हर हाल में हानिकर खुला शौच

Submitted by Hindi on Tue, 10/09/2012 - 11:32
Source
पंचायतनामा, 08-14 अक्टूबर 2012
महात्मा गांधी और विनोबा भावे ने कभी सुचिता यानि स्वच्छता से आत्मदर्शन की कल्पना की थी। ‘शुचिता से आत्मदर्शन’, जिसमें ‘शौचात् स्वांगजुगुप्सा’ तक भौतिक शुचिता से लेकर आध्यात्मिक शुचिता, आत्मानुभूति तक। जिससे भारत के जन-जीवन में शुचिता का दर्शन होगा। वह मानते थे कि तन व मन दोनों जब तक स्वच्छ नहीं होंगे तब तक धर्म, दर्शन व भगवान की बात करना ही बेमायने है। आज से करीब 90 साल पहले गॉंधी ने ग्राम स्वच्छता अभियान की शुरुआत की थी। उन्होंने यह बहुत पहले ही समझ लिया था कि देश में कई एक महामारियों का एक मात्र कारण है-खुले में शौच और घरों के आसपास फैली बजबजाती गंदगी। उस समय हैजा, कालरा, चिकन पॉक्स जैसी जानलेवा बीमारियों से कभी-कभी गांव की पूरी की पूरी आबादी ही साफ हो जाती थी। यही कारण था कि गांधी ने ताउम्र सफाई अभियान की न केवल वकालत की बल्कि गंदी से गंदी बस्ती में जाकर पाखाना साफ किया और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया। वह खुले में शौच के घोर विरोधी थे। वह गांव-गांव जाकर लोगों को खुले में शौच न करने व साफ-सफाई के विषय में वैज्ञानिक ढंग से समझाते थे।

वैज्ञानिकों के मुताबिक एक मक्खी एक दिन में कम से कम तीन किलोमीटर तक जरूर उड़ती है। इस तरह से मक्खियां एक बस्ती से दूसरी बस्ती, आसपास, खेत व जंगलों का सफर करती रहती हैं। मक्खियां मल पर बैठती हैं और फिर उड़ कर घरों में पहुंच कर खाने-पीने की चीजों पर बैठती हैं। उनके पैरों व पंखों में मल चिपका हुआ रहता है जो खान-पान की चीजों में जाकर घुल जाता है। इससे हैजा, कालरा व डायरिया जैसी जानलेवा बीमारी फैलने में देर नहीं लगती।

दुर्भाग्य से खुले में शौच की प्रथा इस देश में अभी भी बरकरार है। जिसके कारण कई जानलेवा बीमारियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक शोध में खुलासा हुआ है कि पोलियो के वायरस केवल मल (टट्टी) में पाए जाते हैं। मेडिकल साइंस का दावा है कि जब तक खुले में शौच की प्रथा बनी रहेगी, पोलियो को जड़ से मिटाया ही नहीं जा सकता। कारण, महज एक ग्राम टट्टी में ही एक करोड़ वायरस, 10 लाख जीवाणु, एक हजार परजीवी कोशिकाएं और 100 अंडे पाए जाते हैं। जब यह हवा के साथ उड़ते हैं तो आसपास के कई गांवों में खतरनाक बीमारियां जन्म लेती हैं। डाक्टरों का दावा है कि सभी मौसमी बीमारियां खुले में शौच करने से ही होती हैं। इनमें डायरिया, कालरा, हैजा व चिकनगुनियां जैसी जानलेवा बीमारियां, जिसके कारण आज भी भारत में लाखों जानें जा रही हैं, खुले में शौच करने से हो रही हैं। 2002 के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में रोज तकरीबन 20,000 मीट्रिक टन खुले में मल का निस्तारण होता है, जो इन बीमारियां का घर है।

अब सवाल उठता है कि खुले में शौच क्यों खतरनाक है? गांव में अभी भी यह धारणा बनी हुई है कि बस्ती से दूर, खेत, जंगल या नदियों के किनारे खुले में मल निस्तारण में कोई बुराई नहीं है। लोग समझते हैं कि जब काफी दूर जाकर खुले में मल का निस्तारण करेंगे तो वह गंदगी बस्ती या घरों तक भला कैसे पहुंच जायेगी। लेकिन यही धारणा सबसे बड़ी भूल है। हकीकत तो यह है कि आज हैजा, कालरा, डायरिया और चिकनगुनियां जैसी बीमारियां देश में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान ले रही हैं तो इसी एक धारणा की वजह से। वैज्ञानिक तथ्य तो यह है कि खुले में मल निस्तारण गांव या बस्ती से चाहे जितनी दूर ही क्यों न हो रहा हो वह घरों व बस्तियों तक पहुंच ही जायेगा। इसका एक बाकायदा सायकल है। मेडिकल साइंस ने एक सर्वे में यह प्रमाणित किया है कि यदि कहीं भी खुले में मल निस्तारण हो रहा है तो कुल 48 ऐसे माध्यम हैं जिनसे होकर वही मल घरों, यहां तक की हमारे खान-पान की चीजों तक पहुंच जाता है।

इनमें सबसे प्रबल माध्यम हैं मक्खियां। मक्खियों में उड़ने की गजब की क्षमता होती है। एक मक्खी को छह पैर होते हैं। एक अनुमान के तहत एक बार भोजन करने में कम से कम पांच मक्खियां बैठती हैं। इन पांचों मक्खियों के छह पैर मिलाकर कुल 30 पैरों के माध्यम से मल हमारे भोजन में घुल जाता है, जिसे हम अक्सर गंभीरता से नहीं लेते। इस तरह से हम भोजन के साथ-साथ मल का सेवन करते रहते हैं। जीव वैज्ञानिकों के मुताबिक एक मक्खी एक दिन में कम से कम तीन किलोमीटर तक जरूर उड़ती है। इस तरह से मक्खियां एक बस्ती से दूसरी बस्ती, आसपास, खेत व जंगलों का सफर करती रहती हैं। मक्खियां मल पर बैठती हैं और फिर उड़ कर घरों में पहुंच कर खाने-पीने की चीजों पर बैठती हैं। उनके पैरों व पंखों में मल चिपका हुआ रहता है जो खान-पान की चीजों में जाकर घुल जाता है। इससे हैजा, कालरा व डायरिया जैसी जानलेवा बीमारी फैलने में देर नहीं लगती।

इन 48 माध्यमों में 6 ऐसे प्रमुख माध्यम हैं, जिसके द्वारा मल हमारे घरों, भोजन व पेट तक पहुंचता है। इस विषय पर शोध कर रहे लोगों का दावा है कि जब तक खुले में शौच की प्रथा रहेगी, इन छह माध्यमों से मल पेट तक जाने की प्रक्रिया को कोई नहीं रोक सकता। इनमें जो छह प्रमुख माध्यम हैं, वह इस प्रकार हैं-उंगलियां, भोजन, खेत, मिट्टी, पानी, मक्खी और हवा। शोधकर्ताओं ने यह सिद्घ किया है कि इन छह प्रमुख कारणों के ऐसे चक्र हैं जो बताते हैं कि कैसे खुले में शौच करने से मल पेट में स्वत: ही पहुंच जायेगा। इसे इन कुछ उदाहरणों से आसानी के साथ समझा जा सकता है। यदि कोई बहते हुए पानी के किनारे वाली जगहों पर खुले में शौच करता है तो मल पानी के सापेक्ष बहकर नीचे की ओर आता है। उस स्थान से दूर कोई उसी बहते हुए जल में स्नान कर रहा है या दातून कर रहा है तो फिर पानी में घुल कर बह रहा मल उंगलियों के माध्यम से पेट तक पहुंचता जायेगा।

मल, पानी और उंगलियों के माध्यम से पेट तक पहुंचना एक स्वत: प्रक्रिया है। यह खुली जगहों पर शौच करने पर अक्सर देखने को मिलता है। इसी तरह से इसके अन्य चक्र भी हैं जैसे- खुले में शौच करने से मल मिट्टी में मिल जाता है। उस मिट्टी में उगाई गई मूली या इसके समधर्मी फल-सब्जियां के साथ मल पेट में पहुंच जाता है। कुछ इसी तरह से पाखाना, तरल चीजों और मुंह का संबंध बन जाता है जिससे मल हमारे पेट के अंदर घुसता है। मक्खियां, भोजन और मुंह, पाखाना,मल, हवा तथा मुंह का चक्रीय विज्ञान भी कुछ ऐसा है कि घूम फिर कर मल पेट में प्रवेश कर जाता है। गौर करने की बात यह है कि जो मल एक चक्रीय रूप से हमारे पेट के भीतर जा रहा है-उसकी सिर्फ एक वजह है, खुले में शौच।

यह सारे चक्र इतने खतरनाक हैं कि यह सीधे जानलेवा बीमारियों को जन्म देते हैं। इसके अतिरिक्त पालतू जानवर, मोटर साइकिल की पहिया, पैर के जूते भी मल को घरों तक लाते हैं। बहुत कम लोग इस बात का ध्यान रखते हैं कि खुले में किये गये शौच का मल जानवरों की खुर के माध्यम से घरों तक तथा वहां से वह उन्हीं छह चक्रों के माध्यम से पेट के भीतर तक पहुंच जाता है। इनमें गाय, भैंस के अलावा कुत्ते, बिल्ली की खुर के माध्यम से भी मल घरों तक पहुंचता है। इन तथ्यों के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला गया कि जब तक खुले में शौच की प्रथा पूरी तरह से बंद नहीं हो जाती तब तक पोलियो, डायरिया, हैजा, कालरा व चिकनगुनियां जैसी दर्जनों जानलेवा बीमारियों से निजात कभी नहीं पाया जा सकता। यहीं नहीं उपरोक्त तथ्य हमें यह भी बताते हैं कि एक-दो गांवों को खुले में शौंच मुक्त करने से भी कोई फायदा नहीं, क्योंकि मल को पेट तक पहुंचाने वाले छह प्रमुख माध्यम अपने चक्रीय खासियतों से कई किलोमीटर की परिधि में बसी बस्तियों को अपने गिरफ्त में लिये रहते हैं। इसलिए भारत को खुले में शौच मुक्त देश बनाना ही होगा।

(लेखक हिन्दी वाटर पोर्टल के फेलो हैं)

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