क्या सार्थक होगा हनुमंतिया जल महोत्सव?

Submitted by RuralWater on Mon, 12/05/2016 - 15:16


हनुमंतिया जल महोत्सवहनुमंतिया जल महोत्सवजी हाँ, मध्य प्रदेश की सरकार पूरे जोश-खरोश से नर्मदा नदी पर बने इन्दिरा सागर बाँध के बैक वाटर क्षेत्र में प्राकृतिक आठ बड़े टापूओं को विश्व पर्यटन की दृष्टि से विकसित कर रही है। इनमें सबसे ज्यादा जोर हनुमंतिया पर है। बीते डेढ़ सालों में सरकार ने इसे सुन्दर और सुविधा सम्पन्न बनाने पर खासी कवायद की है। फरवरी में पहले आयोजन के बाद अब 15 दिसम्बर से 15 जनवरी तक एक महीने चलने वाले जल महोत्सव के लिये बड़े पैमाने पर तैयारियाँ की जा रही हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि इस तरह के बड़े आयोजनों और कुछ खास जगहों को विकसित करके ही हम जल पर्यटन को बढ़ावा दे सकते हैं। क्या हनुमंतिया आने वाले दिनों में देश के लिये जल पर्यटन का आइकन बन सकेगा?

जल पर्यटन की दिशा में केरल और गोवा से भी आगे निकलने की होड़ में अब मध्य प्रदेश अपने जल संसाधनों के आसपास के क्षेत्र को विकसित करने पर जोर दे रहा है। करीब 913.04 किलीमीटर में फैले विशालकाय इन्दिरा सागर बाँध देश का ही नहीं, एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित जल संरचना है। खंडवा से 50 किमी दूर जिले के हनुमंतिया के आसपास की स्थिति पर्यटन के लिहाज से महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं। मिनी स्वीटजरलैंड के रूप में पहचाने जाने वाले इस टापू पर एक तरफ दूर तक फैली अगाध जलराशि तो दूसरी तरफ सागौन के बड़े-बड़े पेड़ों और वन्य जीवों वाला सघन जंगल सैलानियों को आकर्षित कर सकता है। यहाँ 20 करोड़ की लागत से काटेज और अन्य सुविधाएँ विकसित की जा चुकी हैं।

फिलहाल यहाँ जल महोत्सव की तैयारियाँ जोरों पर हैं। जलभराव क्षेत्र में क्रूज और मोटर बोट के साथ अब कश्मीर के शिकारा और केरल की तरह हाउस बोट भी चलाई जाएँगी। यहाँ 125 तम्बूओं का पूरा गाँव बसाया गया है। इसके अलावा हनुमंतिया से पानी में करीब 10 किमी दूर बोरियामाल टापू पर भी तम्बू लगाए जा रहे हैं। इसके लिये सरकार निजी क्षेत्र से करीब सौ करोड़ रुपए के निवेश की भी कोशिशें की जा रही हैं।

इसके लिये दिल्ली, नागपुर, हैदराबाद और मुम्बई सहित कुछ बड़े शहरों में रोड शो कर सैलानियों को आकर्षित किया जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि इसमें विदेशी सैलानी भी शामिल होंगे। विदेशों में भी इसका प्रचार-प्रसार किया गया है। इसे खास तौर पर ईयर एंड और न्यू ईयर को ध्यान में रखकर किया गया है। यहाँ सैलानियों के रहने और खाने-पीने की सुविधाओं से लेकर जल क्रीड़ा गतिविधियों और साहसिक खेलों को भी प्रमुखता दी जा रही है।

जल महोत्सव के दौरान यहाँ जल क्रीड़ा में आइलैंड कैम्पिंग, हॉट एयर बैलूनिंग, पैरासेलिंग, पैरामोटर्स, स्टार गेजिंग, वाटर स्कीइंग, जेट स्कीइंग, वाटर जोर्विंग, वर्मा ब्रिज, कृत्रिम क्लाइम्बिंग बाल, बर्ड वाचिंग, ट्रेकिंग, ट्रेजर हंट, नाईट कैम्पिंग के साथ क्राफ्ट बाजार और सांस्कृतिक गतिविधियाँ आदि होंगी।

झील के किनारे बने मकान और पार्कइसके अलावा भी नर्मदा नदी पर ही जबलपुर के पास बने बरगी बाँध, चम्बल नदी पर बने मन्दसौर के पास गाँधी सागर बाँध और सोन नदी पर बने शहडोल के पास बाणसागर बाँध को जल पर्यटन के लिहाज से विकसित करने की कोशिशें की जा रही हैं।

खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे लेकर खासे उत्साहित हैं। वे कहते हैं, ‘हम इसे सिंगापुर के सेंटोसा से बेहतर विकसित कर रहे हैं। यहाँ पर्यटन के लिये बहुत-सी खूबियाँ हैं। मध्य प्रदेश में ऐसी खुबसूरत जगह हो सकती है, इसकी कल्पना भी नहीं की थी। हनुमंतिया और अन्य टापूओं के विकास में कोई कमी नहीं रहने दी जाएगी। इससे आसपास के लोगों को रोजगार भी मिलेगा।’

सूबे के पर्यटन मंत्री सुरेन्द्र पटवा कहते हैं, ‘प्रदेश सरकार यहाँ के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वचनबद्ध है। पर्यटन से लोगों को रोजगार तो मिलता ही है, आसपास का पूरा इलाका खुद-ब-खुद विकसित होता है और यहाँ के लोगों का जीवन स्तर भी सुधरता है।’

पर्यटन क्षेत्र के जानकार भी मानते हैं कि यहाँ ईमानदार कोशिश हो तो प्राकृतिक सौन्दर्य और आधुनिकता का अनूठा संगम हो सकता है। इसे गोवा, केरल या सिंगापुर की तर्ज पर लोकप्रियता मिल सकती है। इसके लिये जरूरी है कि महज हनुमंतिया पर ही नहीं, बल्कि इस पूरे क्षेत्र के विकास और उससे भी जरूरी स्थायी विकास और पर्यावरण हितों के साथ विकास पर जोर देना होगा।

वे बताते हैं कि सेंटोसा को वहाँ की सरकार ने 1972 में विकसित किया। यहाँ मोम की मूर्तियों और मछली घरों से लेकर जल क्रीड़ा और साहसिक गतिविधियों की सुविधाएँ हैं। मनोरंजन के तमाम साधन हैं। इसी तरह गोवा में भी पुराने चर्च और समुद्र तट का खुला माहौल सैलानियों को लुभाता है। यदि इसके मुकाबले में हनुमंतिया को खड़ा करना है तो सरकार को अभी बहुत कुछ करना बाकी है। परिवहन सुविधाओं में सिर्फ सड़कें ही नहीं रेलवे और वायु मार्ग को भी सुलभ करना होगा। सुरक्षा इन्तजाम बढ़ाने होंगे। बाजार और रुकने की सस्ती और अच्छी व्यवस्था जुटानी होगी।

यहाँ कई मायनों में गोवा, केरल, दमन और अन्य जल पर्यटन केन्द्रों से अच्छी भौगोलिक स्थितियाँ हैं लेकिन अभी सुविधाएँ और पर्यावरण के साथ विकास में यह बहुत पीछे है। समुद्र तटों के मुकाबले यहाँ का मौसम सदाबहार रहता है और चिपचिपी गर्मी और उमस भी नहीं रहती। यहाँ छोटे-बड़े टापूओं की तादाद 90 से सौ के करीब है, जिनमें घना जंगल और साफ पानी भरा रहता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा फिशिंग हब भी हो सकता है। यहाँ डाल्फिन के लिये भी उपयुक्त स्थितियाँ हैं। जरूरी है, आसपास पहाड़ों और जंगलों को जोड़कर पूरे क्षेत्र को इकोटूरिज्म बनाना होगा।

इन्दिरा सागर बाँध के झील में नाव पर बैठे पर्यटकएक तरफ दुनिया के नक्शे पर पटाया, मारीशस, मालदीव, फुकेट और बाली जैसे समुद्र तट हैं। यहाँ हर साल सिर्फ महोत्सव ही नहीं बल्कि स्थायी विकास के इन्तजाम भी जरूरी है। तभी हम इसे विश्व पर्यटन के नक्शे पर ला सकते हैं। इसके लिये प्रचार-प्रसार के साथ एक दीर्घकालीन सुनियोजित और पर्यावरण सम्पन्न दृष्टि की कार्ययोजना बनाई जानी चाहिए तभी हम इसके समुचित विकास की बात कर सकते हैं। मध्य प्रदेश में इससे पहले कान्हा, भेड़ाघाट, मांडू और नर्मदा सहित बेशकीमती जंगली इलाका होने के बाद भी कभी इन्हें ढंग से पर्यटन के नक्शे पर नहीं ला सके तो अब उम्मीद यही की जा सकती है कि हनुमंतिया के बहाने अब यहाँ के मन्द पर्यटन विकास के भी पंख लग सकें।

इस क्षेत्र के लोगों ने इन्दिरा सागर बाँध के आकार लेने से पहले विस्थापन और पुनर्वास के नाम पर बड़ी यातनाएँ सही हैं। बाँध की वजह से यहाँ के बेशकीमती जंगलों, हरसूद जैसे कस्बे सहित ढाई सौ गाँव, उपजाऊ खेत और इनमें किसानी-मजदूरी करने वाले हजारों लोग अपना सब कुछ छोड़कर हकाल दिये गए। मुआवजे की तमाम विसंगतियों और अच्छी पुनर्वास सुविधाओं के अभाव में वे अब भी उपेक्षित जिन्दगी जी रहे हैं। अब यदि इस क्षेत्र को विकसित किया जा रहा है तो यहाँ के बढ़ते हुए रोजगार सम्भावनाओं पर पहला अधिकार उन्हीं का बनता है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि उन्हें इसके लिये प्रशिक्षित कर वहीं रोजगार से जोड़ा जाये ताकि बहुत थोड़ा ही सही उनके दर्द को कम किया जा सके।

इन मुद्दों पर यदि सकारात्मक रूप से विचार होकर कार्य योजना बनेगी तब ही हनुमंतिया में होने वाले जल महोत्सव भी सार्थक हो सकेंगे। कहीं ऐसा न हो कि ये महोत्सव भी सरकारी अभियानों की तरह तात्कालिक और सतही बनकर रह जाएँ। एक सुनहरे भविष्य की उम्मीद तो की ही जा सकती है।
 

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