लाॅकडाउन से हील हो रही ओजोन लेयर

Submitted by HindiWater on Tue, 04/07/2020 - 08:18

ओजोन परत सूर्य की पैराबैंगनी किरणों से बचाने के लिए सन स्क्रीन की तरह काम करती है। ओजोन गैसे ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनी होती है और स्वाभाविक रूप से कम मात्रा में होती है। वायुमंडल में लगभग 10 किलोमीटर से 40 किलोमीटर के बीच इसकी परत रहती है। ओजोन सूर्य के उच्च आवृत्ति के प्रकाश की 93 से 99 प्रतिशत मात्रा अवशोषित कर लेती है। पृथ्वी के वायुमंडल में 91 प्रतिशत से अधिक ओजोन गैसे यहां मौजूद है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ओजोन खतरनाक होती है और प्रदूषण का कारण बनती है। इससे अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है। ओजोन परत में छेद के लिए क्लोरोफ्लोरो कार्बन यानी सीएफसी गैसे को भी जिम्मेदार माना जाता है।

दरअसल पृथ्वी पर निर्मित रासायनिक गैसें ओजोन परत को नुकसान पहुंचाती हैं। हर बार ठंड में अंटार्कटिका के ऊपरी वायुमंडल में ओजोन परत का छेद बड़ा हो जाता है। यह उस क्षेत्र में मौजूद विशेष मौसम संबंधी और रासायनिक स्थितियों के कारण होता है, लेकिन पिछले साल सितंबर और अक्टूबर के दौरान अंटार्कटिका के ऊपरी वायुमंडल में ओजोन परत के छेद में रिकाॅर्ड स्तर पर कमी देखी गई थी। नासा और अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमाॅस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) के वैज्ञानिकों ने बताया था कि 1982 के बाद से इस 2019 में सितंबर और अक्टूबर के दौरान अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत का छेद सबसे छोटे आकार तक सिकुड़ गया। इससे पहले ओजोन का ये छिद्र 1.64 करोड़ वर्ग किलोमीटर को हो गया था, लेकिन फिर घटकर 64 लाख वर्ग किलोमीटर ही रह गया। हालाकि वैज्ञानिकों ने फिर भी इसे राहत की बात नहीं बताई थी। नासा ने दावा भी किया था कि वर्ष 2000 से 2018 के बीच ओजोन परत का छेद 40 लाख वर्ग किलोमीटर सिकुड़ा है, लेकिन इस बार ओजोन परत फिर से हील हो रही है। जिसका कारण कोरोना वायरस के कारण अधिकांश देशों में हुआ लाॅकडाउन है।

कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण दुनिया के अधिकांश देशों में लाॅकडाउन है। उद्योगों के संचालन को बंद किया गया है। सड़कों पर परिवहन सीमित है। आपातकाल के अलावा किसी को भी घरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है। इससे वायु प्रदूषण अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। नदियों का जल साफ होने लगा है, आसमान साफ और नीला दिखाई देता है। रात की चांदनी में आसमान की तरफ टिमटिमाते तारे साफ दिखाई देते हैं। मानवीय गतिविधियां कम होने से पशु पक्षी स्वछंद होकर घूम रहे हैं। पक्षियों की आवाजे उन शहरों में भी सुनाई देने लगी है, जहां बहुत मुश्किल से पक्षी दिखा करते थे। साफ तौर पर कहें को लाॅकडाउन के कारण प्रकृति को काफी फायदा पहुंचा है। पृथ्वी पर जीने के लिए सबसे जरूरी ओजोन परत भी अंटार्कटिका के ऊपर अपने आप हील होने लगी है। कई वैज्ञानिकों का मानना है कि ओजोन परत के हील होने का कारण लाॅकडाउन नहीं बल्कि माॅन्ट्रियल प्रोटोकाॅल है। इसके अंतर्गत किए जा रहे प्रयासों से ही ओजोन परत हील हो रही है।

दरअसल वर्ष 1980 में पहली बार ओजोन परत में छेद का पता चला था। प्रदूषण बढ़ने के साथ साथ ओजोन छिद्र भी बढ़ता गया। जिस कारण सूर्य की पैराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर पहुंचने लगी, इससे त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद, प्रतिरक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचने के साथ ही पौधों को भी नुकसान पहुंचने लगा। इससे बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 1987 में एक माॅन्ट्रियल प्रोटोकाॅल संधि की गई। वर्ष 2000 में पृथ्वी के ऊपर चलने वाली दक्षिणी गोलार्थ की तेज धारा में बह रही हवा जो ओजोन लेयर में छेद की वजह से पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव की तरफ जा रही थी अब न केवल बंद हो चुकी है, बल्कि पलट गई है। यही ओजोन लेयर की हीलिंग होने का कारण माना जा रहा है। ऐसा भी माना जा रहा है कि यदि माॅन्ट्रियल प्रोटोकाॅल का पालन किया जाता है तो वर्ष 2060 तक ओजोन परत का छेद पूरी तरह से भर जाएगा। खैर फिलहाल भले ही ओजोन परत के हील होेने का श्रेय माॅन्ट्रियल प्रोटोकाॅल को दिया जा रहा हो, लेकिन वास्तव में इस समय परत के हील होने का मुख्य कारण लाॅकडाउन ही है, क्योंकि इससे जहरीली गैसों का उत्सर्जन न्यूनतम स्तर पर या इससे भी कम हो गया है। ऐसे में हमे प्रयास करना होगा कि लाॅकडाउन हटने के बाद ओजोन परत के छेद को बढ़ने न दिया जाए।


 हिमांशु भट्ट 

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