क्यों जानना जरूरी है कुंभ परिचय

Submitted by Hindi on Tue, 01/15/2013 - 15:00
भारत का पांरपरिक ज्ञान भले ही कितना गहरा व व्यावहारिक हो, लेकिन सिर्फ पाप-पुण्य कहकर हम नवीन पीढ़ी को उसके अनुसार चलने को प्रेरित नहीं कर सकते। उसे तर्क की कसौटी पर खरा उतारकर दिखाना ही होगा; वरना् भारत का अद्भुत ज्ञान जरा से आलस्य के कारण पीछे छूट जायेगा। उस पर जमी धूल को पोछना ही होगा। कुंभ के असल मंतव्य को न समझाये जाने का ही परिणाम है कि आज कुंभ... नदी समृद्धि बढ़ाने वाला पर्व होने की बजाय, नदी में गंदगी बहाने वाला एक दिखावटी आयोजन मात्र बनकर रह गया है। दुनिया में पानी के बहुत से मेले लगते हैं, लेकिन कुंभ जैसा कोई नहीं। स्वीडन की स्टॉकहोम, ऑस्ट्रेलिया की ब्रिसबेन, अमेरिका की हडसन, कनाडा की ओटावा...जाने कितने ही नदी उत्सव साल-दर-साल आयोजित होते ही हैं, लेकिन कुंभ!.. कुंभ की बात ही कुछ और है। जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी.. यहां तक कि राष्ट्र की सरहदें भी कुंभ में कोई मायने नहीं रखती। साधु-संत-समाज-देशी-विदेशी... इस आयोजन में आकर सभी जैसे खो जाते हैं। कुंभ में आकर ऐसा लगता ही नहीं कि हम भिन्न हैं। हालांकि पिछले 50 वर्षों में बहुत कुछ बदला है, बावजूद इसके यह सिलसिला बरस.. दो बरस नहीं, हजारों बरसों से बदस्तूर जारी है। छः बरस में अर्धकुंभ, 12 में कुंभ और 144 बरस में महाकुंभ! ये सभी मुझे आश्चर्यचकित भी करते हैं और मन में जिज्ञासा भी जगाते हैं।

आखिर कुंभ है क्या?


नदी में स्नान कर लेने मात्र का एक आस्था पर्व या इसकी पृष्ठभूमि में कोई और प्रयोजन थे? यदि प्रयोजन सिर्फ स्नान मात्र ही हो, तो कल्पवासी यहां महीनों कल्पवास क्यों करते हैं? सिर्फ स्नान के लिए इतना बड़ा आयोजन क्यों? क्या कुंभ हमेशा से ही ऐसा था या समय के साथ इसके स्वरूप में कोई बदलाव आया? अर्धकुंभ, कुंभ और महाकुंभ की नामावली, समयबद्धता तथा अलग-अलग स्थान पर आयोजन के क्या कोई आधार हैं? यह पूरा आयेाजन सिर्फ आस्था पर आधारित है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक अथवा सामाजिक कारण भी हैं? करीब छह बरस पहले ये तमाम सवाल जलपुरुष के नाम से विख्यात पानी कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह के मन में उठे थे। उनके साथ मिलकर इन प्रश्नों के उत्तर तलाशते-तलाशते जो सूत्र हमारे हाथों लगे, वे सचमुच अद्भुत हैं और भारतीय ज्ञानतंत्र की गहराई का प्रमाण भी। कुंभ का इतना वैज्ञानिक व तार्किक संदर्भ जान मेरा मन आज भी गर्व से भर उठता है। कुंभ सिर्फ स्नान न होकर कुछ और है। आखिर कोई तो वजह होगी कि लाख-दो लाख नहीं, करोड़ों लोग सदियों से बिन बुलाये चले आ रहे हैं गंगा का मेहमान बनने? कुंभ-2013 में 55 दिन गंगा फिर मेहमाननवाजी करेगी। इस मेहमाननवाजी के लिए इलाहाबाद के संगम तट पर 55 दिन की नई बसावट बसेगी। प्रयाग पर नये रंग बरसेंगे। सदियों से चल रहा है यह सिलसिला। क्यों? क्या सिर्फ स्नान के लिए? अब तो गंगा का जल स्नान योग्य भी नहीं रहा। बावजूद इसके भी क्यों खिंचे चले आ रहे हैं दुनिया भर से लोग त्रिवेणी के तट पर? यह विचार करने योग्य प्रश्न हैं। क्या कुंभ में आने वाले प्रत्येक स्नानार्थी को उन सूत्रों को नहीं जानना चाहिए?

क्यों जरूरी है कुंभ को जानना:


भारत के ऋषि-आचार्य भली-भांति जानते थे कि विज्ञान तर्क करता है, सवाल उठाता है और जवाब मांगता है। वे इससे भी वाकिफ थे कि आस्था सवाल नहीं करती; वह सिर्फ पालन करती है। अतः उन्होंने समाज को नैतिक व अनुशासित बनाये रखने के लिए लंबे समय तक वैज्ञानिक व तार्किक रीति-नीतियों को धर्म, पाप, पुण्य और मर्यादा जैसी आस्थाओं से जोड़कर रखा। समाज को विज्ञान की जटिलताओं व शंकाओं में उलझाने की बजाय आस्था की सहज, सरल और छोटी पगडंडी का मार्ग अपनाया। लेकिन अब आधुनिक विज्ञान और तकनीक का जमाना है। हम 21वीं सदी में हैं। नई पीढ़ी को हमारी आस्थाओं के पीछे का विज्ञान व तर्क बताना ही होगा। भारत का पांरपरिक ज्ञान भले ही कितना गहरा व व्यावहारिक हो, लेकिन सिर्फ पाप-पुण्य कहकर हम नवीन पीढ़ी को उसके अनुसार चलने को प्रेरित नहीं कर सकते। उसे तर्क की कसौटी पर खरा उतारकर दिखाना ही होगा; वरना् भारत का अद्भुत ज्ञान जरा से आलस्य के कारण पीछे छूट जायेगा। उस पर जमी धूल को पोछना ही होगा। कुंभ के असल मंतव्य को न समझाये जाने का ही परिणाम है कि आज कुंभ... नदी समृद्धि बढ़ाने वाला पर्व होने की बजाय, नदी में गंदगी बहाने वाला एक दिखावटी आयोजन मात्र बनकर रह गया है। जरूरी है कि कुंभ आने से पहले प्रत्येक आगंतुक कुंभ को जाने; तभी हम कुंभ के प्रति न्याय कर पायेंगे।

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