हिमालयी विकास का ढाँचा

Submitted by editorial on Sun, 09/09/2018 - 15:57
Source
अमर उजाला, 09 सितम्बर, 2018

हिमालयहिमालय हिमालय को समझने की भूल शुरुआती दौर से ही हो चुकी है। इसे पहाड़, पानी, वनों का ही हिस्सा समझते हुए व्यवहार किया गया, जबकि हिमालय वेद पुराण के अनुसार तब भी आध्यात्मिक महत्त्व ज्यादा रखता था और आज भी उसी तरह से रखता है। हिमालय को हमेशा एक पूजनीय स्थल समझा गया और यही कारण है कि सभी तरह के देवी-देवताओं का यह वास बना। कोई भी धर्म हो, हिमालय उसका केन्द्र बना। इसका प्रमाण इन धर्मों के तीर्थस्थलों की हिमालय में उपस्थिति से मिलता है।

ऐसा नहीं है कि पूर्वजों ने हिमालय के भौतिक उपकारों को उचित स्थान न दिया हो। वे इसके महत्त्व को समझते थे और हिमालय को देश-दुनिया का पालक मानते थे। इसलिये हिमालयी वन, जल व वायु को देवतुल्य प्रसाद माना गया, ताकि इनके समुचित संरक्षण की गम्भीरता बन सके। इन सब बातों के पीछे एक ही मंतव्य था कि हिमालय को शारीरिक व आध्यात्मिक आपूर्तियों का केन्द्र मानकर चलेंगे, तो इसके संरक्षण के प्रति चिन्तित भी रहेंगे।

हिमालय देश का वह भूभाग है, जिसे कई तरह की संज्ञा दी गई है, जैसे मुकुट, दाता व देवलोक। लगभग 3,000 किलोमीटर में फैला 11 राज्यों का यह भूभाग चार करोड़ लोगों से सीधे जुड़ा है। देश का यह भूभाग ऐसा है, जिसमें अब भी प्राकृतिक निर्माण जारी है। हिमालय को शिशु अवस्था में ही माना जाता है। भूगर्भीय विज्ञान के अनुसार, यहाँ दूसरी भौगोलिक व भूगर्भीय क्रियाएँ अभी चरम पर नहीं पहुँची है, पर इससे पहले ही हिमालय को बड़ी छेड़छाड़ झेलनी पड़ी है। इसकी संवेदनशीलता को दरकिनार कर यहाँ भी मैदानी शैली में विकास की ताबड़तोड़ योजनाएँ शुरू हो गईं।

हिमालय का एक भी राज्य ऐसा नहीं, जहाँ पारिस्थितिकी असन्तुलन का चिन्ह न दिखाई दिया हो। इसका पता मानसून में ही चलता है, जब हिमालय को मानव जनित त्रासदियाँ झेलनी पड़ती हैं। त्रासदी यह है कि सब कुछ जानने-समझने के बाद भी हम अब भी उन्हीं रास्तों पर चलने को आमादा हैं। देश का पारिस्थितिकी केन्द्र हिमालय लगातार इसी तरह की अनदेखी का शिकार रहा है। केन्द्र सरकार ने हिमालय का यही इलाज माना कि इसे राज्य का दर्जा दे दिया जाये। इस तरह इसके विकास व सन्तुलन का भार केन्द्र पर ही न डालकर राज्यों के पाले में डाल दिया। राज्य की माँग के पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ ज्यादा रही हैं, यहाँ के लोगों के विकास और हिमालय के संरक्षण की कम। पर आज हिमालय से जुड़ा कोई भी राज्य पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से बेहतर नहीं कहा जा सकता। त्रासदी के बाद त्रासदी, अनियमित विकास की पहल व जान-माल का नुकसान ही हिमालय की पहचान बनता जा रहा है।

इसी तरह अगर हिमालयी राज्य की अनदेखी करते रहे, तो एक दिन सबका बंटाधार होना तय है। जब भी हिमालय में कोई आपदा आएगी, उसका असर देश-दुनिया में पड़ेगा ही, क्योंकि यहाँ से ही नदियाँ पनपती हैं। वनों के सारे सरोकार हिमालय से ही हैं। वनाच्छादित हिमालय ही देश की प्राणवायु व पानी का सबसे बड़ा कारक है। देश की 65 फीसदी जनता इसी के प्रताप से फलती-फूलती है। नदियों से ढोई हुई हिमालय की मिट्टी मैदानी इलाकों में हरियाली लाती है। ऐसे में हिमालय की पारिस्थितिकी अगर बिगड़ती है, तो इसका असर देश के जनजीवन पर सीधा पड़ेगा। इसलिये हिमालय को खोने जैसा बड़ा जोखिम नहीं लिया जा सकता।

हिमालयी पर्यावरण राष्ट्रीय चिन्ता का विषय नहीं बन पा रहा, जबकि इसे सब भोगते हैं। अगर राजनीतिज्ञों और नीतिकारों की कोई चिन्ता है, तो वह देश की आर्थिकी को चरम ऊँचाइयों पर पहुँचाने की है। उन्हें पैरों के तले सिकुड़ती-खिसकती जमीन दिखाई नहीं देती। उन्हें समझना चाहिए की नींव जितनी मजबूत होगी, इमारत उतनी ही ऊँची बनेगी। हालत यह है कि पारिस्थितिकी अपने बदतर हालत में पहुँच रही है और इसके संकेत भी सामने हैं। पर मिट्टी, हवा, पानी की रक्षा के लिये एक सामूहिक आन्दोलन खड़ा नहीं हो पा रहा। बिगड़ते पर्यावरण की खबरें हमारे बीच टुकड़ों-टुकड़ों में लगातार आती रही हैं, पर एक बड़ी आवाज आज तक सुनाई नहीं दी। इस बार के मानसून को ही देख लीजिए। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में जिस तरह से आपदाएँ आई हैं और तबाही मची है, उसने साफ कर दिया कि सब कुछ हमारी मर्जी से नहीं चलने वाला। हिमालय में रहने वालों को मैदानी विकास की शैली से परहेज करना पड़ेगा और उसके विकास के तौर-तरीके खुद तय करने होंगे। हम विकास का बड़ा बोझ नहीं उठा सकते। वैसे भी हिमालय ने संकेत देने शुरू कर दिये हैं। आर्थिक योजनाओं को बढ़ावा देने मात्र से हिमालय का भला नहीं हो सकता। हिमालय को बचाने के लिये इसकी पारिस्थितिकी को ज्यादा महत्त्व देना पड़ेगा। केन्द्र को हिमालय के प्रति ऐसी रणनीति बनानी पड़ेगी, जो पहले इसके संरक्षण की जिम्मेदारी ले। यहाँ विकास के रास्ते पारिस्थितिकी से होते हुए गुजरें। सरकारों और नीतिकारों को यह तो समझना ही पड़ेगा कि हिमालयी विकास का ढाँचा मैदानी तर्ज में नहीं हो सकता। यहाँ विकास से ज्यादा विरासत जरूरी है और आर्थिकी से ज्यादा पारिस्थितिकी।


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