जड़ कैसे पकड़ सकता है अगर उसका संगठित स्वरूप न उभरता हो।

यह वह पारस मणि है जो हमारे हाथ से छूट गई है। निर्विकल्प मानकर इसे ईमानदारी से पकड़ना होगा। किसी के विरोध में नहीं, समाज के हक में काम खड़ा करना ही हमारे होने का मतलब है। फिर चाहे इस रास्ते में किसी का भी, कभी भी विरोध करना या सहना पड़े। गांधी-विनोबा-जयप्रकाश की विरासत से स्वयं को जोड़ने का इतना सीधा लेकिन इतना कठोर मतलब होता है। हम यह न कर रहे हों, समाज की अपनी कोई शक्ति न बन रही हो, यथा स्थिति की ताकतें मजबूत होती जा रही हों, राज्य-संस्था की मुट्ठी में आम जनता दबती जा रही हो और वह मुट्ठी कसती जा रही हो तो जान लीजिए कि गांधी-विनोबा-जयप्रकाश की यह त्रयी हमारे हाथों से फिसल रही है।

गांधी ने अपनी कब्र में से भी आवाज लगाने की बात कही थी तो वह हमारे लिए भी थी! उस आवाज की सबने अनसुनी की है- हमने भी। उसे सुनें- उसके पीछे की पीड़ा को आत्मसात करें। दूसरी हमारी सारी प्रिय गतिविधियां और कार्यक्रम इंतजार कर सकते हैं। यह आवाज अब इंतजार नहीं कर सकती है क्योंकि यह उस अंतिम आदमी से सीधी जुड़ी हुई है जिसका ताबीज बना कर गांधी ने हमें दिया था।

सेवाग्राम आश्रम, वर्धा में 25 से 28 अगस्त 2012 के दौरान आयोजित संगीति में पढ़े गए बीज भाषण के कुछ अंश।

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