ज़मीन में ही छिपा है दिल्ली के जल संकट का समाधान

Submitted by Hindi on Tue, 05/07/2013 - 12:46
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जनसत्ता, 07 मई 2013
दिल्ली को अन्य राज्यों की तरह यमुना के पानी में से हिस्सा दिल्ली विधानसभा बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के प्रयास से मिला। दिल्ली को 808 क्यूसेक पानी दिया जाना तय किया गया। लेकिन यह पानी आज तक नहीं मिला। दिल्ली जल बोर्ड ने 2021 का पानी का जो मास्टर प्लान बनाया है, उसके हिसाब से दिल्ली को तब 1840 एमजीडी पानी की जरूरत होगी। उस समय अभी के स्रोतों के अलावा हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध से 275 एमजीडी पानी मिलने की उम्मीद है। यानि उस भरोसे दिल्ली को पानी नहीं मिल पाएगा। पानी की समस्या लगातार भयावह होती जा रही है। इसमें सुधार की उम्मीद नहीं दिखती है।केवल पानी के लीकेज को कम कर और पानी का बँटवारा कर दिल्ली में पानी के संकट का स्थायी समाधान संभव नहीं है। इसके लिए हर साल भूमिगत जल में हो रही करीब एक मीटर की गिरावट को रोकना जरूरी है। हालत यह है कि दक्षिणी पश्चिमी दिल्ली के कुछ इलाकों में पानी का स्तर 20-30 मीटर तक नीचे चला गया है। शीला दीक्षित सरकार के पहले कार्यकाल में तब के ग्रामीण विकास मंत्री डॉक्टर योगानंद शास्त्री ने दिल्ली देहात में परंपरागत पानी के स्रोतों को पुनर्जीवित कर और बरसाती पानी के संग्रह का अभियान चलाया था। पेड़ लगाने और शहरी इलाकों में बरसाती पानी के संग्रह को अनिवार्य बनाया गया था। इसका फायदा भी हुआ। बढ़ती आबादी और शहरीकरण ने अन्य जरूरी चीजों से ज्यादा पानी के संकट को बढ़ाया है। आज हालत यह है कि दिल्ली में पानी के वैध कनेक्शन वाले घरों में प्रतिदिन पूरे प्रवाह से दो घंटे तक साफ पानी पहुंचाना संभव नहीं हो पा रहा है। गर्मी में बिजली और पानी की मांग बढ़ जाती है। अगर विधानसभा चुनाव से पहले बरसात का मौसम न आता तो बिजली पानी के मुद्दे आगे सभी मुद्दे बेकार साबित होते। बिजली तो किसी भी दर पर कहीं से भी खरीदी जा सकती है। लेकिन पानी नहीं। इसकी हर इलाके में कमी है। गर्मी बढ़ने के साथ-साथ पानी के लिए मारामारी बढ़ती जा रही है।

दिल्ली में शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में सिंचाई के लिए पश्चिमी यमुना नहर बनवाई थी। उस नहर से दो उप नहरें निकलती थीं। उनसे उत्तर-पश्चिम दिल्ली में अलीपुर और कंझावला विकास खंड के सवा सौ गाँवों में सिंचाई होती थी। लेकिन राजधानी में शहरीकरण होने से सिंचाई का रकबा घटता चला गया। अब अलीपुर और कंझावला में 10-12 गाँवों में ही खेती होती है। दिल्ली 1911 में देश की राजधानी बनी। उस समय दिल्ली में 365 गांव थे। ढ़ाकाधीरपुर गांव में जार्ज पंचम का दरबार लगा था। वहीं राजधानी बनने की घोषणा हुई थी। पुराना सचिवालय 1912 में बनना शुरू हुआ। सरकारी कर्मचारियों के लिए तिमारपुर गांव की ज़मीन पर तिमारपुर कालोनी बनी। 1947 में बँटवारे के बाद से ही शाहजानांबाद (दिल्ली का पुराना नाम जो चहारदीवारी से घिरा हुआ था) ने देहात को निगलना शुरू किया। अब तो गिनती के गांव ही बचे हैं। साल 1993 में हुए आखिरी पंचायत चुनाव में 199 पंचायतें सरकारी रिकार्ड में दर्ज थीं। वास्तव में देहाती इलाक़ा अब नाम का ही बचा है। पानी के संकट का यही मूल कारण माना जाता है।

आज से बीस साल पहले तक दिल्ली में छह हजार निजी और सरकारी ट्यूबवेल थे। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से मार्च 2012 में 65 री-बोरिंग ट्यूबवेल सहित जल बोर्ड के 2636 ट्यूबवेल और 21 बरसाती कुएं थे। नजफगढ़, महरौली इलाकों में रहट (कुओं से ऊटों और बैल आदि से पानी खींचने की व्यवस्था), चरस (आदमी खींचते थे) और ढेकी से सिंचाई होती थी।

दिल्ली को भौगोलिक हिसाब से तीन हिस्सों में बाँटा जाता है, महरौली यानि दक्षिणी में पहाड़ी इलाकों को पहाड़, नजफगढ़ यानी पश्चिमी दिल्ली के इलाके को डाबर और यमुना की तलहटी के इलाके को बागड़। नजफगढ़ इलाके का आकार झील जैसा था। इसलिए उसके मूल स्वरूप को बचाने के लिए नजफगढ़ नाला बनाया गया। उसके साथ हरियाणा से लगे गाँवों में सिंचाई के लिए भूटानी और छुटानी नाला बनाया गया। बवाना और कंझावाला इलाके के लिए मूंगेशपुर नाला और पालम इलाके के लिए पालम नाला बना। इसमें हिसी बस्ती का गंदा पानी नहीं जाता था, केवल बाढ़ का पानी था। जो बाद में बेकार हो जाता था। तब इन नालों को पुनर्जीवित करने की कोशिश हुई थी। नजफगढ़ नाले में पंप लगाकर तीनों छोटी नहरों में पानी डाला गया। इससे 60-70 गाँवों को पानी मिला था। इसी तरह हर गांव के जोहड़ (तालाब) और झील को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए गए। गांव के पुराने तालाबों पर लोगों के कब्ज़े हो गए हैं। कई तो अब इतिहास में समा चुके हैं। जो तालाब बचे हुए हैं उनकी संख्या भी 70 के करीब है। जरूरत उनको ठीक कर पानी से भरने की है। भलस्वा झील, संजय झील, नजफगढ़ नाले आदि को गहरा और चौड़ा कर उसे बड़ा जलाशय बनाना जरूरी है। उससे भी जरूरी है दिल्ली में बहने वाली यमुना नदी के समानांतर नहर बना कर उसमें गंदा पानी इंटरसेप्टर से साफ कर डाला जाए और यमुना नदी को बड़े जलाशय की तरह विकसित किया जाए। क्योंकि पानी बाहर से लाना कठिन होता जा रहा है।

हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी पानी के लिए हाहाकार है। तय समझौते के बाद भी हरियाणा डेढ़ दशक में मुनक नहर का काम पूरा नहीं कर पाया है। दिल्ली को ताजेवाला बांध मुनक नहर से 85 एमजीडी पानी आना है। पक्का नहर न बनने से काफी पानी रास्ते में बर्बाद हो जाता है। हरियाणा को दिल्ली से पैसे लेकर इसे बनाना था। लेकिन अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।

दिल्ली के गिरते जलस्तर को रोकने के लिए केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने पुराने नौ जिलों में से सात जिलों में भूजल का दोहन पर रोकने के आदेश जारी कर दिए। प्राधिकरण ने साल 2000 में दिल्ली के दक्षिणी और पश्चिमी जिलों को गंभीर क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया। मार्च 2006 में अधिसूचना के माध्यम से पूर्वी जिला, नई दिल्ली जिला, उत्तर पूर्वी जिला और पश्चिम जिले को अत्यधिक दोहन वाला क्षेत्र घोषित कर जल दोहन पर रोक लगा दी। इस पर कानून बनाने के लिए दिल्ली विधान सभा में दिल्ली जल बोर्ड (संशोधन) विधेयक, 2005 लाया गया। इसे बारी विरोध के चलते प्रवर समिति को भेजा गया। समिति ने दो फरवरी 2006 को उसे रद्द कर दिया।

दिल्ली को अन्य राज्यों की तरह यमुना के पानी में से हिस्सा दिल्ली विधानसभा बनने के बाद पहले मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना के प्रयास से मिला। दिल्ली को 808 क्यूसेक पानी दिया जाना तय किया गया। लेकिन यह पानी आज तक नहीं मिला। दिल्ली जल बोर्ड ने 2021 का पानी का जो मास्टर प्लान बनाया है, उसके हिसाब से दिल्ली को तब 1840 एमजीडी पानी की जरूरत होगी। उस समय अभी के स्रोतों के अलावा हिमाचल प्रदेश के रेणुका बांध से 275 एमजीडी पानी मिलने की उम्मीद है। यानि उस भरोसे दिल्ली को पानी नहीं मिल पाएगा। पानी की समस्या लगातार भयावह होती जा रही है। इसमें सुधार की उम्मीद नहीं दिखती है। इसमें सुधार के लिए जन आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है। इसमें सरकार की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

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