हकदारी-जवाबदारी की बाट जोहता पानी प्रबंधन

Submitted by admin on Fri, 11/29/2013 - 16:36

पानी के स्थानीय, अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय विवाद हैं। इसी के कारण लोग पानी प्रबंधन के लिए एक-दूसरे की ओर ताक रहे हैं। इसी के कारण सूखती-प्रदूषित होती नदियों का दुष्प्रभाव झेलने के बावजूद समाज नदियों के पुनर्जीवन के लिए व्यापक स्तर पर आगे आता दिखाई नहीं दे रहा। बाजार भी इसी का लाभ उठा रहा है। याद रखने की जरूरत यह भी है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ इंसान के लिए नहीं हैं, दूसरे जीव व वनस्पतियों का भी उन पर बराबर का हक है। अतः उपयोग की प्राथमिकता पर हम इंसान ही नहीं, कुदरत के दूसरे जीव व वनस्पतियों की प्यास को भी सबसे आगे रखें।

हम अक्सर दावा करते हैं कि भारत में जलप्रबंधन की परंपरागत प्रणालियां अति उत्तम थे। आप पूछ सकते हैं कि यदि ये प्रणालियां और प्रबंधन इतने ही सुंदर और उत्तम थे, तो टूट क्यों गए ? समाज व सरकारें इन्हें जीवित क्यों नहीं रख सका? ये फिर कैसे जीवित होंगे?

क्यों टूटा साझा प्रबंधन?


अतीत गवाह है कि पानी का काम कभी अकेले नहीं हो सकता। पानी एक साझा उपक्रम है। अतः इसका प्रबंधन भी साझे से ही संभव है। वैदिक काल से मुगल शासन तक सामिलात संसाधनों का साझा प्रबंधन विशः, नरिष्ठा, सभा, समिति, खाप, पंचायत आदि के नाम वाले संगठित ग्राम समुदायिक ग्राम्य संस्थान किया करते थे। अंग्रेजी हुकूमत ने भूमि-जमींदारी व्यवस्था के बहाने नए-नए कानून बनाकर ग्राम पंचायतों के अधिकारों में खुला हस्तक्षेप प्रारंभ किया। इस बहाने पंचों को दण्डित किया जाने लगा। परिणामस्वरूप साझे कार्यों के प्रति पंचायतें धीरे-धीरे निष्क्रिय होती गईं। नतीजा यह हुआ कि सदियों की बनी-बनाई साझा प्रबंधन और संगठन व्यवस्था टूट गई। रही-सही कसर अंग्रेजी हुकूमत ने राजस्व बटोरने की दृष्टि से नदी, नहर व वनों को सरकारी नियंत्रण में लेकर पूरी कर दी।

सरकारी के प्रति परायापन एक बड़ी चुनौती


अंग्रेजी हुकूमत के शासन से पूर्व प्राकृतिक संसाधनों पर लोगों का मालिकाना था। नहरें थी, लेकिन उनसे सिंचाई पर सिंचान नहीं वसूला जाता था। इन संसाधनों के सरकारी होते ही लोगों ने इन्हें पराया मान लिया। हालांकि ‘जिसकी भूमि-उसका भूजल’ का निजी अधिकार पहले भी भूमालिकों के हाथ था और आज भी। लेकिन भूजल का अदृश्य भंडार हमें दिखाई नहीं देता। हमारा समाज आज भी यही मानता है कि जल-जंगल के सतही स्रोत सरकार के हैं। अतः पानी पिलाना, सिंचाई व जंगल का इंतज़ाम उसी के काम हैं; वही करे। आज, जब केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारों ने भी अनेक योजनाओं के क्रियान्वयन के अधिकार पंचायतों को सौंप दिए हैं; बावजूद इसके सरकारी को पराया मानने की नजीर और नजरिया आज पहले से बदतर हुआ है। इसी सोच व नासमझी ने पूरे भारत के जल प्रबंधन का चक्र उलट दिया है। पूरी जवाबदेही अब सरकार के सिर आ गई है। समाज हकदारी खो चुका है। परिणामस्वरूप आज भारत के पानी प्रबंधन को बाढ़-सुखाड़ से इतर तीन नए संकटों से जूझना पड़ रहा है।

नये संकट


शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण: 21वीं सदी के इस दूसरे दशक में भारत के पानी समक्ष पेश नए संकट ये तीन ही हैं। जो उद्योग या किसान जेट अथवा समर्सिबल पंप लगाकर धकाधक भूजल खींच रहा है, उस पर कोई पाबंदी नहीं कि जितना लिया, उतना पानी वापस धरती को लौटाए। हालांकि अभी हाल ही में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने एक मामले में उद्योगों को ऐसे आदेश जारी किए हैं; लेकिन जब तक ‘रेलनीर’ या हमारे दूसरे सरकारी संयंत्र खुद यह सुनिश्चित नहीं करते कि उन्होने जिन इलाकों का पानी खींचा है, उन्हें वैसा और उतना पानी वे कैसे लौटायेंगे, तब तक सरकार गैरसरकारी को कैसे बाध्य कर सकती है? यही हाल अतिक्रमण का है। देश में जलसंरचनाओं की जमीनों पकारीर सर-गैरसरकारी कब्जे के उदाहरण एक नहीं, लाखों हैं। तहसील अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक कई ऐतिहासिक आदेशों के बावजूद स्थिति बहुत बदली नहीं है। जहां तक प्रदूषण का सवाल है, हमने उद्योगों को नदी किनारे बसाने के लिए दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा, लोकनायक गंगापथ और गंगा-यमुना एक्सप्रेस वे आदि परियोजनायें तो बना ली, लेकिन इनके किनारे बसने वाले उद्योगों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण के स्रोत पर प्रदूषण निपटारे की कोई ठोस व्यवस्था योजना हम आज तक सुनिश्चित नहीं कर पाए हैं; जबकि प्रदूषण प्रबंधन का सिद्धांत यही है।

तीन समाधान


जिस तरह कैंसर का निदान उसके स्रोत से किया जाता है, उसी तरह प्रदूषण का निपटारा भी उसके स्रोत पर ही किया जाना चाहिए। मल हो या कचरा.. दोनों को ढोकर ले जाना सिर्फ सामाजिक व नैतिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पाप भी है। भूजल शोषण नियंत्रण का उपाय भूजल स्रोतों का नियमन, लाइसेंसीकरण या रोक नहीं हो सकता। हां! अकाल आदि आपदाकाल छोड़कर सामान्य दिनों में जलनिकासी की अधिकतम गहराई सीमित कर भूजल-शोषण कुछ हद तक नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। ऐसा करने से स्थानीय उपभोक्ताओं को जलसंचयन के लिए भी कुछ हद तक बाध्य किया जा सकेगा। किंतु सभी प्रकार के शोषण रोकने का यदि कोई सबसे पहला और बुनियादी सिद्धांत है, तो वह यह कि हम जिससे जितना लें, उसे उतना और वैसा वापस लौटाएं। यह सिद्धांत पानी पर भी पूरी तरह लागू होता है। अतिक्रमण रोकने के लिए जलसंरचनाओं का चिन्हीकरण और सीमांकन कर अधिसूचित करना एक सफल उपाय साबित हो सकता है।

हकदारी-जवाबदारी की जुगलबंदी जरूरी


ऊपरी तौर पर देखें, तो इन सिद्धांतों को व्यवहार में लाना सुनिश्चित कर हम उक्त तीन संकट से निजात पा सकते हैं, लेकिन बाजार के लालच और प्राकृतिक उपक्रमों के प्रबंधन को लेकर सरकार की ताकने की सामाजिक आदत से निजात पाने का रास्ता एक ही है: प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की जवाबदारी तथा मालिकाने व उपयोग की हकदारी सुनिश्चित करना। गौर करने की बात है कि वन प्रबंधन में वनवासियों की सहभागिता और लाभ में भागीदारी प्रावधान के परिणाम बेहतर आए हैं। क्यों? क्योंकि अतिक्रमण, शोषण और प्रदूषण हमारे प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट होने के कारण नहीं हैं। ये परिणाम है, प्राकृतिक संसाधनों के प्रति पराएपन की हमारी सोच के।

यूं देखें, तो जहां-जहां समाज ने मान लिया है कि ये स्रोत भले ही सरकार के हों, लेकिन इनका उपयोग तो हम ही करेंगे, वहां-वहां चित्र बदल गया है। वहां-वहां समाज पानी के संकट से उबर गया है। समाज और शासन-प्रशासन के साझे से संकट पर विजय के उदाहरण भी इस देश में कई हैं। उ. प्र. के जिला सहारनपुर में पांवधोई नदी की प्रदूषण मुक्ति की कथा आज भी प्रशासनिक पहल, औद्योगिक सहयोग और जननिगरानी की साझी मिसाल के तौर पर जानी जाती है। पंजाब की कालीबेंई की प्रदूषण मुक्ति भी मिसाल भी साझी ही है। महाराष्ट्र में अग्रणी नदी पुनर्जीवन की जारी कोशिश इस कड़ी में ताजा है। महोबा, हुबली-धारवाड़ और देवास में तालाबों-झीलों को जीवन लौटाने के नए काम ऐसे ही साझे के उदाहरण हैं। लेकिन हर जगह का समाज व प्रशासन ऐसे ही हों, जरूरी नहीं है। अतः हकदारी और जवाबदारी की जुगलबंदी जरूरी है। सरकारी के प्रति परायेपन के भाव से समाज को उबारने का यही तरीका है। वरना तीन सवाल भारतीय पानी प्रबंधन के समक्ष नई चुनौती बनकर खड़े ही हैं: प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन? शासन-प्रशासन प्राकृतिक संसाधनों की ठीक से देखभाल न करे, तो जनता क्या करे? जलापूर्ति पर निर्णय का अधिकार किसका? पानी के व्यावसायीकरण ने यह चुनौती और बढ़ा दी है।

आखिर हकदारी की कब तक बाट जोहेगी जवाबदारी?


इन्ही सवालों के कारण पानी के स्थानीय, अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय विवाद हैं। इसी के कारण लोग पानी प्रबंधन के लिए एक-दूसरे की ओर ताक रहे हैं। इसी के कारण सूखती-प्रदूषित होती नदियों का दुष्प्रभाव झेलने के बावजूद समाज नदियों के पुनर्जीवन के लिए व्यापक स्तर पर आगे आता दिखाई नहीं दे रहा। बाजार भी इसी का लाभ उठा रहा है। अभी आम धारणा यह है कि सार्वजनिक जरूरतों की पूर्ति करना शासन-प्रशासन का काम है। उनके काम में दखल देना... कानून अपने हाथ में लेना है। प्राचीन रोमन साम्राज्य द्वारा स्थापित पब्लिक ट्रस्टीशिप के वैधानिक सिद्धांत समेत दुनिया भर के आधुनिक ट्रस्टीशिप के सिद्धांत इसे खारिज करते हैं। भारतीय संविधान की धारा 21 और 32 इन सिद्धांतों को समर्थन देती हैं। जो जवाबदारी के लिए हकदारी जरूरी मानते हैं, वे भी इसे खारिज करते ही रहते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि हकदारी पाने की प्रतीक्षा में हम कब तक अपनी जवाबदारी से दूर भागते रहेंगे? आखिर हम यह क्यूं भूल जाते हैं कि जवाबदारी निभाने से हकदारी खुद-ब-खुद आ जाती है? याद रखने की जरूरत यह भी है कि कुदरत की सारी नियामतें सिर्फ इंसान के लिए नहीं हैं, दूसरे जीव व वनस्पतियों का भी उन पर बराबर का हक है। अतः उपयोग की प्राथमिकता पर हम इंसान ही नहीं, कुदरत के दूसरे जीव व वनस्पतियों की प्यास को भी सबसे आगे रखें।

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