जनता खुद बनाए अपना जल घोषणा पत्र

Submitted by admin on Sat, 01/25/2014 - 16:00

25 जनवरी, राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर विशेष


उल्लेखनीय है कि जलबिरादरी ने 2013 के प्रादेशिक चुनावों से पहले लोक जल घोषणापत्र बनाकर राजनीतिक दलों के समक्ष रखा था। इसमें नदी की सुरक्षा हेतु उसकी जमीन को चिन्हित व अधिसूचित करने, रिवर-सीवर को अलग रखने, प्रवाह का मार्ग बाधा मुक्त करने तथा नदी जल व रेत का अति दोहन रोकने की बात जोर-शोर से उठाई गई थी। नदी जलग्रहण क्षेत्र विकास तथा जल सुरक्षा अधिनियम प्रमुख मांग की तरह दर्ज थे। कहा गया था कि भूजल की सुरक्षा लाइसेंस अथवा जलनियामक आयोगों की बजाए जनसहमति से भूजल निकासी की गहराई सुनिश्चित कर की जाए। हर पांच साल में कोई आकर चुपके से हमारा मत चुरा ले जाता है; कभी जाति-धर्म-वर्ग-वर्ण, तो कभी किसी लोभ, भय या बेईमानी की खिड़की खोलकर और हम जान भी नहीं पाते। ये खिड़कियां कब सीलबंद करेगा मतदाता? इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस द्वारा मतदाता से जवाब मांगता मूल प्रश्न यही है। हां! इस राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर हम यह सोचकर जरूर खुश हो सकते हैं कि स्वाधीन भारत के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है जब मतदान के अलावा किसी अन्य काम के लिए भी मतदाता की पूछ हो रही है। आगामी लोकसभा चुनाव स्वाधीन भारत का ऐसा पहला चुनाव होने जा रहा है कि जब मतदाता पार्टियों का भविष्य ही नहीं, भविष्य के काम का घोषणापत्र भी तय करेगा। ‘आप’ के अलावा देश की प्रमुख आला राजनीतिक पार्टियों ने अपने घोषणापत्रों की निर्माण प्रक्रिया को मतदाताओं के लिए खोल दिया है। कांग्रेस ने जनसुनवाई कर घोषणा पत्र तैयार करने की घोषणा कर दी है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पढ़े कुछ नौजवान अमेठी लोकसभा क्षेत्र में लोकमत संग्रह कर रहे हैं। राहुल गांधी खुद जाकर भोपाल की महिलाओं से पूछ रहे हैं कि उन्हें कैसा भारत चाहिए। भारतीय जनता पार्टी ने आम सुझावों के लिए अपनी खास वेबसाइट गत् विधानसभा चुनावों से पहले से खोल रखी है।

अब उसके नेता कह रहे हैं कि भाजपा कई प्रमुख शहरों का घोषणापत्र शहर के डी एन ए और जनाकांक्षा के आधार पर बनाएगी। राहुल गांधी ने इससे आगे बढ़कर 15 सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों का चयन रायशुमारी के जरिए कराने की घोषणा कर चुके हैं। आम आदमी पार्टी ये दोनों काम पहले ही शुरू कर चुकी है। किंतु यदि यह रायशुमारी पहले की तरह एजेंसियों द्वारा कराए गए सैंपल सर्वे जैसी दिखावटी होकर रह गई या फिर बिन्नी जैसों को उंगली उठाने का मौका देने वाली हुई, तो निराशा तो होगी ही; वरना घोषणापत्र निर्माण से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक की प्रक्रिया के दरवाज़ों का मतदाताओं के लिए थोड़ा खुल जाना लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण तो है ही।

उल्लेखनीय है कि अभी तक पार्टियाँ ही अपना उम्मीदवार तथा घोषणापत्र के रूप में हमारे अगले पांच वर्ष का भविष्य तय करती रही हैं। यह चित्र उलटना होगा। यह बात मैं पिछले पांच वर्ष से भिन्न मंचों व लेखों के माध्यम से उठाता रहा हूं। 2007 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जलबिरादरी ने कई संगठनों के साथ मिलकर पर्यावरण लोक घोषणापत्र तैयार किया था। हिमाचल प्रदेश के पिछले प्रादेशिक चुनाव में स्थानीय संगठनों ने समग्र विकास की दृष्टि से लोक घोषणापत्र बनकर एक अच्छी पहल की थी। ऐसी ही पहल पिछले दो बार के दिल्ली नगर निगम के चुनावों के दौरान जन चेतना मंच द्वारा की जाती रही है।

उल्लेखनीय है कि जलबिरादरी ने 2013 के प्रादेशिक चुनावों से पहले लोक जल घोषणापत्र बनाकर राजनीतिक दलों के समक्ष रखा था। इसमें नदी की सुरक्षा हेतु उसकी जमीन को चिन्हित व अधिसूचित करने, रिवर-सीवर को अलग रखने, प्रवाह का मार्ग बाधा मुक्त करने तथा नदी जल व रेत का अति दोहन रोकने की बात जोर-शोर से उठाई गई थी। नदी जलग्रहण क्षेत्र विकास तथा जल सुरक्षा अधिनियम प्रमुख मांग की तरह दर्ज थे। कहा गया था कि भूजल की सुरक्षा लाइसेंस अथवा जलनियामक आयोगों की बजाए जनसहमति से भूजल निकासी की गहराई सुनिश्चित कर की जाए। दिलचस्प है कि कांग्रेस, भाजपा, आम आदमी पार्टी और वामदलों के पधारे प्रतिनिधियों ने उस पर सहमति तो जताई थी, लेकिन उनमें से कुछ बिंदुओं को शामिल करने में दिलचस्पी सिर्फ आम आदमी पार्टी ने ही दिखाई थी। बावजूद इसके यह प्रयोग अब रंग ला रहा है। जरूरत है कि हम इसे आगे बढ़ाने में सहयोगी बने।

मतदाता मित्रों! मैं समझता हूं कि समय आ गया है कि हम मतदाता अब खुद तय करें कि हमें अपने क्षेत्र का कैसा विकास, कैसा जीवन और कैसा पानी चाहिए? समय आ गया है कि हर चुनाव से पहले सामुदायिक रूप से एकत्र होकर पिछले पांच सालों की योजना और व्यवहार का सच्चा आकलन करें। लोक घोषणा पत्र के रूप में अपने क्षेत्र के विकास को लेकर योजनाओं और अपेक्षाओं का खाका हम मतदाता खुद तैयार करें। सभी उम्मीदवार व पार्टियों को बुलाकर उनके समक्ष लोक घोषणा पत्र पेश करें। उनसे संकल्प लें और जीतकर आए जनप्रतिनिधि को उसके संकल्प पर खरे उतरने को न सिर्फ विवश करें, बल्कि सहयोग भी करें।

उल्लेखनीय है कि आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र जलबिरादरी ने पानी समेत विकास के अन्य मसलों पर लोक घोषणापत्र तैयार करने को एक अभियान के रूप में पूरे देश में ले जाने का फैसला किया है। सूचना मिली है कि आगामी 19 फरवरी को जलबिरादरी की अमेठी इकाई अपना जल घोषणापत्र जारी करेगी। क्या यह उचित नहीं कि हम सभी अपनी-अपनी लोकसभा का लोक घोषणापत्र बनाकर आने वाले उम्मीदवारों को आइना दिखाने का काम शुरू करें? शायद जरूरत इससे और आगे जाने की भी है। जरूरत न सिर्फ अपने इलाके के विकास का नक्शा खुद तैयार करने की है, बल्कि जरूरी है कि सरकारी योजनाओं का सफल क्रियान्वयन सुनिश्चित करने और कराने में भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करें। उनके उपयोग-दुरुपयोग व प्रभावों की कड़ी निगरानी खुद रखें। सरकारी योजनाओं के जरिए हमारे ऊपर खर्च होने वाली हर पाई का हिसाब मांगे।’ पब्लिक ऑडिट’ यानी लोक अंकेक्षण करें। यदि ग्रामवासी हर निर्णय की चाबी ग्रामप्रधान को सौंपकर सो जाएं, तो वह हर पांच साल में एक गाड़ी बनाएगा ही। तेरी गठरी में लागा चोर, मुसाफिर जाग जरा!

जाहिर है कि ऐसा करना पांच साल बाद जनप्रतिनिधियों के आकलन में भी हमारी मदद करेगा। किंतु यह तभी संभव है, जब हमारे लिए बनी योजनाओं की जानकारी हमें खुद हो। उनमें जनप्रतिनिधित्व, अधिकारी और खुद की भूमिका को हम जाने। हम मतदाताओं की सकारात्मकता, सजगता, समझदारी और संगठन से ये सब संभव है। देशव्यापी स्तर पर निष्पक्ष मतदाता परिषदों का गठन कर यह किया जा सकता है। यह रास्ता, भारतीय लोकशाही पर हावी राजशाही मानसिकता को बाहर का रास्ता दिखा सकता है। लोक उम्मीदवारी का मार्ग भी इसी से प्रशस्त होगा। आइए! प्रशस्त करें।
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