जन से दूर जल सप्ताह

Submitted by Hindi on Sat, 04/13/2013 - 10:40
यदि सरकार पानी के अनुशासित उपयोग को सचमुच बढ़ावा देना चाहती; उसे ‘आधार’ की तरह जनयोजनाओं से मिलने वाली लाभ से जोड़ देती। सरकार सचमुच में पानी का संतुलन बनाना चाहती है, तो एक नियम बनाए और इसका लागू होना सुनिश्चित करे - “जो जितना पानी निकाले, उतना और वैसा पानी संजोये भी।’’ यह सभी के लिए हो। यह एक अकेला नियम लागू होकर ही मांग-उपलब्धि के अंतर को इतना कम कर देने वाला है, बाकी बहुत सारे प्रश्न स्वतः गौण हो जायेंगे। जलनीति प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक सुनिश्चित कर सके, तो दूसरे कई विवाद होंगे ही नहीं। ‘भारत जल सप्ताह’ सम्पन्न हुआ। कभी कुंभ पानी की चिंता करता था; अब पानी की चुनौतियों का समाधान तलाशने का एक नया अंतरराष्ट्रीय, आधिकारिक और सालाना मंच मौजूद है। भारत सरकार ने पिछले साल ‘भारत जल सप्ताह’ की शुरुआत की थी। इस साल 8-12 अप्रैल तक चला’ द्वितीय ‘भारत जल सप्ताह’ कई मायने में खास था। इसमें करीब 200 खास पर्चे प्रस्तुत किए गए। विज्ञान भवन और इंडिया हैबिटेट जैसी खास जगह इसके लिए चुनी गई। ‘फिक्की’ जैसे खास संगठन इसके साथी बने। जाहिर है कि इसमें भाग लेने वाले करीब 2000 प्रतिभागी भी खास ही रहे होंगे। इस बार का विषय भी खास ही था- पानी का कुशल प्रबंधन: चुनौतियाँ और समाधान। कृषि, बिजली,उद्योग और घरेलु जलापूर्ति के कई तकनीकी और नीतिगत पहलुओं पर इस आयोजन में खास चर्चा भी हुई। आधिकारिक होने के कारण भी यह चर्चा खास कही जा सकती है। चर्चा के समानान्तर अन्य स्थलों पर तकनीकी व व्यापारिक प्रदर्शनी भी हुई। यूं पानी के व्यापार और तकनीकी की नुमाइश कहकर इस प्रदर्शनी की आलोचना की जा सकती है; लेकिन सच है कि प्रदर्शित तकनीक व प्रणालियां जलापूर्ति और प्रदूषण समस्या से निपटने में रुचि रखने वाले निजी संस्थानों/उद्योगों के लिए ख़ासी उपयोगी थी। जल सप्ताह आयोजित करने की इस पूरी कवायद के लिए भारत सरकार की तारीफ की जानी चाहिए; लेकिन आम आदमी को इस जल सप्ताह में सहभागी होने से वंचित रखने को लेकर इस आयोजन की तारीफ कतई नहीं की जा सकती। इसके लिए आयोजकों की आलोचना की जानी चाहिए। इसे लेकर हिमांशु ठक्कर और मनोज मिश्र ने एक सत्र में कड़ा विरोध जताया; जो कि जायज़ ही था। आयोजन में शामिल होने के लिए फ़ीस आठ हजार रुपया रखी गई थी। आठ हजार रुपया देने वालों के लिए पंजीकरण आखिर तक खुला रहा। इसे बगैर संस्था वाले मेरे जैसे पानी कार्यकर्ता तो वहन नहीं ही कर सकते। क्या यह ठीक है?

देखें तो, इस पूरे आयोजन की सारी जुगत आम आदमी तक पानी पहुंचाने के लिए थी। क्या आम आदमी की जरूरत से जुड़ी चर्चा उसके बगैर हो सकती है? फिर यह विरोधाभास क्यों? आखिर यह आयोजन ऐसा भी क्या खास था कि मीडिया ने भी इसमें हुई चर्चाओं को आम करने की कोशिश नहीं की? मैं भलीभांति जानता हूं कि यह आयोजन नीतिगत निर्णय की आधारभूत चर्चा के लिए आयोजित अंतरराष्ट्रीय जलसंसद जैसा है। यह भी सच है कि भीड़ में भाषण हो सकते हैं, नीतिगत निर्णय नहीं लिए जा सकते। इस सब के बावजूद मैं मानता हूं कि आम सहभागिता के बगैर ऐसे आयोजन सबको पानी सुलभ कराने जैसे खास लक्ष्य को पा ही नहीं सकते। यदि पानी की चुनौतियों से निपटना है, तो इसे बंद दीवारों की चुनौतियों से बाहर निकालना जरूरी है; और यह संभव भी है। .....तभी ‘भारत जल सप्ताह’ सही मायने में जलकुंभ की जगह ले सकेगा

।ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में जन सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए भारत के प्रत्येक राज्य व जिले में आधिकारिक स्तर पर सालाना जल सप्ताह आयोजित किए जाने की जरूरत है। इनमें प्रत्येक ग्रामसभा/नागरिक समितियों की सहभागिता आवश्यक कर्तव्य की तरह सुनिश्चित करनी होगी। अपने-अपने स्तर पर स्थानीय जल समस्याओं, उपलब्धियों और ज़रूरतों के अनुकूल रास्ते बनाने की दृष्टि से स्थानीय जलनीति, योजना व क्रियान्वयन कार्यक्रम प्रस्तुत करने को ऐसे स्थानीय जल सप्ताह का दायित्व बनाना होगा। भारत के हर जिले से स्थानीय जल सप्ताह द्वारा तय एक जिला जल प्रतिनिधि को ‘भारत जल सप्ताह’ का सक्रिय सहभागी बनने का अधिकार हो। उनसे प्रतिभागिता फ़ीस लेने की बजाय उसके आने-जाने के खर्च व रहने-खाने की व्यवस्था करने के ‘भारत जल सप्ताह’ के आयोजकों का ज़िम्मा हो। उनकी सहभागिता के लिए खास सत्र हो। उनकी राय भारत की राय बने। स्थानीय जल योजनाओं व कार्यानुभवों के आधार पर राष्ट्रीय जलनीति, योजना व कार्यक्रमों का निर्धारण हो। हर वर्ष जलनीति व योजना की समीक्षा तथा आवश्यकतानुसार परिमार्जन हो। विकेन्द्रित निर्णयों से एकीकृत जलप्रबंधन की ओर जाने का यही रास्ता है। भारत जैसे विविध भूगोल, विविध मौसम व जल जरूरत वाले देश में यह एक जरूरत है। क्या सरकार यह करेगी?

ऐसा न किए जाने के नतीजा है कि आयोजन पानी की तुलना में बांधों की मंजूरी और उनकी सुरक्षा की चिंता करता ज्यादा नजर आया। इसी का नतीजा है कि नई राष्ट्रीय जलनीति का दस्तावेज़ किसी को भी पानी मुफ्त देने के खिलाफ राय रखता है; उसे भी नहींं, जिसके पास देने के लिए पैसा न हो। यह दस्तावेज़ ‘भारत जल सप्ताह’ के मौके पर औपचारिक रूप से जारी किया गया। कहने को इस दस्तावेज़ में तारीफ के लिए बहुत कुछ है; लेकिन जलनीति का सारी सद्भावना एक बिंदु पर आकर चुक जाती है। सरकारें चाहती हैं कि पानी के लिए लोगों से ज्यादा से ज्यादा पैसा वसूला जाए। उसकी राय में बिजली के कम मूल्य निर्धारण से पानी और बिजली.. दोनों की बर्बादी होती है। कीमतें बढ़ाई जाएं। जलनीति बहुत ही चालाकी के साथ जलउपभोक्ता संघों को जलशुल्क एकत्र करने, जल की मात्रा के प्रबंधन तथा रखरखाव का वैधानिक अधिकार देने की बात कहकर उन पर ज़िम्मेदारी तो डालती है, लेकिन पानी की दर तय करने के असल अधिकार से उन्हें दूर रखती है। जलनीति यह अधिकार राज्य के हाथ में रखती है।

इस जलनीति का सबसे खतरनाक कदम भूजल को निजी हक से निकालकर सार्वजनिक बनाना है। अभी तक ज़मीन के नीचे का पानी का मालिक होता है। यदि जलनीति का बीज यदि धरती में अंकुरित हुआ होता, तो नीति कहती कि भूजल के अतिदोहन पर लगाम लगाने का यह ठीक रास्ता नहीं है। स्थानीय परिस्थितियों व जनसहमति के जरिए जलनिकासी की अधिकतम गहराई को सीमित कर जलनिकासी को नियंत्रित तथा जलसंचयन को जरूरी बनाया जा सकता है। यदि सरकार पानी के अनुशासित उपयोग को सचमुच बढ़ावा देना चाहती; उसे ‘आधार’ की तरह जनयोजनाओं से मिलने वाली लाभ से जोड़ देती। सरकार यदि सचमुच पानी का संतुलन बनाना चाहती है, तो एक नियम बनाए और इसका लागू होना सुनिश्चित करे - “जो जितना पानी निकाले, उतना और वैसा पानी संजोये भी।’’ यह सभी के लिए हो। यह एक अकेला नियम लागू होकर ही मांग-उपलब्धि के अंतर को इतना कम कर देने वाला है, बाकी बहुत सारे प्रश्न स्वतः गौण हो जायेंगे। जलनीति प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक सुनिश्चित कर सके, तो दूसरे कई विवाद होंगे ही नहीं।

यदि ‘भारत जल सप्ताह’ का यह आयोजन आगे चलकर भारत के पानी के समक्ष चुनौतियों को कार्यरूप में उतारने का जनोन्मुखी रास्ता न बना सका, तो इसे भारतीय जलक्षेत्र में कारपोरेट निवेश कर मुनाफ़ा कमाने वाले व उनके सहयोगियों के क्लब के रूप में याद किया जायेगा। यह अच्छा नहीं होगा।

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