जहाजों की कब्र से फैलता जहर

Submitted by Hindi on Wed, 10/06/2010 - 11:33
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समकालीन जनमत, सितंबर 2010
कुशीनगर जिले कप्तानगंज ब्लाक के बसहिया गांव निवासी 24 वर्षीय गौतम साहनी की पांच मई को गुजरात के सोसिय बंदरगाह पर एक पुराने जहाज की कटाई के दौरान फायर गैस की चपेट में आकर मौत हो गई। गौतम शिप विजय बंसल ब्रेकिंग कंपनी-158 में काम करते थे। उनका शव आठ मई को गांव आया। आज गौतम साहनी के परिजन आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई सहारा देने वाला नहीं है। जिस कंपनी के लिए वह काम करते थे, उसने भी गौतम के परिजनों की कोई मदद नहीं की। गुजरात के भावनगर के अलंग समुद्र तट को आप चाहें तो मृतप्राय जलपोतों की सबसे बड़ी कब्रगाह कह सकते हैं। पुराने जलपोतो को तोड़ने का यह दुनिया का सबसे बड़ा यार्ड है। आर्थिक प्रदर्शन के लिहाज से नई सदी का पहला दशक, इस कारोबार के लिए बेहतरीन साबित हुआ। विश्व व्यापार में आई मंदी ने जहाज मालिकों के लिए यह अनिवार्य बना दिया कि वे अपने पुराने पड़ चुके निष्प्रयोज्य जलपोतों को नष्ट कर दें। भारत में इस कारोबार के तेजी से बढ़ने का स्याह पहलू यह है कि विकसित देशों के सख्त पर्यावरणीय कानून एवं श्रम कानूनों से बचने के लिए भारतीय समुद्र तट एवं यहां के सस्ते मानव श्रम का इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत के मजदूरों एवं पर्यावरण को जोखिम में डालने की इस कार्रवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा चल रहा है। जहरीला प्रदूषण फैलाने के आरोप में अमेरिकी जलपोत प्लेटिनम-2 पर यह मुकदमा दर्ज किया गया था। इस साल फरवरी में यह जलपोत, भारतीय जलसीमा में गैरकानूनी तरीके से घुस आया था। लेकिन भारत सरकार के दांव-पेंच के चलते इस मुकदमें की सुनवाई में तेजी नहीं आ पा रही है। भारत सरकार के रवैए को देखते हुए इस बात की कम ही गुंजाइश है कि जलपोतों के जहरीले प्रदूषण से मजदूरों के बचाव एवं पर्यावरण की रक्षा की दिशा में कोई मुकम्मल कार्रवाई हो पाएगी।

जहाज तोड़ने के काम में लगे प्रवासी मजदूर गुजरात से बाहर के हैं। इन ठेका मजदूरों का कोई नियमित स्वास्थ्य परीक्षण नहीं होता और नौकरी स्थाई नहीं होने के चलते, इनका अनियमित रूप से आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत असर की जांच मुश्किल हो जाती है। जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, एस्बेस्टस और अन्य खतरनाक प्रदूषकों के बीच काम करने वाले मजदूरों की नौकरी अनिवार्य रूप से स्थाई की जानी चाहिए ताकि उनके स्वास्थ्य की व्यवस्थित रूप से निगरानी की जा सके।

ग्रीन पीस और एफ.आई.डी.एच. की एक रिपोर्ट (एंड आफ लाइफ शिप्स द ह्यूमन कास्ट आफ ब्रेकिंग शिप्स) के मुताबिक अलंग समुद्री तट पर उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बांगाल और उत्तर प्रदेश के हजारों मजदूर काम करते हैं। जहाज तोड़ने का काम अत्यंत जोखित भरा है। जहाज तोड़ते समय कई प्रकार की जहरीली गैसें निकलती है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होती है, लेकिन मजदूरों को इन्हीं जहरीली गैसों के बीच काम करना पड़ता है। परिणाम-स्वरूप वे कई तरह की खतरनाक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।नेशनल इस्टीट्यूट ऑफ आकुपेशनल हेल्थ ऑफ वरकर्स द्वारा अलंग मजदूरों के बीच कराए गए सर्वे में 16 प्रतिशत मजदूरों को एस्बेस्टस-प्रदूषण से प्रभावित पाया गया। इस प्रदूषण के प्रभाव में आने वाले लोग फेफड़े के कैंसर एवं अन्य असाध्य बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। प्रदूषण की दृष्टि से खतरनाक पेशों में लगे लोग सर्वाधिक असुरक्षित होते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त केंद्रीय प्रर्यावरण सचिव के नेतृत्व में गठित एक समिति की रिपोर्ट के अनुसार अलंग में काम कर रहे लोगों के दुर्घटना की चपेट में आने की आशंका, खनन उद्योग के खतरे से भी ज्यादा है। जबकि खनन उद्योग को अभी तक का सर्वाधिक खतरनाक काम वाला उद्योग माना जाता था।

एक अनुमान के मुताबिक सितंबर 2007 के बाद से 700 से ज्यादा पुराने जहाज; दस्तावेजों की हेरा-फेरी के जरिए अलंग समुद्र तट पर पहुंच गए है। सी.बी.आई. की गुजरात शाखा ने इसकी जांच भी शुरू कर दी है। यह तथ्य सामने आ रहे हैं कि सीमा व उत्पाद शुल्क से बचने के लिए इन जहाजों की कीमत, वास्तविक कीमत से कम बताई गई। इसके अतिरिक्त उत्पाद कर की अदायगी से जुड़ी अनियमितताएं भी सामने आ रही हैं। प्लेटिनम-2 के विषय में उजागर हो चुका है कि यह मृतप्राय जहाज नकली दस्तावेजों की बुनियाद पर भारतीय समुद्र में डुबाया गया। अन्य कई मृतप्राय जहाज जैसे-एम.एस.सी. अरेबिया एम.टी.एम.ए.आर (केमिकल टैंकर), एम.टी. थेरेसा-तृतीय और सप्तम (कैमिकल टैंकर)-भारतीय समुद्र तट पर खड़ा करने एवं नष्ट किए जाने की अनुमति की प्रक्रिया में हैं। 31 मार्च तक के उपलब्ध इस साल के आंकड़ों के मुताबिक 348 जलपोत, अलंग यार्ड में डुबोए जा चुके हैं। 1999 में सर्वाधिक 361 जलपोत डुबोए गए थे।

इसके अलावा काम करते समय सिलेंडर फटने व लोहे की चादर गिरने की घटनाएं अक्सर होती हैं, जिसमें मजदूरों की मौत हो जाती है। गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के रिकार्ड के अनुसार 1983 से 2004 तक जहाज तोड़ने के दौरान 372 दुर्घटनाएं हुई। बांग्लादेश के चिटगांव में समुद्री जहाज तोड़ने के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में एक हजार मजदूरों की मृत्यु का अनुमान है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जहाज तोड़ने के काम में लगे मजदूर बहुत ही गरीब परिवार के होते हैं। उनकी सुरक्षा के लिए किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है, जिससे दुर्घटनाओं की संख्या ज्यादा है। इन मजदूरों के काम की भी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, न ही उन्हें उचित पारिश्रमिक मिलता है।पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने प्लेटिनम-2 के संदर्भ में पहले से चौकस रहने की जरूरत को रेखांकित तो किया, लेकिन इन मामलों को उन्होंने वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाले इस्पात मंत्रालय के पास भेज दिया। अब यह मामला जी.के.वासन के नेतृत्व वाले जहाजरानी मंत्रालय के पास जाने वाला है। लेकिन इस संदर्भ में जहाजरानी मंत्रालय के अब तक के कामकाज पर नजर डालें तो स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है। अलंग में यह साफ देखा जा सकता है कि समुद्र तट का असंवैधानिक उपयोग हो रहा है, यहां अवैध तरीके से कबाड़ रखा गया है। खेती की जमीन पर एस्बेस्टस जैसे खतरनाक कबाड़ के ढेर लगाए जा रहे हैं। समुद्र को कबाड़ और जहरीले रासायनिक पदार्थों का कूड़ेदान बनाया जा रहा है। रेडियोएक्टिव पदार्थों से मुक्त किए बगैर जलपोत खड़े किए जा रहे हैं। मछलियों की कई प्रजातियां यहां के समुद्री जल से लुप्त हो रही हैं। मजदूरों की जीवन स्थितियां एवं स्वास्थ्य की स्थिति बद से बदतर है। बिहार, झारखंड, उड़ीसा, एवं उत्तर प्रदेश से विस्थापित हुए मजदूरों के साथ अमानवीय व्यवहार यहां आम बात है। समुद्र तट पर बालू के खनन का अवैध काम चल रहा है लेकिन इन तमाम सवालों पर संबंधित मंत्रालयों की ओर से कोई पहल लेने की बजाए, गेंद एक पाले से दूसरे पाले में डाली जा रही है।

इस कारोबार के अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य पर नजर डालें तो यह बात छुपी नहीं रहती कि विकसित देशों को विकासशील देशों के पर्यावरण एवं मानव आबादी के स्वास्थ्य की कोई चिंता नहीं है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के अंतर्राष्ट्रीय सामुद्रिक संगठन (आई.एम.ओ.) के 15 मई 2009 को हांगकांग में संपन्न हुए अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन ने भी पहले से जारी इसी प्रवृत्ति को पुख्ता किया है। वैसे भी, जहाज को नष्ट करना और स्टील के उत्पादन के लिए इसकी रिसाइक्लिंग करना एक औद्योगिक गतिविधि है। आइ.एम.ओ. के पास इस तरह की औद्योगिक प्रक्रिया को निर्देशित करने की दक्षता नहीं है। आई.एम.ओ. केवल सामुद्रिक मामले निपटा सकता है। लेकिन यह बात नजरअंदाज नहीं की जा सकती है कि आई.एम.ओ. जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को भी विकासशील देशों की परवाह नहीं है। विश्व के लगभग 80 प्रतिशत मृतप्राय जहाज भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के समुद्र तट पर तोड़े जाते हैं। ज्वार-भाटा से बनते-बिगड़ते नरम रेते वाले इन समुद्र तटों पर खतरों से बचाव के उपकरणों और ढांचों का मुकम्मल इंतजाम करना संभव ही नहीं है। जहाज तोड़ते समय आस-पास फैलने वाले खतरनाक रासायनिक एवं रेडियोएक्टिव कचरे के लिए भी यह नरम समुद्र तट असुरक्षित है। नरम समुद्र तट पर सोखा जाने वाला रासायनिक कचरा; आसानी से तटीय क्षेत्रों में दूर तक फैल जाता है। समुद्र तट पर जहाज तोड़ने के खतरे को समझने के लिए इस तथ्य का उल्लेख करना भर काफी होगा कि कोई भी विकसित देश अपने समुद्र तट पर जहाज तोड़ने के कारोबार की इजाजत नहीं देता है।

कुशीनगर जिले कप्तानगंज ब्लाक के बसहिया गांव निवासी 24 वर्षीय गौतम साहनी की पांच मई को गुजरात के सोसिय बंदरगाह पर एक पुराने जहाज की कटाई के दौरान फायर गैस की चपेट में आकर मौत हो गई। गौतम शिप विजय बंसल ब्रेकिंग कंपनी-158 में काम करते थे। उनका शव आठ मई को गांव आया। आज गौतम साहनी के परिजन आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं, लेकिन उन्हें कोई सहारा देने वाला नहीं है। जिस कंपनी के लिए वह काम करते थे, उसने भी गौतम के परिजनों की कोई मदद नहीं की। गौतम के परिवार में उनके बुजुर्ग पिता पारस साहनी (65), पत्नी सोमारी (22) और दो छोटे बच्चे पुत्र अभिशेष (3) व पुत्री अर्चना (6 माह) है। सोसिया बंदरगाह पर काम करने वाले गौतम के ही गांव के अच्छेलाल ने बताया कि जहाज काटने के बाद मजदूर जब रिंग लेकर पानी में उतरते हैं तो उस समय खतरे ज्यादा रहते हैं। फायर गैस के चपेट में आने का खतरा तो बराबर बना रहता हैं। कंपनी वाली पी.एफ. तो काटते हैं पर पैसा कभी नहीं मिलता है।

ग्रीन पीस और एफ.आई.डी.एच. की एक रिपोर्ट (एंड आफ लाइफ शिप्स द ह्यूमन कास्ट आफ ब्रेकिंग शिप्स) के मुताबिक अलंग समुद्री तट पर उड़ीसा, बिहार, पश्चिम बांगाल और उत्तर प्रदेश के हजारों मजदूर काम करते हैं। जहाज तोड़ने का काम अत्यंत जोखित भरा है। जहाज तोड़ते समय कई प्रकार की जहरीली गैसें निकलती है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होती है, लेकिन मजदूरों को इन्हीं जहरीली गैसों के बीच काम करना पड़ता है। परिणाम-स्वरूप वे कई तरह की खतरनाक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा काम करते समय सिलेंडर फटने व लोहे की चादर गिरने की घटनाएं अक्सर होती हैं, जिसमें मजदूरों की मौत हो जाती है। गुजरात मेरीटाइम बोर्ड के रिकार्ड के अनुसार 1983 से 2004 तक जहाज तोड़ने के दौरान 372 दुर्घटनाएं हुई। बांग्लादेश के चिटगांव में समुद्री जहाज तोड़ने के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में एक हजार मजदूरों की मृत्यु का अनुमान है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जहाज तोड़ने के काम में लगे मजदूर बहुत ही गरीब परिवार के होते हैं। उनकी सुरक्षा के लिए किसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जाती है, जिससे दुर्घटनाओं की संख्या ज्यादा है। इन मजदूरों के काम की भी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, न ही उन्हें उचित पारिश्रमिक मिलता है।

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