कैसे हो नदी का बंटवारा

Submitted by Hindi on Fri, 04/01/2011 - 09:27
Source
दिव्य हिमाचल, 22 मार्च 2011

संतुलित उपयोग किया जाए, तो हर क्षेत्र में पानी की खपत कम हो सकती है और गृह युद्ध से हम बच सकते हैं…


विश्लेषकों का मानना है कि अगला विश्व युद्ध पानी के बंटवारे को लेकर होगा। विश्व के अधिकांश बड़े शहर नदियों के किनारे बसे हैं। नदी के पानी से ही इन शहरवासियों की प्यास बुझती है। सिंचाई भी नदी से नहर निकाल कर की जाती है। देश की खाद्य सुरक्षा पानी पर निर्भर है। अनुमान है कि आने वाले समय में नदी का पानी बहुत कीमती हो जाएगा। ऊपरी देशों द्वारा नदी का दोहन करने से नीचे के देश संकट में आएंगे। जैसे चीन द्वारा बह्मपुत्र का पानी अधिक निकाल लिया जाए, तो भारत के साथ युद्ध छिड़ सकता है। अथवा भारत द्वारा गंगा से पानी निकाल लिया जाए, तो बंगाल देश क्रुद्ध हो सकता है। ऐसी ही स्थिति पानी के घरेलू बंटवारे को लेकर उत्पन्न हो रही है। पानी का उपयोग अनेक लोग करते हैं। शहरवासियों को पीने और गाड़ी धोने के लिए पानी चाहिए। किसान को सिंचाई के लिए, मछुआरे को मछली के लिए, थर्मल पावर प्लांट को बायलर ठंडा रखने के लिए, तीर्थयात्री को स्नान के लिए और पर्यटक को पानी का सौंदर्य निहारने के लिए नदी का पानी चाहिए।

पानी के इन विभिन्न उपयोगों की जांच करनी चाहिए। संतुलित उपयोग किया जाए, तो हर क्षेत्र में पानी की खपत कम हो सकती है और गृह युद्ध से हम बच सकते हैं। पीने के लिए नदी से पानी निकालने को श्रेष्ठ वरीयता दी जाती है, जो ठीक है। मुख्य विवाद किसानों और दूसरे वर्गों के बीच है। तीर्थयात्री, पर्यटक, मछुआरे एवं तटीय क्षेत्र के निवासी चाहते हैं कि नदी में ज्यादा पानी छोड़ा जाए, जबकि किसान अधिकाधिक पानी निकालना चाहता है। सिंचाई के लिए पानी निकालने के लाभ को भी बढ़ा-चढ़ाकर गिनाया जाता है। सरकारी अधिकारी सहज ही कहते हैं कि देश की खाद्य सुरक्षा के लिए सिंचाई को पानी देना जरूरी है। यह सच नहीं है। मैंने नहर से सिंचित क्षेत्रों का अध्ययन किया है। पाया कि नहर के हेड पर किसान पानी का भयंकर दुरुपयोग करते हैं। उनसे पानी का मूल्य भूमि के रकबे के आधार पर किया जाता है। उनका प्रयास रहता है कि अधिकाधिक मात्रा में सिंचाई करें। सिंचाई से लाभ न्यून हो तो भी पानी डाला जाता है, चूंकि इसका अतिरिक्त मूल्य नहीं देना पड़ता है।

पानी का उपयोग गन्ना तथा मेंथा जैसी विलासिता की फसलों के लिए किया जा रहा है। इसी प्रकार कर्नाटक में अंगूर, महाराष्ट्र में कपास तथा राजस्थान में मिर्च के उत्पादन को भारी मात्रा में पानी का उपयोग हो रहा है। देश की खाद्य सुरक्षा तो बाजरा, रागी, जौ तथा चने से भी स्थापित हो सकती है। फिर भी सरकारी महकमा अधिकाधिक सिंचाई पर कुर्बान है। कारण यह कि बराज एवं नहर निर्माण एवं इनके रखरखाव में ठेका और कमीशन मिलता है। पानी की इस खपत के पीछे राजनीति भी है। नहर से उत्पादित मेंथा, अंगूर और चीनी की खपत अधिक देश का संभ्रांत वर्ग करता है, जबकि नुकसान तीर्थ यात्रियों को होता है। सिंचाई महकमे का मूल उद्देश्य है गरीब के संसाधनों को जबरन छीनकर अमीर को देना। नदी के पानी को परमाणु संयंत्रों को ठंडा करने के लिए भी निकाला जा रहा है। संयंत्र से निकले गरम पानी को सीधे नदी में छोड़ दिया जाता है। गरम पानी को ठंडा करके पुनः उपयोग किया जा सकता है, परंतु अधिकारीगण इस मामूली खर्च को वहन करने के स्थान पर निरीह जंतुओं को मौत के घाट उतार रहे हैं। नदी में बहने वाले पानी से तमाम लोग लाभान्वित होते हैं।

नदी के पानी से भूमिगत जल का पुनर्भरण होता है, विशेषकर बाढ़ के समय। सरकारी महकमा बाढ़ को पूर्णतया हानिप्रद मानता है। टिहरी जैसे बांधों में पानी रोककर अथवा तटबंध बनाकर बाढ़ के पानी को फैलने नहीं दिया जा रहा है। इससे भूमिगत जल का पुनर्भरण नहीं हो रहा है। ट्यूबवेल सूखते जा रहे हैं। देश की खाद्य सुरक्षा दांव पर लगी हुई है। मछुआरों की जीविका खतरे में है। फरक्का बराज से इलाहाबाद तक हिलसा मछली समाप्तप्राय हो गई है। पानी के साथ-साथ नदी गाद को भी ढोकर लाती है। यह गाद ही हमारे समुद्र तटों को कटाव से बचाती है। पानी के साथ-साथ गाद भी निकल रही है और समुद्र को कम ही पहुंच रही है। गंगासागर द्वीप का तेजी से क्षरण हो रहा है।

हमारी संस्कृति में सभी नदियां पूजनीय हैं। मैं छह-सात वर्ष का था। कानपुर के सरसैया घाट पर पिताजी हमें नहाने ले जाया करते थे। अपार भीड़ रहती थी। हम नाव से नदी के बीच बाजू पर जाकर स्नान करते थे। आनंद आता था। आज नदी में पानी की कमी के कारण कानपुर के निवासी इस आनंद से वंचित हो गए हैं। नदी के मुक्त बहाव से तमाम जनता को सुख मिलता है। अमरीका के वाशिंगटन राज्य में अल्हवा नदी पर दो बांध थे। इनसे सिंचाई होती थी और बिजली बनाई जाती थी। दूसरी ओर मछली पकड़ने वालों एवं नौकाविहार करने वाले टूरिस्टों को हानि होती थी। पशोपेश में पड़ी सरकार इस मुद्दे को सुलझाने को नागरिकों का सर्वे करवाया। लोगों से पूछा गया कि बांधों को हटाकर नदी को स्वच्छंद बहने दिया जाए, तो कितनी रकम देने को तैयार हैं। सर्वे से निष्कर्ष निकला कि बांधों को हटाने के लिए जनता ज्यादा रकम देने को तैयार थी, जबकि सिंचाई और बिजली से सरकार को तुलना में बहुत कम आय होती थी। इस आधार पर सरकार ने इन बांधों को बारुद से उड़ाने का निर्णय ले लिया।

मैंने देवप्रयाग, ऋषिकेश एवं हरिद्वार में गंगा में स्नान को आए तीर्थयात्रियों का सर्वे करवया था। पाया कि तीर्थयात्रियों को 4666 करोड़ रुपए और देश की समस्त जनता को 7980 करोड़ रुपए का नुकसान प्रति वर्ष टिहरी डैम से जल की गुणवत्ता घटने से हो रहा है। इस पृष्ठभूमि में हम आकलन कर सकते हैं कि नदी से कितना पानी निकालना उचित होगा। नदी से 100 फीसदी पानी निकाला जाए, तो किसान को लाभ होगा, परंतु समुद्र तट वासियों, मछुआरों तथा तीर्थयात्रियों को हानि बहुत ज्यादा होगी। यदि 90 प्रतिशत पानी निकाला जाए और 10 प्रतिशत छोड़ा जाए, तो किसानों को मामूली हानि होगी, जबकि तीर्थयात्रियों को अधिक लाभ होगा। इसी प्रकार पर गणना करके पता लगाया जा सकता है कि किस स्तर पर किसान को लाभ एवं तीर्थयात्रियों को हानि बराबर हो जाएगी। मात्र इतना पानी निकालना चाहिए।

पानी निकालने के तरीके पर भी पुनर्विचार करना चाहिए। वर्तमान में नदी के संपूर्ण पाट पर बराज बनाकर पानी के बहाव को रोक लिया जाता है। बराज के पीछे तालाब बन जाता है, जिसमें पानी सड़ता है और गाद जमा हो जाती है। मछलियां अपने प्रजनन क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाती हैं। बराज के स्थान पर आंशिक ठोकर बनानी चाहिए। मान लीजिए 40 प्रतिशत पानी निकालना है। ऐसे में नदी के 100 मीटर के पाट में 40 मीटर पर एक दीवार बनाकर 40 प्रतिशत पानी को नहर में निकाला जा सकता है। शेष 60 प्रतिशत पानी को बिना रुकावट बहने दिया जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था से लठैतों द्वारा ज्यादा पानी नहीं लिया जा सकेगा। अर्थव्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना जनहित है। जरूरत है कि नदी के पानी के विभिन्न उपयोगों का आकलन जनहित की कसौटी पर किया जाए और तदानुसार उसका बंटवारा किया जाए। अन्यथा शक्तिशाली लोग पानी का दुरुपयोग करेंगे अैर निर्धन के हक को छीन लेंगे।

(डा. भरत झुनझुनवाला, लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं)
 

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