जोहड़ जोड़ने वालों ने दी पानी की ‘गवाही’

Submitted by Hindi on Mon, 09/06/2010 - 08:31
Source
दैनिक भास्कर, 05 सितंबर 2010


अरवरी जल संसद की कहानी एक पिछड़े इलाके के कम पढ़े-लिखे लेकिन संगठित लोगों द्वारा अपने प्रयासों और संकल्पों की ताकत से लिखी कहानी है। दो साल पहले मुझे राजस्थान के अलवर जिले में अरवरी नाम की एक छोटी सी गुमनाम नदी को देखने का अवसर मिला। मुझे बताया गया कि देश की हजारों नदियों की तरह पहले अरवरी भी बारहमासी थी, लेकिन पानी के बढ़ते उपयोग और जंगलों के कटाव के कारण 50 साल पहले यह नदी सूख गई।

जलसंकट गहरा गया। क्षेत्र के नौजवान बड़े शहरों की ओर पलायन करने लगे। ऐसे कठिन दौर में तरुण भारत संघ ने जोहड़ बनाने का काम शुरू किया। एक के बाद एक जोहड़ बनते गए और पानी सहेजा जाने लगा। जमीन तक पानी पहुंचा तो कुंओं में नमी लौटी। धीरे-धीरे अरवरी भी सदानीरा होने लगी। 1990 में पहली बार अरवरी में अक्टूबर माह तक पानी बहता दिखाई दिया था और 1995 तक पूरी नदी पुनर्जीवित हो गई। यह जल संसद के विचार के अमल में आने की शुरुआत थी।

मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त राजेंद्र सिंह को इस इलाके में ‘पानी वाले बाबा’ के नाम से जाना जाता है। यह उनकी ही सोच थी कि अरवरी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा की व्यवस्था उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के लोगों के ही हाथ में होनी चाहिए, क्योंकि अगर उनमें जल जागरूकता नहीं लाई गई तो नदी फिर सूख जाएगी।

इस मुद्दे पर जानकारों की राय जानने के मकसद से अरवरी नदी के किनारे बसे गांव हमीरपुर में 19 दिसंबर 1998 को जन सुनवाई करने का फैसला लिया गया। इस सुनवाई में मुद्दई, गवाह, वकील, जज, विचारक, नियंता सभी मौजूद थे। यह आयोजन इतना लाभदायक और उपयोगी साबित हुआ कि 26 जनवरी 1999 को अरवरी जल संसद का गठन कर दिया गया। तब से आज तक इस जल संसद की नियमित बैठकें होती हैं और इनमें लिए जाने वाले फैसलों का क्रियान्वयन किया जाता है।

जल संसद के तहत अरवरी नदी और उसके प्राकृतिक परिवेश को जीवित बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए गए थे। लोगों ने बाकायदे सिंचाई के नियम बनाए और तय किया कि होली के बाद नदी से सीधे पानी उठाकर सिंचाई नहीं की जाएगी। कुंओं से सिंचाई के भी नियम तय किए गए।

चूंकि इस पूरे इलाके में भूजल की छोटी-छोटी धाराओं का जाल बिछा था, इसलिए यहां ज्यादा गहरे कुंए और नलकूप बनाना उचित नहीं समझा गया। पानी की कम खपत वाली फसलें पैदा करने पर जोर दिया गया। पानी की बिक्री या उसके व्यावसायिक उपयोग पर रोक लगा दी गई।

साथ ही यह फैसला लिया गया कि गरीबों को पानी की आपूर्ति निशुल्क की जाएगी। उद्योगपतियों को जमीन बेचने पर रोक लगा दी गई। यह नियम भी बनाया गया कि जो व्यक्ति धरती को जल देगा, वही धरती के पानी का उपयोग करने का अधिकारी होगा। जीव-जंतुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अरवरी क्षेत्र को शिकार प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया। गांव का पैसा गांव में ही रहे, एेसी बाजार मुक्त फसल उत्पादन की विकेंद्रित व स्वावलंबी व्यवस्था कायम की गई।

अरवरी जल संसद की कहानी एक पिछड़े इलाके के कम पढ़े-लिखे लेकिन संगठित लोगों द्वारा अपने प्रयासों और संकल्पों की ताकत से लिखी कहानी है। देश की जलनीति और समाज की अपेक्षाओं के टकराव के बावजूद यह काफी हद तक समाज और पानी के योगक्षेम की जीवंत कहानी है। अरवरी के इन बेटों ने जल संकट के निदान का एक अभिनव मॉडल पेश किया है। यह मॉडल उनकी प्रेरणा का स्थायी स्रोत है। साथ ही यह पानी से जुड़े कानूनों को मानवीय चेहरा प्रदान करने का संदेश भी देता है।

- लेखक पर्यावरण विशेषज्ञ हैं।
 

 

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