कहीं हम सब फँस तो नहीं रहे ‘जल युद्ध’ के चक्रव्यूह में

Submitted by RuralWater on Tue, 03/01/2016 - 11:09
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नेशनल दुनिया, 29 फरवरी 2016

पानी की किल्लत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी आदि हजारों नदियों से पटे पड़े और तीन ओर से समुद्र से घिरे भारत में पानी की किल्लत को लेकर आन्तरिक टकराव की आशंका बढ़ती जा रही है। इसका असर आम जनजीवन और सिंचाई से लेकर ऊर्जा क्षेत्र में देखने को मिल सकता है। जल संकट से किस तरह हम सब घिर चुके हैं, इसका आभास जल आयोग की ओर से बीती 25 फरवरी को जारी रिपोर्ट से मिलता है। आँकड़ों से भरी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कम बरसात की वजह से देश बुरी तरह से अल्पवृष्टि का शिकार हुआ है।

देशभर में जल दोहन को लेकर सालों से चेतावनियाँ दी जा रही हैं, लेकिन उसका कोई खास असर देखने को नहीं मिल रहा है। इस लापरवाही की वजह से हम सब जल युद्ध के चक्रव्यूह में फँसते नजर आ रहे हैं। गर्मियों में देशभर में पानी को लेकर जब-तब हाय-तौबा मचती रहती है और अब तो स्थिति यह हो गई है कि जल समस्या गर्मी के मौसम के इन्तजार में नहीं रहती, बल्कि साल में कभी भी चाहे ठंड या बरसात ही क्यों ना हो, इस समस्या का सामना करना पड़ता है।

आज की तारीख में राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यहाँ के लोग पानी की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं। कहीं दिल्ली में एकाध दिन तो कहीं हफ्ते भर से लोगों को अपने घर में लगे नलों से पानी भरना नसीब नहीं हो पा रहा है। हालांकि दिल्ली में पानी नहीं मिलने की वजह पड़ोसी राज्य हरियाणा में हुए जाट आन्दोलन के दौरान हुई तोड़फोड़ को बताया जा रहा है। लेकिन सच तो यह है कि केजरीवाल की सरकार के पास इस बहानेबाजी के सिवाय हालात में सुधार का कोई उपाय नहीं है। पानी किल्लत से निपटने के लिये सुप्रीम कोर्ट से की गई गुहार पर मंत्री कपिल मिश्रा को फटकार लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप एसी कमरे में बैठे रहें और सुप्रीम कोर्ट पानी-बिजली जैसी मूलभूत जरूरतों की अदायगी के लिये हस्तक्षेप करता रहे। यह कहीं से ठीक नहीं है। सरकारों को पानी के संकट जैसी समस्याओं से निपटने के लिये परस्पर सद्भाव भरे प्रयास खुद करने चाहिए।

लेकिन यह समस्या केवल दिल्ली की नहीं है। जो कारण गिनाए जा रहे हैं, वह तात्कालिक हैं, क्योंकि हरियाणा के जाट आन्दोलन से भले ही दिल्ली की पानी की सप्लाई रुक गई हो, लेकिन जहाँ आन्दोलन नहीं हुआ या जिन राज्यों के पड़ोसियों ने पानी सप्लाई नहीं रोकी है, उन राज्यों की हालत भी ठीक नहीं है। देश के एक-दो नहीं बल्कि पन्द्रह राज्य ऐसे हैं, जहाँ इस साल अप्रैल-मई आते-आते पानी की किल्लत को लेकर हाहाकार मचने वाला है। यह सम्भावना कांफिडेंस के साथ इसलिये व्यक्त की जा रही है कि इन राज्यों में यह समस्या हर साल उत्पन्न होती है और तब से अब में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। बता दें कि पानी की जबरदस्त कमी का सामना करने वाले राज्यों में वे राज्य भी हैं जहाँ हाल-फिलहाल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ये राज्य तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल हैं।

जाहिर तौर पर पानी की किल्लत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी आदि हजारों नदियों से पटे पड़े और तीन ओर से समुद्र से घिरे भारत में पानी की किल्लत को लेकर आन्तरिक टकराव की आशंका बढ़ती जा रही है। इसका असर आम जनजीवन और सिंचाई से लेकर ऊर्जा क्षेत्र में देखने को मिल सकता है। जल संकट से किस तरह हम सब घिर चुके हैं, इसका आभास जल आयोग की ओर से बीती 25 फरवरी को जारी रिपोर्ट से मिलता है। आँकड़ों से भरी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कम बरसात की वजह से देश बुरी तरह से अल्पवृष्टि का शिकार हुआ है। फरवरी महीने के आखिरी हफ्ते तक देश के 91 प्रमुख जलाशयों में महज 32 प्रतिशत यानी सिर्फ 51.2 अरब घन मीटर पानी ही संग्रहीत हो पाया है।

इन जलाशयों की कुल जल संग्रहण क्षमता 157.799 अरब घन मीटर है। यह देश की अनुमानित जल संग्रहण क्षमता 253.388 अरब घन मीटर का लगभग 62 फीसदी है। इन जलाशयों में 37 जलाशय ऐसे हैं जो 60 मेगावाट से अधिक की स्थापित क्षमता के साथ पनबिजली लाभ देते हैं। इसका मतलब यह है कि पानी की किल्लत के साथ कुछ इलाकों में बिजली की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

पूर्वी भारत में भी पानी को लेकर कोहराम मचने वाला है। इसके साथ-साथ पश्चिमी भारत के जल आयोग के 27 जलाशयों की दशा खतरनाक स्तर पर है। ये जलाशय गुजरात और महाराष्ट्र में हैं। इनमें 27.07 अरब घन मीटर जल संग्रहण क्षमता है। आज की तारीख में इनमें महज 7.84 अरब घन मीटर पानी यानी महज 29 फीसदी भराव है। पिछले वर्ष इस अवधि में 48 फीसदी संग्रहण था। जबकि पिछले दस वर्ष का औसत संग्रहण इस अवधि में 53 फीसदी रहा है।

केन्द्रीय जल आयोग की निगरानी में देश के मध्य क्षेत्र यानी उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश औऱ छत्तीसगढ़ में बारह जलाशय हैं। इनमें कुल 42.30 अरब घन मीटर पानी संग्रहण की क्षमता है। यहाँ भी पानी के संग्रहण की कमी देश में जल को लेकर बनी नाजुक हालत की कहानी बता रहे हैं। इनमें महज 16.91 अरब घन मीटर जल यानी इनके संग्रहण क्षमता का महज 40 फीसदी हिस्सा ही भरा है। दस साल का औसत संग्रहण इस अवधि में इन जलाशयों में कुल संग्रहण क्षमता का महज 37 फीसदी था। दक्षिणी क्षेत्र यानी आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल एवं तमिलनाडु में जल आयोग के 31 जलाशय हैं। इनकी जल संग्रहण क्षमता 51.59 अरब घन मीटर है। चेन्नई की भयंकर बाढ़ की घटना के बावजूद इनको जल की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। इनमें कुल उपलब्ध जल संग्रहण 11.61 अरब घन मीटर है।

मतलब क्षमता का महज 23 फीसदी जल ही संग्रहित है। पिछले वर्ष इसी अवधि में इनमें 31 फीसदी जल संग्रहित था। आसन्न जल संकट का संकेत देने वाले जल आयोग के आँकड़ों में बताया गया है कि पिछले साल की तुलना में जिन राज्यों के जलाशयों में जल संग्रहण की स्थिति में अपेक्षित सुधार आया है उनमें हिमाचल प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश और त्रिपुरा शामिल हैं। जिन जलाशयों में पिछले साल जैसे ही हालात हैं वो आन्ध्र प्रदेश-तेलंगाना की दो संयुक्त परियोजनाएँ हैं। पिछले साल की तुलना में इस साल जिन राज्यों की हालत बदतर है, यानी जिन राज्यों के जलाशयों में जल संग्रहण कमतर है, उनमें पंजाब, राजस्थान, झारखण्ड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल शामिल हैं।

बीते साल कमजोर मानसून और अल्पवृष्टि का शिकार हुए राज्यों की मुसीबतों को बयान करने वाले हालात गम्भीर हैं। इसके लिये केन्द्र की ओर से जल संकट के सम्भावित राज्यों को हालात से निपटने के लिये ठोस प्रयास करने को कहा जा रहा है। मगर मुश्किल है कि केन्द्र सरकार के अधीन जलाशयों से ही नहीं बल्कि कम पानी की वजह से स्थानीय भूजल स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। जल का स्तर नीचे गिरा है। आने वाले दिनों में राज्य व केन्द्र सरकारों के लिये जल संकट बड़ी समस्या बनकर उभरने वाला है। ऐसे में जल संरक्षण को लेकर बड़ा अभियान चलाने की जरूरत है।

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