जो नदी अभी यहीं थी वो कहां खो गई?

Submitted by Hindi on Wed, 12/21/2011 - 11:42
Source
दैनिक भास्कर, 17 दिसम्बर 2011
वाराणसी को पहचान दिलाने वाली वरुणा नदी का पानी बहुत जहरीला हैवाराणसी को पहचान दिलाने वाली वरुणा नदी का पानी बहुत जहरीला हैमैं नदी के साथ-साथ गया/बस्ती, जंगल, वीराने छाने/देखे पर्वत-घाटी, निहारे तारे/नदी के सोए पानी पर/पर वापसी में खड़ा था, अकेला/नदी कहीं खो गई थी.. बचपन से लालसा रही कि हफ्ते में कम से कम एक बार जाऊं, नदी के किनारे से हो आऊं। कितना सुंदर लगता है, नदी को अनवरत बहते देखना, सुनना लहरों का मधुर संगीत। चाहता था कि अपना एक घर बनाऊं, जो बिल्कुल नदी के किनारे हो। पर यह सब बचपन की फंतासी थी। जैसे-जैसे बड़ा होता गया, नदी के विकराल रूप ने दिल दहलाना शुरू किया। बाढ़ का तांडव लगभग हर साल आने लगा। यह निश्छल और कल-कल करती नदियां अचानक इतनी क्रूर कैसे हो गईं? पता चला, दोष नदियों का नहीं, हम जैसे कुछ इंसानों की साजिश है, जो पहले नदियों की धार को बांध देते हैं, बिजली और दूसरे छोटे स्वार्थों के लिए और जब नहीं संभाल पाते नदियों का पानी तो छोड़ देते हैं इसे यूं ही और गरीब जनता बाढ़ से बर्बाद होती रहती है।

साल बीते और अब नदियों से रिश्ता भी वैसा न रहा, जैसा बचपन में था। पढ़ाई के सिलसिले में घर से बाहर निकला। वर्धा पहुंचा। यहां नदियों में साल भर पानी नहीं रहता। जब बारिश होती तो नदियों में प्राण होता, अन्यथा वे किसी नाले की ही तरह दिखती हैं। बारिश होने पर हम भीगकर भी नदी-किनारे घंटों बिताते, पांव को नदी की धार में डुबोए। घूमते-घूमते एक बार मैसूर शहर पहुंचा। यहां के वृंदावन गार्डन के बारे में बहुत सुन रखा था, सो देखने पहुंच गया। यह कावेरी पर बने कृष्ण राजा सागर बांध से सटा है। कावेरी को बंधा देखना बहुत डरावना था और जिस तरह से उसकी लहरें बांध की दीवारों पर चोट करके कराह रही थीं, मुझे लगा कि वह कह रही है कब तक मुझे बांधोगे? एक दिन तो मैं यह दीवार तोड़ दूंगी और उसके बाद जो प्रलय आएगा, उससे कोई नहीं बचेगा। नदियों को मैं शहर की नब्ज के रूप में देखते आया हूं। एक बार, वाराणसी के बारे में किसी ने बताया कि शहर का नाम वरुणा और अस्सी से मिलकर बना है।

बहुत पता करने पर भी कोई बता न सका कि ये नदियां कहां से होकर बहती हैं। कहीं वे काल के कपाल में समा तो नहीं गईं? एक भाई ने कहा कि जो जगह आप खोज रहे हो, वहां आज एक बाजार है। मन नहीं माना। इलाहाबाद गया तो त्रिवेणी के किनारे देर तक धाराओं को निहारता रहा। लोगों ने बताया साफ पानी गंगा है, मटमैली-सी यमुना और सरस्वती दोनों धाराओं के नीचे बहती है। मैंने सरस्वती को खोजना चाहा, पूछना चाहा कि तुम हो भी कि नहीं, लेकिन सरस्वती नहीं मिली। अरसा बीता, पढ़ाई पूरी हुई, नौकरी का सिलसिला शुरू हुआ और इसी कड़ी में मैं पहुंचा जयपुर। नदियों से मेरा प्रेम कहीं सो गया था। महीनों नौकरी करने के बाद भी कभी नदी के तट पर जाने की हूक मन में नहीं उठी। घर और दफ्तर के बीच कुछ छूट रहा था। शायद यह नदियों का साथ ही था।

भारत में जितनी भी राज्यों की राजधानियां हैं, वह किसी न किसी नदी या जलस्रोत के किनारे ही बसी हैं। मानकर चल रहा था कि कोई नदी जयपुर से भी गुजर रही होगी। अभी कल की बात है, हैरान रह गया यह जानकर कि इस शहर से होकर कोई नदी नहीं बहती। एक नदी थी द्रव्यवती, जो शहरीकरण का शिकार हो गई। लोग उसके अवशेष को अमानीशाह का नाला कहते हैं। मानवता ने एक नदी का अतिक्रमण कर लिया। जबसे सुना है, तब से सदमे में हूं।

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