जल परियोजनाओं के लिये दिल्ली को पैसा कौन देगा

Submitted by RuralWater on Thu, 03/26/2015 - 15:55

विश्व जल दिवस पर विशेष


.यमुना की मौजूदा हालत बताने की अब कोई जरूरत नहीं। पिछले 30 साल से खूब बताया जा रहा है और यह नदी दिन प्रतिदिन बदहाल हो रही है। आज कहने की नई बात यह है कि 1376 कि.मी. लम्बी देश की इस प्रमुख नदी की जब-जब चिन्ता हुई वह तभी हुई जब दिल्ली को पानी की और जरूरत पड़ी।

निष्कर्ष यह है कि यमुना की चिन्ता उसके उद्गम स्थल बन्दरपूँछ से लेकर सिर्फ 400 कि.मी. दूर तक यानि दिल्ली तक ही की गई। तरह-तरह के बहाने बनाकर दिल्ली में पानी की जरूरत बताकर यमुना को पूरा पीकर दिल्ली में ही खत्म कर दिया गया।

यमुना की बदहाली पर आज अगर सोच विचार की जरूरत है तो दिल्ली के बाद 200 कि.मी. के नीचे तक के हिस्से पर बात करने की है। खासतौर पर इसलिये क्योंकि दिल्ली से 175 कि.मी. नीचे वृन्दावन मथुरा के लोग दिल्ली आकर धरना प्रदर्शन करने लगे हैं। वे दिल्ली के बाद सीवर में तब्दील यमुना में पानी की माँग कर रहे हैं।

पिछले दो महीने में दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर धरना प्रदर्शनों की संख्या बढ़ती जा रही है। इन प्रदर्शनों में आन्दोलनकारियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। जाहिर है कि वृन्दावन में यमुना, दिल्ली में पेयजल और उत्तर प्रदेश और हरियाणा के किसानों के लिये पानी की जरूरत पर अब फिर बातें उठेंगी।

इन बातों में नई बात यह होगी कि दिल्ली के बाद वाले यमुना के हिस्से की स्थिति को समझा जाए। इस कवायद में एक बार फिर देखा जाएगा कि दिल्ली में आकर यमुना का अस्तित्व समाप्त क्यों हो गया?

सन् 1988 की बात है दिल्ली में पानी की कमी से हाहाकार मच गया था। दिल्ली को और पानी की जरूरत थी। लेकिन ऐसा कोई आधार नहीं था कि दिल्ली को यमुना से और पानी मिल सके। तभी यह तथ्य सामने आया था कि दिल्ली का जो अपना क्षेत्रफल है या कहें कि उसका जो जल संग्रहण क्षेत्र है उसके आधार पर दिल्ली यमुना के पानी में 110 क्यूसेक से ज्यादा पानी ले ही नहीं सकती। उधर हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी पानी की कमी से जूझ रहे थे। उस संकट के दौरान तमाम बैठकें हुई।

जैसा होता आ रहा था दिल्ली की समस्या को सबसे पहले रखा गया और तरह-तरह के बहाने बनाकर यमुना के पानी में हिस्सा बढ़वा लिया गया। जबकि उसी समय यमुना पर शोध परक अध्ययनों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया गया था कि दिल्ली के पास अगर पानी का अपना इन्तज़ाम नहीं है तो वह अपने कथित विकास को नियन्त्रित कर ले लेकिन इस पर बिल्कुल भी गौर नहीं हुआ।

बड़ी हैरत में डालने वाली बात है कि 110 क्यूसेक पानी के लिये अधिकृत दिल्ली 1700 क्यूसेक से ज्यादा पानी इस्तेमाल कर रही है। उसके पास 110 क्यूसेक यमुना के पानी को मिलाकर जहाँ सिर्फ 175 क्यूसेक पानी का इन्तज़ाम था वह बढ़कर आज सन् 2015 में 1700 क्यूसेक कैसे हो गया? पिछले 30 साल के कानूनी दाँवपेच की कहानी बताती है कि तरह-तरह के समझौतों के तहत दिल्ली में ज्यादा पानी का इन्तज़ाम किया जाता रहा। यह दिल्ली के खुद का इन्तज़ाम नहीं था बल्कि दूसरे राज्यों के किसानों और दूसरे मदों का हिस्सा काटकर बनाया गया इन्तज़ाम था।

सन् 1988 की बात है दिल्ली में पानी की कमी से हाहाकार मच गया था। दिल्ली को और पानी की जरूरत थी। लेकिन ऐसा कोई आधार नहीं था कि दिल्ली को यमुना से और पानी मिल सके। तभी यह तथ्य सामने आया था कि दिल्ली का जो अपना क्षेत्रफल है या कहें कि उसका जो जल संग्रहण क्षेत्र है उसके आधार पर दिल्ली यमुना के पानी में 110 क्यूसेक से ज्यादा पानी ले ही नहीं सकती। उधर हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी पानी की कमी से जूझ रहे थे। उस संकट के दौरान तमाम बैठकें हुईं। जल विज्ञान के विशेषज्ञ इंजीनियर तर्क देते हैं कि दिल्ली दूसरे राज्य से पानी खरीद लेती है। सवाल है कि ऐसा कौन सा प्रदेश है जो दावा करता हो कि उसके पास बेचने के लिये पानी है। इस मामले में प्रशासकों और जल सम्बन्धी विभागों के इंजीनियर उत्तर प्रदेश का नाम लेते हैं। यानी वे बताते हैं कि उत्तर प्रदेश जो पानी दिल्ली को दे रहा है उसका वह पैसा लेता है। इस पर सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश के पास अपने किसानों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों को जरूरत भर का पानी देने लायक कोई इन्तज़ाम है? ये बातें सार्वजनिक क्यों नहीं होना चाहिए?

अगर यह खबर महत्वपूर्ण है कि मथुरा और वृन्दावन के लोग यमुना को लेकर आन्दोलित हो गए हैं तो अब यमुना के पानी के हिसाब-किताब की बातें फिर से उठने से कोई रोक नहीं सकता और जब बही खाते खंगाले जाएँगे तो ज्यादा अन्देशा इसी बात का है कि दिल्ली कटघरे में खड़ी होगी।

खैर मामला वाद-विवाद का नहीं, बल्कि जीवन के लिये अपरिहार्य जल के संकट का है। जाहिर है कि दिल्ली को अपने लिये पानी के इन्तज़ाम का ब्यौरा देना पड़ेगा। पानी के इन्तज़ाम के लिये उसे जल परियोजनाओं के खर्च का आँकड़ा भी सुनना पड़ेगा। उसे केन्द्र सरकार या अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों से निवेश के तौर पर धन माँगना होगा। जब दिल्ली पानी के लिये पैसे उधार माँगेगी तो यह बात उठेगी कि आप पैसा वापस कैसे करेंगे? आप तो पानी मुफ्त देते हैं।

कहते हैं कि जैसे हालात हैं उनमें दिल्ली को कहीं से भी एक बूँद पानी और नहीं मिल सकता। सिर्फ एक सूरत है कि यमुना की अपस्ट्रीम में यानी दिल्ली में यमुना के ऊपर और बन्दरपूँछ के नीचे, बीच में कहीं जल संग्रहण परियोजनाओं पर दिल्ली निवेश कर दे और उनमें पानी की हिस्सेदारी सुनिश्चित करे ले। कहते हैं कि ऐसा एक मामला लम्बित भी पड़ा है। इसे रेणुका बाँध परियोजना कहते हैं।

कई साल से लटकी पड़ी इस विलक्षण परियोजना की प्लानिंग का आधे से ज्यादा काम पूरा हो जाने के बाद भी इसका जिक्र नहीं होता। शायद इसलिये नहीं होता क्योंकि इस पर तीन हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। इस मामले में आईआईटी कानपुर से जल विज्ञान में प्रशिक्षित और पानी के मामलों के तीस साल के अनुभवी इंजीनियर श्री कुलदीप कुमार का कहना है कि जहाँ दिल्ली में मुफ्त पानी देने के कार्यक्रम चल रहे हों वहाँ दिल्ली के पानी के इन्तज़ाम के लिये कौन पैसा देगा? यानी दिल्ली को निवेेशक मिलने की कोई सम्भावना नहीं दिखती।

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