हक की लूट

Submitted by editorial on Fri, 08/17/2018 - 17:58
Source
डाउन टू अर्थ, अगस्त,2018

ट्राइबल सबप्लानट्राइबल सबप्लान (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)क्या सरकार ट्राइबल सबप्लान (टीएसपी) का फंड आदिवासियों के कल्याण पर खर्च कर रही है? कम-से-कम कोयला और खान मंत्रालय में ऐसा कतई नहीं हो रहा। सूचना के अधिकार (आरटीआई) से मिले दस्तावेज बताते हैं कि इन मंत्रालयों ने टीएसपी का फंड आदिवासियों के कल्याण के बजाय उन कामों पर खर्च किया जिनसे आदिवासियों के सामने मुश्किलें खड़ी होंगी।

दस्तावेजों के मुताबिक, कोयला मंत्रालय ने टीएसपी का फंड कोयले के भण्डार का पता करने और खुदाई आदि पर व्यय किया जबकि खान मंत्रालय ने खनिजों के भण्डार पता लगाने के लिये सर्वे और मैपिंग के लिये इस फंड का उपयोग किया।

आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिये टीएसपी की शुरुआत 1974-75 में की गई थी। योजना आयोग (जिसे खत्म कर नीति आयोग बना दिया है और टीएसपी का नाम बदलकर शेड्यूल्ड ट्राइब कम्पोनेंट) ने हर तमाम मंत्रालयों और विभागों के लिये टीएसपी के लिये फंड निर्धारित किया। उदाहरण के लिये ग्रामीण विकास विभाग के लिये 17.5 प्रतिशत, स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के लिये 10.7 प्रतिशत, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के लिये 10 प्रतिशत, भूमि सुधार विभाग के लिये 10 प्रतिशत, जनजातीय मामलों के मंत्रालय के लिये 100 प्रतिशत, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लिये 8.2 प्रतिशत, कोयला मंत्रालय के लिये 8.2 प्रतिशत और खान मंत्रालय के लिये 4 प्रतिशत निर्धारित है। कुल मिलाकर सम्पूर्ण बजट का 8.6 प्रतिशत हिस्सा टीएसपी के लिये निर्धारित किया गया है।

जनजातीय मामलों के मंत्रालय के अनुसार कुल 37 मंत्रालय व विभागों को टीएसपी का फंड जारी किया जाता है। कुल 289 योजनाएँ टीएसपी में शामिल हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसी सरकार ने अब तक पूरा फंड जारी ही नहीं किया। उदाहरण के लिये 2018-19 के केन्द्र की तमाम योजनाओं के लिये बजटीय व्यय रुपए 10,14,451 करोड़ निर्धारित किया गया।

इस बजट का 8.6 प्रतिशत यानी रुपए 87,248 करोड़ आदिवासियों के कल्याण पर खर्च होने चाहिए लेकिन सरकार ने टीएसपी के लिये रुपए 39, 135 करोड़ ही आवंटित किये। यह निर्धारित बजट (8.6) के बजाय 3.86 प्रतिशत ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार ने आधा बजट भी नहीं दिया। 2014-15 में कुल अनुमानित बजट का 1.84 प्रतिशत, 2015-16 में 1.13 प्रतिशत और 2016-17 में 1.21 हिस्सा ही टीएसपी को आवंटित किया गया। इसी तरह 2017-18 में निर्धारित बजट का महज 1.53 प्रतिशत ही टीएसपी को नसीब हुआ।

जो बात सबसे चौंकाती है, वह यह है कि उपलब्ध कराई जा रही धनराशि भी खर्च नहीं की जा रही है। 13 मार्च 2018 को जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार, 2014-15 से 2016-17 के बीच रुपए 62,947.82 करोड़ टीएसपी के तहत खर्च किये गए जबकि इस दौरान रुपए 76,392 करोड़ आवंटित किये गए।

यह स्थिति तब है जब तमाम राजनीतिक दल और प्रधानमंत्री आदिवासियों के हितैषी होने का दावा कर चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद की 15वीं बैठक को 27 जून 2015 को सम्बोधित करते हुआ कहा था, ‘टीएसपी वार्षिक योजनाओं के साथ पंचवर्षीय योजनाओं में शामिल होने चाहिए और प्रावधान होना चाहिए कि ये नॉन ट्रांसफरेबल और नॉन लैप्सेबल हों।’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपने भाषणों में खुद को आदिवासियों का हितैषी बताने से नहीं चूकते। चाहे वह आदिवासी महिला को मंच पर चप्पल पहनाना हो या आदिवासी कार्निवल में हिस्सा लेना। 25 अक्टूबर, 2016 को मोदी ने कहा, ‘यह आवश्यक है कि विकास की प्रक्रिया में जनजातीय समुदायों को भी भागीदार बनाए जाएँ।’

कहाँ जा रहा है टीएसपी का फंड

योजना आयोग के मुताबिक, टीएसपी में केवल वही योजनाएँ शामिल की जानी चाहिए जिनसे आदिवासियों को प्रत्यक्ष लाभ सुनिश्चित हो। आदिवासियों को शोषण से बचाना टीएसपी का दूसरा अहम लक्ष्य है। लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? यह जानने के लिये आरटीआई कार्यकर्ता संजॉय बासु ने कोयला मंत्रालय से 2011-12 से 2017-18 और खान मंत्रालय से 2010-11 से 2017-18 तक का टीएसपी के खर्च का ब्यौरा माँगा। उन्हें मिले दस्तावेज बताते हैं कि ट्राइबल सबप्लान की जो धनराशि अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक और सामाजिक विकास पर खर्च होनी चाहिए थी कोयला मंत्रालय ने वह धनराशि कोयला कम्पनियों को आवंटित कर दी।

इन कम्पनियों ने टीएसपी के उद्देश्य से उलट कोयले के भण्डार खोजने, खुदाई और खदानों की सुरक्षा-संरक्षण पर इस धनराशि को खर्च किया। दूसरी तरफ खान मंत्रालय ने भी टीएसपी का फंड जूलॉजिकल सर्वे अॉफ इंडिया (geological survey of india - GIS) और इंडियन ब्यूरो अॉफ माइन (indian bureau of mines - IBM) को दे दिया। जीएसआई ने खान मंत्रालय से प्राप्त रुपए 66.21 करोड़ कोलकाता, नागपुर, जयपुर, हैदराबाद, लखनऊ और शिलांग क्षेत्र में खनिजोें का भण्डार पता लगाने के लिये किये गए सर्वे और मैपिंग पर खर्च किये। आईबीएम को खान मंत्रालय ने रुपए 9.3 करोड़ टीएसपी फंड दिया लेकिन उसने इस फंड का इस्तेमाल ही नहीं किया।

कोयला मंत्रालय ने कोयला कम्पनियों और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड (central mine planning and design institute) को जारी टीएसपी निधि का विवरण उपलब्ध कराया है। मंत्रालय ने इस अवधि के दौरान रुपए 205 करोड़ कोयला कम्पनियों और सीएमपीडीआईएल को स्थानीय स्तर पर कोयले के भण्डार पता लगाने, खुदाई और संरक्षण-सुरक्षा से जुड़ी परियोजनाओं को दिये।

सीएमपीडीआईएल ने 2011-12 से 2017-18 के बीच कोयले के भण्डार पता लगाने के लिये कुल रुपए 41.59 करोड़ प्राप्त किये जबकि खुदाई के लिये कम्पनी को रुपए 82.32 करोड़ कोयला मंत्रालय ने दिये। टीएसपी मद से कोयले के भण्डार पता लगाने के लिये उपलब्ध कराई गई धनराशि का इस्तेमाल कम्पनी ने छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और ओड़िशा के 20 ब्लॉक में कोयले के भण्डार खोजने में खर्च किये। इनमें से 14 ब्लॉक में कम्पनी ने ज्योग्राफिकल रिपोेर्ट मुहैया करा दी है जबकि छह जगह अभी खुदाई चल रही है। कम्पनी ने खुदाई के लिये, जारी टीएसपी की धनराशि का इस्तेमाल छत्तीसगढ़ के नौ ब्लॉक, ओड़िशा के दो ब्लॉक और मध्य प्रदेश के चार ब्लॉक में किया। चौंकाने वाली बात यह है कि सीएमपीडीआईएल ने कोयले के भण्डार पता लगाने के लिये मिली टीएसपी की धनराशि से तीन गुणा अधिक खर्च किया जिसकी भरपाई जनरल फंड से की गई।

सीएमपीडीआईएल ने इन परियोजनाओं पर कुल रुपए 122.87 करोड़ व्यय किये जबकि खुदाई पर रुपए 233 करोड़ खर्च कर डाले।

कोलकाता स्थित कोल कंट्रोलर कार्यालय ने आरटीआई के जवाब में बताया कि ट्राइबल सबप्लान की निधि सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड (central coalfields limited CCL), सिंगरेनी कोयलरीज कंपनी लिमिटेड (singareni collieries company limited - SCCL) और महानदी कोलफील्ड लिमिटेड (mahanadi coalfields limited - MCL) को दी गई। इन कम्पनियों ने इस निधि से झारखण्ड, आन्ध्र प्रदेश ओड़िशा और तेलंगाना में स्टोइंग और प्रोटेक्टिव वर्क के काम कराए।

2012-13 में इन सरकारी कम्पनियों ने रुपए 12.71 करोड़ इन कामों पर खर्च कर दिये। 2013-14 में रुपए 13.10 करोड़, 2014-15 में रुपए 15.17 करोड़, 2015-16 में रुपए 13.94 करोड़ 2016-17 में रुपए 16.53 करोड़ और 2017-18 में रुपए 16.40 करोड़ स्टोइंग और प्रोटेक्टिव वर्क पर खर्च किये। इन कम्पनियों ने 2012-13 से 2017-18 के बीच कुल रुपए 87.85 करोड़ टीएसपी का फंड खर्च किया।

टीएसपी फंड से कोयला कम्पनियों और उनके द्वारा किये गए काम पर सवाल खुद जनजातीय मामलों के मंत्रालय की 15 सितम्बर, 2015 को अन्तर मंत्रालय समन्वय समिति की बैठक में उठाया गया था। बैठक में यह मुद्दा उठा कि कोयला मंत्रालय ने टीएसपी का फंड खुदाई और कोयले के भण्डार पता लगाने पर कैसे खर्च कर दिया? बैठक में यह भी कहा गया कि कोयला मंत्रालय के टीएसपी पर किये गए खर्च पर तुरन्त ध्यान देने की जरूरत है और नीति आयोग के परामर्श से नई योजना की जरूरत है ताकि कोयला मंत्रालय के टीएसपी फंड का उचित इस्तेमाल हो सके।

टीएसपी फंड का दुरुपयोग नया नहीं

योजना आयोग ने साल 2010 में टीएसपी और एससीएसपी (scheduled caste sub plan) के दिशा-निर्देशों की समीक्षा के लिये एक टास्क फोर्स गठित की थी। टास्क फोर्स के अध्यक्ष नरेन्द्र जाधव (देखें अमल के लिये दंड का प्रावधान होना चाहिए) ने डाउन टू अर्थ को बताया कि टीएसपी का फंड कुछ सालों से जरूर बढ़ रहा है और सरकार इसके लिये अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन टीएसपी की निगरानी का कोई तंत्र अब तक विकसित नहीं किया गया है। इसी वजह से जो पैसा आदिवासियों के कल्याण पर खर्च होना चाहिए, वह दूसरी जगह स्थानान्तरित कर दिया जाता है।

आदिवासियों के हक की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता और कोयला व खनन मामलों के जानकार सुदीप श्रीवास्तव ने डाउन टू अर्थ को बताया ‘आदिवासी सबसे अधिक कोयला और खान मंत्रालय से प्रभावित होते हैं। आदिवासी क्षेत्रों में कोयले के भण्डार और खनिज मिलने पर उन्हें अपनी जड़ों से विस्थापित किया जाता है। यह हैरानी भरा है कि आदिवासियों को बुरी तरह प्रभावित करने वाला कोयला और खान मंत्रालय आदिवासियों के कल्याण पर खर्च किया जाने वाला टीएसपी का पैसा उन्हें उजाड़ने पर खर्च कर रहा है। कोयले के भण्डार, खुदाई और खदानों की सुरक्षा पर खर्च किया गया टीएसपी फंड इसकी मूल भावना के खिलाफ है।’

सुदीप बताते हैं ‘मंत्रालयों के पास आदिवासियों के कल्याण के लिये कोई योजना नहीं है, उन्हें टीएसपी की धनराशि सम्बन्धित राज्यों को भेज देनी चाहिए ताकि राज्य इस फंड का उचित उपयोग कर सकें।’

पैसा आदिवासियों पर खर्च होने की बजाय कम्पनियों पर हो रहा हैपैसा आदिवासियों पर खर्च होने की बजाय कम्पनियों पर हो रहा है (फोटो साभार - डाउन टू अर्थ)ऐसा नहीं है कि केवल कोयला और खान मंत्रालय में ही टीएसपी फंड की बंदरबाँट हुई है। 2015 में जारी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की अॉडिट रिपोर्ट के मुताबिक, टीएसपी की अवधारणा आदिवासी बहुल राज्यों जैसे अरुणाचल प्रदेश और मेघालय आदि में लागू नहीं है क्योंकि वहाँ आदिवासी आबादी 60 प्रतिशत से अधिक है। सीएजी ने पाया कि इन राज्यों के लिये भी रुपए 706.87 करोड़ टीएसपी फंड जारी किया गया।

इसके अलावा रुपए 326.21 करोड़ उन राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को जारी किये गए जहाँ 2011 की जनगणना के मुताबिक आदिवासी आबादी ही नहीं है। सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 में योजना आयोग के दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि जिस टीएसपी फंड का उपयोग न हो पाया हो, वित्तीय वर्ष के अन्त में उसे नॉन लैप्सेबल पूल में शामिल कर जनजातीय मामलों के मंत्रालय को दे दिया जाये ताकि आदिवासियों के लिये बनी योजनाएँ लागू हो सकें। गाइडलाइन के जारी होने के 4 साल बाद भी इस पर अमल नहीं किया गया।

संसद की लोक लेखा समिति (Public accounts committee) के अध्यक्ष व सांसद मल्लिकार्जुन खड़गे ने 18 दिसम्बर, 2017 को टीएसपी पर अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की। रिपोर्ट में टीएसपी के कार्यान्वयन में कई खामियाँ पाई गईं। मसलन, फंड जारी करने में विशिष्ट नियमों को न अपनाना, कमजोर कार्यक्रम प्रबन्धन, निगरानी प्रणाली की कमी और सूचना प्रदान करने वाले कार्यक्रमों को लागू न करना। कमेटी ने पाया कि वित्तीय वर्ष के अन्त में फंड को टीएसपी के नॉन लैप्सबल पूल में ट्रांसफर नहीं किया गया जिसे बाद में इस्तेमाल किया जा सके।

नरेन्द्र जाधव बताते हैं, ‘टीएसपी फंड का दूसरी जगह ट्रांसफर करना अपवाद नहीं है, यह नियमित होता जा रहा है। आदिवासियों के लिये निर्धारित पैसा उनके कल्याण पर खर्च हो इसके लिये जरूरी है कि टीएसपी की ठीक से मॉनिटरिंग हो।’

अमल के लिये दंड का प्रावधान होना चाहिए

ट्राइबल सबप्लान के दिशा-निर्देशों के समीक्षा के लिये योजना आयोग ने नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में टास्क फोर्स गठित की थी। आयोग के सदस्य रह चुके नरेंद्र जाधव अभी राज्यसभा सांसद हैं। उन्होंने टीएसपी के मुद्दे पर डाउन टू अर्थ से बातचीत की

ट्राइबल सबप्लान के क्रियान्वयन में क्या कमियाँ आपको मिलीं?

पहली कमी यह थी कि लोक संख्या के अनुपात में टीएसपी फंड का निर्धारण नहीं होता था। दूसरा, जो फंड निर्धारित होता था, वह पूरी तरह खर्च नहीं नहीं हो पाता था। इसके अलावा तीसरी कमी यह थी कि टीएसपी फंड दूसरी जगह स्थानान्तरित कर दिया जाता था। ये समस्याएँ अब भी आम हैं।

टीएसपी के क्रियान्वयन में समस्याएँ क्यों सामने आईं और इसका निदान क्या है?

टीएसपी की गाइडलाइन योजना आयोग द्वारा बनाई गईं लेकिन योजना आयोग कार्यकारी निकाय नहीं था। उनके दिशा-निर्देश पर राज्य या केन्द्र सरकार अमल नहीं करती है तो उनसे पूछने वाला कोई नहीं था। क्योंकि वह गाइडलाइन थी नियम या कानून नहीं जिन्हें मानना अनिवार्य हो। इसके समाधान का एक विचार तब आया जब 12वीं पंचवर्षीय योजना की तैयारी चल रही थी। तब बहुत से समूह बनाए गए थे। तब एक विचार यह आया कि योजना आयोग की गाइडलाइन के बजाय केन्द्रीय मंत्रिमंडल की गाइडलाइन बनाई जाये। अगर ऐसा हो जाता तो अमल ज्यादा अच्छा हो जाता। जहाँ अमल नहीं होता है, वहाँ दंड का प्रावधान हो सकता था। दूसरी सोच यह थी कि कायदा बनाए जाएँ। यह प्रक्रिया शुरू भी हो गई लेकिन अंजाम तक नहीं पहुँची।

कोयला मंत्रालय से आदिवासी बहुत प्रभावित होते हैं। क्या इसका टीएसपी फंड दूसरी जगह स्थानान्तरित करना सही है?

ये बहुत गलत बात है। पैसा आदिवासियों के कल्याण पर ही खर्च होना चाहिए। समाज में खाई को मिटाने के लिये तो और अधिक खर्च करना चाहिए लेकिन हालात यह है कि निर्धारित फंड ही नहीं दिया जा रहा है। मैंने अपनी रिपोर्ट में भी विस्तार से लिखा है टीएसपी का फंड स्थानान्तरित नहीं होना चाहिए।

नई पॉलिसी क्या हो सकती है?

योजना आयोग को खत्म करने के बाद प्लान और नॉन प्लान खर्च का अन्तर खत्म हो गया है। अब पंचवर्षीय योजना ही नहीं रहा। टीएसपी के लिये कारगर योजना यह हो सकती है कि केन्द्र सरकार की सारी योजनाओं के कुल खर्च में लोकसंख्या के अनुपात में खर्च निर्धारित करना चाहिए। यह टीएसपी की मूलभावना से अनुकूल भी होगा।

योजना आयोग और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कह चुके हैं टीएसपी का फंड नॉन लैप्सेबल और नॉन डायवर्टेबल होना चाहिए। आखिर इस पर अमल क्यों नहीं होता?

दिशा-निर्देश और सुझाव कभी अनिवार्य नहीं होते, चाहे वह योजना आयोग के हों या किसी और के। यह सरकार पर निर्भर है कि दिशा-निर्देशों को मानना है कि नहीं। टीएसपी फंड के लिये योजना आयोग के दिशा-निर्देशों पर इसी वजह से अमल नहीं हुआ। अमल के लिये कायदे की जरूरत है। अगर अमल नहीं होता है दंड का प्रावधान भी जरूरी है। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में मैंने यह मुद्दा उठाया था कि आयोग में निगरानी तंत्र की आवश्यकता है ताकि यह देखा जा सके कि जो पैसा योजनाओं के लिये जा रहा है वह जरूरतमंदों पर खर्च होता है या नहीं।

 

 

 

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