जल संकट - कुव्यवस्था अथवा प्राकृतिक समस्या

Submitted by Hindi on Sat, 01/30/2016 - 13:41
Source
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2014

जल - जीवन का आधार


.रामचरितमानस में कविवर तुलसी दास जी ने लिखा है -

“क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा।
पंच रचित अति अधम शरीरा।।”


अर्थात, हमारा शरीर पंच-तत्वों यथा क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीरा से मिलकर बना है। इन पंच-तत्वों में से जल सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह जल ही है जो जीवन की उत्पत्ति का स्रोत माना जाता रहा है। वैज्ञानिक शोधों से भी यह तथ्य स्पष्ट हो चुका है कि जीवन की उत्पत्ति जल से हुई है और पृथ्वी के प्रारम्भिक जीवधारी दीर्घावधि तक जल में ही निवास किया करते थे। कालांतर में, जलीय जीव उभयचर में तथा फिर पूर्णरूपेण स्थलीय जीव में विकसित हुए। विश्व की सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं का जन्म भी प्रमुख नदियों के किनारे ही हुआ था। जल अपने विशेष भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्मों के कारण हमारी धरा पर अस्तित्व की कुँजी बना रहा है।

जल की उपयोगिता के मद्देनजर इसका कोई विकल्प हो ही नहीं सकता है। जल की महत्ता की हमारे प्राचीन ग्रंथों में काफी प्रशंसा की गयी है। यजुर्वेद के 15वें और 36वें श्लोकों में ऋषिगण जल से प्रार्थना करते हैं कि जैसे माँ अपनी संतान को दूध पिलाती है वैसे ही, जल है और यह जल हम मानवों के लिये कल्याणतम रस है। अतः ईश्वर हमें जल अवश्य प्रदान करें। इसमें कोई दो मत नही हैं कि जल प्रकृति से प्राप्त विरासत है। पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों में जल हमारे लिये सर्वाधिक मूल्यवान है। मनुष्य सहित पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जंतु एवं वनस्पति का जीवन जल पर ही निर्भर है। कहने का तात्पर्य है कि जल, मनुष्य के लिये ही अद्वितीय और अनिवार्य नहीं है बल्कि, यह पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, प्रकृति आदि सभी के लिये उपयोगी एवं आवश्यक है। संक्षेप में, जीवन के लिये जल की उपादेयता अतुलनीय है। वास्तव में, जीवन और प्रकृति का सम्पूर्ण सौन्दर्य जल पर ही निर्भर है।

वर्तमान समय में, जल हमारे दैनिक जीवन के साथ-साथ अन्य कई क्षेत्रों तथा विभिन्न मानवीय क्रियाकलापों में प्रमुखता से प्रयुक्त हो रहा है। यह मनुष्य को मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ रखते हुए बल में वृद्धि करता है। यह किसी भी राष्ट्र के आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक विकास एवं प्रगति का एक आधारभूत संकेतक भी है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जल के बिना जीवन की कल्पना करना असंभव है।

जल - संकट: विश्व के संदर्भ में


प्रसिद्ध दार्शनिक ‘एगेल्स’ ने कहा था - ‘‘हमें प्रकृति पर अपनी भौतिक विजय के कारण आत्म प्रशंसा में विभोर नहीं होना चाहिए क्योंकि वह हर ऐसी विजय के लिये प्रतिशोध लेती है।’’ ये पंक्तियाँ वर्तमान विश्व पर अक्षरशः सत्य सिद्ध होती दिखाई दे रही हैं क्योंकि आज का विश्व जल संकट की समस्या से त्रस्त है। जल संकट का दूरगामी परिणाम और भी भयावह है।

ज्ञात हो कि पृथ्वी पर कुल उपलब्ध जल लगभग 1 अरब 36 करोड़ 60 लाख घन कि.मी. है। किन्तु उसमें से 96.5 प्रतिशत समुद्री खारा जल है। यह खारा जल समुद्री जीवों और वनस्पतियों के अतिरिक्त मानव, धरातलीय वनस्पति तथा जीवों के लिये अनुपयोगी है। शेष 3.5 प्रतिशत मीठा जल है। किन्तु इसका 24 लाख कि.मी. हिस्सा 600 मीटर गहराई में भूमिगत जल के रूप में विद्यमान है तथा लगभग 5 लाख किलोमीटर जल गंदा व प्रदूषित हो चुका है। इस प्रकार पृथ्वी पर उपस्थित कुल जल का मात्रा 1 प्रतिशत ही उपयोगी है। विश्व में उपलब्ध जल का मात्रा 2.5 प्रतिशत भाग मानव उपयोग के लिये उपयुक्त माना जाता है। इसमें से 1 प्रतिशत भाग हिम के रूप में एवं 0.5 प्रतिशत भाग नमी के रूप में विद्यमान है। स्पष्ट है कि मात्र 1 प्रतिशत जल ही मानव को उपयोग के लिये प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त होता है। उसी 1 प्रतिशत जल पर विश्व की आबादी अपनी दैनिक जल की आवश्यकता की पूर्ति करती है। साथ ही, सिंचाई, उद्योग, कृषि कार्य तथा अन्य जल आधारित कार्यों की निर्भरता भी उसी 1 प्रतिशत जल पर है।

विडंबना यह है कि लगभग सभी महादेशों में जल संकट है और विश्व की कुल आबादी के 18 प्रतिशत हिस्से को भी स्वच्छ पेयजल नहीं मिल पा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्तमान में 1.6 बिलियन से भी अधिक लोग जल के पूर्णतः अभाव में हैं और सन 2025 तक संसार की दो-तिहाई आबादी उन देशों में रहने के लिये मजबूर हो जायेगी जहाँ जल की बहुत कमी होगी। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भारत सहित कई देशों में जल बँटवारे सम्बन्धित कई विवाद आज भी सुलझे नहीं हैं। यहाँ तक कि मैडागास्कर के राष्ट्रपति को दक्षिण कोरिया में जल संकट की वजह से अपना पद त्यागना पड़ा था। स्पष्ट है कि जल संकट राजनीतिक समस्या तथा अस्थिरता का भी कारण बन सकता है और जल उपलब्धता के लिये वैश्विक प्रतियोगिता स्वाभाविक है।

संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक 70 करोड़ लोगों को जल के लिये अपने क्षेत्रों से विस्थापित होने के लिये विवश होना पड़ेगा। जल का हमारे जीवन पर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है। एक ओर जल संकट से कृषि उत्पादकता कुप्रभावित हो रही है। वहीं दूसरी ओर जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा तथा मानव स्वास्थ्य का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। स्तंभकार स्टीवन सोलोमन ने अपनी पुस्तक ‘वाटर’ में नील नदी के जल संसाधन को लेकर मिस्र एवं इथोपिया के बीच विवाद का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए लिखा है कि दुनिया में सबसे विस्फोटक क्षेत्र पश्चिम एशिया में अगला विश्व युद्ध जल के लिये भी हो सकता है। उनका यह कथन संभव होता दिख रहा है। इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन तथा खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से जल की केंद्रीय भूमिका स्थापित होती है।

संयुक्त राष्ट्र के जल उपलब्धता मानकों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन न्यूनतम 50 लीटर जल मिलना चाहिए। लेकिन यह संभव नहीं है। दुनिया के 6 में से 1 व्यक्ति न्यूनतम मात्रा से काफी कम मात्रा में अपनी जल आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है। सब-सहारा क्षेत्रों जैसे कांगों, नामीबिया, मोजांबिक, घाना आदि में लोगों को महीने में औसतन 100 लीटर जल भी उपलब्ध नहीं हो पाता है।

वैश्विक जलवायु परिवर्तन की वजह से विश्व भर में जल की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है। ऐसा अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन से जल-स्रोतों के वितरण प्रभावित होंगे तथा मध्य एशिया और निम्न अक्षांश वाले देशों में जल की कमी होगी। वैश्विक जल संकट के संदर्भ मे यह तथ्य दुःखद भविष्य की ओर संकेत करता है कि हर वर्ष 2.5 करोड़ से अधिक लोगों की मृत्यु प्रदूषित जल के पीने से हो रही है। फलतः ताजे जल की आपूर्ति गंभीर समस्या बन चुकी है। जैसे-जैसे जल का उपभोग बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे राष्ट्र जल के अभाव की समस्या से जूझता जाता है। कुल मिलाकर पेयजल की समस्या अवश्यंभावी है। उपरोक्त समस्याओं के समाधान हेतु जल संरक्षण समय की आवश्यकता बन गया है। अतः वृहत पैमाने पर जल प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता है।

जल-संकट: भारत के संदर्भ में
अंधाधुंध दोहन से बढ़ता जल संकटपूरे विश्व में भारत में पानी का अत्याधिक प्रयोग 13 प्रतिशत होता है। भारत के बाद चीन 12 प्रतिशत तथा अमेरिका 9 प्रतिशत का स्थान है। भारत की जलीय स्थिति के सम्बन्ध में विश्व बैंक की रिपोर्ट को देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत में जल का भविष्य चिंताजनक और जल की स्थिति नाजुक है। जल की मांग तथा आपूर्ति में लगातार असंतुलन बढ़ता जा रहा है। समन्वित जल संसाधन विकास के राष्ट्रीय आयोग का अनुमान है कि सन 2050 तक यह अंतर 50 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।

वर्तमान में लगभग 7 खरब घनमीटर जल की मांग है और इस मांग का बढ़कर 14 खरब 44 अरब घनमीटर हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इतना ही नहीं, प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में भी तेजी से गिरावट की प्रवृत्ति लगातार सामने आ रही है।

हम जानते हैं कि भारत में दुनिया की 16 प्रतिशत आबादी रहती है। लेकिन, यहाँ ताजे जल के स्रोतों की गणना करें तो यह महज 4 प्रतिशत में ही सिमट कर रह जाती है। भारत की आजादी के बाद से प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता घटकर एक-तिहाई रह गई है और आँकड़े बताते हैं कि सन 2050 तक हर व्यक्ति को अभी उपलब्ध हो रहे जल का महज लगभग 6 प्रतिशत अंश ही मिल पायेगा।

भारत को प्राचीन काल से ही जल के लिये अधिक समृद्ध क्षेत्र माना जाता रहा है। लेकिन वर्तमान समय में विश्व के अन्य देशों की तरह भारत में भी जल संकट की समस्या ज्वलंत है। जल संकट आज भारत के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। भारत में वर्तमान में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 2,000 घनमीटर है, लेकिन यदि परिस्थितियाँ इसी प्रकार रहीं तो अगले 20-25 वर्षों में जल की यह उपलब्धता घटकर 1,500 घनमीटर रह जायेगी। जल की उपलब्धता का 1,680 घनमीटर से कम रह जाने का अर्थ है पीने के पानी से लेकर अन्य दैनिक उपयोग तक के लिये जल की कमी हो जायेगी। इसी के साथ सिंचाई के लिये पानी की उपलब्धता न रहने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो जायेगा। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक हर जगह जल को लेकर गहरी चिंता है। गाँवों में जल अभाव की स्थिति और भी दयनीय है।

जल उपलब्धता की दिक्कतों का अध्ययन महिला आयोग ने भी किया है। उक्त आयोग ने जल की व्यवस्था करने में महिलाओं द्वारा उठाये जा रहे कष्टों का अध्ययन करने के बाद यह जानकारी दी है कि घेरलू उपयोग के लिये जल का प्रबंध करने में 15 करोड़ महिलाएँ और करीब 10 करोड़ रुपये के समतुल्य श्रम खर्च होता है। जल लाने के लिये महिलाएँ प्रतिदिन लगभग 9-10 किलोमीटर तक पैदल चलती हैं। ऐसे ही कई अध्ययनों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों में से ‘पेयजल प्राप्त करना’ को एक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है। साथ ही यह निर्देश भी दिया है कि केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि नागरिकों के इस अधिकार की रक्षा करें। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की रिपोर्ट कहती है कि 2002 से 2008 के दौरान ही देश के भूमिगत जल भण्डारों से 109 अरब क्यूबिक मीटर जल समाप्त हो चुका है। नेशनल इंस्टीटयूट आॅफ हाइड्रोलाॅजी के एक अध्ययन से यह तथ्य सिद्ध हुआ है कि भारत की आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ने के साथ ही देश में जल संकट और भी गहरा हो गया है।

जल संरक्षण की आवश्यकता के मद्देनजर 13वें वित्त आयोग ने वर्ष 2011-12 से 2014-15 तक 5000 करोड़ रुपये का विशेष जल प्रबंधन अनुदान स्वीकृत किया है। भारत में प्रतिवर्ष 4000 अरब क्यूबिक मीटर जल बरसता है। किंतु मात्र 1000 अरब क्यूबिक मीटर जल ही भूमिगत जल का हिस्सा बन पाता है। केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड द्वारा कराये गए सर्वेक्षण से मालूम होता है कि विभिन्न राज्यों में भूमिगत जल स्तर में 20 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष की दर से गिरावट आ रही है। निःसंदेह जल संरक्षण के लिये भूमिगत जल का पुनःपूरण सुनिश्चित करना होगा। यदि समय रहते भूमिगत जल का सीमित उपयोग तथा बड़े पैमाने पर वर्षाजल का संरक्षण नहीं किया जाएगा तो हम सभी को दुष्परिणाम भुगतने के लिये तैयार रहना होगा। ऐसा लगता है मानो समस्त विश्व पर जल संकट का बादल मँडरा रहा हो। स्पष्टतः विश्वव्यापी जल संकट ने भारत को प्रभावित किया है।

जल - संकट: कारण


उल्लेखनीय है कि जल एक नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है तथापि इसकी मात्रा सीमित है और कई कारणों से इसकी प्रारंभिक मात्रा में सतत कमी दिन-प्रतिदिन देखी जा रही है। जल संकट का सबसे सामान्य और वृहत कारण तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या, शहरीकरण तथा औद्योगिकीकरण है और इससे जल की आवश्यकता अथवा माँग को पूर्ण करना हमारे लिये आज एक चुनौती बन चुका है। दूसरी ओर, स्वच्छ पेयजल की प्राप्ति, कृषि कार्यों विशेषकर सिंचाई हेतू मृदु जल की उपलब्धता तथा पनबिजली विकास के प्रयास ने जल के अनुचित तथा असंतुलित उपयोग को बढ़ावा दिया है।

जल संकट की समस्या कोई ऐसी समस्या नहीं है जो एक दिन में उत्पन्न हुई हो बल्कि जल संकट धीरे-धीरे उत्पन्न हुआ। इस संकट ने आज विकराल रूप धारण कर लिया है। जल संकट का अर्थ केवल इतना नहीं है कि सतत दोहन के कारण भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। बल्कि, जल में शामिल होता घातक रासायनिक प्रदूषण, जल को बेवजह बर्बाद करने की आदत जैसे अनेक कारण भी शामिल हैं जो सहज प्राप्य जल की उपलब्धता के मार्ग में अवरोध खड़ा कर रहे हैं।

जल संकट के कारणों पर मनन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि यह प्रकृति जनित समस्या नहीं है। वास्तव में, हमारी अति दोहन की प्रवृत्ति तथा उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा मिलने के कारण से ही सर्व सुलभ जल का संकट गहराया हुआ है। गाँधी जी कहा करते थे कि हमारी पृथ्वी मनुष्य की जरूरतों को पूरा कर सकती है लेकिन हमारे लालच को पूरा करने में वह सक्षम नहीं है। हम ऐसे ही तथ्यों को नजर अंदाज करते जा रहे हैं। बढ़ती आबादी, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और उपलब्ध संसाधनों के प्रति लापरवाही ने मनुष्य के सामने जल का संकट खड़ा कर दिया है। भूमिगत जल के पुनःपूरण के अभाव में परम्परागत जल स्रोत सूख रहे हैं। पिछले कुछ दशकों से तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण, प्राकृतिक संसाधनों के अधिकाधिक दोहन और भौतिक संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग ने जीवन एवं सृष्टि को समाप्त करने की सक्षम समस्या को जल संकट के रूप में प्रत्यक्ष कर दिया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य तथा कृषि संगठन के 22 मार्च, 2012 की रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि प्रतिवर्ष 15000 घनमीटर जल मानवीय क्रियाकलापों से बर्बाद हो जाता है।

हमें यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि जल भोजन उत्पादकता की कुँजी है। जल संकट मानव जनित तथा कुव्यवस्था का परिणाम है। हमारी अव्यवस्थित प्राकृतिक संसाधनों की उपयोग करने की प्रवृत्ति के कारण औसत वर्षा में गिरावट आ चुकी है जो जल संकट की ओर उन्मुख हो रही है। हम अपनी अनियंत्रित जनसंख्या में वृद्धि के समुचित नियंत्रण में असफल हो रहे हैं और परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति जल की खपत में वृद्धि होती जा रही है। इसकी परिणति जल संकट के रूप में हो रही है। भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन से भूजल स्तर में निरन्तर गिरावट आ रही है। उद्योगों तथा कृषि कार्यों में जल की आवश्यकता से अधिक दोहन किया जा रहा है। पर्यावरणीय प्रदूषण से ग्रीष्म ऋतु में जल स्रोतों की कमी के कारण जल के स्रोतों तथा उनकी जल धारण क्षमता में सतत ह्रास हो रहा है।

जल संकट मानवीय कुव्यवस्था का परिणाम है। लोगों में जागरुकता का अभाव जल संकट पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। मजे की बात है कि जल संकट का तत्क्षण तथा प्रत्यक्ष प्रभाव न होने के कारण हमारी मानसिकता इस प्रकार की हो गयी है कि हम जल संरक्षण के प्रति उत्साहित तथा समर्पित नहीं होते हैं। किन्तु हमारी कुव्यवस्था की प्रवृत्तियाँ भविष्य में महासंकट के लिये पृष्ठभूमि तैयार कर रही है। हम बौद्धिक प्राणी हैं किन्तु दुःख के साथ कहना पड़ता है कि हम अपने विवेक का सहारा केवल संकट आने पर ही लेना जानते हैं। यदि हम पहले से ही जल संकट के प्रति सजग रहें तो हमारा भविष्य सुरक्षित हो जायेगा।

निष्कर्ष


सूखाजल संकट 21वीं सदी के विश्व के मानवों के लिये एक बड़ी चुनौती है। जल संकट कोई प्राकृतिक समस्या नहीं है। बल्कि, यह हमारी कुव्यवस्था का परिणाम है। जल के कुप्रबन्धन की समस्या से अगर शीघ्र ही न निपटा गया तो निश्चित ही भविष्य में स्थितियाँ और भी भयावह हो जायेंगी। जल संसाधन संरक्षण और संवर्धन आज की आवश्यकता है और इसमें हर मानव का सहयोग अपेक्षित है। हम मानवों की लापरवाही ने ही जल संकट को जन्म दिया है। अगर हम पहले से ही सचेत रहते तो बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगीकरण का प्रभाव जल संकट में उतना न पड़ता, जितना आज दिखाई दे रहा है।

प्रकृति और प्राणी सृष्टि के प्रारम्भ से ही सहचर तथा अन्योन्याश्रित है। जीवन-जगत का अस्तित्व पर्यावरण की शुचिता और सुनियोजन पर ही निर्भर है। वैसे तो प्रकृति स्वयं पर्यावरणीय घटकों में संतुलन बनाए रखने के तंत्र से युक्त है किन्तु, उस तंत्र की अपनी सीमा है। वैज्ञानिक और औद्योगिक युग के प्रारम्भ के साथ ही मानवों में मिथ्या विश्वास हो गया कि उसने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है। अपने प्रगति पथ पर इस तीव्रता से मानव अग्रसर हो गया कि उसने प्रकृति में कुव्यवस्था तथा असंतुलन उत्पन्न कर दिया। मानवीय क्रियाकलापों से वृहत स्तर पर जल चक्र की मूल संरचना में निरन्तर परिवर्तन आने लगा और शनैः शनैः जल संकट का बादल धरती पर मँडराने लगा।

जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने तथा जल की महत्ता को समझाने के लिये ही प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। यह अन्तरराष्ट्रीय दिवस है जिसका सुझाव 1992 में युनाइटेड नेशन्स कांफ्रेंस आॅन इन्वायरनमेंट एंड डवलपमेंट ने दिया था। हम सभी को प्रण करना चाहिए कि हम लोग जल का संरक्षण करेंगे और जल को बर्बाद नहीं होने देंगे। जल हमारा जीवन है और जल का संरक्षण हमारा कर्तव्य है। 22 मार्च, 2010 को विश्व जल दिवस पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने सम्पूर्ण राष्ट्रों से अपने सम्बोधन में यही कहा था कि ‘जल ही जीवन है’ और इस ग्रह के सभी प्राणियों को आपस में जोड़ने वाला साधन भी जल ही है।

फ्रांस के विचारक रूसो ने प्रकृति के साथ मानव की छेड़-छाड़ की मानसिकता के कुपरिणामों से सावधान करने के लिये संदेश प्रसारित किया था कि प्रकृति की ओर लौट चलो। राहुल सांकृत्यायन ने भी अपनी यात्रा वृतांत में लिखा है - ‘मुड़ो प्रकृति की ओर, बढ़ो मनुष्यता की ओर।’ प्रख्यात साहित्यकार जयशंकर प्रसाद जी अपने महाकाव्य कामायनी में उल्लेख करते हैं कि मनु पौराणिक जल प्लावन से चिंताग्रस्त है। साथ ही, उन्हें यह चिन्ता भी है कि सभ्यता की चरम सीमा पर पहुँचे मनुष्य कुव्यवस्था तथा प्रकृति को अपने वश में करने की प्रवृत्ति से उत्पन्न हो रही पर्यावरणीय समस्या से क्यों नहीं सावधान है। वे लिखते हैं -

‘‘हिम गिरि के उत्तुंग शिखर पर,
बैठ शिला की शीतल छाँह,
एक पुरूष भीगे नयनों से,
देख रहा था प्रलय प्रवाह।’’


जल संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करना अनिवार्य है। विश्व जल संकट और जलवायु परिवर्तन का तीव्र बदलाव महासंकट की ओर संकेत दे रहा है। भू-मण्डल में पर्यावरणीय बदलाव दिखाई देने लगे हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के प्रयासों के अलावा हम सभी मानवों को जल की एक-एक बूँद को बचाना होगा। समय की आवश्यकता है कि जल संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता का मुद्दा होना चाहिए। सामूहिक स्तर, व्यक्तिगत स्तर तथा वैश्विक स्तर पर जल का संरक्षण समय की परम आवश्यकता है। जब तक जल के महत्त्व का बोध हम सभी के मन में नहीं होगा तब तक सैद्धान्तिक स्तर पर स्थिति में सुधार सम्भव नहीं है। इसके लिये हम लोगों को जल को सुरक्षित करने के लिये सही प्रबन्धन के अनुसार कार्य करना होगा। यदि वक्त रहते जल संरक्षण पर ध्यान न दिया गया तो हम सब जल संकट से उत्पन्न प्रलय के लिये जिम्मेवार होंगे।

संपर्क - श्री प्रवीण कुमार शर्मा, दिलावरगंज, पूरबपाली, किशनगंज, बिहार-855107

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