कैसे बचेगी धरती

Submitted by Hindi on Fri, 07/15/2011 - 12:12
Source
अमर उजाला, 15 जूलाई 2011

भोजन और जल की आवश्यकता तभी पूरी हो सकती है, जब प्रकृति में मौजूद खाद्य और पानी की सुरक्षा की जाए। मृत मिट्टी और सूखी नदियां भोजन और जल नहीं दे सकतीं। लिहाजा मानव अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा के लिए चल रहे संघर्ष में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण धरती मां के अधिकारों की सुरक्षा है।

जंग के बारे में सोचते हुए हमारे दिमाग में इराक और अफगानिस्तान ही कौंधता है। लेकिन इससे भी बड़ी जंग हमारी धरती के खिलाफ जारी है। इस लड़ाई की जड़ें उस आर्थिक व्यवस्था में हैं, जो पर्यावरण और नैतिकता की सीमा का सम्मान करने में विफल रही-यह सीमा असमानता, अन्याय, लालसा और आर्थिक केंद्रीकरण की है। कुछ मुट्ठी भर कंपनियां और ताकतवर देश दुनिया भर के संसाधनों पर कब्जा जमाकर पृथ्वी को एक ऐसे सुपर मार्केट में तबदील कर देना चाहते हैं, जहां हर चीज बिकाऊ होगी। वे हमारे जल, जीन, कोशिका, अंग, ज्ञान, संस्कृति और भविष्य, सभी कुछ बेच देना चाहते हैं। अफगानिस्तान, इराक और दूसरी जगहों पर ‘तेल के लिए खून’ नहीं बह रहा। जैसा कि दिख रहा है, हम कह सकते हैं कि यह खून जीन, जैव विविधता और पानी के लिए बह रहा है।

युद्ध की यह मानसिकता सैन्य-औद्योगिक कृषि के स्वरूप में छिपी है, जिसका पता मोनसांटो की, राउंड अप, मचेटी, लैसो जैसे हर्बीसाइड्स (पौधों की वृद्धि रोकने वाले शाकनाशक) के नाम से चलता है। अमेरिकन होम प्रोडक्ट्स ने भी, जिसका मोनसांटो के साथ विलय हो चुका है, अपने हर्बीसाइड्स के ऐसे ही नाम रखे हैं, जैसे पेंटागन और स्क्वॉड्रन । यह युद्ध की भाषा है, जबकि खेती की निरतंरता तो शांति से जुड़ी है। धरती के खिलाफ लड़ाई दरअसल दिमाग से शुरू होती है। हिंसक विचार ही हिंसक कार्यों को आकार देते हैं और हिंसक वर्ग हिंसक औजार बनाते हैं। यह हिंसा और कहीं इतने साफ ढंग से नहीं दिखती, जितनी औद्योगिक, कृषि और खाद्य उत्पादन में दिखती है। युद्ध के समय जो कारखाने लोगों को मारने के लिए जहर और विस्फोटक पदार्थ तैयार कर रहे थे, वे युद्ध खत्म होने के बाद कृषि-रसायन के उत्पादन में जुट गए।

व्यक्तिगत रूप से मुझे 1984 में इस बात का पता चला कि जिस तरह हम अनाज पैदा कर रहे हैं, वह तरीका गलत है। तब पंजाब में हुई हिंसा और भोपाल में गैस त्रासदी के कारण खेती भी युद्ध की तरह दिखने लगी थी। युद्ध के समय रसायन के तौर पर इस्तेमाल होने वाला कीटनाशक कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित करने में विफल रहा। यह उम्मीद थी कि जेनेटिक इंजीनियरिंग विषाक्त रसायनों का विकल्प तैयार करेगी। इसके बजाय उसने कीटनाशक और शाकनाशक को बढ़ावा देने का ही काम किया और किसानों के खिलाफ जंग की शुरुआत कर दी। पशु आहार और रासायनिक खादों के दामों में आई तेजी किसानों को कर्ज के जाल में फंसा रही है और यही कर्ज उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर करता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1997 से अब तक दो लाख से अधिक किसानों ने मौत को गले लगाया है।

धरती के साथ शांत बर्ताव मनुष्य के लिए हमेशा ही एक नैतिक और पारिस्थितिक अनिवार्यता रहा है। अब तो यह शांति हमारे अस्तित्व के लिए भी जरूरी हो चुकी है। मिट्टी, जैव विविधता, जल, पर्यावरण, कृषि और कृषि उत्पादों के खिलाफ हिंसा खाद्य व्यवस्था के लिए युद्ध जैसी है, जो लोगों का पोषण करने में विफल साबित हुई है। एक अरब लोग आज भूखे पेट हैं। जबकि दो अरब लोग मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कैंसर जैसी खानपान संबंधी गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं। आज हिंसा के कुल तीन रूप देखने को मिलते हैं। पहला है धरती के खिलाफ हिंसा, जो पारिस्थितिकी संकट के रूप में दिखती है। दूसरा है लोगों के खिलाफ हिंसा, जो गरीबी, अभाव और विस्थापन के रूप में हमारे सामने है। और तीसरा युद्ध व संघर्ष की हिंसा है, जिसमें अपनी असीम भूख के लिए ताकतवर देश उन प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंचते हैं, जिस पर अन्य समुदायों और देशों का भी हक होता है।

जब जीवन का हर पहलू व्यावसायिक होता है, तो रहन-सहन ज्यादा खर्चीला होता है और लोग भी गरीब होते हैं, भले ही वे प्रतिदिन एक डॉलर से भी अधिक क्यों न कमाएं। दूसरी तरफ अगर मनुष्य की खेतों तक पहुंच हो, खेतों की मिट्टी उपजाऊ हो, नदियां स्वच्छ पानी दे, सभ्यता समृद्ध हो, अच्छा मकान, कपड़ा और स्वादिष्ट भोजन मिलता रहे, सामाजिक सामंजस्य, एक जुटता और समुदाय की भावना हो, तो मनुष्य पैसे के बिना भी अमीर हो सकता है। आज हम भौतिक रूप से जितने अमीर होते हैं, पर्यावरण और संस्कृति के लिहाज से उतने ही गरीब होते जाते हैं। हमें समझना होगा कि जीवन का वास्तविक धन जीवन ही है और यही सवाल उठता है कि इस दुनिया में हम खुद को किस तरह देखते हैं? मनुष्य के लिए हम क्या कर रहे हैं? कहीं हम सिर्फ रुपया कमाने वाली और संसाधनों का दोहन करने वाली मशीन तो नहीं बन गए हैं? क्या हम ऊंचा लक्ष्य भी रखते हैं?

मेरा मानना है कि ‘अर्थ डेमोक्रेसी’ हमें रहन-सहन में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करने में समर्थ बनाती है, जो सभी प्रजातियों, लोगों और संस्कृतियों के वास्तविक मूल्य पर आधारित है। यानी धरती के सभी महत्वपूर्ण संसाधनों और उसके इस्तेमाल पर समान बंटवारा। वह जीवन के अधिकार का आधार भी है, जिसमें जल, आहार, स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी और आजीविका का अधिकार शामिल है। हमें यह तय करना होगा कि क्या हम कॉरपोरेट लालसा पर टिके बाजारू कानून का पालन करेंगे या पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र ओर उसकी उत्पत्ति की विविधता को अक्षुण्ण बनाए रखने की दिशा में सोचेंगे।

भोजन और जल की आवश्यकता तभी पूरी हो सकती है, जब प्रकृति में मौजूद खाद्य और पानी की सुरक्षा की जाए। मृत मिट्टी और सूखी नदियां भोजन और जल नहीं दे सकतीं। लिहाजा मानव अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा के लिए चल रहे संघर्ष में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण धरती मां के अधिकारों की सुरक्षा है। यह आज के दौर का प्रचारित शांति आंदोलन है।
 

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