जल जीवन की कविताएँ

Submitted by UrbanWater on Sat, 04/15/2017 - 10:44
(एक)
चुल्लू भर
डूबने के लिये
ओक भर
प्यास के लिये
अंजूरी भर
किस के कमंडल में
विध्वंस के लिये
यहाँ तो
आँख भर बचा हैं
जिस में डबडबाता है
काला हीरा।

(दो)
धूप सूख कर
काँटा हुई
हवा सूख कर
हुई प्यास
पानी सूख कर
धरती
धरती सूख कर
हो गई आकाश
बादल पसीज कर
पानी न हुआ।

(तीन)
जहाँ नहीं पानी की
एक बूँद
वहाँ एक तालाब था कभी
जहाँ नहीं दिख रहीं
मुट्ठी भर रेत
वहाँ बहती थी एक नदी
जहाँ नहीं बचा है
एक भी पेड़
वहाँ जंगल था घना
जहाँ खड़ी दिख रही हैं
बहुमंजिला इमारत
वहाँ दबा पड़ा है एक तालाब
नदी की रेत
जंगल वाला पेड़।

(चार)
तपता हुआ दिन
पेड़ खजूर का
जहाँ जा बैठा पानी इन दिनों
छाँव है जितनी
उतने ही दूर है फल।

(पाँच)
पीतल की चरी में
भरा टँगा है जो बरसों से
घर की खूँटी पर
गंगाजल
जिसके आचमन को
लगी जनार होगी कितनी लम्बी
कितनी छोटी
जल बिन
किसने देखी जीवन की पीठ।

(छह)
सबसे कर्कश
नल से पानी की बूँदों का टपकना
सबसे मनोरम
ऊँचे पहाड़ से नीचे गिरता हुआ झरना
सबसे सुन्दर
कल-कल बहना लगता एक नदी का
सबसे दुर्गम
प्यास लिये सीढियाँ चढ़ना कुएँ की
सबसे आसान
जो पानी के सिवा होगा।

(सात)
एक कुआँ है
गाँव के बाहर / बड़ा-सा डस्टबीन
जिसकी दीवारों में उग आये
पीपल
लटके है औंधे मुँह
जरा-सी आहट
कि एक जोड़ी कबूतर
दुबक जाते है कुएँ की कोह में
पनघट है कुएँ की
रस्सियों के निशाँ भी जस के तस
पनिहारिन भी नहीं आती
गंगा-चरी पूजन तो अब हुई
गुजरे समय की बात
सब हैं कुएँ में
कुएँ के आस-पास
लेकिन उसके पेंदे में पानी नहीं हैं
इसीलिये तो चहचहाती जिंदगानी नहीं हैं।

(आठ)
तालाब भी हैं यूँ तो
गाँव की बगल में
पहले बड़ा था,अब हुआ छोटा/
क्रिकेट का मैदान
बावड़ी तो कब की मर गई दब कर
बहुत सुन्दर हैं सीढ़ियाँ / मनमोवाणी
दुनिया में जो भी सुन्दर हैं
वह पानी से हैं
जब पानी नहीं होगा
यह दुनिया वाकई हो जाएगी
असुन्दर
सारी ख़ूबसूरती पानी से बनती हैं
जिसके बिना
उसे एक दिन माटी में मिल जाना है।

(नौ)
सूख गई
जो नदी दूर थी गाँव से
अब बहुत दूर
तो उजड़ गई बस्ती
इतिहास में इंसान की बसावट
और उजाड़
दोनों पानी की बदौलत
सेनाएँ खड़ी होगी
जहाँ बचा होगा पानी प्यास-भर
हर सितम करबला होगा।

(दस)
जल ही जीवन है
पढ़ा बहुत
पर गुना नहीं किसी ने
जल है तो कल है
कहा बहुत
पर माना नहीं किसी ने
यह कह कर
कि कल किसने देखा है
बिन पानी सब सून'
" कबीरा खड़ा बाज़ार में '
सबकी खैर ही माँगता रहा सदा
यहाँ हाट-हाट बिक गया पानी।

"
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