जलवायु परिवर्तन का जल संसाधन पर प्रभाव

Submitted by RuralWater on Fri, 03/06/2020 - 11:58
Source
ब्रह्मपुरी, हजारी चबूतरा, जोधपुर

 जलवायु परिवर्तन जलवायु परिवर्तन

सारांश

जलवायु परिवर्तन आज विश्व की ज्वलंत समस्या है। सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन के भयावह परिणामों की आशंका से त्रस्त है। वर्तमान में जिस तेज गति से जलवायु चक्र में परिवर्तन हो रहा है उतना पिछले कई हजार वर्षों में भी नहीं देखा गया। प्रकृति में होने वाली विभिन्न क्रियाओं में मानव हस्तक्षेप के कारण विगत कुछ दशकों से पृथ्वी के वायुमण्डल में अनेक अनपेक्षित परिवर्तन देखे गए हैं। शहरीकरण एवं औद्योगिक विकास के चलते निरतंर वृक्षों को काटना, वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की हानिकारक गैसों की सान्द्रता का लगातार बढ़ना, पृथ्वी के वायुमंडल के निरंतर प्रदूषित कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थान, आई.पी.सी.सी. ने अपने चतुर्थ प्रतिवेदन में स्पष्ट संकेत दिए है कि यदि मानवीय हस्तक्षेप को न रोका गया तो पृथ्वी पर जन-जीवन सामान्य रूप से चलना कठिन हो जाएगा। यह आभास किया गया है कि वायुमण्डलीय ट्रेस गैसों की वृद्धि से जलवायु परिवर्तन संभवतः जलचक्र को प्रभावित करेगा और जल विज्ञान संबंधित आपदाओं, जैसे बाढ़, सूखा, सतही एवं भू जल संसाधनों की उपलब्धता पर प्रभाव डालेगा। इस तरह के परिवर्तन से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक अव्यवस्था की संभावना है। ऐसा आकलन किया गया है कि विशेष रूप से विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के कारण जल तथा खाद्यान्न की कमी का सामना करना पड़ेगा तथा साथ ही स्वस्थ जीवन पर भी संकट पड़ सकता है। यह खतरा भारत जैसे विकासशील देश के लिए गंभीर है जिसकी अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण जल, खाद्य तथा ऊर्जा संबंधित मांग अधिक गंभीर होने की संभावना है। अतः इस संबंध में सार्थक प्रयासों एवं जनचेतना की महती आवश्यकता है।

Abstract

Climate change has become a global menace in this century. In fact whole world is severely affected with its dreadful effects which were not observed in past decades. It has been scientifically accepted that amongst the other reasons due to man’s intervention for his selfness, abrupt changes which are harmful for living organisms have been developed. As a consequence or unplanned industrialization and urbanization, deforestation, followed by increase in concentration of toxic gases in atmosphere have been globally observed which in turn pollute the environment Fourth Report of international institute, IPCC has clearly indicated that if man’s intervention will not be stopped then it will plunge in great problem for survival of organisms. This climate change will affect water and hydrological cycles and will enhance onset of flood, famine and drought, availability of surface and ground water resources. This will also have an adverse effect on socio-economic aspect. It has been estimated that developing countries as a result of climate change may have to take crisis of water and foodgrains and also healthy life. This problem may be more acute in country like ours whose economy is agriculture dependent. Therefore, immediate attentions are required to save human beings and environment.

वस्तुतः जलवायु या Climate शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के क्लाइमा; (Clima) शब्द से हुई है। CLIMA का अर्थ झुकाव या तिरछापन अथवा ढाल; (Clino) होता है। अर्थात् सूर्य की तिरछी किरणों के फलस्वरूप तापमान के वितरण में भिन्नता पाई जाती है, उसमें उत्पन्न दशा (मौसम) का दीर्घकालीन औसत, जलवायु कहलाती है। अथवा संपूर्ण पृथ्वी या उसके किसी भू भाग की दीर्घकालीन (31 वर्ष) मौसमी दशाओं के औसत को भी जलवायु कहते है।

मौसम तथा जलवायु में पर्याप्त अंतर होता है। वायुमण्डल की अल्पकालिक दशाओं को मौसम कहा जाता है। अर्थात् वायुमण्डल की क्षणिक अवस्था का द्योतक मौसम कहलाता है। एक दिन में अनेक मौसम हो सकते है। मौसम शब्द की उत्पत्ति भी अरबी भाषा के मौसिम शब्द से हुई है। मौसम के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, जबकि जलवायु के लिए अंतरराष्ट्रीय मौसम विभाग ने 31 वर्ष की अवधि निर्धारित की है। मौसम स्थानिक होता है, स्थान व समय के आधार पर बदल जाता है, जबकि जलवायु प्रादेशिक व विश्वस्तरीय समानता रखती है। मौसम में परिवर्तन स्थानीय होता है, जबकि विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन देखने को मिलते है, जैसे प्लीस्टोसीन हिमयुग में। जलवायु की ही एक दशा मौसम होती है अर्थात् जलवायु मौसम का एकीकरण होती है।

जलवायु के प्रमुख तत्व है-तापमान, आतपन ;( Insolation) वायुदाब, आद्रता तथा वर्षण, पवन तथा मेघाच्छादन की मात्रा। वस्तुतः ये सभी तत्व बहुत परिवर्तनशील होते है, फिर भी इन तत्वों में कुछ समरूपता प्रेक्षित की जा सकती है। भू-तल पर उपर्युक्त तत्व की मात्रा, उनकी तीव्रता तथा उनके वितरण में विभिन्नता के फलस्वरूप एक प्रदेश की जलवायु दूसरे प्रदेश की जलवायु से भिन्न होती है।

मनुष्य के जीवन के प्रारम्भ में जल निर्मल था, वायु स्वच्छ थी, भूमि शुद्ध थी तथा मनुष्य के विचार भी शुद्ध थे। हरी-भरी इस प्रकृति में सभी जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे बड़ी स्वच्छंदता से पनपते थे। चारों दिशाओं में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का वातावरण था तथा प्रकृति भली-भांति पूर्णतः संतुलित थी। परन्तु जैसे-जैसे समय बीता, मानव ने विकास किया और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उसने शुद्ध जल, वायु तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर उपयोग किया है। यद्यपि मनुष्य की हर आवश्यकता का समाधान प्रकृति ने किया, परंतु बदले में मनुष्य ने प्रदूषण जैसी कभी न समाप्त होने वाली समस्या उत्पन्न कर दी है। आज हमें मानवीय कार्यकलापों के फलस्वरूप लाभांश ; (Bonus) के रूप में विविध प्रकार के प्रदूषणों की मार झेलनी पड़ रही है।

क्या है जलवायु परिवर्तन-जलवायु परिवर्तन किसी अचानक आई विपदा की भांति प्रभावी न होकर धीरे-धीरे पृथ्वी और यहां रहने वाले जीवों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अनेक समस्याओं को जन्म देती है। जलवायु परिवर्तन का मतलब तापमान, बारिश, हवा, नमी जैसे जलवायुवीय घटकों में दीर्घकाल के दौरान होने वाले परिवर्तनों से है। जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य उन बदलावों से है जिन्हें हम लगातार महसूस कर रहे हैं।

वस्तुतः किसी विस्तृत प्रदेश की जलवायु संबंधी दशाओं में होने वाला दीर्घकालिक परिर्वतन, जलवायु परिवर्तन कहलाता है। मानवीय कार्यो द्वारा विभिन्न पदार्थो व अपशिष्टों को वायुमंडल में छोड़ने के फलस्वरूप वायुमण्डल के तापमान में निरंतर वृद्धि होती जा रही है, जिससे सम्पूर्ण जैव मण्डल की गतिविधियों पर विनाशकारी तथा हानिकारक प्रभाव पड़ता जा रहा है। इस बढ़ती वृद्धि को भूमण्डलीय ताप वृद्धि या विश्ववृत्तीय तापन कहा जाता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण

जलवायु में आए परिवर्तन दो कारणों से हो सकते है-

(1) नैसर्गिक तथा (2) मानवीय गतिवधियां

(1) नैसर्गिक कारण

  • भूस्खलन
  • ज्वालामुखी विस्फोट 
  • पृथ्वी का झुकाव 
  • समुद्री तूफान
  • बाढ
  • सूखा

(2) मानवीय गतिवधियां

  • वनोन्मूलन
  • शहरीकरण
  • औद्योगिकीकरण
  • वायुमण्डलीय प्रदूषण
  • खनन कार्यो में वृद्धि
  • कार्बन मोनो तथा डाइ-|ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि 
  • परमाणु विस्फोट 
  • जैव विविधता का ह्रास (पगद्ध जनसंख्या वृद्धि)
  • प्रौद्योगिकी विकास 
  • भू उपयोग में भारी परिवर्तन
  • हरित गृह प्रभाव गैसों में वृद्धि
  • ओजोन परत का क्षरण ग्लोबल वार्मिग में सर्वाधिक योगदान कार्बन डाइ-ऑक्साइड का है।

1880 से पूर्व वायुमण्डल में कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा 280 (पी.पी.एम) थी जो आई.पी.सी.सी. की रिपोर्ट के अनुसार आज 379 प्रति पी.पी.एम. हो गई है। कार्बनडाइ ऑक्साइड की वार्षिक वृद्धि दर विगत दशक (1995-2005) में 1.9 पी.पी.एम. वार्षिक है। इसी प्रकार औद्योगिकीकरण से पूर्व मीथेन की मात्रा 715 पी.पी.बी. (पार्ट्स पर बिलियन) थी और सन् 2005 में बढ़कर 1734 पी.पी.बी. हो गई है। मीथेन की सान्द्रता में वृद्धि के लिए कृषि व जीवाश्म ईंधन को उत्तरदायी माना जा रहा है। उपर्युक्त वर्षो में नाइट्रस ऑक्साइड की सान्द्रता भी 270 पी.पी.बी. से बढ़कर 319 पी.पी.बी. हो गई है। समुद्री तापमान में भी वृद्धि हो गई है। समुद्री जल स्तर में वृद्धि 1961 की अपेक्षा 2003 में 1.8 मिमी हुई है।

विगत शतक में अंटार्टिका के तापमान में भी दोगुना वृद्धि हुई है तथा इसके बर्फीले क्षेत्रफल में भी कमी आई है। उत्तरी अंटलांटिक से उत्पन्न चक्रवातों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। सारणी-1 एवं 2 में क्रमशः वर्ष 2004 में कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा तथा वैष्विक तापन में विभिन्न देशों के योगदान के बारे में जानकारी प्रदान की गई है।

सारणी-1: वर्ष 2004 में कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा

देश

कार्बन डाइ ऑक्साइड की मात्रा (बिलियन टन प्रति वर्ष)

प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष

अमेरिका     

5.9

23.6 टन

चीन  

4.7  

1.0 टन

रूस  

1.7  

4.7 टन

जापान      

1.3  

10 टन

भारत

1.1  

1 टन

 

सारणी-2: वैश्विक तपन (ग्लोबल वार्मिग) में विभिन्न देशों का योगदान (प्रति वर्ष)

देश

प्रतिशत

देश

प्रतिशत

संयुक्त राज्य अमेरिका

30.3

जापान

3.7

 

यूरोप

27.7

पश्चिम एशिया      

2.6

सोवियत संघ       

27.7

अफ्रीका

2.5

 

भारत, चीन और विकासशील एशिया            

12.2

आस्ट्रेलिया

1.1

दक्षिण और मध्य अमेरिका   

3.8

कनाडा

2.3

हरित गृह गैसों के स्त्रोत तथा प्रभाव को सारणी-3 में दर्शाया गया है।

 

सारणी-3 हरित गृह गैसें-स्त्रोत एवं प्रभाव

क्र. सं.      

गैस

स्त्रोत

प्रभाव

 

1

कार्बन डाइ ऑक्साइड

ऊर्जा उत्पादन के लिए ईधन का दहन

पृथ्वी के तापमान में वृद्धि

2.         

 

कार्बन मोनो ऑक्साइड

ऊर्जा उत्पादन में ईंधन का अधूरा दहन  

सांस एवं फेफड़ों की समस्या

3

सल्फर डाइ ऑक्साइड

गंधयुक्त ईंधन का दहन

अम्लीय वर्षा

4

नाइट्रोजन ऑक्साइड

भट्टियों में ईंधन का जलना

तापमान में वृद्धि और श्वास रोग

5

ओजोन

हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन के ऑक्साइड

तापमान में वृद्धि और फेफड़ों में क्षति

6

मीथेन

प्राकृतिक गैस एवं अवशिष्ट पदार्थ

पृथ्वी के तापमान में वृद्धि

7

क्लोरोफ्लोरो कार्बन

औद्योगिक उत्सर्जन

ओजोन क्षरण, तापमान में वृद्धि

8

अन्य हाइड्रोकार्बन

औद्योगिक क्रियाओं के दौरान

तापमान में वृद्धि, आंखों में जलन

जलवायु परिवर्तन के मंडराते खतरे

वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार वर्ष 2020 तक संपूर्ण विश्व का तापमान विगत 1,000 वर्षों की तुलना में सर्वाधिक होगा। वैश्विक जलवायु परिवर्तन के अनेक परिणाम होंगे जिनमें अधिकतर हानिकारक होंगे। इस विषयक जानकारी निम्नांकित है।

  • वैश्विक जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप विश्व के मानसूनी क्षेत्रों में वर्षा में वृद्धि होगी। जिससे बाढ़, भूस्खलन, भूमि अपरदन जैसी समस्याएं उत्पन्न होंगी। जल की गुणवत्ता में गिरावट आएगी। स्वच्छ जल की आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव पड़ेंगे।
  • जहां तक हमारे देश भारत का प्रश्न है, मध्य तथा उत्तरी भारत में कम वर्षा होगी, जबकि इसके विपरीत देश के पूर्वोतर तथा दक्षिण-पश्चिमी राज्यों में अधिक वर्षा होगी। फलतः वर्षा जल की कमी से मध्य तथा उत्तरी भारत मे सूखे जैसी स्थिति होगी। जबकि पूर्वोत्तर तथा दक्षिण पश्चिमी राज्यों मे अधिक वर्षा के कारण बाढ़ जैसी समस्या होगी।
  • सूखे एवं बाढ़ की स्थिति के कारण कृषि उत्पादन प्रतिकूल रूप से प्रभावित होगा।
  • स्वच्छ एवं पीने योग्य जल की कमी होगी, जल प्रदूषित होगा तथा जल निकास की व्यवस्था को हानि पहुंचेगी।
  • उच्च अक्षांश वाले देशों तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के जल स्त्रोतों में जल की अधिकता होगी, जबकि मध्य एशिया के जल स्त्रोतों में जल की कमी होगी।
  • जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप ध्रुवीय बर्फ पिघलने के कारण समुद्री जल स्तर बढ़ेगा तथा तटीय क्षेत्रों के समीप रहने वाली आबादी को खतरा उत्पन्न होगा।
  • देश के उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, गोवा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात तथा पश्चिम बंगाल राज्य जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान से प्रभावित होंगे।
  • समुद्री शैवालों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा तथा प्रवाल भित्तियां आगामी पचास वर्षो में लुप्त होने की आंशका है।
  • भारत में जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप गन्ना, मक्का, ज्वार, बाजरा, रागी जैसी फसलों की उत्पादन दर में वृद्धि होगी, जबकि इसके विपरीत मुख्य फसलों, जैसे- गेहूं, धान तथा जौ की उपज में गिरावट होने की आशा है।
  • जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप जैव-विविधता का ह्रास होगा।
  • वैश्विक जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा। विश्वस्वास्थ्य संगठन के प्रतिवेदन के अनुसार जलवायु में उष्णता के कारण श्वास एवं हृदय संबंधी बीमारियों में वृद्धि होगी। विश्व के विकासशील देशों में दस्त, पेचिश, हैजा, क्षयरोग, पीतज्वर, मियादी बुखार जैसे रोगों में वृद्धि होगी। दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों जैसे-मलेरिया, डेंगू, जापानी बुखार के प्रकोप में बढ़ोत्तरी होगी। इसके अतिरिक्त फाइलेरिया तथा चिकनगुनिया का प्रकोप भी बढ़ेगा।
  • जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप न केवल रोगाणुओं में बढोत्तरी होगी वरन् इनकी नयी प्रजातियों की भी उत्पत्ति होगी जिससे वातावरण प्रदूषित होगा साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
  • नाशीजीवों तथा रोगाणुओं की जनसंख्या में वृद्वि तथा इनकी नई प्रजातियों की उत्पत्ति का प्रभाव दुधारू पशुओं पर भी पडे़गा जिससे दुग्ध उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
  • जलवायु परिवर्तन से जलीय जंतु भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगे। शीतल जल की मछलियों का आवास नष्ट हो जाएगा तथा कई मत्स्य प्रजातियां लुप्त हो जाएगी।
  • वैश्विक जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप समुद्री तूफानों की तीव्रता और बारंबारता में वृद्धि होगी।
  • जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक दुष्प्रभाव सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों पर पड़ेगा। आर्थिक क्षेत्र का भौतिक मूल ढांचा जलवायु परिवर्तन द्वारा सबसे अधिक प्रभावित होगा। बाढ़, सूखा, भूस्खलन तथा समुद्री जलस्तर में वृद्धि के कारण बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन होगा जिससे सुरक्षित स्थानों पर भीड-भाड़ की स्थिति उत्पन्न होगी।

जलवायु परिवर्तन का जल संसाधन पर प्रभाव वैश्विक जलवायु के विश्लेषण में ऐसा अनुमान है कि एशिया क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण अपवाह तथा उसका सामयिक वितरण प्रभावित होगा जिससे जल संसाधनों पर बहुत दबाव बढ़ने का अनुमान है। यह प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप, जहां अधिकतम आबादी है, पर अत्यधिक गंभीर होने की संभावना है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भारत जैसे विकासशील देश पर जिसकी अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है, पर गंभीर रूप से महसूस किया जा सकता है। भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण देश भर में दो मानसून प्रणाली यानि दक्षिण-पश्चिम मानसून तथा पूर्वोत्तर मानसून से प्रभावित होती है। भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह पीने तथा सिंचाई के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धता कराता है। जलवायु परिवर्तन का भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र में दक्षिण-पश्चिम मानसून पर, कृषि उत्पादन, जल संसाधनों तथा देश की अर्थव्यवस्था पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की संभावना है। लेकिन वैश्विक जलविज्ञानीय प्रक्रियाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के सम्बन्ध में कई अनिश्चितताएं भी है।

जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन के निम्नांकित प्रभाव होंगे 

(i) पानी की मात्रा में परिवर्तन

भारत में जल संसाधनों पर मौजूदा दबाव के मुख्य कारण प्राय: बढ़ती जनसंख्या, पानी के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा, निम्न गुणवत्ता, पर्यावरण के दावे और भूजल है। जलवायु परिवर्तन से जल संसाधन पर यह दबाव आगे और भी असंतुलित और विकट हो जाएगा। इस दबाव के परिणामस्वरूप कम वर्षा और तापमान में वृद्धि के अलावा पानी की उपलब्धता, घरेलू, कृषि और उद्योग के क्षेत्रों को प्रभावित करेगी। केवल एक उदारवादी जलवायु परिवर्तन के आधार पर अनुमानित है कि 2025 तक दुनिया के महत्त्वपूर्ण देशों में पानी की कमी लगभग 34% (1995) से 63% हो सकती है। उदाहरण के लिए अफ्रीका के बड़े जलागम जैसे नाइजर, चाडझील और सेनेमल में कुल उपलब्ध पानी में पहले ही 40.60% की कमी है। अध्ययन से पाया गया है कि लूनी, कच्छ, सौराष्ट्र, 60 प्रतिशत भाग में पानी की अत्यधिक कमी होगी। माही, पेन्नर, साबरमती, व तापी में भी पानी कमी देखी जाएगी। कावेरी, गंगा, नर्मदा व कृष्णा बेसिन में मौसमी व नियमित पानी की समस्या रहेगी। वही गोदावरी, ब्राह्मी व महानदी में बाढ बढ़ने की संभावना है।

(ii) पानी की गुणवत्ता में परिवर्तन

वर्षा के बदले प्रतिरूप से संभवतः पानी की गुणवत्ता में परिवर्तन होने की चितांए है। उच्च तापमान से जिन स्थानों पर, जहां ऊंची जल सतह है वहां जल की लवणता बढ़ने की संभावनाएं है। इसके अन्य कारण गहन सिंचाई एवं तापमान से वर्धित वाष्पीकरण भी है। इसके अलावा बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से मृदा से निक्षालित अपशिष्ट भूजल में मिलने से भूजल प्रभावित होगा। समुद्र का स्तर बढ़ने की वजह से तटीय क्षेत्रों में भूगर्भ जल लवणीय होने से स्वच्छ जल की मात्रा और गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ेगा और वहां रहने वाली आबादी को प्रभावित करेगा।

(iii) पानी की उपलब्धता में परिवर्तन

जलचक्र आधिक्यता के परिणास्वरूप जल की मात्रा में कमी एवं दूषित होने से उपलब्ध जल के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। कृषि एवं आंतरिक क्षेत्रों में जल की मांग विशेषकर गर्मी और सूखे के समय में अधिक महत्त्वपूर्ण रहेगी। भारत एक कृषि प्रदान देश है। तथा अधिकतर जल कृषि के लिए उपयोग में लाया जाता है। बढ़ता हुआ तापमान, कम वर्षा और बढ़ती हुई आबादी ने सिंचाई की आवश्यकताओं को बढ़ा दिया है। वर्षा की अनिश्चयता एवं जल स्रोतों के अधिक दोहन से जल स्रोतों पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे ।

(iv) जलवायु परिवर्तन के प्रभाव क्षेत्र

खाद्य सुरक्षा एवं औद्योगिक गतिविधियों में जल उपयोग तथा विकास एवं मानव जीवन निर्वाह में जल की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। जल की उपलब्धता और उसका उपयोग विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग एवं स्वास्थ्य आदि में प्रतिस्पर्धा का कारण बन सकता है। एक अनुमान के अनुसार एक अरब से अधिक लोगों को सुरक्षित पानी उपलब्ध है। जबकि दो अरब से अधिक लोगों को जल का अभाव है। जल की मात्रा, गुणवत्ता और अभिगम्यता में परिवर्तन के प्रभाव से कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य गतिविधियों के कारण मानव आबादी पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

जलवायु परिवर्तन /वैश्विक तपन को रोकने के उपाय

जलवायु परिवर्तन अर्थात् पृथ्वी तल पर बढ़ते तापमान को रोकने के लिए समय रहते स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास करने की महती आवश्यकता है। स्थान, क्षेत्र व समय के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रणनीतियां भी बनाई जा सकती है।

जलवायु परिवर्तन संबंधी नीतिगत उपायों के तीन आयाम हैं-जलवायु प्रणाली का गहन अनुसंधान तथा अवलोकन और विकास पर उसका प्रभाव, जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारकों में मानवीय योगदान को कम कर जलवायु परिवर्तन का खतरा कम करना तथा परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने की कार्यवाही करना।

इस समस्या के निदान हेतु निम्नांकित उपायों पर अमल करना होगा ।

  •  प्रदूषण मुक्त प्रौद्योगिकी का विकास,
  • प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग व दोहन पर नियंत्रण,
  • जैव विधिता का विकास,
  • गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का विकास
  • जनसंख्या पर नियंत्रण
  • बड़े बांधों के निर्माण पर रोक
  • प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर प्रतिबंध
  • बंजर भूमि व वनोन्मूलित भूमि पर सघन वृक्षारोपण
  • जैव रसायनों के उपयेाग में वृद्धि व प्रोत्साहन
  • जीवाश्म ईंधनों के उपयेाग पर रोक,
  • ओजोन क्षरणकारी रसायनों के उत्पादन को कम करना,
  • कठोर कानून का प्रावधान व क्रियान्वयन
  • सुरथैतिक विकास की संकल्पना
  •  पर्यावरण व पारितंत्र के संरक्षण के प्रति जन चेतना जागृत करना।

अतः जलवायु परिवर्तन न केवल हमारे पर्यावरण वरन् वृद्धि व विकास के लिए भी एक खतरा है। वर्तमान मूल्याकंन से यही पता चलता है कि इससे उत्पन्न होने वाले खतरे को कम करने के खर्च की तुलना में जलवायु परिवर्तन से मानव कल्याण को होने वाले नुकसान अधिक है। हमें अपनी विकास नीति बनाते समय कार्बन के प्रभाव के प्रति सजग एवं इससे प्रभावित दुनिया को भी ध्यान में रखना होगा। राष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन की वास्तविक चुनौती यही है कि हम जलवायु से संबंधित खतरों को विकास संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों में सम्मिलित करें। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस विषयक जन जागरूकता लाना भी अनिवार्य होगा ।

जलवायु परिवर्तन के जल संसाधन पर पड़ने वाले प्रभाव कृषि, स्वास्थ्य एवं जैव विविधता पर प्रभाव डालते है। अतः क्षेत्रीय या बेसिन पैमाने पर जल संसाधनों पर प्रभाव को रोकने या कम करने के लिए समुचित कार्य करने चाहिए। वस्तुतः यह समष्टि का कार्य है, इसमें सभी का सहयोग अपेक्षित है।

References

  • Dr. Narottam Gaan “Climate change and international politics”, Kalpaz Publications, 2007.
  • World Bank Data, available on http://data.world bank/org./indicator/sp.RuR. ToTL.Zs/Countries/IW – 8 S ? display.
  • Jalvayu Parivartan aur Samaj. MoES publication, 2010.
  • Author articles published in various scientific magazines 2012, 2015, 2016.
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