जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां

Submitted by admin on Thu, 07/09/2009 - 07:19
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- प्रवीण कुमार
ग्लोबल वार्मिंग एक समस्या बनती जा रही हैं इसकी जड़ में है जीवाष्म ईंधन का अंधाधुंध इस्तेमाल, जिससे हमारा वातावरण लगातार गर्म होता जा रहा है। इसके असर से अमीर-गरीब कोई भी देश नहीं बच पाया है। इसलिए ज़रुरत अभी से संभलने की है, क्योंकि कहीं देर न हो जाए।

मालदीव व बांग्लादेश जैसे देशों में बाढ़, चीन व ऑस्ट्रेलिया में जलसंकट, ध्रुवीय भालू प्राणियों के अस्तित्व पर सवालिया निशान, मच्छरों से होने वाली बीमारियों का बढ़ता प्रकोप आदि कुछ ऐसी काल्पनिक तस्वीरें हैं जो भविष्य में कड़वी सच्चाई भी बन सकती है। अगर हम नही चेते और जीवाश्म इंर्धन का मौजूदा गति से इस्तेमाल करना जारी रहा, तो हमें इस स्थिति का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

यह सर्वविदित तथ्य है कि तेल व कोयला जैसे जीवाश्म इंर्धनों से वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड में बढ़ोतरी होती है। अगर धरती पर गर्मी बढ़ी, तो बर्फ पिघलेगी और जाहिर है कि समुद्र के जल स्तर में इजाफा होगा। नतीजा निचले क्षेत्रों में जलप्लावन।

जाधवपुर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार वर्ष २०२० तक पश्चिम बंगाल के संुदरवन इलाके का १५ फीसदी क्षेत्र समुद्री पानी की भंेट चढ़ चुका होगा। स्थिति तब और बदतर हो जाएगी जब ग्रीनलैण्ड व अंटार्क्टिका में बर्फ पिघलना शुरु होगी। वहीं दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया व चीन जैसे कई देशों के करोड़ों लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाएंगे।

संयुक्त राष्ट्र संघ प्रयोजित जलवायु परिवर्तन पर अंतर-शासकीय समिति (आईपीसीसी) द्वारा गत २ फरवरी को पेरिस में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष २१०० तक वातावरण के तापमान में १.८ से ४ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हो जाएगी। रिपोर्ट का दावा है कि इसके ९० फीसदी निष्कर्ष सत्यता की कसौटी पर खरे उतरेंगे। इस रिपोर्ट को ११३ देशों के ३.७५० पर्यावरण विशेषज्ञों ने तैयार किया है। इस रिपोर्ट को तैयार करने से पहले उन्होंने २००१ में जारी पिछली रिपोर्ट के सभी उपलब्ध नतीजों का भी गहराई से अध्ययन किया। आईपीसीसी रिपोर्ट हर पांच साल में जारी की जाती है।

इस बार की रिपोर्ट चरणों में जारी की जा रही है। हाल ही में रिपोर्ट का जो मजमून जारी किया गया है, उसमें जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक आधारों के बारे में चर्चा की गई है। इसका दूसरा भाग इसी साल अप्रैल में जारी किया जाएगा। उसमें इस बात पर ज़ोर दिया जाएगा कि जलवायु परिवर्तन का मनुष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मई २००७ में जारी होने वाले तीसरे भाग में बताया जाएगा कि हम इन प्रभावों को कम करने के लिए क्या कर सकते हैं।

कोयला, पेट्रोलियम पदार्थ और प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल करके हम रोज़ाना अपने वातावरण में दो करोड़ टन कार्बन डाईऑक्साइड गैस उड़ेलते हैं। अगर प्रति व्यक्ति की बात करें, तो हर व्यक्ति औसतन साल भर में एक टन कार्बन या चार टन कार्बन डाईऑक्साइड वातावरण में छोड़ना है। इस प्रकार हम साल भर में सात गीगाटन ग्रीनहाउस गैसें अपने वातावरण में डाल देते हैं(एक गीगाटन = सौ करोड़ टन)। वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा में जितनी बढ़ोतरी होगी, ग्रीनहाउस प्रभाव भी बढ़ता जाएगा। नतीजा यही होगा कि वातावरण भी दिन-प्रतिदिन गर्म होता जाएगा।

कार्बन डाईऑक्साइड, जो वातावरण के दस लाख हिस्सों में ३५० भाग होती है, उसे मानव जनित ग्रीनहाउस प्रभाव के लिए आधा ज़िम्मेदार माना जाता है। ग्रीनहाउस प्रभाव के लिए ज़िम्मेदार एक अन्य गैस है मीथेन । मीथेन सामान्य तौर पर धान के खेतों और मवेशियों के गोबर से उत्सर्जित होती है। इसी सूची में दो अन्य गैसें हैं सीएफसी-११ व सीएफसी-१ जो रेफ्रिजरेटर्स में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जाती है। हालांकि मांट्रियल संधि की बदौलत अब सीएफसी गैस के उत्सर्जन पर थोड़ा विराम लगा है। ये सभी ग्रीनहाउस गैसें उस ओजोन परत को नष्ट करने में भी खलनायक की भूमिका निभा रही हैं, जो हमें सूर्य से निकलने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है।

ऐसा भी नहीं है कि ग्रीनहाउस गैसें बुरी ही हैं। अगर ये न होतीं तो धरती इतनी ठंडी रहती कि यहां रहना ही नामुमकिन हो जाता। जंगल और महासागर कार्बन डाईऑक्साइड को सोखने वाले प्राकृतिक उपादान माने जाते हैं। हाल ही में ग्रीनलैण्ड से प्राप्त बर्फ के टुकड़ों और वृक्षों के वलय इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कार्बन डाईऑक्साइड को सोखने वाले इन प्राकृतिक उपादनों ने वातावरण में इस गैस के स्तर को २५० पीपीएम (पाट्र्स पर मिलियन) तक बनाए रखा। यह सिलसिला औद्योगिक क्रांति से पहले लगातार एक हजार साल तक जारी रहा। फिर धीरे-धीरे बदलाव आता गया। सन् १९५५ तक कार्बन डाईऑक्साइड का स्तर ३२० पीपीएम तक पहुंच गया था। ताज़ा शोध तो और भी भयावह स्थिति पेश करता है। यह शोध कहता है कि अब जंगलों और महासागरों ने भी कार्बन डाईऑक्साइड उगलना शुरु कर दिया है; यानी खतरे की घंटी बज चुकी हैं।

जैसे-जैसे धरती का वातावरण गरम हो रहा हैं, समुद्रों के पानी के वाष्प बनने की प्रक्रिया भी तेज़ होती जा रही है। यह नीम पर करेला साबित हो रहा है, क्योंकि जलवाष्प भी ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करती है।

शोध बताते हैं कि वातावरण में गर्मी का प्रकोप भूमध्य रेखा की बजाय ११ अक्षांश पर ज्यादा रहेगा। उत्तरी गोलार्द्ध, जहां जमीन का हिस्सा सर्वाधिक है, अधिक तेज़ी से तपेगा। दक्षिणी गोलार्द्ध, जिसका अधिकांश भाग समुद्र से बना है, अपेक्षाकृत कम गरम होगा। लेकिन यहां यह समझना होगा कि सामान्य तापमान में केवल कुछ डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी का मतलब होगा व्यापक पैमाने पर पर्यावरणीय बदलाव। जाहिर सी बात हैं, ये बदलाव अनुकूल तो कतई नहीं रहेंगे। इन बदलावों के तहत दस हजार साल से हिम युग के अवशेषों का प्रतिनिधित्व करने वाली बर्फ तेज़ी से पिघलने लगेगी। इससे समुद्र सतह का स्तर छह मीटर तक बढ़ सकता है। इक्कीसवीं सदी के अंत तक समुद्र सतह के स्तर में एक मीटर तक की वृद्धि होने की आशंका जताई जा रही है। आंकड़े बताते हैं कि पिछली एक सदी में समुद्र जल की सतह १० से १५ सेंटीमीटर तक ऊपर उठ चुकी हैं।

तटीय बंगाल के संुदरवन इलाके में, जहां समुद्र सतह के स्तर में हर साल ३.१४ मिलीमीटर की बढ़ोतरी हो रही हैं, ग्लोबल वार्मिंग एक हकीकत बन चुकी है। जाधवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल आफ ओशिएनोग्राफिक स्टडीज़ की निदेशक सुजाता हाजरा बताती हैं कि इस क्षेत्र में समुद्री जल स्तर में बढ़ोतरी नई बात नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि समुद्र सतह में बढ़ोतरी का सिलसिला ७० सालों से चलता रहा है। इस अवधि में यह दर औसतन २.८८ मिलीमीटर सालाना रही है।

पिछले साल ब्रिटेन ने स्टर्न रिव्यू जारी की थी। इसमें आगाह किया गया था कि अगर हम जल्द ही नहीं चेते तो सदी के मध्य तक भारी बाढ़ और सूखे से २० करोड़ लोग अपने-अपने स्थानों से बेदखल हो जाएंगे। गौरतलब है कि दुनिया की आधी आबादी तटीय इलाकों से २५ किलोमीटर की दूरी के भीतर रहती है। कई शहर भी समुद्र किनारे ही आबाद हुए हैं। इंडोनेशिया के पर्यावरण मंत्री ने आशंका जताई है कि वातावरण में परिवर्तन से अगले तीन दशक के दौरान देश के १८ हजार द्वीपों में से करीब दो हजार द्वीप समुद्र में समा जाएंगे। ब्रिटेन और नीदरलैण्ड जैसे देशों ने तो निचले इलाकों में ऐसे मकान बनाने की योजना बनाई है जो पानी में भी बचे रहेंगे।

बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में गर्मियों में गंगोत्री में गंगोत्री ग्लैशियर हर साल १८ मीटर छोटा होता गया है। यह वही ग्लैशियर है जिससे पवित्र गंगा नदी निकलती है। विश्व का ७५ फीसदी मीठा जल पर्वतीय ग्लैशियरों में जमा है। इन ग्लैशियरों के पिघलने से नदियों में पानी की आपूर्ति भी धीरे-धीरे कम होती जाएगी। ऐसी स्थिति भी आ सकती है जब टैंकर तेल की जगह पानी की ढुलाई करेंगे।

वैसे धरती के गरम और ठंडा होने का सिलसिला लगातार चलता रहा है। क्रिटेशियस काल काफी गरम था। यह वही समय था जब पृथ्वी पर डायनासौर विचरण करते थे। दस हजार साल पहले हिमयुग भी था। वैज्ञानिकों का कहना है कि ७६ करोड़ से ५५ करोड़ साल की अवधि के दौरान पृथ्वी पर ठंडे और गरम का सिलसिला काफी तेज़ी से चला। तो इसका अर्थ क्या लगाया जाए ? जेम्स लवलाक द्वारा परिकल्पित गेइया सिद्धांत के अनुसार जलवायु प्रणाली अपना संतुलन खुद ही बनाती रहती है।

यूनान में पृथ्वी के जिस रुप को देवी माना गया है, उसी का नाम गेइया है। तमाम परिवर्तनों पर इस देवी का नियंत्रण होने के बावजूद वह इस मामले में काफी उदार भी है। लेकिन अगर उसकी उदारता का फायदा उठाते हुए हम परिवर्तन की गति को अंधाधुंध बढ़ाते रहे, तो यह हमारी आधुनिक सभ्यता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

दुर्भाग्य से ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा उत्तर बनाम दक्षिण के विवाद में भी फंस गया है। ग्रीनहाउस गैसों पर नियंत्रण के लिए वर्ष १९९७ में १४१ देशों ने क्योटो में एक संधि पर दस्तखत किए थे। क्योटो संधि से अमेरिका वर्ष २००१ में यह कहकर अलग हो गया कि यह संधि अविश्वसनीय वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है और इसका पालन उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रहा है। गौरतलब है कि एक चौथाई ग्रीनहाउस गैसों के लिए अमेरिका ही ज़िम्मेदार है। उसका तर्क था कि इसमें चीन, भारत व ब्राज़ील जैसे बड़े विकासशील देशों को भी भागीदार बनाया जाए, क्येांकि दुनिया की एक तिहाई आबादी इन देशों में रहती हैं।

अमेरिका का कहना था कि विकासशील देशों में आबादी में बढ़ोतरी का मतलब है ऊर्जा की खपत में भी वृद्धि। भारत आगामी कुछ सालों में चीन को पछाड़कर आबादी के मामले में दुनिया में नंबर वन राष्ट्र बन जाएगा। लेकिन इसके बावजूद तथ्य यह है कि यहां ज़हरीली गैसों का उत्सर्जन इतना नहीं होता, जितना अमेरिका में हो रहा है। अमेरिका में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत भारत या चीन के मुकाबले १० से १५ गुना अधिक है । जितनी अधिक ऊर्जा की खपत, ज़हरीली गैसों का उत्सर्जन भी उतना अधिक। अब यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए दुनिया के सामने कोई मिसाल रखना चाहता है अथवा नहीं।

ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रण में करने के लिए इन दिनों एक नया तरीका भी ईजाद किया गया है : कार्बन क्रेडिट। कंपनियों व कारखानों को प्रदूषण फैलाने से रोकने के लिए आजकल इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। क्योटो संधि विकसित देशों की उन कंपनियों को विकासशील देशों की परियोजनाओं में निवेश की अनुमति देता है जो उत्पादन के दौरान न्यूनतम प्रदूषण फैलाती हैं। विकासशील देशों में वैसे भी प्रदूषण रहित उत्पादन प्रक्रिया अपेक्षाकृत सस्ती है। चीन वर्ष २००९ तक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन के मामले में अमेरिका से आगे निकल जाएगा। प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए चीन ने अपनी छोटी विद्युत परियोजनाओं को बंद करने की योजना बनाई है। साथ ही, वह बिजली परियोजनाओं से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड को भूमिगत कंटेनरों में जमा करने की योजना पर भी काम कर रहा है। विश्व की सबसे बड़ी इस्पात कंपनी आर्सेलर मित्तल भी चीन में देश का पहना कार्बन क्रेडिट एक्सचेंज स्थापित करने में मदद कर रही है।

वर्जिन ग्रुप के प्रमुख रिचर्ड ब्रैनसम ने हाल ही में उस व्यक्ति को ढाई करोड़ डॉलर का पुरस्कार देने की घोषणा की है जो ग्रीनहाउस गैसों के एक बड़े उपाय सुझा सके। कहना न होगा कि ग्लोबल वार्मिंग अब केवल बौद्धिक विलास का विषय नहीं रह गया है। यह एक हकीकत है, कड़वी हकीकत। सवाल यह है कि हम इस हकीकत से दूर भागते हैं या इसका सामना करते हैं।

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