जल के मायने

Submitted by Hindi on Tue, 10/28/2014 - 09:34
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भारतीय धरोहर, जनवरी-फरवरी 2010
.मोटे तौर पर भारत के 90% हिस्सों से पानी गायब हो रहा है। यह भी सच है कि किसी देश या व्यवस्था के विकास में, पानी अहम है। सूखता पानी हमारे मौजूदा विकास मॉडल पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है। केवल मशीनें, बुलडोजर, बहुमंजिला भवन ही विकास नहीं है। प्रत्येक क्षेत्र के विकास की अलग-अलग दिशा होती है। विकास में आने वाली बाधाओं के हल भी स्थानीय कारकों के आधार पर ही ढूंढने होंगे। रेगिस्तानी पहाड़ी और समुद्री इलाकों की जल समस्याएं अलग-अलग होंगी, अतः विकास प्रक्रिया भी उसी के अनुरूप होगी। 21वीं सदी में विकास बहुत पेचीदा मुद्दा है। जल या अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ टिकाऊ विकास एक बड़ी चुनौती है।

21वीं सदी के लिए पानी सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। विश्व बैंक, यूएन या आईएमएफ के अनुसार दुनिया का 1/6 भाग जलरहित हो चुका है। 31 देशों में घोर जल संकट है। 2025 तक हालात भयावह होंगे। 2050 तक दुनिया के 50 देशों में यह संकट और गहरायेगा। कड़वी सच्चाई तो यह है कि पानी बिना समूचा विकास व्यर्थ है। पानी के बिना तो जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, फिर विकास की बात तो दूर ही है। पानी की मांग प्रत्येक 20 वर्ष में दोगुनी हो जाती है। धरती की सतह पर पानी घट रहा है, जो बचा है, वह गंभीर रूप से प्रदूषित है। धरती के नीचे भी पानी विलुप्त होने के कगार पर है। गुजरात, राजस्थान और मप्र के 100 जिलों में 40 मीटर तक पानी नीचे चला गया है। यह गंभीर संकेत है। सौराष्ट्र में 1,800 फीट पर पानी है। चेरापूंजी जो विश्व में सर्वाधिक वर्षा का स्थान था, अब वहां पानी को लोग तरस रहे हैं।

ऐसा नहीं कि भारत में कुदरत वर्षा जल नहीं देती, पर समस्या है कि हम इस जल को न तो रोक पा रहे हैं और न ही संभाल पा रहे हैं। वर्षा जल का कुप्रबंधन इसे संभालने-रोकने की रणनीति और बेलगाम आबादी से हालात बिगड़ते हैं। भारत में वर्षाकाल दो माह का है। इसमें भी समय, मात्रा और स्थान के हिसाब से जल वितरण भी असमानता बढ़ा रही है। नतीजा है कहीं सूखा और कहीं बाढ़।

प्रकृति ने धरती के नीचे जलभंडार दिए हैं। ये भंडार भी सीमित हैं। केवल विशेष परिस्थितियों में उपयोग तो ठीक हैं। पर शर्त है, वर्षाकाल में उसी जल को वापस भी करो। जितना लो, उतना दो। यही नीति ही टिकाऊ नीति थी। पर ऐसा हो न सका। भूमिगत जल को निचोड़कर उसे खोखला बना दिया। नतीजा हुआ पानी रहित भूगर्भ, भौगर्भिक विनाश और नए संकटों को आमंत्रण। पंजाब में कुछ जंगलों के जलस्तर का एक साथ गिरना-उठना एक अजीब वाकया के रूप में सामने आया। इसके असर से रोड दरक गए, बेसमेंट डूब गए, मकानों की नींव चटकने लगी, रनवे टूट गए, दरारें पैदा हो गई, नहरें और बड़ी नालियां भी क्षतिग्रस्त हो गईं। पंजाब में 128 ब्लॉक में से 93 डार्क जोन बन गए। यह सब पानी की कमी से उपजने वाले हालात थे।

अब भारत में प्रत्येक व्यक्ति को औसत 50 लीटर प्रतिदिन पानी बचा है, जिसमें से 5 लीटर पीने में, 10 लीटर रसोई में, 15 लीटर स्नान में तथा शेष 20 लीटर शौच और सफाई में इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत उ. अमेरिका, द. अमेरिका (पेरू को छोड़कर) यूरोप तथा आस्ट्रेलिया में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता प्रतिदिन 100 लीटर या उससे अधिक ही है और पानी कोई समस्या या मुद्दा नहीं है। चीन, मंगोलिया तथा मध्य अफ्रिका में यह उपलब्धता 51 से 100 लीटर के बीच है और पानी अभी कोई बड़ी समस्या या प्राथमिकता नहीं है। जबकि मध्य-दक्षिण अमेरिका, भारत मध्य अफ्रीका के कुछ भाग, दक्षिण पूर्व एशिया के भागों में यह उपलब्धता 31 से 50 लीटर के बीच ही है। पानी की यह स्थिति संवेदनशील और चेतावनी देती है। धरती के कुछ हिस्सों में अत्यधिक क्रिटिकल हालात पैदा हो रहे हैं। जहां पानी केवल 16-30 लीटर प्रति व्यक्ति/प्रति दिन ही मुहैया है और आगामी बड़े खतरे और उथल-पुथल का संकेत है। ये खतरे भुखमरी, अकाल, खाद्यान संकट से लेकर भारी पलायन, रोजगार की मारामारी और हिंसा तक है।

वर्षाकाल में कुल 200 घंटे बरसात होती है, इसकी आधी बारिश तो 25-30 घंटों में ही हो जाती है। इस वर्षा के जल को केवल 20% पानी हम रोक पा रहे हैं शेष 80% पानी रोकने की चुनौती अब भी है। यह हो सका तो, यह एक बड़ी फ़तह होगी।

कहावत है “पानी उतर गया” यानी किसी काम का नहीं। देश में हमने कुप्रबंधन और गलत नीतियों से यही पानी उतारने का काम किया है। 2030 तक हिमालय के ग्लेशियर्स 10 लाख वर्ग कि.मी. तक सिंकुड़ जाएंगे। प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता अत्यधिक कम होगी। कृषि उत्पादन 30 से 40% गिरेगा। और 2050 में जनसंख्या होगी, 1 अरब 80 करोड़। इस विशाल आबादी के लिए हमारे पास पानी होगा ही नहीं। ग्लेशियर्स पिघलने से जलभरण की हालत बदलेगी और बिगड़ेगी। पानी तो नीला सोना है। एक अनुमान के मुताबिक 2020 तक पानी जरुरत से 27% कम मिलेगा अधिकांश शहरों में पेयजल नहीं होगा। भारत में 1869 अरब घन मीटर पानी है, जिसमें से 1123 घन मीटर ही उपयोग लायक है। भारत में प्रति व्यक्ति जल संग्रहण क्षमता 207 घन मीटर प्रति वर्ष है। यह भारतीय जरूरतों के हिसाब से काफी कम है। देश में 19.2 करोड़ परिवार हैं। जिनमें से 39 फीसदी परिवारों यानी 7.5 करोड़ परिवारों को ही घर के अंदर पेयजल उपलब्ध है। 8.5 फीसदी परिवारों यानी 44.3 करोड़ लोगों को घर से थोड़ा दूर पानी के लिए जाना पड़ता है। जबकि 16.7 फीसदी परिवार ऐसे भी है, जिन्हें घर से काफी दूर भटकने पर ही पानी मिलता है। पानी को लेकर सोच बहुत अजीब है। इस पर व्यक्तिगत अधिकार मानना एक बड़ी भूल है, वास्तव में पानी तो समूचे समाज की संपदा है, जिस पर सबका समान अधिकार है। यह अधिकार अगर उपयोग को लेकर है तो संरक्षण में सभी की भागीदारी भी अनिवार्य है।

आज भारत की जल आवश्यकता बढ़ रही है। उद्योग, कृषि और घरेलू इस्तेमाल में सर्वाधिक खर्च है। हमें 1000 अरब घन मीटर पानी चाहिए, जबकि हमारे जल स्रोत 500 अरब घन मीटर ही दे पा रहे हैं। वर्ष 1950-51 में सिंचाई रकबा 220.56 लाख हेक्टेयर था जो वर्ष 95-96 में 780 लाख हेक्टेयर हो गया, आज 1500 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र के लिए पानी चाहिए। प्रचलित सिंचाई व्यवस्था में जल का बड़ा हिस्सा वाष्पीकृत हो जाता है। और लवणीय पदार्थ मिट्टी में बजरीकरण बढ़ा रहे हैं। कई जगहों पर पथरीली चट्टानों से टकराकर पानी वापस ऊपर आ रहा है। सेम की समस्या बढ़ रही है और लाखों हेक्टेयर जमीन बर्बाद हो रही है।

उहापोह तो यह है कि विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना है, साथ ही इस उत्पादन में जल की भारी आवश्यकता से भी निपटना है। कागज, कपड़ा उद्योग के लिए बहुत पानी चाहिए। एक किलो कागज बनाने में 700 लीटर पानी एक टन स्टील में 280 लीटर पानी लगता है। अन्य उद्योग भी पानी पर ही आश्रित हैं। पानी को लेकर दुनिया भर की सरकारें और संगठन चिंतित हैं। योजनाएं बनती हैं, पर नतीजे नहीं आते। 1977 मार्च में मारडेल प्लाटा (अर्जेंटीना) में संयुक्त राष्ट्र जल सभा का आयोजन, 1981-1990 का दशक अंतरराष्ट्रीय पेयजल वितरण एवं स्वच्छता प्रबंधन पर केंद्रित, देश के 14 राज्यों में ग्रामीण पेयजल योजना के परिणाम नहीं आए, जल स्रोतों में प्रदूषण पर रोक के लिए जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1974 भी बना पर कोई अपेक्षित परिणाम नहीं दिखे। आज देश भर के 70% जल-क्षेत्र प्रदूषित तथा 30% अत्यधिक प्रदूषित हैं। ‘डार्क जोन’ लगातार बढ़ रहे हैं।

कहावत है “पानी उतर गया” यानी किसी काम का नहीं। देश में हमने कुप्रबंधन और गलत नीतियों से यही पानी उतारने का काम किया है। 2030 तक हिमालय के ग्लेशियर्स 10 लाख वर्ग कि.मी. तक सिंकुड़ जाएंगे। प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता अत्यधिक कम होगी। कृषि उत्पादन 30 से 40% गिरेगा। और 2050 में जनसंख्या होगी, 1 अरब 80 करोड़। इस विशाल आबादी के लिए हमारे पास पानी होगा ही नहीं। ग्लेशियर्स पिघलने से जलभरण की हालत बदलेगी और बिगड़ेगी। अनुमान तो यह भी है कि कृष्णा, पेन्नार, कावेरी, लूनी, ताप्ती, नर्मदा, माही, साबरमती जैसी नदियों के कछार सिंकुड़ जाएंगे। इस सब के पीछे मौसम का बदलता मिजाज एक बड़ा कारण बनेगा। तापक्रम में आंशिक वृद्धि भी अभूतपूर्व चौतरफा संकट लाएगी और साथ में खाद्य और गंभीर जल संकट भी।

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