जल की संपन्नता और निर्जला का संयम

Submitted by Hindi on Sat, 06/11/2011 - 09:22
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दैनिक भास्कर, 11 जून 2011

यह दिन गंगा के बहाने-धरती पर उपलब्ध पीने योग्य संपूर्ण जलराशि के सम्मान और जल देवता के प्रति आभार व्यक्त करने का उत्सव है। जो मनुष्य और प्रकृति के सबसे अनमोल उपहार जल के संबंधों को भी हर वर्ष स्मरण कराने आता है।

मुझे उस बनारसी नाविक का चेहरा आज तक याद है, जिसकी नाव में अपने मित्र के साथ बैठ मैं बनारस के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट के इस पार से उस पार जा रहा था। दिन ठंड के थे, लेकिन धूप तीखी होने पर प्यास लगी और मैंने नाविक से एक सवाल कर लिया। उस सवाल की प्रतिक्रिया में उसके चेहरे पर जो भाव उभरे, वे चुभने वाले थे। ऐसे कि आज तक चुभ रहे हैं। गलती से मैं पूछ बैठा- क्या गंगा का पानी पीने योग्य है, पी लूं सीधे? जवाब में उसका चेहरा तमतमा गया और अपने गुस्से को काबू में कर वह बोला- ‘क्या कहते हो बाबूजी गंगा का पानी पी लूं। यह भी कोई पूछने की बात है। अरे खूब पीजिए। बड़े भाग वाले हैं, जो गंगाजी का पानी पीने को मिल रहा है। वरना लोग मर जाते है, आस पूरी नहीं होती। तभी तो मरते वक्त मोक्ष के लिए गंगाजल मुंह में डालते हैं।’ मैंने गलती स्वीकारते हुए क्षमा मांगी और नदी के बहते पानी में गंदगी देखने के बावजूद नाविक की भावना के सम्मान में आखिरकार पानी पी ही लिया।

वह पानी सीधे पीने काबिल तो नहीं था, पर यकीन मानिए मेरी उस वक्त की प्यास ही नहीं, मानो जन्मों की प्यास बुझ गई। न जाने उस पानी में ऐसी क्या बात थी।तब सवाल उठा मन में कि पानी तो पानी है, फिर गंगा का पानी बाकी पानी से खास क्यों है? खूब मन मथा और मस्तिष्क भी, लेकिन जवाब मन से ही आया - गंगा का पानी इसलिए खास है, बाकी से अलग है, दूषित होकर भी शुद्ध है, चिर तृप्तिदायक है, क्योंकि वह गंगा का पानी है। उस गंगा का, जो हमारी अस्मिता है, हमारी संस्कृति है, हमारा इतिहास है, हमारी सभ्यता, हमारी शक्ति, हमारा जीवन है। गंगा सिर्फ नदी ही नहीं, हमारी मां, देवी और हमारे होने का प्रमाण है। वरना न नदियों की कमी है, न प्यास बुझाने के लिए जलस्रोतों की। कुछ तो बात होगी कि अकेली गंगा समूचे महाकाव्य-सी सदियों से हमारे वजूद पर छायी हुई है।

वह हमारे लिए गंगोत्री से निकल ऋषिकेश, हरिद्वार, इलाहाबाद, बनारस, कोलकाता होते हुए गंगासागर में मिल जाने वाली नदी भर नहीं है। साहिर याद आते हैं- कितने सूरज डूबे-उतरे गंगा तेरे द्वारे, युगों-युगों की कथा सुनाते तेरे बहते धारे, तुझको छोड़ के भारत का इतिहास लिखा ना जाए, गंगा तेरा पानी अमृत दर-दर बहता जाए। गंगा से हम युगों-युगों से जीवन पाते आए हैं, और आज भी पा रहे हैं। जल जीवन है और गंगा जल का अथाह भंडार है। वह सदानीरा है। हमारे लिए वो कीमती इसलिए भी है, क्योंकि बड़ी तपस्या के बाद उसे धरती पर लाने में भगीरथ सफल हो पाए थे। तभी तो उसके धरती पर आने का दिन गंगा दशहरा के रूप में प्राय: पूरे भारत में ज्येष्ठ शुक्ल दशमी (इस बार 11 जून यानी आज) को मनाया जाता है।

यह दिन गंगा के बहाने धरती पर उपलब्ध पीने योग्य संपूर्ण जलराशि के सम्मान और जल देवता के प्रति आभार व्यक्त करने का उत्सव है जो मनुष्य और प्रकृति के सबसे अनमोल उपहार जल के संबंधों को भी हर वर्ष स्मरण कराने आता है जो यह भी बताता है कि जब गंगा के रूप में स्वर्ग से महान जलराशि धरती पर उतर आए तो हम बौराएं नहीं, जल भंडार को देख अपना संयम न खो दें, जल के उपयोग के प्रति जिम्मेदार रवैया जल भंडार देख बदल न दें, बल्कि ज्यादा गंभीर, ज्यादा जिम्मेदार हो जाएं। यही कारण है कि गंगा दशहरा के ठीक अगले दिन निर्जला एकादशी का विधान किया गया कि एक दिन पहले गंगा के रूप में अकूत संपदा मिली है जल की और दूसरे दिन ऋषि-मुनि निर्जल व्रत का निर्देश दे रहे हैं। आज जब पेयजल की कमी भविष्य की बड़ी चुनौती बन रही है, गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी हमें परंपरा के जरिए जल के संयमित उपयोग के प्रति सचेत कर रहे हैं।
 

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