जलविद्युत परियोजनाओं को जरूरी मानते हैं सियासतदां

Submitted by Hindi on Mon, 04/30/2012 - 13:46
Source
नेशनल दुनिया, 29 अप्रैल 2012

प्रतिमत


सरकार प्रदेश को ऊर्जा प्रदेश बनाए जाने का दावा कर रही है लेकिन विडम्बना है कि गंगा व तमाम सहायक नदियों का यह प्रदेश बिजली की कुल 31 मीलियन यूनिट मांग के विरुद्ध तमाम जुगाड़ के बावजूद 22 मिलियन यूनिट बिजली ही राज्यवासियों को उपलब्ध करा पा रहा है। उसमें से भी काफी बिजली महंगे दाम पर खरीदकर उपभोक्ताओं को सस्ते में उपलब्ध कराकर राज्य के निगम करोड़ों का घाटा उठाने को मजबूर है।

उत्तराखंड की सरकार जलविद्युत परियोजनाओं को बंद करने के खिलाफ कमर कसती नजर आ रही है। शुक्रवार को भी ऋषिकेश में मुख्यमंत्री ने वैज्ञानिक ढंग से गंगा के पानी का विदोहन करते हुए गंगा की अविरलता बनाए रखने की बात कही। उनका कहना था कि यदि परियोजनाएं नहीं बनीं तो उत्तराखंड में अंधकार छा जाएगा। जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध को लेकर राज्य में राजनैतिक दल भी उठ खड़े हुए हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस तो इसके विरोध में है ही भाजपा भी इसको कर संजीदा है। भाजपा की फायर ब्रांड नेता उमा भारती भी ऋषिकेश में गंगा की अविरलता बनाए रखकर इसमें बिजली परियोजनाओं को भी बनाए जाने की बात कहती नजर आईं। पर्यावरण और आस्था के नाम पर छेड़ा गया विवाद अब गंगा को सुर्खियों में ले आया है। राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तो सभी मंचों से इस क्षेत्र की नदियों पर बनाई जा सकने वाली परियोजनाओं की पैरवी करते नजर आ रहे हैं।

केंद्रीय मंत्रियों की बैठक हो या फिर गंगा बेसिन अथॉरिटी कै बैठक, उन्होंने सभी जगह इन परियोजनाओं को आवश्यक बताकर आस्था, पर्यावरण एवं वैज्ञानिक तथ्यों के बीच एक साम्य बनाने की बात कही है। गंगा पर चल रही परियोजनाओं को बंद करने से राज्य के विकास में बाधा आने की बात अब हर कोई कर रहा है। सरकारी अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि गंगा के प्रवाह पर जल विद्युत परियोजनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उनका दावा है कि इससे गंगा के प्रदूषण का भी खतरा नहीं है। राज्य में 27 हजार मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं बनाई जा सकती हैं। लेकिन अब तक मात्र 3600 मेगावाट विद्युत उत्पादन की परियोजनाएं राज्य में बनी हैं। पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए कम से कम छह सौ परियोजनाओं को बनाया जा सकता है।

लेकिन इसके विपरीत गंगा की आस्था की आड़ में यहां बन रही तमाम परियोजनाओं का विरोध शुरू हो गया है। इससे नाराज मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों तो यहां तक कह दिया कि इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे लोग बाहरी हैं। वे यहां की हकीकत नहीं जानते। विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि प्रदेश में आर्थिक विकास के लिए जल विद्युत परियोजनाओं की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व में लगभग 44 हजार बांध हैं। इनमें से 19 हजार बांध अकेले पड़ोसी देश चीन में बने हैं। इनमें से बीस फीसदी वहां के पहाड़ी क्षेत्र में ही बने हैं। अमेरिका के पहाड़ी क्षेत्र में भी कोई बांध हैं।

इस देश में 5500 बांध है। विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ों के लिए बांध खतरा न होकर विकास के आधार है। बशर्ते कि यह सभी चीजों के साम्य के साथ बने। परियोजनाओं का विरोध कर रहे साधु सन्यासी परियोजनाओं को गंगा की अविरलता के प्रतिकूल बता रहे हैं। उनका कहना है कि आस्था से विकास के नाम पर खिलवाड़ की छूट नहीं दी जा सकती। यह हालत तब है गंगा के प्रमुख तीर्थ माने जाने वाले हरिद्वार में बिना किसी परियोजना के 150 लाख लीटर सीवर की गंदगी रोज बहाई जाती है। सीवर की यह गंदगी हरकी पैड़ी से ज्वालापुर और कनखल में भी बह रही है। इसके अलावा तीर्थ नगरी में गंगा लोगों को ढोने का भी जरिया बनाई जा रही है। जल संस्थान की ओर से हरिद्वार में जो ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं। उनकी क्षमता 45 एमएलडी गंदे पानी के ट्रीटमेंट की है। जबकि इसके खिलाफ इस तीर्थ नगरी में 55 से 60 एमएलडी सीवेज बिना ट्रीटमेंट के ही गंगा में छोड़ा जा रहा है।

एक तरफ गंगा की अविरलता उसका प्रदूषण, पर्यावरण एवं उसकी आस्था का प्रश्न है तो दूसरी तरफ गंगा नदी का उद्गम माना जाने वाला उत्तराखंड विद्युत संकट से दो चार है। गर्मी बढ़ते ही मांग के अनुरूप बिजली न मिलने से सभी गांव, कस्बे और शहर रेसिंग की चपेट में हैं। सरकार प्रदेश को ऊर्जा प्रदेश बनाए जाने का दावा कर रही है लेकिन विडम्बना है कि गंगा व तमाम सहायक नदियों का यह प्रदेश बिजली की कुल 31 मीलियन यूनिट मांग के विरुद्ध तमाम जुगाड़ के बावजूद 22 मिलियन यूनिट बिजली ही राज्यवासियों को उपलब्ध करा पा रहा है।

उसमें से भी काफी बिजली महंगे दाम पर खरीदकर उपभोक्ताओं को सस्ते में उपलब्ध कराकर राज्य के निगम करोड़ों का घाटा उठाने को मजबूर है। ऐसे में राज्यवासी यह सवाल भी करते नहीं थकते कि क्या यहां की नदियां वर्षांत एवं अन्य प्रतिकूल मौसम में यहां तबाही मचाने के लिए ही छोड़ी जाएं इनसे विकास में योगदान का कोई काम आस्था के नाम पर छोड़ दिया जाए या फिर सभी बातों का साम्य बनाकर वैज्ञानिक ढंग से इसकी संभावनाओं का विकास में विदोहन किया जाए।

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