क्या नदी बिकी (नुक्कड़ों पर एकल पाठ के लिये)

Submitted by Hindi on Sat, 12/15/2012 - 15:04
Source
हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान मातली, उत्तरकाशी
बहती नदी के साथ बहता
वह समय
आता हुआ
छूटती है दूर तक
लहरों से बनी कृतियां
शब्दों से दूर बसी
नदी की गहराई में कविता
पर्वतों के बीच से
सबसे तरल दिल
बह रहा है
धड़कनों के साथ
किनारों पर
मिल रहा है जो
बस छूटता है
फिर भी अकेली
जंगलों और पर्वतों के
गांव
प्यासे हैं
दूर है अब भी नदी
नदी के होंठ से
मिल नहीं पा रहे हैं
होंठ गांवों के
बहने दो नदी को, कहने दो
कहने दो उसे भी एक कहानी
जो रोज सहती
और बहती और बहती।
बहने दो
रोक मत देना प्रवाह
पहाड़ पर नजरें गड़ाए
यह कौन से पंजे
यह कौन सी आंखे
बढ़ रही हैं नदी के पास, रोकने को
प्रवाह नदियों का
सूख जायेगी नदी तो
सूख जायेगी सदी
यह कौन नजरें, गाड़कर
इन पर्वतों को घूरता है
धीरे-धीरे नर्म चरागाहों को रौंद कर
बह रहा है
आंखें है
कि जैसे लोमड़ी की
बढ़ रहा है फाइलों के बीच से
हाकिमों के साथ
हुआ, वही हुआ
नदी बिक गई
बिक गई
गांव चौकन्ने, निहत्थें, प्रकृति के सामने शर्मिंदा
बेच दी हां बेच दी तुमने नदी
बेच दी है सांस
जंगल और जमीन से उठती हुई
आवाज
मुनाफे के लिए
बांटते हैं
दलाल नदियों के
सत्ता की दलीलें
फाइलों में बंद है अब
भविष्य नदियों का, फाइलों में बंद
फाइलो से
एक गोमुख जन्म लेगा
भ्रष्टाचार की लहरे उछालेंगी
ठहाके
डूबे हुए शहर के ऊपर
तैरेंगी
भ्रष्टाचार की नदियां
स्वच्छ पानी
आज संकट में है
संकट में पड़ी बेचैन
इधर-उधर
बिखरी हुई है
नदी की आत्मा
संकट में है समय
गांव संकट में
मौसम और दुनियाँ

संकट में है नदी
नदी को सुरंगों से बहाकर
बनेगी बिजलियों की ऊर्जा
पर विज्ञान के हाथ में हो डोर
उसकी
बुनियादी हक न माने जाये
गांवों के
डगमगा न जाये कहीं
दुनिया
हो रहा है आज ऐसा ही
होता रहेगा ठीक ऐसा ही
इससे पहले कि
टूटे बांध न हो प्रलय का रूप जहरीला।

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