लोक में वर्षा-विचार

Submitted by Hindi on Wed, 03/16/2011 - 12:09
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लोक में जल (सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार)
नौतपा आये और चले गये। रोहिणी नक्षत्र में सूर्य जिन नौ दिनों में परिभ्रमण करता है समान्यतः यही नो तपा के नौ दिन होते हैं। गांव से अक्सर लोग आते रहते हैं। खेती-किसानी की चर्चा ही उनकी चिन्ता के केंद्र में रहती है। विगत तीन वर्षों से वर्षा की जो अनियमितता इधर निर्मित हुई है, उसने गांव का हुलिया और अधिक दीनहीन बनाया है। गांव से आने वाला प्रत्येक व्यक्ति वर्षा की भविष्यवाणी में उलझा-पुलझा अपनी आशंका का इजहार करता, पंचांग के ग्रह-योगों के आधार पर फलित ज्योतिष का आदेश जानना चाहता है। वैसे वह अब की बार भी आशान्वित नहीं है। तपा जो तो गये हैं। नौ तपो में यदि वर्षा हो जाए तो इसे तपा का तो जाना कहा जाता है। तपा के तो जाने का मतलब है- वृष्टि की विरलता। पानी फिर नहीं बरसेगा। अबके चौमासे फिर धूल उड़ाते भांय-भांय करते व्यतीत हो जायेंगे।

‘तो’ शब्द संस्कृत के तोय शब्द का अपभ्रंश है। इसका अर्थ पानी होता है। गाय के गर्भपात को भी ‘तो’ जाना कहा जाता है। संभवतः गर्भ-जल के असमय पात् को ही इस शब्द से अभिहित किया जाता है। तपा के ‘तो’ जाने और गाय के ‘तो’ जाने में न केवल शाब्दिक साम्य है, बल्कि इनमें क्रिया-व्यापार का भी साम्य है। रोहिणी नक्षत्र का सूर्य सर्वाधिक गर्म होता है। यदि इन दिनों धरती खूब तप जाये, तो वाष्पीकरण की मात्रा तेज हो जाती है। खेत की सतह पर रहने वाले कृमि-कीट नष्ट हो जाते है। प्राकृतिक जैविक खाद इस रूप में तैयार हो जाती है। इसके साथ ही धरती में तापजन्य उर्वरता का उद्रेक भी उठने लगता है। यदि इस काल में पानी बरस गया तो तपिश पर तुषारापात जैसे हो जाता है। प्रस्रविता पृथ्वी को गर्भपात की पीड़ा सहनी पड़ती है। वाष्पीकरण की तीव्रता में बाधा पहुंचती है। यह तो जाना लोक की अपनी प्रतीक संरचना है। इससे लोक के व्यापक कार्य-कारण संबंध ज्ञान और उसके वैज्ञानिक बोध का पता चलता है।

लोक में वर्षा के अनुमानों का एक आधार, पंचांग हजारों वर्षों से अपनी भूमिका प्रस्तुत कर रहा है। ज्योतिषी ग्रह-नक्षत्रों की गणना करके वर्षा-योग की भविष्यवाणी करते हैं। ग्रामीण इलाकों में इस तरह की भविष्यवाणीयां बहुत महत्व रखती हैं। मासिक संक्रातियों एवं गोचर ग्रहों के आधार पर वर्षा का अनुमान लगाने का प्रमाण ज्योतिषशास्त्र में प्राप्त होता है। वर्ष- फल के रूप में वर्ष में वर्षा के स्वामी ग्रह का उल्लेख किया जाता है। इस ग्रह को रसेश की उपाधि दी जाती है। ग्रह के स्वभाव और चाल के अनुसार संपूर्ण वर्ष की वर्षा का विचार ज्योतिषी द्वारा किया जाता है। वर्ष में वर्षा का विश्वा भी दर्शाया जाता है यह स्पष्ट किया जाता है कि समुद्र पर पहाड़ों पर और आबादी की भूमि पर कितने-कितने विश्वा पानी बरसेगा। विश्वा का पूर्णांक बीस होता है। यह भी विचार किया जाता है कि वर्षा माली, धोबी, आदि जातिवाचकों में से किस प्रतिनिधि के घर में निवास करेगी। इन जातियों की मानसिकता के आधार पर वर्षभर बरसने वाली जल की मात्रा और अखंड तथा खंड वृष्टि का अनुमान किया जाता है। इस तरह के अनुमानों के साथ ग्रह-स्थिति से भी वर्षा-योग को जाना जाता है। वर्षा ज्ञान के निमित्त ज्योतिष में सात नाड़ियां मानी जाती हैं। इनमें से प्रत्येक की गति चार-चार नक्षत्रों में सर्पाकार होती है। जब चंद्रमा, मंगल तथा बृहस्पति की स्थिति ऐसी होती है, कि वे एक ही नाड़ी के चारों नक्षत्रों में से किसी पर होते हैं, चाहे चारों नक्षत्रों में से किसी एक ही पर अथवा भिन्न-भिन्न पर तो जगत व्यापिनी वर्षा होती है। ज्योतिष में इस तरह के अनेक अनुमान वर्षा की स्थितियों को प्रकट करने वाले हैं। लोक में ज्योतिष के महत्व की अभी भी प्रतिष्ठा है।

वर्षा के अनुमान के लिए गांवों के कुछ अपने तरह के अनुष्ठान हैं। इनमें से एक अनुष्ठान आज भी लोक में अपना स्थान बनाये हुए है। आषाढ़ की पूर्णिमा को एक ऊंचे बांस में ध्वजा फहराई जाती है। ध्वजा के आधार भाग के पास अनेक तरह के अन्न बांध दिये जाते हैं। पूर्णिमा की रात्रि के अंतिम प्रहर में ध्वजा जिस दिशा में फहराती है, हवा का प्रवाह वर्ष भर उसी दिशा में रहता है। जो अनाज फूलकर अंकुरित हो उठता है- उसकी फसल अच्छी होती है। अनाज की समग्र फुलावट पर वर्षा का अनुमान लगाया जाता है। लोक में स्वरोदय से भी वर्षा का अंदाज लगाने की परंपरा है। क्वांरी लड़कियों, साधु-संतों से भी भविष्यवाणीयां वर्षा के लिए पूछी जाती हैं। लोक-जीवन में वर्षा का अतिशय महत्व है, इसलिये इसके प्रति चिंतित होना स्वाभाविक ही है।

वर्षा का अनुमान लगाने के लिए लोक में घाघ और भड्डरी की कवितायें भी प्रचलन में हैं। घाघ और भड्डरी लोक के सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक वर्षा-वेत्ता हैं। शताब्दियों से लोक के होठों पर इनके द्वारा रचित पंक्तियां उत्तर भारत के समस्त ग्रामीण अंचलों में थिरकती रही हैं, आज भी वर्षा के अनुमान के लिए घाघ और भड्डरी सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। मौसम की भविष्यवाणी करने वाले आज जैसे संयंत्र पुराने जमाने में नहीं थे। लेकिन उस जमाने में भी घाघ और भड्डरी जैसे लोग मौसम की सटीक और अचूक भविष्यवाणी करते थे। समूचा लोक इन भविष्यवाणियों को यथार्थ में घटित होते अनुभव करता था, इसलिये लोक का इन पर अडिग विश्वास रहा है। घाघ और भड्डरी लोक के ऐसे भविष्यवक्ता थे, जिन्होंने ज्योतिष की शास्त्रीय पद्धति के समानांतर अपना एक लोक-ज्योतिष निर्मित कर लिया था।

गांव का आदमी आज भी यदि शुक्रवार का बादल शनिवार तक आकाश में आच्छादित देखता है तो वर्षा होने की संभावना भड्डरी के माध्यम से बतला देता है-

शुक्रवार की बादली रहे शनीचर छाय।
ऐसा बोले भड्डरी बिन बरसे न जाय।।


इन भविष्यवक्ताओं ने प्रकृति की बदलती भंगिमाओं का सूक्ष्म निरीक्षण किया था। पशुओं-प्रणियों, कीट-पतंगों में आने वाले बदलाव उनकी क्रियाओं के नये अंदाज और बदले अंदाज से ये मौसम में आने वाले परिवर्तनों को परिलक्षित कर लेते थे। भड्डरी के अनुसार यदि चींटी अंडों को लेकर यात्रा करने लगे, और चिड़िया धूल में नहाने लगे तो वर्षा बहुत निकट होती है- और जब वर्षा होती तब चारों ओर जल ही जल भर जाता है-

चींटी ले अंडा चले चिड़ी नहावे धूर।
ऐसा बोले भड्डरी वर्षा हो भरपूर।।


पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों की संवेदनशीलता आगामी मौसम का शीघ्र ही अनुभव लगा लेती है, बस उनके क्रिया-व्यवहारों में आये परिवर्तन और उनके अनुरूप हुए मौसम में बदलाव में सामंजस्य तलाशने की जरूरत है। भड्डरी का अनुभव जगत उनकी संवेदनशीलता, उनकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति और उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति का वैशिष्ट्य ही लोक को प्रभावित करने वाला रहा है। वे मौसम में आये परिवर्तनों के आधार पर प्राकृतिक संरचना में होने वाली घटनाओं के सहारे भी अपनी भविष्यवाणीयों को उचारते थे। उन्होंने भारतीय तिथि और दिवस के साथ प्राकृतिक हलचलों को जोड़ा था। और उनकी निष्पतियों को अपने भविष्यकथनों में पिरोया था। वे मानते हैं कि यदि आषाढ़ की पूर्णिमा को खूब बादल घिरें, खूब बारिश हो और गर्जन-तर्जन के साथ तड़ित-निपात हो तो वर्ष भर अच्छी वर्षा होगी-

आषाढ़ी पूनौ दिना गाज बीज बरसंत!
ऐसो बोले भड्डरी आनंद मानो संत!!


भड्डरी जैसे भविष्यवाणीकर्ता स्थानीयता जन्य प्रतिक्रियाओं को भी अपने मौसम संबंधी भविष्य कथनों में महत्व देते हैं। यह तो निश्चित है कि देश के सभी क्षेत्रों के लिए मौसम संबंधी सार्वभौमिक भविष्यवाणी कारगर नहीं हो सकती है। भू-संरचना, जलवायु, वानस्पतिक परिवेस मानवीय संस्कृति आदि कारक मौसम के नियामक होते हैं। भड्डरी ने इन कारकों के मद्देनजर ही अपनी भविष्यवाणियां की हैं। अपनी इसी लोक सापेक्ष अनुभव दृष्टि के कारण आज भी वे ज्यों के त्यों प्रमाणिक हैं। वे गांव के कंठ में स्थायी रूप से बसे हैं। न केवल मौसम संबंधी कथनों के लिये भड्डरी जाने जाते हैं बल्कि सामाजिक और वैयक्तिक अभिक्रियाओं में आने वाले परिवर्तनों के संभावित परिणामों की भी वे भविष्यवाणी करते हैं। वे मौसम और समाज के संश्लेष द्वारा क्रिया-व्यापारों के सूक्ष्म अभिप्रायों को प्रकट करते हैं। अगर तीतर के रंग की बदली आकाश में दिखे, तो वह अवश्य बरसेगी और यदि विधवा स्त्री ने आंख में काजल आंजा है, तो वह अवश्य अपना घर बसायेगी।

तीतर बरनी बादरी विधवा काजर रेख।
वे बरसें वे घर करें, कहे भड्डरी देख।।


अनेक किसानी प्रसंगों के माध्यम से भड्डरी अपनी भविष्यवाणीयों के प्रसंग रचते हैं। एक किसान मां अपने बेटे से कह रही है कि हे पुत्र उत्तरी हवा चल रही है, अतः जल-पान के लिए घर मत जाओ। पानी अधिक बरसने वाला है कि खेत की मेड़ पर ही भरपेट पानी पीने मिल जायेगा। अवधी में भड्डरी कहते हैं-

वायु बहै ऊता।
मेड़ा लाय पानी, पियो पूता।।


भड्डरी एक क्षेत्र में सीमित नहीं है वे उत्तर भारत की अधिकांश बोलियों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भड्डरी की लोकप्रियता सीमाएं तोड़ती है। उनके अनुभवों को अधिकांश बोलियों ने अपनी बानी में ढाल लिया है। मेंढक का बोलना वर्षा का संकेत है किंतु भड्डरी मेंढक को बोलने को विशेष महिने से जोड़ कर वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं। वे कहते हैं कि ज्येष्ठ के अंतिम दिनों में यदि मेंढक बोलते हैं, तो वर्षा अवश्य होती है-

उतरे जेठ जो बोले दादूर।
कहै भड्डरी बरसे बादर।।


लोक में बादलों के रंग को देखकर वर्षा की मात्रा का अनुमान कर लिया जाता है। सफेद रंग का बादल खेत भर बरसता है- अर्थात थोड़े से भूभाग को गीला कर पाता है, लाल रंग का बादल कुछ विस्तृत क्षेत्र में बरसा करता है- इसके बरसने से तालाब भर जाता है। पीले रंग का बादल बहुत ही कम बरसता है- उसके बरसने से कटोरी ही भरी जा सकती है, किंतु जब धुआंधार रंग का बादल बरसता है तब नदी-नाले जल से लबालब भर उठते हैं। वर्षा बहुत भारी और विस्तृत क्षेत्र में होती है-

सेत बरसे खेत भर, लाल बरसे ताल भर
पीरो बरसे पारो भर, और जब-
बरसे धुआंधारों तब आवें नदी-नारो!


पुरवाई हवा यदि धरती पर लोटकर बहती है- अर्थात पुरवाई के द्वारा धूल उड़ाई जाती है- तब ग्रीष्म काल का अंत और वर्षा प्रारंभ मान लेना चाहिये। इस हवा के साथ ही बादल आते हैं-

जौ भुंई लोट चलै पुरवाई।
तब जानौ बरसा रितु आई।।


बैलगाड़ी पर यात्रा कर रहे पति-पत्नी पुरवाई के द्वारा लाये गये बादलों को देखकर घबरा जाते हैं। बैलगाड़ी को पति हांक रहा है। उससे पत्नी कहती है कि बैलगाड़ी को मसक कर चलाओ-खूब दौड़ाओ पुरवाई के बादल घिर आये हैं- यदि बरस गये तो घर पहुंचना मुश्किल हो जायेगा।

गाड़ी वारे मसक दे बैल
के पुरवाईया के बादर घिर आये।


लोक-जीवन में जिस प्रकार बादलों के बरसने के प्रमाणों के परिणामस्वरूप भविष्यवाणियां की जाती हैं- उसी प्रकार मौसम, परिस्थितियों आदि के परिवर्तनों के आधार पर अवर्षा की स्थिति की भी भविष्यवाणियां की जाती हैं। यदि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की नवमी को न बादल दिखें, न बिजली चमके, तो किसान को अपना हल चीर-फाड़कर चूल्हे में ईंधन स्वरूप जला लेना चाहिये। खेत में जिस बीज को बोना है- उसे पका कर खा लेना चाहिए-

आषाढ़ सुदी हो नवमी ना बादर ना बीज।
हल फारौ ईंधन करो बैठो चावो बीज।।


लोक में मान्यता है कि यदि रात में कौवा बोले और दिन में सियार फेत्कार करे तो ये दो परिस्थितियों को प्रकट करने वाले चिन्ह हैं, या तो झमाझम पानी बरसने वाला है- या फिर वर्षा का नितांत अभाव होने वाला है, सूखा पड़ेगा और देश की प्रजा पलायन कर जायेगी-

रात मा बोले कागला, दिन मा बोले स्यार।
या होये झरवदरी या फिर देश उजार।।


घाघ ने अपनी अभिव्यक्ति को संक्षिप्त ढंग से ही प्रस्तुत किया है। वे छोटी-छोटी परिवर्तनकारी परिस्थितियों के हवाले से अपनी दो टूक भविष्यवाणी करने में सिद्धहस्त हैं। लोक के वे चहेते भविष्यवक्ता हैं। उनके अनुसार यदि दिन में गर्मी और रात में ओस पड़ती है, तो सौ कोस तक वर्षा नहीं होगी-

दिन मा गर्मी रात मा ओस।
घाघ कहै वर्षा सौ कोस।।


ठीक इसी क्रम में यदि रात में तारागण छिटके रहते हैं और दिन में बादल रहते हैं तो पानी बरसने की आस नहीं रहती है। पता नहीं राम क्या-क्या करने वाला है? यही सोचते समय कटता है-

दिन बादर और रात तरैयो।
का है राम करैयां।


लोक-जन को मालूम है कि यदि वर्षा ऋतु में दक्षिणी वायु चलने लगे तो धान की पैदावार बिल्कुल नहीं होती है। यहां तक कि मांड़ चखने के लिए नहीं मिल पाता है।

वायु वहै दखिना।
मांड़ कांड कहां से चखना।


सावन में यदि पुरवाई चलने लगे तो किसान को बैल बेच देना चाहिए। गाय खरीद लेना चाहिए। ऐसी स्थिति में पानी का अभाव हो जाता है। खेती करना संभव नहीं रह जाता है, इसलिए गाय से काम चलाना ही उचित होता है-

सावन मास बहै पुरवाई।
बरधा बेंच लेऊ धनु गाई।।


चंद्रमा के चारों ओर रात में कभी-कभी एक वलय सा बन जाता है। इस वलय को बोलियों में मंडल या मातना कहा जाता है। यदि यह मंडल चंद्रमा से दूर बड़े घेरे में बनता है, तो पानी दूर होता है, अर्थात पानी जल्दी नहीं बरसता है- यदि यह घेरा छोटा होता है- चंद्रमा के करीब रहता है, तो पानी जल्दी बरसता है-

नियरे मातनो नियरे पानी
दूर मातनो दूर पानी।


जब आकाश लाल-पीला हो जाता है- तब पानी बरसने का समय चला जाता है-

लाल पियर जब भवा आकासा
अब नाहीं बरसा की आसा।


माघ के महिना में यदि आसमान लाल रंग वाला दिखाई दे तो निश्चित रूप से ओले गिरते हैं-

माघ मा बादर लाल घरे।
सांची मानो पाथर परै।।


नखत-विज्ञान भी गांवों में वर्षा की गुणवत्ता को उजागर करता है। मघा नक्षत्र में बरसने वाला पानी ही खेत को सराबोर करने वाला होता है। जैसे मां के परोसे बिना पेट नहीं भरता है, वैसे ही मघा नक्षत्र के बरसे बिना खेत नहीं भरते हैं-

माता न परसे भरे न पेट
मघा न बरसे भरे न खेत।


लोक के ये वर्षा-अनुमान युगों-युगों से खरे उतर रहे हैं। किन्तु इधर पारस्थितिकीय तंत्र में आये परिवर्तनों के कारण ये अनुमान हो सकता है कि अब पूर्णतः सटीक न रहे हों, किंतु गांवों में ये अभी भी विश्वसनीय हैं।

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