क्षमा करें मगर सीवर तक में हैं सियासत

Submitted by Hindi on Fri, 01/25/2013 - 12:32
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हिन्दुस्तान, नई दिल्ली, अप्रैल 12, 2007, सुनीता नारायण की पुस्तक 'पर्यावरण की राजनीति' से साभार
हर समाज को यह समझना होगा कि उसके द्वारा छोड़े जा रहे कचरे का प्रबंधन उसे कैसे करना है। इससे हमें कई अहम चीजों और विषयों के बारे में सीखने को मिलता है। कचरा प्रबंधन की शिक्षा मुझे संयोग से ही मिली थी। चंद वर्षों पहले जिस कमेटी के साथ मैं काम कर रही थी उसे सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि वह नदियों में गंदगी छोड़कर उन्हें नारकीय हालात में पहुंचाने वाले शहर के नालों की सफाई इंतजामों पर राज्य सरकारों की कोशिशों की निगरानी करे। सरकार ने एक कार्ययोजना पेश की। इसमें उन्हें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को बनाने, मौजूदा प्लांट बेहतर करने, आवासीय कॉलोनियों में नाले-नालियों का निर्माण और कचरे को सीवेज प्लांट तक पहुंचाने वाली व्यवस्था की मरम्मत का काम करना था।

मुझे लगा कि हमारा काम यह सुनिश्चित करना था कि सीवेज प्लांट बने या नहीं, वे ठीक हालत में काम कर रहे हैं या नहीं। लेकिन मैं कितनी अंजान थी। मुझे पहला सबक उस दिन मिला जब हम सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निरीक्षण करने गए। प्लांट के प्रबंधकों के पास यहां आने वाले तरल कचरे की किस्मों और उनकी सफाई आदि की बाबत रिकॉर्ड उपलब्ध थे। उन्होंने इसके सैंपल भी दिखाए। देखने में यह बेहद व्यवस्थित लग रहा था। एक छोटी सी समस्या बस यह थी कि सीवेज प्लांट अपनी क्षमता से बेहद कम काम कर रहा था, महज 40 फीसदी। अधिकारियों ने हमें बताया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि सीवेज व्यवस्था तो तैयार हो गई थी, मगर उसे घरों से जोड़ा नहीं जा सका था। जिसकी वजह थी इसमें लगने वाली उच्च लागत। उनका कहना था कि इसका बनना और प्लांट तक सीवेज का पहुंचना अब केवल कुछ समय की ही बात है। उनका जोर खुद सीवेज प्लांट के ढांचे में भी विकास करने पर था। इस अतिरिक्त सीवेज के मद्देनजर वह इसकी क्षमता और बढ़ाने की जरूरत बता रहे थे। जैसे ही ऐसा यदि हो गया तो हमारी नदियां बिल्कुल साफ-सुथरी हो जाएंगी...। उन्होंने हमें यह भरोसा भी दिलाया।

तभी अचानक .. मैंने उनसे पूछा कि वह साफ किए हुए कचरे की निकासी कैसे करते हैं। झट से जवाब आया-हमारे पास साफ किए हुए कचरे की निकासी के लिए एक नाला है, जो कुछ दूसरी पर जाकर नदी में मिल जाता है। हमने तब निकासी स्थान देखने की इच्छा जाहिर की। तुरंत, कीड़ों से बजबजाता एक मुहाना खोल दिया।

निकासी स्थान सीवेज प्लांट के सामने बने नाले में था। साफ नजर आ रहा था कि तरल कचरे को एक ऐसे नाले में डाला जा रहा था, जो कि खुद गंदगी और संड़ांध से लबरेज था। वास्तव में नाले की इसी संड़ांध और गंदगी ने प्रदूषण नियंत्रण की सभी कोशिशों पर पानी फेर दिया था। प्लांट वहां बनाया गया था, जहां जमीन उपलब्ध थी। अधिकारियों ने कभी इस बाबत विचार ही नहीं किया कि साफ किए हुए कचरे की निकासी व्यवस्था का निरीक्षण करें।

फिर हमने नाले के बारे में पूछा। यह उफनते पानी का एक नाला था और अधिकारियों ने हमें बताया कि इसमें कोई कचरा नहीं होना चाहिए (उस समय प्रचंड गर्मी का मौसम था) । समस्या यह थी कि आसपास की कॉलोनियों में कचरा निकासी के लिए नाले-नालियां नहीं थीं, लेकिन जैसे ही वे बन जातीं, स्थिति काबू में आ जाती।

पानी-कचरे की यह कहानी केवल एक नदी या शहर तक सिमटी हुई नहीं है। शुद्धिकरण की यह वह पॉलिटिकल इकॉनमी है, जिसमें गरीबों के नाम पर अमीरों को छूट मिलती है। जिसमें विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि दी जाती है। यही वह वास्तविक कचरा है जिसे हमें समझना ही होगा।

फिर एक और मुहाना खोला गया। हमें पता लगा कि शहर के इस हिस्से में रहने वाली लगभग आधी आबादी सीवेज सिस्टम से नहीं जुड़ी है। वे अनिधिकृत इलाकों में रह रहे थे। लिहाजा उनका कचरा भी ‘अवैध’ था। समूची आबादी को आधिकारिक निकासी व्यवस्था से न जोड़ पाने के कारण कुल कचरे का एक छोटा सा ही हिस्सा इन प्लांटों तक पहुंच पाता है। शेष कचरा उन खुले नालों में इकट्ठा होता रहता है, जिसे सरकारी रिकॉर्ड में केवल गंदे पानी से भरा बताया जाता है, कचरे से नहीं। जब ‘वैध’ और ‘अवैध’ कचरा उसी सीवेज में मिलकर एक हो जाता है – जो नदी से जुड़ता है – तो हमें इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आखिर हमारी नदियां साफ क्यों नहीं हो रही हैं।

अगला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पहले प्लांट से छोड़े गए तरल कचरे की सफाई करता था। इसका कचरा भी सफाई के बाद एक नाले में जाता था, जो कि उसे और गंदगी से लबरेज करके नदी तक ले जाता था।

समस्या तब और गंभीर नजर आई जब हम नदी तक गए। पीने के पानी के लिए शहर के ऊंचे तल पर बने बांध पर नदी के पानी को जमा किया जा रहा था। फिर, यह पानी अपनी यात्रा के दौरान मेरे शहर से सीवेज भी समेटता था। और जब यह छोड़ा जाता था तो इसमें महज कचरा होता था, पानी नहीं। नदियों में पानी ही नहीं है, जो कचरे को अपने में विलीन कर लें। यहां तक कि ये अपनी वह प्राकृतिक क्षमता भी खो रही हैं, जिसके तहत कचरे को बांट-कर वह मिट्टी और पानी में तब्दील कर देतीं थीं। इन्हें फिर से जीवन देने के लिए हमें इनसे पानी लेकर फिर इन्हें पानी ही लौटाना होगा।

अब मैं कचरा व्यापार का अर्थशास्त्र समझने लगी हूं। एक टेंडर निकालिए और नाले, पंप व सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण करवा दीजिए। समस्या यह है कि हम अपना गणित नहीं जानते। जितना ज्यादा हम पानी इस्तेमाल करेंगे, उतना ज्यादा हम कचरा पैदा करेंगे।

पानी-कचरे की यह कहानी केवल एक नदी या शहर तक सिमटी हुई नहीं है। शुद्धिकरण की यह वह पॉलिटिकल इकॉनमी है, जिसमें गरीबों के नाम पर अमीरों को छूट मिलती है। जिसमें विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि दी जाती है। यही वह वास्तविक कचरा है जिसे हमें समझना ही होगा।

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