जल-संसाधनों पर पर्यावरणीय प्रतिघात का मूल्यांकन

Submitted by Hindi on Mon, 12/26/2011 - 12:11
Source
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, चतुर्थ राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 16-17 दिसम्बर 2011
आज विश्व के सामने प्रदूषण का खतरा अत्यंत गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है। यद्यपि बहुत पुराने समय से (जब से मनुष्य ने आग का उपयोग शुरू किया) प्रदूषण अस्तित्व में था, किन्तु 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के कारण पूरे विश्व में यह बहुत तेजी से बढ़ा है, हालांकि औद्योगिक क्रांति द्वारा विश्व में तकनीकी प्रगति बहुत तेजी से ही है, किंतु साथ ही साथ मनुष्य द्वारा प्रकृति का दोहन भी बहुत तेजी से किया जा रहा है, जो कि पर्यावरण के लिए बहुत हानिकारक है। यह सत्य है कि प्रगति के लिए उद्योगों का होना आवश्यक है, लेकिन उद्योगों की बेतहाशा वृद्धि जन-कल्याण के हित में नहीं हो सकती। दिन-प्रतिदिन बढ़ते कारखानों से निकलने वाले जहरीले अपशिष्टों एवं गैसों से हमारा पर्यावरण एवं हमारे जल संसाधन प्रदूषित होते जा रहे हैं।

पर्यावरण मुख्यतया वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण तथा जल प्रदूषण से दूषित हो रहा है। वायु के बिना जीवन संभव नहीं है। परन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, कल-कारखानें भी बढ़ रहे हैं। कारखानों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं से व्यक्ति नई-नई बिमारियों का शिकार हो रहा है। वृक्षों के काटे जाने के कारण ऑक्सीजन की कमी हो रही है और हानिकारक गैसों की मात्रा वातावरण में बढ़ती जा रही है। दमा, खाँसी आदि बीमारियों का बढ़ना इसी का परिणाम है। जीवन की खाने-पीने की सभी वस्तुएँ मिट्टी में ही पैदा होती है। जब मृदा ही प्रदूषित होगी, तो हमारे खाद्य पदार्थ भी प्रदूषित होंगे। इसका कारण भी वृक्षों का कटाव, रासायनिक खादों का प्रयोग, पॉलिथीन का प्रयोग आदि है। गाड़ियों के हॉर्न, मिलों के सायरन, टेलीविजन, टेप रिकार्डर, लाउड स्पीकर की आवाजों के शोर से ध्वनि प्रदूषण फैलता है, जो मनुष्य के कानों को खराब कर उन्हें बहरा बना रहा है।

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