कृष्णा के संस्मरण

Submitted by Hindi on Mon, 10/18/2010 - 13:17
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गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा
कृष्णा का कुटुम्ब काफी बड़ा है। कई छोटी-बड़ी नदीयां उससे आ मिलती हैं। गोदावरी के साथ-साथ कृष्णा को भी हम ‘महाराष्ट्र-माता’ कह सकते हैं। जिस समय आज की मराठी भाषा बोली नहीं जाती थी, उस समय का सारा महाराष्ट्र कृष्णा के ही घेरे के अंदर आता था।एकादशी का दिन था। गाड़ी में बैठकर हम माहुली चले। महाराष्ट्र की राजधानी सातारा से माहुली कुछ दूरी पर है। रास्ते में दाहिनी तरफ श्री शाहु महाराज के वफादार कुत्ते की समाधि आती है। रास्ते पर हमारी ही तरह बहुत से लोग माहुली की तरफ गाड़ियां दौड़ा रहे थे। आखिर हम नदी के किनारे पहुंचे। वहां इस पार से उस पार तक लोहे की एक जंजीर ऊंची तनी हुई थी। उसमें रस्सी से एक नाव लटकाई गई थी, जो मेरी बाल-आंखों को बड़ी ही भव्य मालूम होती थी।

किनारे के छोटे-बड़े कंकर कितने चिकने, काले-काले और ठंडे-ठंडे थे! हाथ में एक को लेता तो दूसरे पर नजर पड़ती। वह पहले से अच्छा मालूम होता। इतने में तीसरे भीगे हुए कंकर पर कत्थई रंग की लकीरें दीख पड़ती और उसे उठाने का दिल हो जाता। उस दिन कृष्णा का मुझे प्रथम दर्शन हुआ। कृष्णा मैया ने भी मुझे पहली ही बार पहचाना। मैं उसे पहचान लूं इतना बड़ा तो मैं था ही नहीं । बच्चा मां को पहचाने उसके पहले ही मां उसे अपना बना लेती है। हम बच्चे नंगे होकर खूब नहाये, कूदे, पानी उछाला, नाव पर चढ़कर पानी में छलांगे मारीं। कड़ाके के भूख लगे इतना कृष्णा में जलविहार किया।

जैसा नदी का यह मेरा पहला ही दर्शन था, वैसा ही नहाने के बाद नमकीन मूंगफली के नाश्ते का स्वाद भी मेरे लिए पहला ही था। यात्रा के अवसर पर मोर पंखों की टोपी पहनने वाले ‘वासुदेव’ भीख मांगने आये थे। मंजीरे के साथ उनका मधुर भजन भी उस दिन पहली ही बार सुना। कृष्णा मैया के मंदिर में थोड़ा-सा आराम करने के बाद हम घर लौटे।

सह्याद्रि के कान्तार में, महाबलेश्वर के पास से निकलकर सातारा तक दौड़ने में कृष्णा को बहुत देर नहीं लगती। किन्तु इतने ही वेण्णया कृष्णा से मिलने आती है। इनके यहां के संगम के कारण ही माहुली को माहात्म्य प्राप्त हुआ है। दो बालिकाएं एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर मानो खेलने निकली हों, ऐसा यह दृश्य मेरे हृदय पर पिछले पैंतीस साल से अंकित रहा है।

कृष्णा का कुटुम्ब काफी बड़ा है। कई छोटी-बड़ी नदीयां उससे आ मिलती हैं। गोदावरी के साथ-साथ कृष्णा को भी हम ‘महाराष्ट्र-माता’ कह सकते हैं। जिस समय आज की मराठी भाषा बोली नहीं जाती थी, उस समय का सारा महाराष्ट्र कृष्णा के ही घेरे के अंदर आता था।

‘नरसोबाची वाड़ी’ जाते समय नाव पर गाड़ी चढ़ाकर हमने कृष्णा को पार किया, तब उसका दूसरी बार दर्शन हुआ। यहां पर एक ओर ऊंचा कगार और दूसरी ओर दूर तक फैला हुआ कृष्णा का कछार, और उसमें उगे हुए बैंगन, खरबूजे ककड़ी और तरबूज के अमृत-खेत! कृष्णा के किनारे के ये बैंगन जिसने एकाध बार खा लिये, वह स्वर्ग में भी उनकी इच्छा करेगा। दो-दो महीने तक लगातार बैंगन खाने पर भी जी नहीं भरता, फिर भला अरुचि तो कैसे हो?

सांगली के पास, कृष्णा के तट पर मैंने पहली ही बार ‘रियासती महाराष्ट्र’ का राजवैभव देखा। वे आलीशान और विशाल घाट, सुंदर और चमकीले बर्तनों में भर-भर कर पानी ले जाती हुई महाराष्ट्र की ललनाएं, पानी में छलांग मारकर किनारे पर के लोगों को भिगोने का हौसला रखने वाले अखाड़ेबाज, क्षुद्र घंटिकाओं की तालबद्ध आवाज से अपने आगमन की सूचना देनेवाले पहाड़ जैसे हाथी, और कर्-र्-र् की एक श्रुति आवाज निकालकर रसपान का न्योता देने वाले ईख के कोल्हू-यह था मेरा कृष्णा मैया का तीसरा दर्शन।

मुझे तैरना अच्छी तरह नहीं आता था। फिर भी एक बड़ी गागर पानी में औंधी डालकर उसके सहारे बह जाने के लिए मैं एक बार यहां नदी में उतर पड़ा। किन्तु एक जगह कीचड़ में ऐसा फंसा कि एक पैर निकालता तो दूसरा और भी अंदर धंस जाता। और कीचड़ भी कैसा? मानो काला-काला मक्खन! मुझे लगा कि अब जंगम न रहकर उलटे पेड़ की तरह यहीं स्थावर हो जाऊंगा! उस दिन की घबराहट भी मैं अब तक नही भूला हूं।

चिंचली स्टेशन पर पीने के लिए हमें हमेशा कृष्णा का पानी मिलता था। हमारे एक परिचित सज्जन वहां स्टेशनमास्टर थे। वे हमें प्रेम से एकाध लोटा पानी मंगवाकर देते थे। हम चाहे प्यासे हों या न हों पिताजी हम सबको भक्ति पूर्वक पानी पीने को कहते। कृष्णा महाराष्ट्र की आराध्य देवी है। उसकी एक बूंद भी पेट में जाने से हम पावन हो जाते हैं। जिसके पेट में कृष्णा की एक बूंद भी पहुंच चुकी है। वह अपना महाराष्ट्रीयपन कभी भूल नहीं सकता। श्रीसमर्थ रामदास और शिवाजी महाराज, शाहू और बाजीराव, घोरपड़े और पटवर्धन, नाना फडनवीस, और रामशास्त्री प्रभुणे-थोड़े में कहें तो महाराष्ट्र का साधुत्व और वीरत्व, महाराष्ट्र की न्यानिष्ठा और राजनीतिज्ञता, धर्म और सदाचार, देशसेवा और विद्यासेवा, स्वतंत्रता और उदारता, सब कुछ कृष्णा के वत्सल कुटुम्ब में परवरिश पाकर फला-फूला है। देहू और आलंदी के जल कृष्णा में ही मिलते हैं। पंढरपुर की चंद्रभागा भी भीमा नाम धारण करके कृष्णा को ही मिलती है। ‘गंगा का स्नान और तुंगा का पान’ इस कहावत में जिसके गौरव का स्वीकार किया गया है, वह तुंगभद्रा कर्नाटक के प्राचीन वैभव की याद करती हुई कृष्णा में ही लीन होती है। सच कहें तो महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगण (आन्ध्र), इन तीनों प्रदेशों का ऐक्य साधने के लिए ही कृष्णा नदी बहती है। इन तीनों प्रान्तों ने कृष्णा का दूध पिया है। कृष्णा में पक्षपाती प्रांतीयता नहीं है।

कॉलेज के दिन थे। बड़ी-बड़ी आशायें लेकर बड़े भाई से मिलने मैं पूना से घर गया। किन्तु मेरे पहुंचने से पहले ही वे इहलोक छोड़ चुके थे। मेरी किस्मत में कृष्णा के पवित्र जल में उनकी अस्थियों का समर्पण करना ही बदा था। बेलगांव से मैं कूड़ची गया। संध्या का समय था। रेल के पुल के नीचे कृष्णा की पूजा की। बड़े भाई की अस्थियां कृष्णा के उदर में अर्पण कीं। नहाया और पलथी मारकर जीवन मरण पर सोचने लगा।

कृष्णा के पानी में कितने ही महाराष्ट्र के वीरों और महाराष्ट्र के शत्रुओं का खून मिला होगा! वर्षाकाल की मस्ती में कृष्णा ने कितने ही किसान और उनके मवेशियों को जलसमाधि दी होगी! पर कृष्णा को इससे क्या? मदोन्मत्त हाथी उसके जल में विहार करें और विरक्त साधु उसके किनारे तपश्चर्या करें, कृष्णा के लिए दोनों समान हैं। मेरे भाई की अस्थियों और कंकर बनी हुई पहाड़ की अस्थियों के बीच कृष्णा के मन में क्या फर्क है? माहुली में अपने कंधे पर मुझे खड़ा करके पानी में कूदने के लिए बढ़ावा देने वाले बड़े भाई की अस्थियां मुझे अपने हाथों उसी कृष्णा के जल में समर्पण करनी पड़ीं। जीवन की लीला कैसी अगम्य है!

कृष्णा के उदर में मेरा दूसरा एक भाई भी सोया हुआ है! ब्रह्मचारी अनंतबुआ मरढेकर हृदय की भावना से मेरे सगे छोटे भाई थे, और देशसेवा के व्रत में मेरे बड़े भाई थे, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा और गोसेवा यह त्रिविध कार्य करते-करते उन्होंने शरीर छोड़ा था। मेरे साथ उन्होंने गंगोत्री और अमरनाथ की यात्रा की थी। किन्तु कृष्णा के किनारे आकर ही वे अमर हुए। भक्ति की धुन में वे सुध-बुध भूल जाते और कई जगह ठोकर खाते। इस बात का मुझे हिमालय की यात्रा में कई बार अनुभव हुआ था। मैं बार-बार उनको कोसता। किन्तु वे परवाह नहीं करते। वे तो श्रीसमर्थ की प्रासादिक वाणी की सात्त्विक मस्ती में ही रहते। कृष्णा को भी उन्हें कोसने की सूझी होगी। देव-मंदिर की प्रदक्षिणा करते-करते वे ऊपर से एक दह में गिर पड़े और देवलोक सिधारे। जब वाई के पथरीले पट पर से बहती गंगा का स्मरण करता हूं, कृष्णा में हर वर्षाकाल में शिरस्नान करते देव-मंदिर के शिखरों का दर्शन करता हूं, तब कृष्णा के पास मेरा भी यह एक भाई हमेशा के लिए पहुंच गया है इस बात का स्मरण हुए बिना नहीं रहता; साथ ही साथ अनंतबुआ की तपोनिष्ठ किन्तु प्रेम-सुकुमार मूर्ति का दर्शन हुए बिना भी नहीं रहता।

सन् 1921 का वह साल! भारतवर्ष ने एक ही साल के भीतर स्वराज्य सिद्ध करने का बीड़ा उठा लिया है। हिन्दू-मुसलमान एक हो गये हैं। तैंतीस करोड़ देवताओं के समान भारतवासी करोड़ों की संख्या में ही सोचने लगे हैं। स्वराज्य ऋषि लोकमान्य तिलक का स्मरण कायम करने के लिए ‘तिलक स्वराज्य फंड’ में एक करोड़ रुपये इकट्ठे करने हैं। राष्ट्रसभा के छत्र के नीचे काम करने वाले सदस्यों की संख्या भी एक करोड़ बनानी है। और पट-वर्धन श्रीकृष्ण के सुदर्शन के समान चरखे भी इस धर्मभूमि में उतनी ही संख्या में चलवा देने हैं। भारतपुत्र इस काम के लिए बेजवाड़े में इकट्ठे हुए हैं। श्री अब्बास साहब, पुणतांबेकर गिदवाणी और मैं, एक साथ बेजवाड़ा पहुंच गये हैं। ऐसे मंगल अवसर पर श्री कृष्णाम्बिका का विराट दर्शन करने का सौभाग्य मिला। वाई में जिस कृष्णा के किनारे बैठकर संध्यावंदन किया था और न्यायनिष्ठ रामशास्त्री तथा राजकाजपटु नाना फडनवीस की बातें की थीं। उसी नन्हीं कृष्णा को यहां इतनी बड़ी होते देखकर प्रथम तो विश्वास ही न हुआ। कहां माहुली की वह छोटी-सी जंजीर और कहां यूरोप-अमरीका को जोड़ने वाले केबल के जैसा यहां का वह रस्सा! हजारों-लाखों लोग यहां नहाने आये हैं। स्थूलकाय आंध्र भाइयों में आज भारतवर्ष के तमाम भाई घुलमिल गये हैं। ‘राष्ट्रीय’ हिन्दी का वाक्प्रवाह जहां-तहां सुनाई देता है। कृष्णा में जिस प्रकार वेण्ण्या, वारणा, कोयना, भीमा, तुंगभद्रा आकर मिलती हैं, उसी प्रकार गांव-गांव के लोग ठटके ठट बेजवाड़े में उभरते हैं। ऐसे अवसर पर सबके साथ रोज कृष्णा में स्नान करने का लुत्फ मिलता। जिस कृष्णा ने जन्मकाल का दूध दिया उसी कृष्णा ने स्वराज्यकांक्षी भारतराष्ट्र का गौरवशाली दर्शन कराया। जय कृष्णा! तेरी जय हो! भारतवर्ष एक हो! स्वतंत्र हो!!

जुलाई, 1929

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