कृषि में जल बचत की प्रौद्योगिकियाँ

Submitted by HindiWater on Fri, 01/24/2020 - 11:21
Source
फार्म संचालन सेवा इकाई, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली

सारांश

जल प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक ऐसा उपहार है जो न केवल जीवन, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अमूल्य है। जैव मंडल की अनेक क्रियाएं जल पर ही निर्भर करती है। भारत गाँवों का देश है। ग्रामीणों की आजीविका का साधन कृषि है और कृषि हेतु सिंचाई जल की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक 71 प्रतिशत वैश्विक जल का उपयोग कृषि कार्यों में किया जाएगा। सफल फसलोत्पादन हेतु उन्नत बीज, खाद व उर्वरक, जल, भूमि की तैयारी तथा कीट एवं बीमारियों से फसलों की रक्षा करना आवश्यक है, जिनका समुचित प्रबंधन करके हम कृषि उत्पादन को बढ़ाकर दो गुना या तीन गुना बढ़ा सकते हैं। उक्त फसलोत्पादन के कारकों में जल एक प्रमुख कारक है, क्योंकि पौधों के सम्पूर्ण जीवन काल में इसकी अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। जल की कमी से फसल उगाना लगभग असभंव हो जाता है। कृषि में परंपरागत फसलोत्पादन विधियों को अपनाने से जल का सर्वाधिक क्षति होती है जबकि वर्तमान में जल बचत हेतु अनेक सिंचन विधियाँ एवं खेती की पद्धतियाँ उपलब्ध हैं, जिन्हें अपनाकर प्रति इकाई क्षेत्र से कम जल एवं श्रम से भरपूर पैदावार ले सकते हैं।

Abstract

Water is a gift given by nature that is invaluable not only to life but also to the environment. Many functions of the biosphere depend on water. India is a country of villages. Agriculture is the means of livelihood of the villagers and irrigation water is important for agriculture. According to an estimate, by the year 2030, 71 percent of the global water will be used in agriculture. For successful crop production, it is necessary to have advanced seeds, fertilizers and fertilizers, water, land preparation and to protect crops from pests and diseases, by proper management of which we can increase agricultural production by two or three times. Water is a major factor in the above crop production factors, as it is needed in greater quantity throughout the life of plants. Growing crops becomes almost unrelated due to lack of water. The maximum loss of water is caused by adopting traditional crop production methods in agriculture, while many watering methods and farming methods are available for water saving at present, which can be adopted with less water and labor yield per unit area.

जल प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक ऐसा उपहार है जो न केवल जीवन, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अमूल्य है। जैव मंडल की अनेक क्रियाएं जल पर ही निर्भर करती है। भारत गाँवों का देश है। ग्रामीणों की आजीविका का साधन कृषि है और कृषि हेतु सिंचाई जल की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2030 तक 71 प्रतिशत वैश्विक जल का उपयोग कृषि कार्यों में किया जाएगा (चित्र 1)।

सफल फसलोत्पादन हेतु उन्नत बीज, खाद व उर्वरक, जल, भूमि की तैयारी तथा कीट एवं बीमारियों से फसलों की रक्षा करना आवश्यक है, जिनका समुचित प्रबंधन करके हम कृषि उत्पादन को बढ़ाकर दो गुना या तीन गुना बढ़ा सकते हैं। उक्त फसलोत्पादन के कारकों में जल एक प्रमुख कारक है, क्योंकि पौधों के सम्पूर्ण जीवन काल में इसकी अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। जल की कमी से फसल उगाना लगभग असभंव हो जाता है। कृषि में परंपरागत फसलोत्पादन विधियों को अपनाने से जल का सर्वाधिक क्षति होती है जबकि वर्तमान में जल बचत हेतु अनेक सिंचन विधियाँ एवं खेती की पद्धतियाँ उपलब्ध हैं, जिन्हें अपनाकर प्रति इकाई क्षेत्र से कम जल एवं श्रम से भरपूर पैदावार ले सकते हैं, जैसे;

1. टपक/बूँद-बूँद/ड्रिप सिंचाई विधि

कृत्रिम रुप से किसी पौधों की जड़ों में धीरे-धीरे सिंचाई जल को बूँद-बूँद करके पहुँचाना ड्रिप सिंचाई कहलाता है। अथवा समुचित मात्रा में नियमित रूप से पौधों के जड़ों में सीधे पानी देने की विधि को ड्रिप अथवा सूक्ष्म सिंचाई निकाय (ड्रिप/माइक्रो इरिगेशन सिस्टम) कहते हैं अथवा टपक सिंचाई वह विधि है, जिसमें प्लास्टिक पाइपों पर स्थापित जल ड्रिपर के द्वारा पौधों की जडों तथा समान रूप में सिंचाई से कम जल प्रयोग करके अधिकतम पैदावार प्राप्त की जा सकती है। इस विधि द्वारा पौंधों के जड़ क्षेत्र में तरल घुलनशील रासायनिक तथा उर्वरकों पोषक तत्वों का प्रयोग भी आसानी से किया जा सकता है। बूँद-बूँद करके जल का प्रयोग भारतीय संस्कृति में अनादि काल से शिवलिंग का सिंचन करने के लिए किया जाता है। साथ ही साथ सनातन हिन्दु धर्म में मतृक को जल देने हेतु भी बूँद-बूँद करके जल को घडें में से सिंचन के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है। परन्तु सिंचाई के लिए बूँद-बूँद जल का प्रयोग हमारे देश में पहले नही किया गया। ड्रिप इरिगेशन का विकास सिम्बाब्रास नाम के इज्राइली वैज्ञानिक द्वारा 1960 में प्रारम्भ किया गया था। मेघालय के मुक्तापुर जिले में बांस की बनी हुई नालियों के प्रयोग से सुपारी के वृक्षों को जल का प्रयोग बूँद-बूँद करके देने की विधियों का पता चला है परन्तु इसे हमेशा से जयन्तिया जन जाति प्रगति के द्वारा प्रयोग किया जाता रहा है। आधुनिक ड्रिप इरिगेशन का प्रचलन भारत में 1970 से प्रारम्भ हुआ, जो वर्तमान में 03 लाख हेक्टेयर तक फैल चुका है और विश्व स्तर पर उभर कर आगे आ रहा है। आज इस विधि का प्रयोग इन सभी क्षेत्रों में किया जाने लगा है जहाँ जल की कमी है तथा जल लवणीय है। इस विधि में पौधों की जड़ों के सहारे पाइप बिछाये जाते है और इनमें नोजल/टोटियाँ लगी होती हैं। इन टोटियों द्वारा 2-10 लीटर प्रति घण्टा की दर से जल बूँद-बूँद करके भूमि पर टपकता रहता है। धीमी गति से पड़ने के कारण पूरा जल भूमि में सोख लिया जाता है। यह उन क्षेत्रों में भी उपयोगी साबित हो रहा है जहाँ जल की कमी और मृदा लवणीय है। ड्रिप सिंचाई का मुख्य उद्देश्य फसल को एक समान मात्रा में जल उपलब्ध कराना, जल उपयोग क्षमता में वृद्धि करना, पौधे की जड़ों के पास लगातार नमी रखकर उपज बढ़ना है। ड्रिप सिंचाई में जल का समान्य दबाव 1-1.5 कि.ग्रा. प्रति वर्ग सें. मी. होता है, इस विधि में जल ईमीटर के द्वारा प्राप्त होता है, ड्रिपर एवं ईमीटर के द्वाराजल के प्रवाह की दर 2-4 लीटर प्रति घण्टा होती है। ड्रिप नालियों व लैटरल्स में रुकावट की समस्या को दूर करने के लिए 1-2 माह के अन्तराल पर तनु हाईड्रोक्लोरिक अम्ल को नालियों में प्रवाहित करना चाहिए, क्योंकि सिंचाई जल में लवणों की अधिकता में ड्रिप नालियों व लेटरल्स के ड्रिपर बन्द हो जाते हैं। यह विधि उन क्षेत्रों के लिए वरदान सिद्ध हो रही है, जहाँ जल का अभाव व मृदा में लवणों की समस्या है। यह विधि उद्यानों, बगीचों व फल वृक्षों के लिए सर्वोत्तम है। ड्रिप सिंचाई पद्धति में 1-4 लीटर/ड्रिपर/घन्टे बहाव (डिसचार्ज) रेट होता है इस में जल की आपूर्ति निरन्तर या अन्तराल पर की जा सकती है। सतही सिंचाई की तुलना में ड्रिप सिंचाई से 30-40 प्रतिशत तक जल की बचत होती है। इससे प्रति हेक्टेयर उपज भी 20 से 25 प्रतिशत अधिक प्राप्त होती है। गन्ने की सिंचाई से इस प्रकार की ड्रिप सिंचाई का प्रयोग किया जाता है। इसमें 50 प्रतिशत कम जल की आवश्यकता होती है। आजकल इसका प्रयोग हवाई द्वीप समूह में गन्ना की सिंचाई हेतु भी होता है।

टपक सिंचाई के लिए उपयुक्त फसलें

(क) सब्जियांः टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च, पत्तागोभी, फूलगोभी, भिंडी, बैगन, करेला, खीरा, मटर, प्याज आदि।

(ख) फल वाली फसलेंः अंगूर, केला, अनार, नीबू, अमरूद, आंवला, लीची आदि।

(ग) फूलों वाली फसलेंः गुलाब, कार्नेशन, जरवैरा, गुलदावदी, डहैलिया गेंदा, आदि।

(घ) तिलहन फसलेंः सूरजमुखी, ऑयल पाम, मूँगफली आदि।

ड्रिप सिंचाई के अवयव/घटक

1. जल उठाने के लिए पम्प (हेड यूनिट)

2. ऊँचाई पर जल की टंकी।

3. केन्द्रीय जल वितरण प्रणाली-जल की मात्रा तथा दबाव को नियंत्रित करने के लिए मुख्य जलापूर्ति लाइन से जुड़ी रहती है।

4. उर्वरक के प्रयोग के लिए केद्रीय वितरण प्रणाली से जुड़ी टंकी।

5. फिल्टरः जल में घुले हुए अवाछिंत पदार्थ को छालने के लिए प्रयोग करते हैं।

6. जलापूर्ति के लिए पी.वी.सी. पाइप।

7. सहायक एवं पाश्र्वपाइप लाइनः ये मुख्य लाइन से समान्तर रुप से एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।

8. प्लास्टिक के ड्रिपरः नियत मात्रा में जल देने के लिए पौधों की पंक्तियों में एक समान दूरी पर पाश्र्वलाइन में लगाया जाता है।

ड्रिप सिंचाई पद्धति के प्रकार

1. सतही बूँद.बूँद सिंचाई पद्धति

सिंचाई की इस विधि में जल दाब द्वारा प्लास्टिक की पतली नलिकाओं में जिनमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बूँद-बूँद जल निकलने के लिए कपाट लगे होते हैं, भेजा जाता है। यह प्रणाली काफी लोकप्रिय तथा इस प्रणाली को स्थापित करने, देख-रेख करने, उत्सर्जक (ड्रिपर) की सफाई करने अथवा उसे बदलने में सुविधा रहती है। यह विधि मुख्यतः उन क्षेत्रों के लिए हितकर पाई गई है जहाँ पर जल की बहुत कमी हो, जलवायु मरुस्थलीय हो तथा पौधे एक दूसरे से काफी दूरी पर लगाए गए हों। इस विधि के द्वारा विभिन्न फसलों की पैदावार तथा जल की बचत सारणी 1 में दी गई है, सतही बूँद-बूँद सिंचाई द्वारा उर्वरक देने की फर्टीगेशन विधि में विभिन्न फसलों की उपज में वृद्धि तथा उर्वरक की बचत सारणी 2 में दर्शायी गई है।

2. उप-सतही बूँद-बूँद सिंचाई

इस विधि से सिंचाई इजराइल तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ दक्षिण-पश्चिमी भागों में की जा रही है। इस विधि में पाश्र्व पाइप तथा ड्रिपर दोनों ही भूमि के भीतर दबा दिये जाते है इस विधि में फसलों में की जाने वाली सस्य क्रियाये में कोई परेशानी नहीं होती है। इस विधि में पेड़ या पौधे के आसपास जल बूँद-बूँद करके नालियों से बाहर आता है और दो पौधों या पेड़ों के बीच की पूरी भूमि की सिंचाई नहीं की जाती है जिसके फलस्वरूप सिंचाई दक्षता अधिक होती है और सीमित प्राप्य जल से अधिक क्षेत्र की सिंचाई हो सकती है। इस विधि द्वारा जल के साथ-साथ घोल के रूप में उर्वरक डालने की उपयोगिता पर भी अनुसंधान किए जा रहे हैं।

3. सूक्ष्म सिंचाई अथवा ड्रिप सिंचाई पद्धति

इस पद्धति में सहायक पाश्र्व तथा ड्रिपर भूतल पर स्थित होते हैं परन्तु इनसे सिंचाई जल बाहरी फुहार अथवा फुवार के रूप में मृदा पर पड़ता है इस विधि का प्रयोग कम दूरी पर बोई गई फसलों में किया जाता है।

4. स्पन्द ड्रिप सिंचाई पद्धति

इस पद्धति में लगातार स्पन्द के रुप में दिया जाता है अर्थात ऐसी व्यवस्था होती है जो यंत्र में सामंजन करके 5-10 या 15 मिनट के अन्तराल पर जल दिया जाता है।

ड्रिप सिंचाई के लाभ

1. इस विधि में 40-70 प्रतिशत जल की बचत होती है तथा 90-95 प्रतिशत जल प्रयोग क्षमता प्राप्त होती है।

2. इस विधि में 60-80 प्रतिशत तक समय व श्रम की बचत तथा लवणीय जल का प्रयोग भी किया जा सकता है अर्थात् लवणीय जल का प्रयोग भी संभव है।

3. इस विधि द्वारा उत्पाद गुणवत्ता के साथ-साथ फसल की उपज में 30-50 प्रतिशत तक की बचत तथा खरपतवारों की समस्या को भी रोका जा सकता है।

4. इस विधि द्वारा उर्वरक देने पर 50 प्रतिशत उर्वरकों की बचत हो सकती है।

5. यह प्रणाली जल की कमी वाले क्षेत्रों, उबड़-खाबड, रेतीले क्षेत्रों, पहाड़ी क्षेत्रों तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए फसलों की सिंचाई करने में सक्षम है।

6. सिंचाई के साथ-साथ उर्वरक एवं कीटनाशी दवाओं का प्रयोग आसानी से एवं सामान्य रूप से हो सकता है।

7. इस विधि में जल पोषक तत्वों को घोलकर सीधे जड़ क्षेत्र में पहुँचा दिया जाता है जिससे पोषक तत्व क्षमता बढ़ जाती है।

8. पौधों का मूल क्षेत्र ही गीला रहता है अतः दो पंक्तियों के मध्य मृदा शुष्क तथा ठोस रहने से सस्य कार्य आसानी से किये जा सकते है।

9. सिंचाई हेतु खेत में क्यारी या मेंड़ बनाने की कोई आवश्यकता नही होती है।

10. पौधों को जल की कमी ग्लानि बिन्दु तक कभी नहीं आती जिससे पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।

11. यह पद्धति हवा की दशा में कम प्रभावित होती है।

12. यह जल के अभाव एवं लवणता वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।

13. लवणीय जल का उपयोग किया जा सकता है।

14. यह विधि अधिक दूरी पर उगाई जाने वाली फसलों, बगीचों एवं सब्जियों जैसेः टमाटर, भिण्डी, पत्तागोभी, फूलगोभी तथा पॉलीहाउस, शेडनेट हाउस के लिए बहुत उपयुक्त है।

15. लगभग 10 प्रतिशत मजदूरी लागत में बचत होती है।

16. फसल गुणवत्ता में सुधार एवं फसल जल्दी पकती है।

17. पैदावार एवं उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होती है।

18. खेतों को समतल करने की आवश्यकता नहीं होती है।

19. शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई की यह विधि अधिक उपयोगी है।

20. तेज वायु चलने पर भी सिंचाई में कोई परेशानी नहीं होती है।

21. सिंचाई जल का सदुपयोग होता है।

2. ड्रिप सिंचाई विधि में फर्टिगेशनः ड्रिप सिंचाई प्रणाली के द्वारा जल के साथ जल में घुलनशील या द्रव उर्वरकों को पौधों तक पहुँचाना फर्टिगेशन कहलाता हैं। फर्टिगेशन के द्वारा पोषक तत्वों को जल उत्सर्जक के ठीक नीचे वाले भाग में प्रयोग किया जाता है जहाँ पर जड़ों की क्रियाविधि केन्द्रित रहती है।

फर्टिगेशन की आवृत्ति

उर्वरकों की ड्रिप सिंचाई प्रणाली में विभिन्न आवृत्तियों में (प्रतिदिन, दो दिन में एक बार या सप्ताह में एक बार) दिया जा सकता है। यह आवृत्ति प्रणाली की रूपरेखा, सिंचाई तत्वों की आवश्यकता और किसान के चुनाव पर निर्भर करती है।

फर्टिगेशन के लिए उपयुक्त उर्वरक

नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटेशियम के बहुत से स्रोत है जिन्हें कि सूक्ष्म सिंचाई के साथ प्रयोग किया जा सकता है।

फर्टिगेशन के लाभ

ऽ जल एवं उर्वरकों की उपयोग क्षमता में वृद्धि होती है।

ऽ उर्वरकों को फसल की मांग के अनुसार दे सकते हैं।

ऽ फर्टिगेशन से उर्वरक प्रयोग में आने वाली लागत, परम्परागत विधियों से उवरक प्रयोग में आने वाली लागत की एक तिहाई होती है।

3. जल बचत हेतु स्प्रिंकलर सिंचाई विधि: छिड़काव सिंचाई पद्धति एक ऐसी पद्धति है जिसके द्वारा सिंचाई जल का हवा में छिड़काव किया जाता है और यह जल भूमि की सतह पर कृत्रिम वर्षा के रुप में गिरता है। इस विधि में पौधों की दो पंक्तियों के बीच में लोहे या रबर के पाइप भूमि के ऊपर बिछा दिये जाते है। स्प्रिंकलर सिंचाई बलुई मृदा, ऊँची-नीची भूमि तथा जहाँ पर जल कम उपलब्ध है वहाँ पर प्रयोग की जा सकती है। इस विधि के द्वारा गेहूँ, कपास, मूँगफली, तम्बाकू तथा अन्य फसलों में सिंचाई की जा सकती है। इस विधि से कम श्रम, समय तथा जल में अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती हैं तथा 30 से 50 प्रतिशत जल की बचत की जा सकती है।

स्प्रिंकलर/बौछारी/फव्वारा/ओवर हेड

छिड़काव सिंचाई पद्धति एक ऐसी पद्धति है जिसके द्वारा सिंचाई जल का हवा में छिड़काव किया जाता है और यह जल भूमि की सतह पर कृत्रिम वर्षा के रुप में गिरता है। इस विधि में पौधों की दो पंक्तियों के बीच में लोहे या रबर के पाइप भूमि के ऊपर बिछा दिये जाते है।

सहायक पाइप एक-दूसरे से समान्तर रखते हुये आवश्यकतानुसार दूरी पर नोजल लगा दिये जाते है। नोजल घूमने वाले या स्थिर हो सकते है। इन नलों का संबंध मुख्य नल से व मुख्य नल का सम्बंध जल स्रोत से कर दिया जाता है। इन नलों में जल अधिक दबाव से प्रवाहित किया जाता है। जिससे जल तेज बहाव के साथ निकलता है और स्प्रिंकलर में लगी नोजल पानी को फुहार के रूप में बाहर फैंकती रहती है। स्प्रिंकलर हमेशा घूमता रहता है जिससे उसके क्षेत्र को खेत में इधर-उधर ले जाया जा सकता है। स्प्रिकंलर एवं शाखा लाइनों की आपसी दूरी लगभग 12 मीटर रखी जाती है। हमारे देश में 1980 के दशक के बाद बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है। इस विधि द्वारा सतही जल बहाव बिल्कुल नहीं होता है जिन क्षेत्रों में फसल पाले अथवा अधिक तापमान से प्रभावित होता है वहाँ पर इस विधि द्वारा सिंचाई करके फसल को बचाया जा सकता है तथा अधिक पैसे देने वाली फसलों जैसे, चाय, कॉफी, बागानों आदि के लिए सिंचाई की यह विधि अधिक उपयुक्त है परन्तु धान एवं जूट के लिए उपयुक्त नहीं है। यह विधि काली मृदाओं को छोड़कर सभी मृदाओं के लिए उपयुक्त है। फव्वारा या छिड़काव सिंचाई में जल का दबाव 2-2.5 कि.ग्रा. प्रति वर्ग सें. मी. होता है तथा इस प्रणाली में जल का डिस्चार्ज 1000 लीटर प्रति घन्टे प्रति नोजल होता है। 5 नोजल वाले सेट से एक घण्टे में लगभग 4000-5000 लीटर जल छिड़का जा सकता है। इस विधि से एक एकड़ क्षेत्रफल की सिंचाई लगभग 3-4 घण्टे में की जा सकती है। देश में लगभग 30 लाख हेक्टेयर भूमि में इसका प्रयोग हो रहा है। स्प्रिंकलर सिंचाई बलुई मृदा, ऊँची-नीची भूमि तथा जहाँ पर जल कम उपलब्ध है वहाँ पर प्रयोग की जा सकती है। इस विधि के द्वारा गेहूँ, कपास, मूँगफली, तम्बाकू तथा अन्य फसलों में सिंचाई की जा सकती है।

स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति के मुख्य अवयव/घटक

पम्पिंग सेट या जल उठाने वाला यंत्र, उर्वरक टैंक, प्रेसर मेज, फव्वारा नोजल, बाइ पास वाल्व, छलनी प्रणाली, कन्ट्रोल वाल्व पाइप लाइन, छिड़काव यंत्र आदि।

स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली के प्रकार

स्प्रिंकलर सिंचाई (इरीगेशन) प्रणाली का वर्गीकरण मुख्यतः दो भागों में किया गया है जो जल छिड़काव के कार्य विधि पर आधारित है

1. घूमता हुआ फव्वाराः सैट्रल पिवट, रोटेटिंग बूम टाइप, साइड रोल लेटरल टाइप।

2. छिद्र युक्त पाइप प्रणाली

स्थानान्तरित पर आधारित फव्वारा सिंचाई प्रणाली का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है पूर्ण रूप से स्थानान्तरित योग्य प्रणाली, आंशिक रूप से स्थानान्तरित योग्य प्रणाली, पूर्ण स्थाई प्रणाली, आंशिक स्थाई प्रणाली।

स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति के लाभ

1. खेत में बनाई जाने वाली नालियों तथा मेंड़ों की कोई आवश्यकता नहीं होती है तथा उनके रख रखाव आदि में कोई खर्च भी नहीं होता है।

2. खेत में सिंचाई की नालियों तथा मेंड़ बनाने से कुल सस्य क्षेत्र में कमी हो जाती है परन्तु इस विधि द्वारा कुल सस्य क्षेत्र में कमी नहीं हो पाती है।

3. कम श्रम, समय तथा जल में अधिक क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती हैं तथा इसके प्रयोग से 30 से 50 प्रतिशत जल की बचत होती है।

4. इस विधि के द्वारा घुलनशील उर्वरक भी लगाये जा सकते हैं, जिससे उर्वरक की बचत होती है।

5. भूमि को समतल करने की आवश्यकता नहीं होती है तथा उबड़-खाबड़ जमीन के लिए भी यह प्रणाली उपयुक्त है।

6. पाला व ठण्ड से फसलों के बचाव में सहायता करती है।

7. सिंचाई के जल के साथ उर्वरक, कीटनाशी, कवकनाशी दवाओं का भी आसानी से प्रयोग किया जा सकता है।

8. सघन व बागवानी फसलों के लिए यह विधि उपयोगी है।

9. नर्सरी उत्पादन और श्री विधि से बुवाई गई फसलों के लिए यह विधि उपयोगी सिद्ध हुई।

10. अन्य विधियों की अपेक्षा इससे जल उपयोग क्षमता बढ़ती है।

11. चाय, कॉफी, इलाइची और बगीचों की फसलों के लिए उपयुक्त है।

12. परम्परागत सिंचाई विधि की तुलना में 30-40 प्रतिशत लागत में बचत होती है।

13. यह प्रणाली भारी मृदा को छोड़कर सब प्रकार की मृदा के लिए उपयुक्त है तथा बलुई-भूमि के लिए अधिक उपयोगी है।

14. उर्वरक एवं कीटनाशी रसायनों का सिंचाई के साथ प्रयोग संभव है।

15. इस विधि में जल की हानि बहुत कम होती है।

4. जल बचत हेतु लेजर लैंड लेवलिंग पद्धति आधुनिक खेती में ट्रैक्टर एवं भारी-भरकम कृषि मशीनों के उपयोग के कारण खेती में समतलता एवं मेंडें सुरक्षित नहीं रहीं, जिससे वर्षा जल का अधिकांश भाग बहकर नष्ट हो जाता है। इसके अलावा कृषि भूमि की समतलता बिगड़ती जा रही है, साथ ही फसलों को दिए गए पोषक तत्वों का एक बड़ा हिस्सा भी वर्षा जल के साथ बहकर नष्ट हो जाता है। इस समस्या के कारण फसल की औसत पैदावार में गिरावट आ जाती है। कभी-कभी एक ही तरह के कृषि यंत्रों द्वारा एक ही गहराई पर बार-बार जुताई करने के कारण अधो-भूमि में हल तल के नीचे सख्त (कठोर) परतों का निर्माण हो जाता है, जिसके कारण मृदा में वायु नमी के आवागमन में बाधा पहुँचती है। साथ ही पौधों की जड़ों का विकास भी ठीक तरह से नहीं हो पाता है । इस प्रकार की समस्याओं के निवारण के लिए आधुनिक कृषि यंत्र लेजर लैण्ड लेवलर के उपयोग से खेतों को पूर्णतया समतल किया जा सकता है। यह यंत्र चार उपकरणों से मिलकर बना होता है। जिसके तीन उपकरण कन्ट्रोल बॉक्स, लेजर ग्राही और मांजा (बकेट) एक ट्रैक्टर में लगे होते हैं तथा लेसर ट्रांसमीटर खेत के बाहर तिपाई पर रखा जाता है। यह लेसर ट्रांसमीटर खेत के समान्तर लेजर तरगें अपने चारों और भेजता है जिन्हें मांझे पर लगा लेजर ग्राही (रिसीवर) पकड़ लेता है और उन्हें कन्ट्रोल बॉक्स को भेजता है। ट्रैक्टर ड्राइवर की सीट की बगल में लगा हुआ यह कन्ट्रोल बॉक्स मांझे को आवश्यकतानुसार ऊपर नीचे करता रहता है, जिससे खेत में चलता हुआ ट्रैक्टर खेत को पूर्ण समतल कर देता है। यदि एक एकड़ खेत का ढ़लान 10 सें.मी. से कम है तो समय दो घन्टे प्रति एकड़ लगता है। इस यंत्र द्वारा समतल भूमि पर जल, उर्वरक, खाद, पोषक तत्व आदि एकसार वितरित होते हैं तथा उनका न्यूनतम क्षरण होता है। इस तकनीक से 20 से 30 प्रतिशत जल की बचत, 40 से 50 प्रतिशत पैदावार में बढ़ोतरी एवं 30 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि बढ़ जाती है। इसकी कीमत 3.25 से 4.50 लाख तक है तथा विभिन्न राज्य सरकारें इस पर 50 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है।

5. जल बचत हेतु शून्य जुताई विधि द्वारा फसलोत्पादन

आजकल किसान जीरो टिलेज से धान, बाजरा, कपास, मक्का, अरहर, एवं सरसों के खेतों में सीधे गेहूँ, मूँग, चना तथा सरसों की बुवाई करने लगे हैं। इस विधि से 15 से 20 प्रतिशत जल की बचत होती है तथा समय से गेहूँ की बुवाई होने से 20 से 25 प्रतिशत अधिक पैदावार मिलती है। जीरो-टिलेज तकनीक का खेती में लागत कम करने फसलों की बुवाई समय पर करने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में अनोखी विधि है। इससे गेहूँ की बुवाई बहुपयोगी एवं लाभकारी साबित हुई है। आजकल किसान जीरो टिलेज से धान, बाजरा, कपास, मक्का, अरहर एवं सरसों के खेतों में सीधे गेहूँ, मूँग, चना तथा सरसों की बुवाई करने लगे हैं, परन्तु यह मशीन विशेष रूप से गेहूँ की बुवाई के लिए डिजाइन की गई थी। इस तकनीक द्वारा अगेती एवं पछेती दोनों तरह की बुवाई कर सकते हैं। अच्छी पैदावार के लिए बीज एवं उर्वरक की मात्रा पारंपारिक विधि के बराबर ही रखनी चाहिए। सामान्यतः धान, मक्का, कपास, व अरहर की पछेती किस्मों की कटाई के उपरान्त खेत में गेहूँ की फसल के लिए खेत तैयार करने का समय नहीं मिल पाता है और किसान के पास खेत को खाली छोड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं रहता है। जीरो-टिलेज ड्रिल से बुवाई करके किसान इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। इस मशीन द्वारा पूर्व फसलों की कटाई करने के उपरान्त उसी खेत की बिना जुताई किये गेहूँ की बुवाई कर सकते हैं। यह मशीन साधारण बुवाई मशीन की तरह ही होती है उसी तरह ही कार्य करती है, इसमें केवल अन्तर फरो-ओपनर का होता है जो नूकीले चाकू की तरह होते है जिनमें बीज बिना कोई कठिनाई के उचित गहराई पर पहुँच जाता है। इस मशीन में सन्तुलित एवं उचित मात्रा में बीज गिराने के लिए फ्लूटेड रोलर लगाए गए है तथा उर्वरक डालने के लिए खाचेंदार ऊध्र्वाधर रोलर्स लगाए गए हैं। उर्वरक की मात्रा को उर्वरक के बक्से में किये छिद्रों के आकार को कम या अधिक करके निर्धारित किया जाता है।

उर्वरक व बीज गिराने की इकाइयों को चलाने के लिए शक्ति, सामने की तरफ दिये गये पहिए से चैन और गरारी के द्वारा दी जाती है। बीज की गहराई को कम या अधिक करने के लिए मशीन के दोनों तरफ पहिये लगे होते हैं। यह मशीन 35 या उससे अधिक अश्व-शक्ति वाले ट्रैक्टर द्वारा चलाई जा सकती है। यह मशीन 9/11 कूंडों में बुवाई के लिए उपलब्ध है। कूंड खोलने वाले भाग (फरो-ओपनर) ‘शू‘ के आकार के होते है। कूंड से कूंड की दूरी कम या अधिक करने का प्रावधान होता है। प्रायः इस मशीन का आकार लगभग 1800 मि.मी. लम्बाई, 600 मि.मी. चैडाई, 1100 मि.मी. ऊँचाई तथा भार 250 कि.ग्रा. होता है। इस तकनीक के प्रयोग से एक और गेहूँ की उत्पादन लागत में कमी आती है तो वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण हितैषी भी है। अतः इस तकनीक को किसानों में और अधिक लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता है।

जीरो-टिलेज ड्रिल द्वारा गेहूँ की बुवाई से लाभ

1. इस मशीन से गेहूँ की बुवाई करने पर खेत तैयार करने पर होने वाले खर्च में 2500 से 3000 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से बचत कर सकते हैं।

2. इस मशीन से 1.5 हेक्टेयर प्रति घन्टे से बुवाई की जा सकती है।

3. देरी से बुवाई की अवस्था में इस मशीन से बुवाई संभव है।

4. जीरो-टिलेज ड्रिल के प्रयोग से 75-85 प्रतिशत ईधन, ऊर्जा एवं समय की बचत होती है।

5. सामान्य बुवाई की अपेक्षा गेहूँ के बीजों का अँकुरण 2-3 दिन पहले ही हो जाता है तथा जुताई न होने के कारण खरपतवारों के बीज मिट्टी में निचली सतह में पड़े रहने के कारण मंडूसी का प्रकोप कम होता है।

6. इस विधि से 15 से 20 प्रतिशत जल की बचत होती है।

7. समय से गेहूँ की बुवाई होने से 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा पैदावार मिलती है।

8. मृदा एवं पर्यावरण प्रदूषण में कमी आती है।

9. पिछली फसल के अवशेष भूमि में मिलकर या सड़कर मृदा गुणवत्ता में वृद्धि करते हैं।

10. बुवाई में गेहूँ का कम बीज गिरता है।

6. उठी हुई क्यारियों पर बुवाई तकनीकः यह ट्रैक्टर चालित यंत्र भारतीय गेहूँ व जौ अनुसंधान संस्थान (पुराना नाम-डी.डब्ल्यु.आर.) करनाल, हरियाणा द्वारा मेंड़ों पर गेहूँ की बुवाई के लिए विकसित किया गया है। यह यंत्र सिंचित क्षेत्रों के लिए धान, सोयाबीन, कपास व मक्का आदि के बाद गेहूँ की बुवाई हेतु उपयुक्त है। उत्तर-पश्चिमी भारत में प्रचलित फर्टी-सीडड्रिल द्वारा समतल भूमि में बुवाई करने की अपेक्षा इस विधि द्वारा बुवाई करने पर उपज में 5 से 10 प्रतिशत बीज, उर्वरकों एवं सिंचाई जल की कम खपत होती है तथा फसल गिरने की कम संभावना होती है। यह यंत्र अच्छी जुती हुई भूमि पर एक बार में ही मेंड़ बनाकर उन पर बीज की बुवाई और मेंड़ों को सही आकार में रखने का कार्य करता है। यह यंत्र दो मेंड़ों पर 6 लाइनों में बुवाई करता है। उभरी हुई क्यारियों की चैडाई को 56 से 70 सें.मी. के बीच समायोजित किया जा सकता है। इसको 35 से 45 अश्व-शक्ति के ट्रैक्टर द्वारा चलाया जा सकता है। इसकी कार्य क्षमता 0.2 हेक्टेयर प्रति घन्टा है (चित्र)। इस यंत्र में उभरी हुई मेंड़ बनानें के लिए रिजर लगे होते है। बीज को नियमित तथा निर्धारित मात्रा में गिराने के लिए फ्लुटेड रोलर लगे होते हैं। उर्वरक को कप के आकार वाले रोटर द्वारा गिराया जाता है। मेंड़ों को समतल तथा आकार देने के लिए एक बड़ा शेपर यंत्र के पीछे लगा होता है। मेंड़ों की बीच की नालियों से सिंचाई की जाती है तथा बरसात में जल निकासी का लाभ भी इन्ही नालियों से होता है।

इस पद्धति में बुवाई के लिए मृदा का भूरभूरा होना आवश्यक है तथा अच्छे जमाव के लिए पर्याप्त नमी होनी चाहिए। गेहूँ के तुरन्त बाद पुरानी मेंड़ों को पुनः प्रयोग करके खरीफ फसलों जैसे मूँग, मक्का, कपास, सोयाबीन, अरहर आदि फसलें उगाई जा सकती है। इस विधि से दलहन व तिलहन की 15 से 20 प्रतिशत अधिक उपज मिलती है तथा रबी मौसम की फसलों में फेलेरिस माइनर खरपतवार का मेंड के ऊपर कम जमाव होता है। इसके अतिरिक्त लगभग 20-30 प्रतिशत तक जल की बचत होती है।

7. जल बचत हेतु धानउगाने की श्री विधि

इस पद्धति का विकास मेडागास्कर में हुआ था। धान उगाने की इस विकसित के पाँच प्रमुख अवयव हैं

1. धान के 8 से 12 दिन के नवजात पौधों का रोपण जिसमें एक स्थान पर मात्र एक पौधा हो।

2. अधिक दूरी पर वर्गाकार पौध रोपण।

3. सीमित सिंचाई कर पानी की बचत।

4. बार-बार खेत में खरपतवार नियंत्रण हेतु क्रियाओं द्वारा वायु के अधिक आवागमन को बरकरार रखना।

5. अधिक से अधिक कार्बनिक खादों का उपयोग।

इस विधि से एक हेक्टेयर खेत हेतु पौध तैयार करने के लिये मात्र 100 वर्ग मी. क्षेत्रफल तथा मात्र 7.5 कि.ग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। जबकि परम्परागत विधि में 800 वर्ग मी. क्षेत्रफल तथा 60 से 75 कि.ग्रा. बीज लगता है। चूँकि इस विधि में गोबर की खाद का विशेष महत्व है अतः 30 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद डालना लाभकारी होता है। इस विधि में 8 से 12 दिन के पौध के एक-एक पौध को 25×25 अथवा 30×30 सें.मी. की दूरी पर रोपित करते हैं। इसके बाद अत्यन्त हल्की सिंचाई करते हैं और खेत को लगभग नम अवस्था में रखा जाता है। इस विधि में जड़ों के अच्छे विकास, कल्लों के फुटाव में बढ़ोतरी, बाल वाले कल्लों की अधिक संख्या, खेत में फसल न गिरने एवं पोषक तत्वों की उच्च दक्षता के कारण न सिर्फ परम्परागत धान उगानें की विधि से अधिक पैदावार प्राप्त होती है अपितु 30 से 40 प्रतिशत जल की भी बचत होती है।

8. धान जल बचत हेतु एरोबिक विधिः इस विधि में धान के बीज को गेहूँ की तरह ही खेत तैयार कर सीधे खेत में बो दिया जाता है। जिससे खेत में कद् (पड़लिंग) करने एवं पौधे उगाने पर खर्च होने वाले 20-300 मि.मी. जल की सीधी बचत हो जाती है। इस विधि द्वारा धान की बुवाई समय पर हो जाने के कारण अगली फसल गेहूँ के लिये समय से खेत भी खाली हो जाता है। धान उगाने की इस विधि में अल्प एवं मध्यम अवधि में पकने वाली प्रजातियों का चुनाव किया जाता है। जो कि शीघ्र पकती हो एवं खरपतवारों के साथ अच्छी स्पर्धा करने की क्षमता रखती हों। पूसा सुगन्ध-3 और 4, पूसा संकर धान-10 एवं प्रो-एग्रो 6111 ऐसी ही प्रजातियाँ हैं जो कि शुरुआत में उगी खरपतवारों की पहली खेप को अच्छी स्पर्धा देती हैं। इन प्रजातियों का 30-40 कि.ग्रा. बीज एक हेक्टेयर खेत की बुवाई हेतु पर्याप्त होता है। अच्छे अँकुरण हेतु बीज को खेत में 3 से 4 सें.मी. की गहराई पर गिराना व मिट्टी से भली-भांति ढ़कना आवश्यक होता है। शुरूआत में ही जल की भी बचत कर लेने से जल की उत्पादकता में आशातीत वृद्धि देखी गई (चित्रः ) है।

इस विधि से उगाये गये धान के खेतों में खरपतवारों की समस्या प्रमुख होती हैं अतः बुवाई के तुरन्त बाद पेण्डीमिथेलीन को तीन लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से खेत में 25 दिन तक घास कुल के खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु 2, 4-डी का 500 ग्राम ए. आई. प्रति हेक्टेयर का प्रयोग बुवाई के 21 दिन बाद करना लाभदायक होता है। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग स्थान विशेष हेतु की गई सिफारिशों के अनुसार करना उचित होता है। आवश्यकता से अधिक नत्रजनीय उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अँकुरण के बाद पहली सिंचाई में 7 से 10 दिन की देरी की जा सकती है। जिससे जड़ें गहराई तक चली जाती हैं। कल्लों के फुटाव के समय जल अत्यन्त ही आवश्यक होता है। इसके अलावा वर्षा के अनुसार बदलाव लाते हुये 7 से 10 दिन के अन्तराल से सिंचाई कर 30 से 40 प्रतिशत जल की बचत के साथ-साथ धान की अच्छी पैदावार (4-4.5 टन प्रति हेक्टेयर) ली जा सकती है। कहीं कहीं पर लौह तत्व (आयरन) की कमी होने की शिकायत आ सकती है। ऐसी स्थिति में फेरस सल्फेट का घोल पत्तीयों पर छिड़का जा सकता है।

9. एक्वा फर्टी सीड-ड्रिल से बुवाईः शुष्क भूमि में अगेती बुवाई हेतु एक्वा-फर्टी सीड डिल के प्रयोग से बारानी क्षेत्रों में खेत तैयारी के समय सिंचाई जल की आवश्यकता नही होती है जिससे लगभग फसलोत्पादन में 20 प्रतिशत जल की बचत होती है। क्योंकि इस यंत्र मे दाने के साथ पर्याप्त जल भी दिया जाता है। शुष्क भूमियों में बुवाई के समय मृदा नमी उपलब्धता में बहुत अनिश्चितता होने के कारण फसलोत्पादन बहुत कठिन कार्य है। इस कारण यह है कि बीजों के समुचित अँकुरण एवं प्रारम्भिक अवस्था में फसल के स्थापित होने में समस्या आती है। एक्वा-फर्टी ड्रिल के प्रयोग से सही मात्रा में जल तथा समुचित सान्द्रता में उर्वरकों के प्रयोग द्वारा अच्छा अँकुरण एवं फसलों की प्रारम्भिक अवस्था में स्थापन में सहयोग प्राप्त होता है। बाद में, उपसतही मृदा में संरक्षित जल की सहायता से तथा सर्दी के मौसम में होने वाली वर्षा द्वारा फसलों की बढ़वार जारी रहती है। एक्वा-फर्टी सीड ड्रिल द्वारा जल तथा उर्वरक घोल का प्रचालन इस प्रकार किया जाता है कि 1000 लिटर जल के उपयोग से 2 मि.मी. सिंचाई के साथ एक हेक्टेयर क्षेत्रफल को पूरा किया जा सकता है।

10. पलवार तकनीकः पलवार एक मृदा नमी एवं वायु संरक्षित करने की प्रक्रिया है। इस विधि में खड़ी फसलों में नमी सरंक्षण व सिंचाई जल बचत हेतु पलवार के रूप में फसल अवशेष एवं प्लास्टिक पॉलीथीन का उपयोग किया जाता है। पलवार जैविक खाद को बढ़ावा देता है एवं खरपतवार को दबाता है एवं फसलों हेतु पानी बनाएं रखता है।

11. बिना निवेश की तकनीकेंः किसानों का उपयोगी फसल-चक्र अपनाना ताकि वे कम से कम जल में अधिक से अधिक फसले ले सकें। जैसे खरीफ में धान के स्थान पर दलहनी फसलें, जौ, बाजरा, मक्का, ग्वार आदि जोकि 1 या 2 बार सिंचन से भरपूर उपज देती हैं। रबी में चना, मटर, सूरजमुखी व तिलहनी फसलों को फसल चक्र में प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इन फसलों को कम सिंचाई जल चाहिए। इनके अतिरिक्त निम्न पद्धतियों का उपयोग करना चाहिएः

1. कम से कम जल चाहने वाली फसले उगानी चाहिए।

2. धान-गेहूँ का क्षेत्र कम करना होगा, क्योंकि एक तो इसका उत्पादन अत्यधिक मात्रा में हो रहा है और दूसरा इसमें जल की मात्रा की मांग भी अधिक है।

3. खेत की नालियों का ढ़ाल खेत के अनुसार ठीक ढंग से हो ताकि जल के बहाव में रुकावट न आए और समय की बचत हो।

4. बाग लगाकर और टपक विधि का प्रयोग करके हम जल की बचत कर सकते हैं।

5. हमें अपनी फसलों में हल्का जल लगाना चाहिए न कि अधिक मात्रा में, इससे एक तो जल की मात्रा कम लगेगी और दूसरा उपयोगी पोषक तत्व खराब नहीं होंगे।

6. खेतों की डोल को अधिक बड़ी नहीं बनाना चाहिए। खेत को छोटे-छोटे भागों में बांटना चाहिए ताकि एक तो जल का उचित प्रयोग हो सके और दूसरा कम से कम समय में अधिक से अधिक सिंचाई हो सके।

7. नालियों का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा न होकर सीधा होना चाहिए, ताकि जल के बहाव में अवरोध न आए और अधिक से अधिक जल कम से कम समय लग सके।

प्रति बूंद जल से अधिकतम फसलोत्पादन लेने हेतु उपाय

सिंचाई एवं जल संरक्षण थीम के अन्तर्गत जब हम जल की बचत व उचित सिंचाई प्रबंधन की बात करें तो, जिससे हमारी खेती को टिकाऊ, आयवर्धक, व्यावसायिक एवं समृद्ध बनाने के साथ-साथ ‘पर ड्रॉप मोर क्राप‘ का नारा प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के अन्तर्गत दिया गया है। प्रति बूँद जल से अधिकतम उत्पादन के लिए निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखना चाहिए जिससे कम जल द्वारा अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके, जैसे;

  • सिंचाई की नालियां कम चैड़ी व गहरी होनी चाहिए तथा पक्की बना देनी चाहिए।
  • सिंचाई की नालियों में उचित ढाल रखना चाहिए।
  • खेतों को समतल कर देना चाहिए।
  • खेतों से वाष्पीकरण द्वारा जल की हानि को, निराई-गुड़ाई, कृत्रिम आच्छादन व ऐसी फसले खेतों में उगाकर जो अधिक आच्छादन प्रदान करती है, द्वारा कमकरना चाहिए ।
  • खेतों की मेड़बंदी मजबूत करनी चाहिए, जिससे खेतों के अन्दर अपधावन न होने पाये।
  • खेतों में जीवांश पदार्थ व चिकनी मिट्टी मिलानी चाहिए।
  • फसलों की ऐसी जातियों का प्रयोग करना चाहिए जिनकी जड़ों की वृद्धि अधिक होती है।
  • खेतों को खरपतवारों से मुक्त रखना चाहिए।
  • खेतों में लवणों को समाप्त कर देना चाहिए।
  • सिंचाई की नालियां जहाँ तक सम्भव हो छोटी बनानी चाहिए।
  • सिंचाई की ऐसी विधि प्रयोग करनी चाहिए, जिसमें कम जल से अधिक क्षेत्रफल सिंचित हो सके।
  • अधो सतह सिंचाई विधि/भूमिगत सिंचाई विधि, टपक या बौछारी सिंचाई विधि अपनाकर जल उपयोग क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
  • खेतों में सिंचाई जल लगाते समय लापरवाही नही करनी चाहिए।
  • सिंचाई देर तक और आवश्यकता से अधिक नहीं करनी चाहिए।
  • दिये गये जल की गहराई फसल के अनुसार रखनी चाहिए।
  • खेतों में समय पर खरपतवार नियंत्रण करते रहें।
  • Reference
  • कृषि में उन्नत जल प्रबंधन द्वारा अनिल कुमार मिश्र, मनोज खन्ना, एस.एस. परिहार एवंटी.बी. एस. राजपूत, जल प्रौद्योगिकी केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नईदिल्ली-110012
  • जल प्रौद्योगिकीः सिंचाई और जल निकास, द्वारा विश्वनाथ मिश्र, कुशल पब्लिकेशन एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, वाराणसी।
  • कृषि संवाद, जून 2010,पानी बचाएं-जीवन बचाएं द्वारा संवाद सोसायटी, एससीओ-23, सेक्टर-7सी, चंडीगढ़।
  • योजना, जुलाई 2010, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सूचनाभवन, सीजीओ कॉम्पलेक्स, लोधीरोड, नई दिल्ली।
  • 5. कुरुक्षेत्र, जनवरी 2013, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सूचना भवन, सीजीओ कॉम्पलेक्स, लोधीरोड, नई दिल्ली।
  • कुरुक्षेत्र, मई 2015, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सूचना भवन, सीजीओ कॉम्पलेक्स, लोधी रोड, नई दिल्ली।
  • खेती, कृषि ज्ञान प्रबंधन निदेशालय द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली।
  • प्रसारदूत, एटीक, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली।
  • लवणीय एवं क्षारीय जल का कृषि में सुरक्षित उपयोग, बुलेटिन, जल प्रौ. केन्द्र, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली।
  • Venkata SriharshaKuncham, Prof Rao N.V., 2014. Sensors for Managing Water Resources in Agriculture. IOSR Journal of Electronics and Communication Engineering. IOSR-JECE. Volume 9. Pp. 2278-2834.
  • Pereira A. B. and C. C Shock. 2006. Development of irrigation best management practices for potato from a research perspective in the US.Sakia.org e publish, 2006, Vol. 1, 1-20.
  • Campbell GS, Campbell MD 1982. Irrigation scheduling using soil moisture measurements: theory and practice. Adv IrrigSci1: 25–42
  • Kallestad JC, Sammis TW, Mexal JG, White J. 2006. Monitoring and management of pecan orchard irrigation: a case study. Hort-Technology 16:667–673
Disqus Comment