मानव निर्मित बांध, मानव निर्मित बाढ़

Submitted by admin on Fri, 09/11/2009 - 21:15
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हिमांशु ठक्कर


बरसात के मौसम में बाढ़ आना कोई नई बात नहीं है, सो इस वर्ष भी बाढ़ आई। लोगों के खेत-खलिहान, घर, दुकानें डूबीं और सरकार ने राहत की रस्म भी निभाई। लेकिन इस सारे घटनाक्रम में लोग यह जान नहीं पाए कि कौन सी बाढ़ प्रकृति की मार है और कौन है मानव की लापरवाही का नतीजा।

सरकार इस सत्य को जाहिर नहीं होने देना चाहती लेकिन हमारा पूरा प्रयास है कि लोग जानें कि बाढ़ क्यों आई? पिछले दिनों गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में जिस बाढ़ का प्रकोप लोगों को झेलना पड़ा, उसके पीछे ताप्ती, नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी, माही और साबरमती नदियों पर बड़े-बड़े बांधों से निर्मित जलाशयों का कुप्रबंधन मुख्य कारण है। जिन बड़े बांधों से आशा की जा रही थी कि वे बाढ़ रोकने में मदद करेंगे, उन्हीं बांधों के कारण लोगों को बाढ़ की विभिषिका झेलनी पड़ी। गौरतलब है कि बाढ़ की मार उन राज्यों को अधिक झेलनी पड़ी जहां बड़े बांध अधिक हैं।2006 मानसून आने के ठीक पहले विभिन्न बांधों के जलाशयों में रोके गए पानी की स्थिति क्या थी, यह जानने के लिए भारत सरकार के केन्द्रीय जल आयोग द्वारा उपलब्ध कराए गए इन आंकड़ों पर गौर करना जरूरी है।

पहला, इसका मतलब यह हुआ कि जिस पानी का इस्तेमाल गर्मियों में सिंचाई, पेयजल, विद्युत उत्पादन आदि के लिए किया जा सकता था, उसे रोककर बेकार किया गया। दूसरे जब मानसून आया तो ये जलाशय, जो पहले से ही काफी हद तक भरे थे, मानसून में आने वाले पानी की अतिरिक्त मात्रा को संभाल नहीं सके और उन्हें भारी मात्रा में पानी छोड़ना पड़ा। अचानक पानी की इतनी बड़ी मात्रा छोड़े जाने से निचले इलाकों में बाढ़ से भारी तबाही हुई। बांध के प्रबंधकों ने किस प्रकार की लापरवाही बरती है, इसे समझने के लिए दो बांधों की स्थिति का विस्तृत जायजा लिया जा सकता है।

 

उकाई बांध (सूरत) :

सूरत शहर के नजदीक स्थित यह बांध ताप्ती नदी पर बनाया गया है। मानसून शुरू होते ही बांध तेजी से भरने लगा। बांध में 9-10 क्यूसेक्स पानी रोज आ रहा था। बांध में 20 जुलाई तक 51 प्रतिशत, 3 अगस्त तक 77.54 प्रतिशत और 7 अगस्त तक 100 प्रतिशत पानी भर चुका था। जब तक बांध पूरी तरह नहीं भर गया, तब तक उससे पानी छोड़ने की प्रक्रिया नहीं शुरू की गई और बांध के भरते ही अचानक 9-10 क्यूसेक्स प्रतिदिन की दर से कई दिन तक पानी छोड़ा गया, यह जानते हुए भी कि बांध के नीचे ताप्ती नदी की जल वहन क्षमता 3.5 लाख क्यूसेक्स से अधिक नहीं है। बांध के इस कुप्रबंधन से सूरत शहर और आसपास के इलाकों को भारी बाढ़ झेलनी पड़ी। अधिकारियों का यह कहना कि अधिक वर्षा होने के कारण सूरत में बाढ़ आई, सरासर झूठ है। आंकड़ें बताते हैं कि 9 अगस्त की सुबह 8 बजे तक सूरत में औसत से मात्र 12 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई।

 

सरदार सरोवर :


यह बात सर्वविदित हो चुकी है कि 2 अगस्त तक बांध का मुख्य जल निकासी मार्ग केवल आधा मीटर खुला हुआ था। बांध में उस समय तक 98000 क्यूसेक्स पानी प्रतिदिन आ रहा था जबकि केवल 21000 क्यूसेक्स पानी छोड़ा जा रहा था। इस प्रकार पानी रोके रखने से बांध के जलाशय में 128 मीटर गहरा पानी जमा हो गया, जबकि इसे 119 मीटर से अधिक किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए था। जलाशय में इस स्तर तक पानी बढ़ने का सीधा परिणाम यह हुआ कि आसपास के हजारों परिवारों के घर और उनकी जमीनें पानी में डूब गईं, जिसे यदि सावधानी बरती गई होती तो बचाया जा सकता था। ऐसा लगता है कि सरकार जलाशय में पानी की मात्रा बढ़ाकर सरदार सरोवर परियोजना के दायरे में आने वाले परिवारों को आतंकित करना चाहती है ताकि वे विस्थापन की अन्यायपूर्ण शर्तों को स्वीकार करने के लिए बाध्य हो जाएं।सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े लोग यदि अपने को पाक-साफ साबित करना चाहते हैं तो वे लोगों को बताएं कि प्रति घंटे कितना पानी नहरों में छोड़ा गया और कितना नदी की तराई में स्थित विद्युत उत्पादन संयंत्रों को दिया गया। वे यह भी बताएं कि पिछले दिनों बांध में कितना पानी आया और कितना छोड़ा गया तथा बांध के पीछे पानी की गहराई कब-कब कितनी-कितनी थी। यदि गुजरात के पास पानी की इतनी अधिक मात्रा का इस्तेमाल नहीं है तो फिर बांध की ऊंचाई को 110.63 मीटर से बढ़ाकर 121.92 करने के लिए क्यों जोर दिया गया।

कृष्णा, गोदावरी और साबरमती नदी घाटियों में भी यही कहानी दोहराई गई। बांधों का प्रबंधन यहां भी संतोषजनक नहीं रहा।इसी से जुड़ा एक मुद्दा है बांधों में गाद भरने का। बांधों के जलाशयों में गाद की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, जिसके कारण इनकी जलधारण क्षमता दिनों-दिन कम होती जा रही है। भारत सरकार की संस्था ‘राष्ट्रीय समेकित जल संसाधन विकास आयोग’ की एक रिपोर्ट के अनुसार गाद के कारण देश में प्रतिवर्ष 1.4 अरब क्यूसेक्स की जलधारण क्षमता नष्ट हो रही है। इस क्षति का अनुमानित मूल्य 1600 करोड़ रुपए है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए सरकार की कम-से-कम यह जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरे मामले की जांच करवाए और यह पता करे कि ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई जिसे परियोजनाओं के बेहतर प्रबंधन से टाला जा सकता था। बांधों में पानी को रोकने और छोड़ने से संबंधित सभी आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। इन बांधों और जलाशयों का निर्माण करने में देश की बहुत बड़ी पूंजी लगी है। इनके कुप्रबंधन से यदि देश को लाभ की बजाय हानि होने लगे तो संबंधित सरकारों के लिए निश्चित रूप से यह बहुत बड़े शर्म की बात है।

(लेखक नदी परियोजनाओं एवं बांधों से जुड़े विभिन्न आयामों के विशेषज्ञ हैं)

 

 

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