आईएफएस संदीप के प्रयासों से लौटी दयारा बुग्याल की खूबसूरती

Submitted by HindiWater on Tue, 07/21/2020 - 09:30

दयारा बुग्याल में भू-कटाव। फोटो - डीएफओ संदीप कुमार

बुग्याल खुदरत की छिपी हुई खूबसूरती है, जिसे देखने के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ऊंचाई पर मीलों चलना पड़ता है। साफ तौर पर कहें, तो बिना मेहनत के बुग्यालों की खूबसूरती को आप नहीं निहार सकेंगें। हिमालयी क्षेत्रों में ट्री-लाइन या टिंबर लाइन समाप्त होने के बाद जो विशाल घास के मैदान शुरू होते हैं, उसे ही बुग्याल कहते हैं। यानि ट्री-लाइन के ऊपर और स्नो लाइन के नीचे। इन्हें ‘पहाड़ का मैदान’ भी कह सकते हैं। वैसे तो इन ऊंचे घास के मैदानों को स्थानीय भाषा में ‘बुग्याल’ कहा जाता है, लेकिन इसका वैज्ञानिक नाम ‘ऐल्पाइन मेडोज़’ (Alpine Meadows) है। सालों से यहां चरवाहे अपने मवेशियों को चराने के लिए आते रहे हैं, लेकिन मवेशियों को चराने का कोई वैज्ञानिक तरीका अपनाया नहीं जाता है। इसके अलावा बुग्यालों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने से यहां मानवीय गतिविधियों में भारी इजाफा हुआ है। ऐसे में प्रकृति की छिपी हुई इस सुंदरता पर न केवल मानवीय हस्तक्षेप की मार पड़ी, बल्कि मानवीय गतिविधियों के कारण प्रकृति की भी भारी मार पड़ी। जिस कारण बुग्यालों पर भी खतरा मंडराने लगा है। ऐसे ही हिमालयी क्षेत्रों के सैंकड़ों बुग्यालों में से एक है, उत्तराखंड का ‘दयारा बुग्याल’, जो खतरे में है, लेकिन डीएफओ और उनकी टीम के प्रयासों से इसकी अलौकिकता को लौटाने में सहायता मिल रही है। 

उत्तरकाशी में 3408 मीटर की ऊंचाई पर 28 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला दयारा बुग्याल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए विश्वविख्यात है और उत्तराखंड के सबसे खूबसूरत बुग्यालों और पर्यटन स्थलों में से एक है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में यहां मानवीय हस्तक्षेप (पर्यटन) काफी बढ़ गया है, जिससे बुग्याल को नुकसान पहुंच रहा है। बड़े पैमाने पर पशु चराने भी लोग यहां आते थे। इन सभी कारणों से अमूल्य वनस्पतियों को नुकसान पहुंच रहा था, जो बुग्याल के लिए भी नुकसानदायक था। अधिक चरान और मानवीय गतिविधियों से जैसे ही घास और वनस्पतियां कम हुई, बरसात में भूक्षरण और भूकटाव होने लगा। जमीन छोटी-छोटी खाई में तब्दील होने लगी थी। ऐसे में बुग्याल अपना अस्तित्व खो रहा था, जिसे बचाने का जिम्मा उत्तरकाशी वन प्रभाग ने लिया और बुग्याल की खूबसूरती लौटाने के लिए ईको फ्रैंडली ट्रीटमेंट की शुरुआत की। 

फोटो - डीएफओ संदीप कुमार

ईको फ्रैंडली ट्रीटमेंट अपनाने से पहले वन गुर्जरों को विस्थापित किया गया, ताकि पशुओं की संख्या को कम किया जा सके। पर्यटन को व्यवस्थित और नियमित किया गया। इसके लिए रात को रुकने (नाइट स्टे) पर रोक लगा दी गई। कैंपिंग के स्थान को तीन किलोमीटर नीचे कर दिया है। यानी कोर एरिया में पर्यटक अब कैंपिंग नहीं कर सकते। इसके बाद वन विभाग ने आगे का कार्य किया। इसके बाद वन विभाग ने दो चरणों में कार्य करने की योजना बनाई। 

वैसे तो उत्तराखंड में चीड़ को अभिशाप माना जाता है, क्योंकि यहां के जंगलों में इससे हर साल आग लगती है, लेकिन इसके कई फायदे भी हैं। इन्हीं फायदों का लाभ दयारा बुग्याल में उठाया गया।

दयारा बुग्याल के कटाव वाले हिस्से में चीड़ की पत्तियों, जिसे पिरूल कहा जाता है, 240 टन पिरूल से 1200 बंडल तैयार किए गए। इन बंडलों से 400 चैक डैम, 600 मीटर लंबा चैनल और चैंबर तैयार किए गए। ढलाननुमा स्थालों पर काॅयर जियो मैट (coir geo-textile) बिछाई गई। मैट पर घास की एक प्रजाति ‘आयरिस’ रोपी गई। वन प्रभाग के इन प्रयासों से आयरिस घास अब जड़ जमा चुकी है और 129 घनमीटर क्षेत्र में भूक्षरण भी रुक गया है। निचले इलाकों में बाढ़ की आशंका भी काफी कम हो गई है।

इस काम में बांस का उपयोग भी किया गया। इसे देखते हुए वन प्रभाग की योजना के अंतर्गत दयारा बुग्याल में उच्च हिमालयी पौधों की नर्सरी तैयारी की जाएगी। इसमे आयरिस घास को भी शामिल किया जाएगा। ऐसा करने से भविष्य में किसी कारण हुए भूक्षरण को रोकने में आसानी होगी और हिमालयी पौधों का संरक्षण भी किया जा सकेगा। हालांकि इस कार्य में 27 लाख रुपये का खर्च आया है। 

उत्तरकाशी वन प्रभाग के डीएफओ संदीप कुमार कहते हैं कि ‘‘दयारा बुग्याल को बचाने के लिए अभी पहले चरण का ही कार्य किया गया है। पहले चरण में भूकटाव वाले 600 मीटर हिस्से का ट्रीटमेंट किया गया है।  हमने ईको फ्रेंडली तरीके को प्राथमिकता दी। इसके लिए नारियल के रेशों से तैयार किए गए काॅयर जियो मैट देहरादून से मंगवाया, जबकि पिरूल बाड़ाहाट से और बांस के खूंट कोटद्वार से मंगवाए गए। जून के पहले सप्ताह में ट्रीटमेंट का कार्य पूरा हुआ। इससे स्थानीय ग्रामीणों को भी रोजगार मिला।

भूकटाव रूकने के बाद पुराने स्वरूप में लौटने लगा बुग्याल। उग आई घास। फोटो - डीएफओ संदीप कुमार

जल संरक्षण के लिए अहम हैं बुग्याल

पहाड़ों पर ट्री-लाइन या टिंबर लाइन (उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वृक्षों के पाए जाने की अधिकतम सीमा) समाप्त होने के बाद बुग्याल ऐसा सबसे ऊंचा स्थान है, जिसके बाद केवल नीला आकाश ही होता है। हिमालय में टिंबर लाइन/ट्री लाइन की ऊंचाई लगभग 3 हजार मीटर से ऊपर है, जबकि तिब्बत में इसकी ऊंचाई लगभग 4500 मीटर से ऊपर है। उत्तरी गोलार्ध में सबसे ऊंची टिंबर लाइन हिमालय में ही है। यूरोपीयन आल्प्स में ट्री-लाइन 2000 मीटर पर आ जाती है। हिमालय में बुग्याल हमारी नदियों के अपर कैचमेंट जोन में पड़ते हैं। सैंकड़ों छोटी नदियों, झरनों और प्राकृतिक जलस्रोतों का उद्गम इन बुग्यालों से होता है। क्योंकि यहां से छोटे-छोटे स्रोतों और घरनों के रूप में निकलते हैं, और नीचे आकर नदियों का रूप ले लेते हैं। एक प्रकार से जैव-विविधता से भूरपूर ये बुग्याल जल संरक्षण में अहम भूमिका निभाते हैं। 

उत्तराखंड के ग्रीन एंबेसडर जगत सिंह चौधरी ‘जंगली’ ने बताया कि बुग्यालों में लगी विशेष प्रकार की घास प्राकृतिक स्पंज की भांति कार्य करती है। जिस प्रकार स्पंज पानी को पूरी तरह सोख लेता है, उसी प्रकार बुग्यालों में लगी विशेष प्रकार की घास पानी को सोख लेती है। ये बारिश के पानी को सोखकर धीरे-धीरे जमीन के अंदर तक पहुंचाती है। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है। यदि इतनी अधिक ऊंचाई ये घास न हो तो वहां की जमीन रूखी हो जाएगी। ये घास मिट्टी में मजबूत पकड़ बनाकर रखती है, जिससे भूक्षरण और भू-कटाव नहीं होता। तो वहीं, बुग्याल सूक्ष्म जलवायु (Micro Climate) के हब (Hub) हैं, जो उच्च हिमायल में वातावरण को संतुलित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में यदि तालाबों आदि के किनारे इस घास को लगाया जाए, तो जलस्तर में इजाफा देखने को मिल सकता है। 


हिमांशु भट्ट (8057170025)

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