जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और आपदा प्रबंधन

Submitted by Hindi on Sat, 01/23/2016 - 14:35
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योजना, दिसम्बर 2015

भारत जैसे विकासशील देशों जहाँ कृषि एवं अन्य संसाधनों का उपयोग आजीविका और आर्थिक प्रगति के लिये आधारभूत प्राथमिक स्रोत के रूप में किया जाता है, में चुनौतियाँ विशेषकर ज्यादा गंभीर है। भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट, भूस्खलन आदि भौगोलिक आपदाओं की तुलना में जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं का प्रभाव कहीं अधिक दर्ज किया गया (आरेख 1)।

ग्लोबल वार्मिंग पर वैज्ञानिक जागरूकता का इतिहास 1980 या उससे भी पहले का है, जो बाद में तीव्र सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता के रूप में बदला। अगस्त 1989 में मध्य भारत में पर्यावरणीय विज्ञान परिषद द्वारा आयोजित विचार मंथन कार्यशाला में एक स्वर में हिम झीलों पर बढ़ते जोखिम और अन्य विध्वंसक बाढ़ों, सूखा और अकाल, आंधियों और महामारी के प्रकोप पर चिंता जाहिर की गई थी। हालाँकि, इन बदलावों के लिये जिम्मेदार कारणों की वैज्ञानिक पहचान बहुत कमजोर थी। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) ने आपदाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को विज्ञान के आधार पर प्रस्तुत करने में अग्रणी भूमिका निभाई।

आपदा प्रबंधन : उल्लेखनीय बदलाव


आईपीसीसी की चौथी आकलन रिपोर्ट (2007) ने वैश्विक स्तर पर आपदा जोखिम प्रबंधन के साथ जलवायु परिवर्तन अनुकूलन को केंद्रित करने के लिये राजनीतिक मान्यताएँ दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे हम आपदा प्रबंधन में दूसरे बड़े बदलाव के रूप में देखते हैं। इसमें तीन पहलुओं पर ध्यान दिया गया था :

(1) खतरनाक जोखिम का हल,
(2) अतिसंवेदनशीलता को कम करना, और
(3) पर्यावरण ज्ञान पर आधारित दृष्टिकोण।

इसके पहले के बदलाव में आपदा प्रबंधन में ‘बचाव एवं राहत’ से आगे आकर ‘रोकथाम एवं तैयारी’ केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया गया था।

.वैश्विक स्तर पर ‘आपदा प्रबंधन’ पर्यावरण परिवर्तनों को महसूस कर अर्थशास्त्र और इंजीनियरिंग की भांति बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पर्यावरण परिवर्तन के तीन पहलू हैं : जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग और परितंत्र में बदलाव ये सभी जटिल विनाशकारी खतरों और बढ़ते जोखिम के द्योतक हैं। प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण के लिये संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय दशक (आईडीएनडीआर 1990-99) के काल से लेकर ह्योगो फ्रेमवर्क ऑफ एक्शन (2005-15) तक पारिस्थितिकी और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य करने के दौरान आरंभिक अभियांत्रिकी पर आधारित रोकथाम सिद्धांत को व्यापक समुदाय द्वारा अपनाने और तैयारी पर जोर देते हुए सामाजिक-आर्थिक आधारित जोखिम पर केंद्रित दृष्टिकोण का मैं साक्षी रहा हूँ। एक सुरक्षित विश्व के लिये योकोहामा रणनीति और योजना को विश्व सम्मेलन (1994) में अपनाया गया। इसमें स्पष्ट रूप से पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन और एजेंडा 21 को उल्लिखित करते हुए आपदा न्यूनीकरण और धारणीय विकास के बीच नजदीकी अंतरसंबंध को रेखांकित किया गया था। हालाँकि, ह्योगो फ्रेमवर्क की समीक्षा प्राथमिकता 4 हो गई, जिसमें आपदा जोखिम के कारणों और इसके अतिसंवेदनशील परिणामों को रेखांकित करने में राष्ट्रों के असफल होने की बात सामने आई। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की पहचान से न केवल खतरों बल्कि इसके साथ ही अतिसंवेदनशील परिणामों और जोखिम प्रबंधन क्षमताओं (सारणी 2) के आधार पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण को शामिल कर जलवायु परिवर्तन अनुकूलन की बात स्पष्ट होती है। इसी बात पर जून 2014 में थाईलैंड में आयोजित आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर छठे एशियाई मंत्री स्तरीय सम्मेलन में स्वीकृत बैंकॉक घोषणा और पोस्ट ह्योगो फ्रेमवर्क पर एशिया प्रशांत इनपुट दस्तावेज में स्पष्ट संदेश के तौर पर जोर दिया गया था। विश्व सम्मेलन 2015 के परिणामस्वरूप आपदा जोखिम न्यूनीकरण (2015-30) के लिये सेंडई फ्रेमवर्क में इस एकीकरण के लिये स्पष्ट रूप से आवाज उठाई गई थी।

जलवायु आपदाओं से जोखिम


तालिका 1 -परिदृश्य-एजैसा कि आरेख 1 में दर्शाया गया है, एशिया क्षेत्र में विशुद्ध भूभौतिकीय कारणों से उत्पन्न आपदाओं की तुलना में जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाएं अधिक आई और उनका प्रभाव कहीं अधिक था। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव पर ठोस बातचीत मुंबई और उसके बाद कई एशियाई शहरों, ढाका, इस्लामाबाद, सूरत, भोपाल, बंगलुरु, कोलकाता, दिल्ली, हैदराबाद आदि शामिल हैं, आदि में आई विनाशकारी शहरी बाढ़ के बाद आरंभ हुई। भारतीय तटवर्ती और उप तटवर्ती राज्यों, इस क्षेत्र में स्थित अन्य देशों और द्वीपों को प्रभावित करने वाले चक्रवाती आपदाओं उदाहरण स्वरूप फाइलिन और हुदहुद, की बढ़ती बारंबारता और तीव्रता, उत्तराखण्ड और कश्मीर में विनाशकारी बाढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में तीव्र लू, साल दर साल सूखे क्षेत्रों में हो रही बढ़ोतरी ने वैज्ञानिक और रणनीतिक जगत के साथ आकर धारणीय और सुरक्षित विकास के लिये काम करने को मजबूर किया है। एशिया प्रशांत के ज्यादातर देश विकास या अल्प विकास के विभिन्न चरणों में हैं और, अत: इसलिए न केवल भूमि और जलवायु बल्कि और अधिक गंभीर रूप से अपने सामाजिक आर्थिक संसाधनों की संवेदनशीलता से भी जूझ रहे हैं। थाइलैंड और म्यांमार में हाल ही में आई बाढ़ को समुदाय और सार्वजनिक अवसंरचना, पारिस्थितिकी सेवाओं और उसके आधार पर उनकी आजीविका और आर्थिक जीविका पर दीर्घ अवरोधी प्रभाव डालने वाली घटना के रूप में जाना गया। नेपाल के गोरखा भूकम्प 2015 और झटकों के प्रभाव से पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन हुआ और जलवायु परिवर्तन तथा पारिस्थितिकी क्षरण से जोखिम और अधिक बढ़ गया। चिकनगुनिया, डेंगू आदि बीमारियों की उत्पत्ति और प्रसार भी क्षेत्रीय मौसम के प्रारूप और जलवायु व्यवस्थाओं में परिवर्तन से जुड़ा हुआ है।

जलवायु परिवर्तन को संबोधित करते हुए ‘पर्यावरणीय चरम–आपदा जोखिम प्रबंधन’ पर एक भारतीय टिप्पणी 5 जून, 2012 को नई दिल्ली में जारी की गई थी। इसमें चरम घटनाओं और आपदाओं पर जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल द्वारा प्रकाशित विशेष रिपोर्ट से दक्षिण एशिया के संदर्भों को व्याख्यायित किया गया था। (टेबल 1)। रिपोर्ट के अध्याय 4 में यह उल्लेख किया गया था कि जलवायु परिवर्तन के चरम पर पहुँचने से मानव और पारितंत्र को व्यापक क्षति हो सकती है। इससे आर्थिक नुकसान होगा, पर्यटन और कृषि जैसे विभिन्न क्षेत्रों, शहरी बस्तियों और छोटे द्वीपीय देशों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। चरम घटनाओं का जल, कृषि और खाद्य सुरक्षा, वानिकी, स्वास्थ्य और पर्यटन जैसे जलवायु से नजदीकी तौर पर जुड़े अथवा निर्भर क्षेत्रों पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन आपदाओं को कैसे प्रोत्साहित करता है?


प्राथमिक तौर पर, जलवायु परिवर्तन से संबंधित ज्यादातर नीतिगत हस्तक्षेप रोकथाम केंद्रित और भू-भौतिकीय मानकों पर आधारित थे। जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल द्वारा ‘जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, 2012 को आगे बढ़ाने के लिये चरम घटनाओं के जोखिमों और आपदाओं के प्रबंधन’ पर दी गई विशेष रिपोर्ट में कहा गया था, अब जोखिम केंद्रित दृष्टिाकोण की ओर ध्यान दिया जा रहा है। ‘आपदा जोखिम में कमी : बदलते जलवायु में जोखिम और गरीबी, 2009’ पर वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट में पारितंत्र में क्षरण को भविष्य में प्राकृतिक खतरे को और अधिक बढ़ाने वाले कारक के रूप में चिन्हित किया गया था। विश्व बैंक समूह जलवायु जोखिम प्रबंधनः विश्व बैंक समूह के संचालनों में अनुकूलन शामिल करना शीर्षक से अपने प्रकाशन के जरिए 2006 में यह पाया कि दक्षिण एशिया में पर्यावरण परिवर्तन के परिणामों से विशेष रूप से गरीब सहित निम्नलिखित चीजें प्रभावित हो रही हैं।

1. कई शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में जल की उपलब्धता और जल की गुणवत्ता में कमी।
2. कई क्षेत्रों में बाढ़ और अकाल के खतरे बढ़ गए हैं।
3. पहाड़ी आवासों में जल नियमन में कमी,
4. पनबिजली और बायोमास उत्पादन की विश्वसनीयता में कमी आ रही है।
5. मलेरिया, डेंगू और हैजा जैसे जल जनित रोगों की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है,
6. मौसमी घटनाओं के चरम पर पहुँचने से इसके कारण क्षति और मृत्यु में वृद्धि हुई है।
7. कृषि उत्पादकता में कमी आई है, मत्स्य पालन पर प्रतिकूल असर हुआ है, और
8. कई पारिस्थिकी तंत्रों पर प्रतिकूल असर पड़ा है।

आपदाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पृथक करके देखने के बजाय भूमि उपयोग बदलाव और प्राकृतिक संसाधन अपक्षरण जैसे पर्यावरणीय बदलावों के अन्य पहलुओं के साथ देखे जाने की जरूरत है। अनियोजित या खराब तरीके से नियोजित शहरीकरण एवं औद्योगिक संकुलन और बाढ़ क्षेत्र, अपरदन वाले ढलानों, पहाड़ी ढलानों में निष्क्रिय जल निकासी चैनलों जैसे जोखिम भरे क्षेत्रों में दखल, खेती एवं अन्य संबंद्ध कृषि कार्यों में एकांगी प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है, और आधुनिक यद्यपि असुरक्षित आवास को बढ़ावा देता है, प्रौद्योगिकीय अनुप्रयोगों में कमी के बावजूद इस प्रकार के जोखिम आपदाओं का रूप धारण कर लेते हैं। इस संबंध का एक सचित्र प्रस्तुति आरेख 2 में दर्शाया गया है।

आपदा जोखिम प्रबंधन के जरिए जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण जोखिमों को हल करने वाले, अतिसंवेदनशीलता को कम करने वाले और क्षमताओं को बढ़ाने वाले (रोकथाम – रोकथाम और प्रभावी आपात तैयारी पर केंद्रित) त्रिस्तरीय उद्देश्यों का एक व्यवस्थित मिश्रण समझा जाता है। जब जलवायु परिवर्तित होती है तो स्थिति और बदतर होती हैं, जैसे सौ वर्ष की अवधि में हुई वर्षा दस वर्ष में ही हो जाती है, समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी से तटीय तूफानी लहरों में इजाफा होता है तथा बारंबार शक्तिशाली प्रभजन आते हैं, विनाशकारी बवंडर की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि होती है, सूखे के कारण जंगल में आग लगने की घटनाओं और उसके दायरे में वृद्धि होती है और किसानों को अपरिचित मौसमी प्रकोपों को झेलने के लिये मजबूर होना पड़ता है। अतिसंवेदनशीलता को एक हानिप्रद परिस्थिति या घटना के प्रति लोगों, संपत्ति, पारितंत्रों, संसाधनों और सांस्कृतिक, आर्थिक तथा सामाजिक गतिविधियों की संवेदनशीलता के दायरे में संदर्भ में समझा जाता है। यह एक प्रतिकूल वातावरण के प्रभाव का सामना करने में असमर्थता को दर्शाता है। असुरक्षा की खिड़की वह समय सीमा है जिसके भीतर सुरक्षात्मक उपाय कम हो जाते हैं, उनसे समझौता हो जाता है या वे कम रह जाते हैं। रोकथाम से तात्पर्य उन व्यापक गतिविधियों से है जो तनाव को रोककर सहनशीलता को बढ़ाता है, ‘सामाजिक-अर्थव्यवस्था’ के वातावरण के उभरे हुए ‘घटक’ को उपचार और लचीलापन प्रदान करता है, और उसके जरिए आपदा प्रबंधन के संदर्भ से अलग जलवायु परिवर्तन उपचार में विभिन्न धारणाओं को व्यक्त करता है। ‘अनुकूलन’ परिणामों को संबोधित करने से जुड़ा हुआ है, और इसलिए ‘जलवायु परिवर्तन प्रभाव के प्रति अनुकूलता’ एक जादुई संकल्पना के तौर पर ‘रोकथाम-रोकथाम और तैयारी’ के मिश्रण की काफी नजदीक है, आपदा प्रबंधन में नए प्रतिमान के रूप में उपस्थित है। यह मानव पर्यावरण के साथ प्रभावों के उपस्थित जटिल परिदृश्य में बने रहने के लिये योग्यताओं का एक समूह विकसित करने पर केंद्रित है। (सारणी 3)।

आपदा रोकथाम से तात्पर्य जोखिम को कम करने, खतरे या डरावनी आपदा परिस्थिति के प्रभाव को कम करने के लिये किए गए मानवीय हस्तक्षेपों से है। आपदा रोकथाम में विभिन्न ‘संरचनात्मक’ और ‘गैर संरचनात्मक’ हस्तक्षेपों को शामिल किया जाता है। चूँकि अनुकूलन के प्रारूप जिला और स्थानीय स्तर पर नियोजित किए जाते हैं, इसलिए आपदा रोकथाम की स्पष्ट समझ की जरूरत नियोजन और कार्यान्वयन के सभी स्तरों पर होती है, और इसके लिये जरूरी रणनीतिक दस्तावेजों में भी इसकी जरूरत होती है।

तालिका 2 विभिन्न आपदा प्रकारों के लिये खतरों औरमोटे तौर पर आपदा जोखिम और इसके प्रबंधन के लिये चार प्रमुख दृष्टिकोणों की आवश्यकता पड़ती है, जैसे

1. इंजीनियरिंग पर केंद्रित संरचनात्मक रोकथाम,
2. समुदाय पर केंद्रित तैयारी आधारित दृष्टिकोण
3. केंद्रीयकृत समन्वय आधारित दुर्घटना कमान प्रणाली (आपात प्रतिक्रिया के लिये) और
4. आपदा जोखिम प्रबंधन के लिये पर्यावरण आधारित एकीकृत दृष्टिकोण

पर्यावरण और आपदा जोखिम न्यूनीकरण (पीईडीआरआर) और परितंत्र आधारित अनुकूलन (ईबीए) पर संयुक्त राष्ट्र की साझेदारी के जरिए ‘आपदा जोखिम न्यूनीकरण (इको डीआरआर) के लिये पारितंत्रीय दृष्टिकोण’ का हाल के वैश्विक दवाब से दोनों के उद्देश्यों और दृष्टिकोण में एकरूपता देखी गई है, और इसलिए आजीविका में लचीलापन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य संसाधनों और अन्य पारितंत्र सेवाओं के संदर्भ में समुदायों को परस्पर लाभ पहुँचा रहे हैं। नतीजतन उनकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और अतिसंवेदनशीलता में कमी आ रही है।

वैधानिक एवं संस्थागत फ्रेमवर्क


जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदा प्रबंधन में रोकथाम, तैयारी, पुनर्वास, पुननिर्माण और पुन: प्राप्ति सहित सभी पहलू शामिल होते हैं और निम्नलिखित चीजें उपलब्ध कराते हैं:

1. प्रभावी नियोजन, कार्यान्वयन और वित्तपोषण के लिये तकनीकी-वैधानिक और संस्थागत फ्रेमवर्क स्थापित की जाती है।
2. योजनाओं और परियोजनाओं के जरिए विकास की प्रक्रिया और आपदा जोखिम रोकथाम उपायों के लिये बहु-क्षेत्रीय आपदा जोखिम प्रबंधन को शामिल किया जाना।
3. आपदा जोखिम न्यूनीकरण नीतियों और योजनाओं का सर्वांगीण, सहयोगात्मक, समावेशी और सतत ढंग से एकीकरण

जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के जरिए सतत विकास के उद्देश्यों को रणनीतिक ढंग से क्रियान्वित करने और आपदा जोखिमों का एकीकृत ढंग से सामना करने में वर्तमान के अंतर और उसके परिणामस्वरूप चुनौतियों को देखने पर, एशिया प्रशांत क्षेत्र में म्यांमार, कंबोडिया, फिलिपिंस, इंडोनेशिया, बांग्लादेश आदि जैसे कई छोटे देशों के पहल और नवाचार उल्लेखनीय प्रतीत होते हैं, जहाँ पर आपदा जोखिम न्यूनीकरण के मामले और इसके लिये हस्तक्षेपों को क्षेत्रों, शासन और संस्थानों के तहत एकीकृत किया गया है। आरेख 3 में एक सुझावपरक फ्रेमवर्क का खाका खींचा गया है।

प्राथमिक तौर पर पर्यावरण गुणवत्ता और संसाधन प्रबंधन क्षेत्रों को ध्यान में रखकर पर्यावरण और इसके संघटक प्राकृतिक संसाधनों (प्रक्रियाओं और नियोजन) तथा पर्यावरण सेवाओं से जुड़े नियामकीय प्रावधान किए गए हैं, और सतत मानव विकास के निम्न तीन हिस्सों (1) अवसंरचना और उद्योग, (2) पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन तथा (3) समाज कल्याण और सांस्कृतिक सेवा, से जुड़े नियामकीय प्रावधान और कानून आपदा जोखिम प्रबंधन को प्रासंगिक बनाते हैं। खतरों को हल करने, असुरक्षा के मूल कारणों को कम करने तथा क्षमता वर्द्धन में वैधानिक प्रावधान महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, एवं इसके जरिए जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और आपदा जोखिम प्रबंधन से जुड़ते हैं। इस संबंध में हमने विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विधान का अध्ययन किया है।

आपदा केंद्रित अनुकूलन हस्तक्षेपों के कुछ उदाहरण


.बदलती जलवायु और इसके नतीजों की पृष्ठभूमि में आपदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिये विश्व भर में तथा एशिया प्रशांत के देशों में भी कई पहल की गई हैं। भारत में आपदा कानून में स्पष्ट रूप से ‘पर्यावरण’ को आपदा प्रबंधन में बड़े पहलू के रूप में शामिल किया गया है, और इसके जरिए एकीकरण के लिये महत्त्वपूर्ण मौके उपलब्ध कराए गए हैं। भारतीय आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के अनुसार आपदा को ‘तबाही, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा या किसी क्षेत्र में प्राकृतिक या मानव निर्मित कारणों से या दुर्घटना के कारण अथवा लापरवाही के कारण घटित घटना जिसमें जीवन समाप्त होने, मानव पीड़ा या संपत्ति की क्षति और बर्बादी या पर्यावरण का नुकसान या अपक्षरण पर प्रभावित क्षेत्र की ऐसी प्रकृति और मात्रात्मक घटना जिसका सामना करना वहीं के समुदाय की क्षमता से बाहर हो।’ के रूप में परिभाषित किया गया है। उपरोक्त दिए गए वैधानिक प्रावधानों के अलावा भारत में निम्न नीतिगत प्रावधानों से आपदा जोखिम न्यूनीकरण के एकीकरण अनुकूलन के लिये महत्त्वपूर्ण अवसर प्राप्त होते हैं :

1. राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006
2. राष्ट्री आपदा प्रबंधन नीति 2009
3. राष्ट्रीय जल नीति 2002 (संशोधन 2012 के तहत)
4. राष्ट्रीय वन नीति
5. राष्ट्रीय शहरी स्वच्छता नीति
6. राष्ट्रीय कृषि नीति
7. राष्ट्रीय भूमि-उपयोग नीति (ड्राफ्ट / विचाराधीन)
8. जलवायु परिवर्तन पर रणनीति (राष्ट्रीय कार्य योजना)

चरम घटनाओं और आपदाओं के बढ़ते जोखिम के समाधान के लिये आपदा जोखिम प्रबंधन के कुछ विशेषीकृत हस्तक्षेप निम्नलिखित हैं:

1. आपदा प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय योजना :
इसे संबंधित मंत्रालयों/एजेंसियों और राज्य सरकारों से प्रतिक्रिया लेकर, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अनुसार समग्र और परामर्शी तरीके से विकसित किए जाने की जरूरत है। 2013 में उत्तराखण्ड में आई आपदा के बाद हमने राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति के तत्वावधान में राष्ट्रीय योजना तैयार करने के लिये तीव्र कदम उठाए। इसके घटक थे : खतरे का जोखिम और असुरक्षा प्रोफाइल, रोकथाम योजना, प्रतिक्रया योजना और मानव संसाधन क्षमता निर्माण योजना। इस अवसर का उपयोग वित्तीय रणनीतियाँ बनाने और आपात प्रतिक्रिया योजना सहित समूची प्रक्रिया में जलवायु परिवर्तन के मामले को एकीकृत करने के लिये किया गया।

तालिका 3 अनुकूलन के घटक2. राष्ट्रीय मानव संसाधन योजना 2012:
योजना तैयार करते समय, राज्यों की क्षमता निर्मित करने वाले संस्थानों, विभिन्न क्षेत्रों में व विभिन्न स्तरों पर गतिविधियों, जलवायु जोखिम के हल के लिये संसाधनों के अनुमान पर आधारित एक ठोस आकलन वैधानिक स्वीकारोक्ति के तौर पर एक प्रमुख कसौटी था। विभिन्न एजेंसियों, संस्थाओं और साझीदारों के लिये भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के लिये नीति बनाई गई।

3. आपदा प्रबंधन के लिये राष्ट्रीय दिशानिर्देश :
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बाढ़, शहरी बाढ़, सूखा, चक्रवात, भू-स्खलन जैसी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं के लिये दिशा-निर्देश तैयार किए हैं, और इसके तहत जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के लिये महत्त्वपूर्ण अनुकूलन विकल्पों को प्रावधान के तहत शामिल किया गया है।

4. पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी :
आपदा की स्थिति में प्रभावी और समय पर कार्रवाई करने के लिये पूर्व चेतावनी में सुधार किया जाना बहुत जरूरी है। चक्रवात की चेतावनी में सुधार आया है, और इसका लाभ फैलिन और हुदहुद जैसे चक्रवातों के प्रबंधन में देखने को मिला था। भारत का मौसम विज्ञान विभाग निगरानी और पूर्वानुमान के लिये अपने नेटवर्क में सुधार के लिये कमर कस रहा है।

5. जिला योजनाओं में अनुकूलन और आपदा लोच का एकीकरण :
जिला स्तर पर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में जलवायु लचीलापन और आपदा जोखिम पर केंद्रित विभागीय योजना की प्रगति को दिखाने के लिये एक पहल की गई है। इस प्रकिया को ‘साझा अध्ययन’ कहा जाता है, इसका उपयोग जलवायु भविष्यवाणी में सुधार करने और जिले की जलवायु लचीलापन पर आधारित आपदा प्रबंधन योजना के लिये किया जाता है।

6. जलवायु परिवर्तन और राज्य आपदा प्रबंधन योजनाओं के लिये राज्य कार्य योजना :
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और आपदा जोखिमों का सामना करने के लिये तटवर्ती क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों की विशेष चुनौतियों को देखते हुए, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में पायलट परियोजनाओं के सबक को जिला आपदा प्रबंधन योजना के फ्रेमवर्क में शामिल किया गया। प्रक्रिया के परिणामों को जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजना और राज्य आपदा प्रबंधन योजना के साथ सटीक तालमेल बिठाने के लिये शामिल किया गया था। जलवायु लचीलापन ग्राम योजनाओं को भी सामूहिक सहयोग की प्रक्रिया अपनाकर विकसित किया गया।

7. विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं में जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण को शामिल किया जाना :
महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, इंदिरा आवास योजना, एकीकृत जल विकास परियोजना, जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना आदि जैसे सरकार की विभिन्न कार्यक्रमों और योजनाओं का विश्लेषण किया गया है और उनके समायोजन को जलवायु परिवर्तन संबंधित आपदा प्रबंधन के साथ एकीकृत करने के लिये निरूपित किया गया है।

आरेख3 जलवायु और आपदा जोखिम प्रबंधन

उपसंहार


सरकार, समुदाय, कॉर्पोरेट और सार्वजनिक निजी भागीदारी की जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और आपदा जोखिम प्रबंधन के सह-लाभ के साथ कई जमीनी हस्तक्षेप किए गए थे। इस प्रकार के व्यवहारों के सबक को नीतियों और योजनाओं के निर्माण में शामिल करने के लिये, इनके दस्तावेजीकरण की संस्तुति की गई है। लोचशील आवास पर एक दिल्ली घोषणापत्र 27 जनवरी, 2014 को जारी किया गया था, इसमें बाढ़ से उबरने वाले आवास विशेषीकृत निर्माण कोड की बात कही गई थी। वर्ष 2015 में जलवायु परिवर्तन पर नए सतत विकास लक्ष्यों और एक नए प्रोटोकॉल के रूप में विशेष उपलब्धि दर्ज हुई है। क्रियान्वयन के लिये प्रभावी क्षमता, समायोजित और जाँचे गए उपकरणों और जिला एवं ग्राम स्तर पर नीति निर्माण प्रारूप की जरूरत होगी। पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के समय से ही जिला स्तर पर एक पर्यावरण कार्य योजना बहुप्रतीक्षित है। समय की मांग को देखते हुए नियोजन प्रक्रिया में सुधार और उपयुक्त जागरूकता व प्रभावी शासन लोगों और उनके संसाधनों की सुरक्षा सतत विकास के ठोस घटक हैं। सतत विकास के लिये सामाजिक और व्यावसायिक वातावरण तैयार करने हेतु जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंग के रूप में पर्यावरण और मूल्य आधारित शिक्षा पर एक ‘एक राष्ट्रीय मिशन’ को शामिल किया जा सकता है।

लेखक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान, नई दिल्ली में एशोसियेट प्रोफेसर तथा नीति नियोजन विभाग के प्रमुख हैं। इस क्षेत्र में उनका 25 वर्ष से अधिक का अनुभव है और सैकड़ों प्रकाशन अब तक उनके नाम रहे हैं। ईमेल: anil.nidm@nic.in, enviroasafe2007@gmail.com

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