हिमालय आज भी लोगों के लिए पर्यटन स्थल ही है

Submitted by Hindi on Fri, 05/16/2014 - 09:44
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9 सितंबर 2011, साउथ एशियन डॉयलॉगस् ऑन इकोलॉजिकल डेमोक्रेसी (सैडेड) नई दिल्ली
सितंबर 2011 को हिमालय दिवस के अवसर पर सैडेड द्वारा ‘हिमालय बचाओ’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में हिंदी दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग के भाषण का लिखित पाठ यहां प्रस्तुत है।

हिमालय की आत्मा को आप देश के मृत शरीर में कैसे पहुंचा सकते हैं ये बड़ी चुनौती है। आज मीडिया में हिमालय के लिए कोई जगह नहीं है। वो जगह कैसे पैदा कर सकते हैं, ये बड़ी चुनौती है। मेरा एक छोटा सा निवेदन है कि देश के बच्चों के बीच अनिल जी विभिन्न भाषाओं में ऐसी पुस्तिका बंटवा सकें जो उनको हिमालय का वास्तविक दर्शन कराए। हिमालय के साथ उनकी आत्मा को जोड़े। सर्वोदय आंदोलन के साथ काम किया है इसलिए मैं हिमालय या इस तरह के आंदोलन की थोड़ी सी कमियां और मजबुतियां जानता हूं और पिछले 40 साल से मीडिया में काम कर रहा हूं। अगाथा जी ने एक बहुत अच्छी बात कही कि अन्ना का आंदोलन क्यों सफल हुआ और शर्मिला की बात क्यों नहीं सुनी गई। इस पर विचार और बहस कर सकते हैं और हिमालय को इससे जोड़ कर भी देख सकते हैं।

इरोम शर्मिला का आंदोलन मैं मणिपुर में देखकर आया हूं। मैंने सारी चीजें देखी। आर्म फ़ोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट की जो त्रासदी है उसको हम देश की त्रासदी नहीं मान पाए हैं। इसका कारण ये है कि कुछ विशेष क्षेत्रों में वो लागू है और सशस्त्र बलों के अधिकारों से संबंधित है। लेकिन भ्रष्टाचार पूरे देश की समस्या है इसलिए यह मुद्दा देश की नब्ज बन गया है और अन्ना उसके प्रतीक बन गए। कोई भी आंदोलन जो किसी क्षेत्र विशेष का है वो पूरे देश का कैसे बन जाए ये सबसे बड़ी चुनौती है। हिमालय के जो आंदोलन हैं उनके साथ भी ऐसी ही चुनौती है। जब इस कार्यक्रम के लिए आयोजक मुझसे मिलने आए थे तो मैंने इन से कहा था कि हिमालय को लेकर जो हमारी समझ है वो ये है कि देश हो या मीडिया सब हिमालय को एक पर्यटन स्थल के रूप में ही देखते आए हैं। हिमालय के सुन्दर रंग-बिरंगे फोटोग्राफ, हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं में किस चोटी पर कौन पर्वतारोही चढ़ा और नहीं चढ़ा इतना भर ही है।

बचपन में हमारे मानस में हिमालय को लेकर जो स्वाभिमान का जज्बा जगाया जाता है राजनीतिक दलों द्वारा या कविताओं में, कहानियों में, किस्सों में कि उच्च हिमालय पर्वत राज खड़ा पहन कर हिम का ताज.......। हिमालय के प्रति हमारी समझ इससे आगे कभी बढ़ी ही नहीं । अनिल जोशी जी ने कहा कि सांसदों को इस मुहिम में शामिल करना चाहिए पर मेरा मानना है कि बिल्कुल नहीं करना चाहिए। सांसद इस देश में कुछ नहीं कर सकते हैं। अन्ना अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने मुहिम में इन्हें शामिल करते तो उनका आंदोलन संसद भवन केगलियारों में तड़पता हुआ अपनी जान दे देता। जब तक कोई आंदोलन सांसदों की रोजी-रोटी से नहीं जुड़ेगा, रोजी-रोटी का मतलब आप समझते हैं कि वे फिर से चुन कर जा सकें, अपनी कुर्सियों पर बैठ सकें, तब तक कोई भी आंदोलन सफल नहीं होगा। अन्ना के आंदोलन ने ये बताया है कि अब लाॅबिंग करने से काम नहीं चलेगा।

अब सड़कों पर लोगों को उतरना पड़ेगा। अनिल जी लाॅबिंग की बात कर रहे हैं कि राजनेताओं, सांसदों के बीच लाॅबिंग होना चाहिए। मेरा कहना है कि लाॅबिंग का जमाना चला गया। लाॅबिंग का जमाना कारपोरेट सेक्टर के लिए भी खत्म हो गया। जब से घोटालों के टेप उजागर हुए हैं और कारपोरेट सेक्टर के लोग जेलों के पीछे पहुंचे हैं तब से उनके लिए भी दिक्कत हो गई है। हिमालय की आत्मा को आप देश के मृत शरीर में कैसे पहुंचा सकते हैं ये बड़ी चुनौती है। आज मीडिया में हिमालय के लिए कोई जगह नहीं है। वो जगह कैसे पैदा कर सकते हैं,ये बड़ी चुनौती है। मेरा एक छोटा सा निवेदन है कि देश के बच्चों के बीच अनिल जी विभिन्न भाषाओं में ऐसी पुस्तिका बंटवा सकें जो उनको हिमालय का वास्तविक दर्शन कराए। हिमालय के साथ उनकी आत्मा को जोड़े। वो हिमालय के प्रति चेतनाशील हो जाएं और हिमालय के घर-घर में प्रवेश हो जाएं जैसे कि गंगा जल का होता है तो मरे ख्याल से हिमालय दिवस की शुरूआत वहीं से होगी।

लोगों में हिमालय को लेकर आज कोई जिज्ञासा नहीं है। सुन्दर लाल जी ने वर्षों तक चिपको आंदोलन चलाया, हमलोगों ने सहयोग किया। तब मैं सर्व सेवा संघ में काम करता था। टिहरी बांध को लेकर उन्होंने इतना बड़ा आंदोलन किया। वो आंदोलन के आदमी हैं और वो बता सकते हैं कि हिमालय की क्या समस्याएं हैं और हिमालय को एक आंदोलन में कैसे बदला जा सकता है? मैं तो केवल मीडिया का आदमी हूं और लिखने-पढ़ने से मेरा ताल्लुक है। कभी आप समय देगें तो मैं बैठ कर बात करूंगा की इसमें मीडिया की भागीदारी कितनी जरूरी है और कैसे की जा सकती है।

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