जल मापने का महंगा पैमाना

Submitted by Hindi on Fri, 04/13/2012 - 12:07
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, 06 अप्रैल 2012

भारत की अस्सी प्रतिशत आबादी बीस रुपए प्रतिदिन से कम पर गुजारा करती है। ऐसे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वह पानी पर कितना खर्च कर सकती है। पानी के उपभोग की मात्रा नापने वाले एक सेंसर युक्त स्वचालित मीटर करीन का मूल्य करीब बारह हजार रुपए है और यह खर्च केंद्र सरकार को उठाना है। क्या इस तरह के अनावश्यक व्यय का असर अन्य जनहितकारी योजना पर नहीं पड़ेगा ?

भारत के उन अधिकांश जल प्रदायकर्ताओं के लिए स्वचालित मीटर रीडिंग (एएमआर) प्रणाली कामधेनु सिद्ध हो सकती है, जिनका राजस्व वसूली का रिकार्ड बहुत ही निराशाजनक है। इस प्रणाली में मीटर पढ़ने वाला कर्मचारी बजाए घर-घर दस्तक देने के अपने हाथ में एक उपकरण लिए जब एक विशिष्ट परिधि से गुजरेगा तो रेडियो आवृत्ति से स्वतः मीटर को पढ़ लिया जाएगा। एएमआर मीटर इसी बात का दावा करते हैं। पिछले महीने दिल्ली जल बोर्ड ने इस तरह के करीब तीन लाख मीटरों की आपूर्ति एवं लगाए जाने का टेंडर जारी किया जो दिल्ली के कुल नल कनेक्शनों का करीब छठा भाग है। देश में इस तरह का यह सबसे बड़ा टेंडर है। गोवा जल बोर्ड ने इस बात से संतुष्ट होकर, कि स्वचालन से राजस्व एकत्रीकरण में मदद मिलेगी, इस तरह के सत्तर हजार मीटर मंगाए थे। परंतु प्रारंभिक अनुभव बताते हैं कि इससे राजस्व वृद्धि का अपेक्षाकृत परिणाम नहीं मिल सका। दिल्ली में बड़े पैमाने पर इसके उपयोग से पहले इसकी एक पायलट परियोजना चलाया जाना आवश्यक है।

वृद्धि का हिसाब रखना - एएमआर तकनीक हेतु ऐसे स्थानों का चयन किया जा रहा है, जहां मीटर बहुत ही सघन इलाकों या मुश्किल से पहुंच पाने वाले स्थानों पर लगे हों। अभी तो मीटर रीडर मकान मालिकों के साथ सांठ-गांठकर अक्सर यह रिपोर्ट दे देते हैं कि वे उपभोक्ता के घर पर रीडिंग लेने गए थे। परंतु उनके घर पर ताला लगा था। ऐसे मामलों में उपभोग की मात्रा का औसत बिल बना दिया जाता है, जिससे उपभोक्ता को लाभ मिल जाता है। ऐसी स्थिति में एएमआर तकनीक अत्यंत प्रभावी है और इससे नियमित बिलिंग हो सकती है तथा मानवीय भूलों से भी छुटकारा पाया जा सकता है।

मुम्बई देश में पहला शहर है, जिसमें वर्ष 2008 में एएमआर मीटर प्रणाली लागू की गई थी। इसके चलते मुम्बई में 66,000 मीटर स्थापित किए गए थे। एक एएमआर कनेक्शन में लगभग 12,000 रु. से अधिक का खर्च आता है जबकि इतनी ही परिशुद्धता की गैर स्वचालित तकनीक की लागत इसकी केवल 10 प्रतिशत ही पड़ती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए बृहन्न मुम्बई नगर निगम ने मलिन बस्तियों में ऐसे मीटर न लगाने का निर्णय लिया। उनके अनुभव में यह भी आया कि मीटर के कई पुर्जे, जिसमें कि सेंसर भी शामिल हैं, या तो चुरा लिए गए या इन्हें तोड़ दिया गया। प्रति सेंसर को बदलने का खर्च 5 हजार रु. आता है। बृहन्न मुम्बई नगर निगम में पदस्थ अतिरिक्त निगम आयुक्त राजीव जलोटा का कहना है ‘हमें इनकी मरम्मत और मीटर रीडिंग इकट्ठा करने में भी समस्याओं का सामना करना पड़ा। भविष्य में हम और अधिक ध्यान देकर ही इनका उपयोग करेंगे।’ उनका कहना है कि सैद्धांतिक तौर पर यह अच्छा प्रतीत होता है लेकिन इनका उपयोग बढ़ाने से पहले इनकी निगरानी (पायलट परियोजना) करना आवश्यक है।

महाराष्ट्र के ही मलकापुर नगर में एएमआर तकनीक से 4,200 नल कनेक्शन दिए गए। यहां बजाए निश्चित वार्षिक दर के परिवारों से वास्तविक उपभोग के आधार पर भुगतान लिया गया। फलस्वरूप वर्ष 2008 में करीब 32 लाख रु. की हानि हुई। वहीं वर्ष 2010 में इस तकनीक से तीन लाख रुपए का लाभ अर्जित किया गया। जनसुविधा अधिकारियों ने बताया कि इस बदलाव के केंद्र बिन्दु में सही मीटर रीडिंग प्रणाली ही थी।

जनोपयोगी सेवाएं अब बेहतर मीटरिंग (मापने) वाली प्रणालियों पर अधिक खर्च कर रही हैं क्योंकि बिना यथोचित माप के प्रबंधन भी नहीं किया जा सकता। यह कम राजस्व एवं कम निवेश के दुष्चक्र से निकलने का भी एक रास्ता है। मापना (मीटरिंग) अब जल आपूर्ति योजनाओं में अनिवार्य कर दिया गया है और इस हेतु परियोजना लागत का पांच प्रतिशत सुरक्षित रखा जाता है। मीटर प्रदान करने वाली फर्म फोर्बस एवं मार्शल के परियोजना प्रबंधक नेविली भसीन बताते हैं कि राजस्व में वृद्धि के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण बातों को लक्षित करना होगा। जैसे कि अधिकांश शहरी इलाकों में 20 प्रतिशत कनेक्शन धारी 80 प्रतिशत पानी का उपभोग करते हैं। मीटर तो बड़े उपभोक्ताओं जैसे औद्योगिक एवं व्यावसायिक संस्थानों में लगने चाहिए। लेकिन हम अनावश्यक तौर पर राजनीतिक तापमान बढ़ा रहे हैं और घरों में मीटर लगाकर धन बर्बाद कर रहे हैं।’ चूंकि उपभोक्ता कोई शिकायत इसलिए नहीं कर रहा है क्योंकि उसे इसकी भारी लागत नहीं चुकानी पड़ती है और इसका सारा वित्तीय भार केंद्र सरकार के अनुदान के माध्यम से वहन किया जाता है।

एजेंसियां इस तरह की उच्च तकनीक में तभी निवेश करती हैं जबकि दरों के भुगतान के लिए ऐसा करना आवश्यक हो। घरेलू उपभोग और निम्न दरों के मद्देनजर कुछ निजी परिचालक स्वचालित मीटरिंग तकनीक का चुनाव अपनी ऊंची लागत को न्यायोचित ठहराने के लिए कर रहे हैं। दिल्ली जल बोर्ड जिसने कि अभी एएमआर मीटर की स्थापना प्रारंभ भी नहीं की है, पूर्व से ही 3 लाख मीटर लगाने की योजना तैयार कर चुका है। परंतु मंगलौर ने एक नया उदाहरण स्थापित करते हुए एएमआर से सज्जित 5 हजार कनेक्शन हेतु व्यावसायिक एवं गैर घरेलू बड़े उपभोक्ताओं को लक्ष्य किया है। शहर को अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा इन्हीं उपभोक्ताओं से प्राप्त होता है। उसकी योजना घरेलू उपभोक्ताओं पर केंद्रित होने की अवश्य है बशर्ते कि स्वचालन की लागत से मिलने वाला राजस्व इसे न्यायोचित सिद्ध कर पाए।

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