Ice age
Ice age

कोरी नहीं शीतयुग की बात

Published on
5 min read

हिमालय सदियों से देश व समाज की सभी प्राकृतिक उत्पादों से सेवा करता रहा है। सही मायनों में सर्वव्यापी हिमालय को देश की प्राकृतिक राजधानी के रूप में आंकना चाहिए। हिमालय का मतलब सारे देश के अस्तित्व से जुड़ा है। हिमालय जिस तरह प्रदूषित हो रहा है और पर्यावरण का नुकसान हो रहा है उससे यह कोरी कल्पना नहीं लगती कि पृथ्वी को फिर एक बार उसी युग में जाना पड़ेगा तब से जीवन शुरू हुआ था, जब जीवन के चिह्न नहीं थे।

वैसे तो यह प्रकृति का नियम ही है की यह स्वयं ही अपने पर हुए अतिक्रमण का हिसाब चुकता कर देती है। हमारे चारों तरफ तथाकथित एक तरफा विकास की कीमत हमे प्रकृति से छेड़छाड़ के रूप में चुकानी ही है। मनुष्य की विद्वता व उसका चरित्र प्रकृति के आगे औंधे मुंह गिरा है। हमारी जहां से उत्पत्ति हुई और हम उसी के विनाश को उतारू हैं। हमारे ही धर्म में काल्पनिक देवी-देवताओं की स्तुति से पहले पृथ्वी, जल, दीपक, वायु और सूर्य को नमस्कार करने की व्यवस्था इसलिए थी ताकि हम अपने अस्तित्व के आधारों को न भूलें। पर हमारी भोगवादी परंपरा ने सब कुछ बलि चढ़ा दिया। अगर हालात पर तुरंत चिंता नहीं की तो हम बड़ी मुश्किलों में पड़ने वाले हैं। शीत युग की बात कोरी नहीं। पर्यावरण के लगातार नुकसान से पृथ्वी को फिर एक बार उसी युग में जाना पड़ेगा जब से जीवन शुरू हुआ था। यह वह युग था जब जीवन के चिन्ह नहीं थे। हमारी वर्तमान परिस्थिति उसी युग की तरफ धकेल रही है। जंगल, मिट्टी, पानी का तेजी से खत्म होना इस ओर जाने का एक इशारा है। जीवन का खत्म होना या फिर से जीवन का पनपना शीत युग का प्रबल चिन्ह है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हिमालय ही है, जिसके संतुलन को हमने बिखेर दिया।

हिमालय को समझने की चूक हो रही है। इस मिट्टी, बर्फ, पानी से बने पहाड़ को हमने वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझा और इसी भ्रम में इसके साथ खिलवाड़ किया। जबकि हिमालय एक तंत्र है। जिसमें समाज संस्कृति और आर्थिकी और देश की पारिस्थितिकी पनपी है। यहां वनों, नदियों और मिट्टी ने कभी पक्षपात नहीं किया।

लगभग तीन हजार किलोमीटर में फैला हिमालय देश के नौ राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। पश्चिम में उत्तराखंड, हि.प्र. व जम्मू कश्मीर व उत्तर पूर्व में मणिपुर, असम, नागालैंड, मेघालय आदि है। इन सभी राज्यों की कुछ समान विशेषताएँ हैं। समान पहाड़ी ढांचे के अलावा ये देश की मुख्य नदियों के जन्मदाता हैं। विशिष्ट खेती और इसके तौर तरीके इन्हें अन्य राज्यों से अलग करते हैं।

देव तुल्य हिमालय सदियों से देश व समाज की सभी प्राकृतिक उत्पादों से सेवा करता रहा है। सही मायनों में सर्वव्यापी हिमालय को देश की प्राकृतिक राजधानी के रूप में आंकना चाहिए। हिमालय का मतलब सारे देश के अस्तित्व से जुड़ा है। समुद्र व हिमालय परस्पर एक दूसरे के अस्तित्व पर निर्भर हैं और इनके आपसी संतुलन पर ही आज जीवन टिका है। गत एक सदी में हमने हिमालय के साथ जो व्यवहार किया है उसका ख़ामियाज़ा हमें आने वाली कई सदियों तक झेलना पड़ेगा।

हिमालय निर्माण के पीछे कई परिस्थितियों का पारस्परिक प्रभाव रहा है। करीब नौ राज्यों में फैला हिमालय 38 मिलियन लोगों का निवास ज़रुर है पर इसकी सेवा का लाभ लगभग देश में करीब 65 प्रतिशत लोग सीधा उठाते हैं। हिमालय से निकला पानी दुनिया के 18 देशों को पालता है। हिमालय में लगभग 9000 ग्लेशियर हैं और यही कारण है कि इसे जल बैंक भी दर्जा प्राप्त है। यही नहीं यह देश के 25 प्रतिशत हाइड्रोकार्बन का भी संरक्षक हैं। जल शक्ति से यह देश की 79 प्रतिशत हिस्से का मालिक है। वनस्पतियों में श्रेष्ठ हिमालय में देश की 50 प्रतिशत प्रजातियाँ विद्यमान है। इसके करीब 65 प्रतिशत भूभाग में वन हैं और 1365 भूमि में खेती होती है।

लेकिन आज विराट हिमालय की क्षमताओं पर प्रश्नचिह्न लगने वाला है। तमाम वैज्ञानिक अध्ययनों को अगर मान लिया जाए तो हिमालय के प्रति अतिसंवेदनशील व्यवहार करना होगा और यह तब ही संभव है जब हिमालय को मात्र भोगने वाली वस्तु न समझा जाए। इसमें भी प्राण की कल्पना की आवश्यकता है। हमने अब तक इसे भोगने की वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझा है। नदियां जल विद्युत के लिए, वन व्यवसाय के लिए व मिट्टी खेती के लिए। हमने इसे यही मुख्य पहचान दी। इसकी संवेदनशीलता को दरकिनार कर हमने अपनी आवश्यकता अनुसार इसका शोषण किया है। लाखों करोड़ों वर्षों के हिमालय के प्राकृतिक उत्पाद हमने मात्र 100 वर्षों में बर्बाद कर दिए। इस नुकसान की भरपाई तो शायद ही कभी हो पर हमारे व्यवहार में अंतर न आना ज्यादा चिंता का विषय है।

अब बड़े बांधों के सवाल का हमारे पास एक ही जवाब है कि यह हमारी बढ़ती ऊर्जा की आवश्यकता है। बड़े बांधों के कारण उत्पन्न पर्यावरण विपत्तियों को आवश्यकता के आगे पूरी तरह नकार दिया गया है। हिमालय के वनों से देश दुनिया की आस लगी रहती है। वनों के पर्यावरण उत्पाद ही जीवन का आधार हैं। इन वनों ने अब धीरे-धीरे साथ छोड़ना शुरू कर दिया है। एक तरफ जहां वन क्षेत्र घटा है वहीं हिमालयी प्रजातियों पर भारी विपदा आ पड़ी है।

ढांचागत विकास के नाम पर सड़कों से हिमालय में तबाही ही आई है। सड़कों की आवश्यकता को आवाजाही के लिए नकारा नहीं जा सकता पर जिस तरह से सड़कों का निर्माण होता है वह हमारी अविवेकशीलता का परिचय है और यही कारण है कि एक ही बड़ी बारिश में हिमालय की सड़कों का सारा तंत्र अस्त-वयस्त हो जाता है जिसकी भरपाई करोड़ों में भी नहीं हो पाती।

आज सभी हिमालयी राज्यों के ऊपर अगर एक दृष्टि डाली जाए तो सभी किसी न किसी रूप में दोहन के शिकार हैं। यहां हमेशा प्रकृति और निवासियों की अनदेखी हुई है। दोनों में ही रोष है। प्रकृति का गुस्सा तो फूट ही रहा है पर साथ में इस धरा के निवासी भी अपने को लंबी अनदेखी से असहज महसूस कर रहे हैं। यह बात बार-बार सबको कचोटती है कि आखिर कब तक हिमालय की उपेक्षा होगी। राज्य बनाकर हिमालय के दायित्वों से हम कतरा नहीं सकते। केंद्र राज्यों के पाले गेंद नहीं डाल सकता क्योंकि हिमालयों के उत्पादों का बड़ा हिस्सा गैर हिमालयी राज्यों के हिस्से में पड़ता है।

टुकड़ों-टुकड़ों में हम हिमालय के दर्द सुनने के आदि हो चुके हैं। नदियों और वनों की दीनता पर हमारे आंसू सूख चुके हैं। हम किसी बड़ी घटना की प्रतीक्षा में है। यह जान लेना आवश्यक है कि विराट हिमालय के बड़े गुस्से को सहने की बड़ी शक्ति हममें नहीं है। शिव ने हिमालय में जटा खोलकर भागीरथी के माध्यम से हमको कष्ट से अवश्य तारा होगा, मगर जब उनकी तीसरी आंख खुलेगी तो उस प्रलय से हमें कोई नहीं बचा सकता।

हिमालय की रक्षा का संकल्प अगर हम भावनाओं में बहकर न भी करें तो भी आने वाले महाविनाश की चिंता में तो कर ही सकते हैं। देर से ही सही पर यही हमारी सूझ-बूझ का परिचय होगा। बेहतर होगा हम संकल्प लें और इसी युग को बेहतर कर ले वरना हम अपने आप को दूसरे युग की ओर धकेल रहे हैं जो शून्य से शुरू होता है और शीत युग भी कहलाता है।

(लेखक प्रसिद्ध पर्यावरणविद हैं)

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

संबंधित कहानियां

No stories found.
India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org