मानवीय भावों का उद्दीपक : पर्यावरण

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पर्यावरण विमर्श

पर्यावरण मनुष्य के जीवन को संतुलित एवं नियंत्रित रखता है। प्रकृति प्रदत्त समस्त उपादानों के साथ खेलकर मनुष्य आनंद ले रहा है, वह भूलकर कि हमारे इस अन्याय के लिए प्रकृति हमें क्या दंड देगी, हमारे बाह्य एवं आंतरिक भाव के वातावरण को प्रकृति ही संतुलित करती है। वनस्पति, जीव-जंतुओं, धरती, पानी, हवा, प्रकाश का दोहन अंधाधुध हो रहा है। साथ ही मानवीय भाव, प्रेम, संवेदना, उदात्तता का भी दोहन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण मानवजाति के अस्तित्व के लिए जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी मानवीय भाव और संवेदना भी है।

पर्यावरण अपने बाह्य उपादनों के साथ स्वयं एक साध्य के रूप में साहित्य में अहम् भूमिका निर्वहन करता है। कविता के बाहरी और भीतरी दोनों ही स्तरों में पर्यावरण सौंदर्य की खोज में रत् संयोग और वियोग को प्रतिष्ठापित करने का प्रयास करता है। जहां एक ओर भाव प्रकृति के साथ प्रेम और आत्मउद्बोधन बनकर सौंदर्य सृष्टि का साधन बनते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रेम और आत्मउद्बोधन प्रकृति के साथ अंतर्संबंधित होकर रमणीय चित्रमयता को साकार करते हैं।

पर्यावरणीय अवधारणा प्रकृति शब्द की व्यंजना को चरितार्थ करती है। कवियों ने प्रकृति को कल्पना शक्ति के अलौकिक, अद्भुत, अपराजित सृष्टि विधायनी अस्त्र के रूप में अपना हथियार बनाया। इसी हथियार के माध्यम से अनेक अनगढ़ शिल्पों को गढ़ा। प्रकृति को अनुभूति प्रकाशन का माध्यम बनाकर प्रेम, पीड़ा, दर्द, अवसाद, दु:ख, विरह, वेदना का अंकन किया।

प्रकृति चित्रण द्वारा प्रेम वेदना की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति की। संयोग सुखों की मादक स्मृति को प्रकृति के माध्मय से मनोदशा चित्रण का साधन बनाया। वैयक्तिक भाव-भूमि से परे प्रकृति में ही कवियों ने व्यथित विश्व के प्रति सहानुभूति की हार्दिक भावाभिव्यंजना की। गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने साहित्य में प्रकृति का अनुपम चित्रण किया है। वे कहते हैं, एक अंकुर को देखकर जो प्रसन्नता का अनुभव होता है, उसकी तुलना और किसी खुशी से नहीं की जा सकती।

“उन्होंने इसे सृष्टि सृजन के परमानंद की संज्ञा दी है। मनुष्य समस्त सुख-दु:ख का स्पर्श प्रकृति में ही करता है, प्रकृति ही उसका आलंबन है, संयोग के क्षणों में प्रकृति उल्लसित नजर आती है। लगता है जैसे टहनियां पेड़ों के गले में बांहे डालकर झुम रही हैं। भौंरे फूलों का चुंबन करके मधुर तान छेड़ते हैं। भौरों की मादक ध्वनि सुनकर कलियां मुस्कराती हैं। इसके विपरीत जब मन शोक, विरह एवं व्यथा से व्यथित होता है तो प्रकृति भी आह, टीस, वेदना, आंसु से परिपूर्ण नजर आती है। प्रकृति मानव समाज में व्याप्त विषमता का भी चित्रण करती है-जैसे कोई व्यक्ति सुखी है तो अपार सुख का उपभोग कर रहा है, कोई दु:खी है तो रात-दिन व्यथा से तड़प रहा है। विषमता प्रकृति में भी विद्यमान है।

आकाश असीम सुखों का उपभोग करता हुआ उल्लसित होकर रात्रि में अपने नक्षत्र-समाज के साथ अठखेलियां करता है, वहीं पृथ्वी विभिन्न प्रकार के दु:खों को वहन करती हुई विषमतामूलक कारूणिक जीवन जीती है। ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य एवं प्राकृतिक विडंबनाओं को चित्रमय रूप देने में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, नागार्जुन, गिरिजाकुमार माथुर आदि अग्रणी पंक्ति में शामिल हैं।

प्रकृति स्मृतिजन्य वेदना का मनोवैज्ञानिक निरूपण करती है। कवि प्रकृति के मादक वातावरण में प्यार की कल्पना करता है तो प्रकृति की नीरवता में स्वयं को अकेला पाता है। इस भौतिकवादी संसार के संघर्ष और अंतर्द्वन्द के बीच असहाय मनुष्य छल-कपट, मिथ्या वैभव, अहंकार, आडंबर कोलाहल से भरी तनावग्रस्त धरती को छोड़कर प्रकृति के ऐसे मनोरम वातावरण में जाने की इच्छा करता है, जहां समुद्र की लहरे आकाश के कानों में निश्छल प्रेम निवेदन कर रही हों, जहां धरती और आकाश का मिलन हो रहा हो। वर्तमान आधुनिक जीवन की देन अवसाद को दूर करने में भी प्रकृति अहम् भूमिका निभाती है।

छायावादी कवियों ने प्रकृति का मानवीकरण कर प्रकृति के अचेतन एवं जड़ अवयवों को सचेतना से जोड़ा है। प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने कविता करने की प्रेरणा का स्रोत प्रकृति को ही बताया है। आधुनिक युग में काव्यों में प्रकृति चित्रण उन रूपों में चित्रित हुई है, जिसमें आलंबन, उद्दीपन, संवेदनात्मक वातावरण निर्माण, रहस्यात्मक, प्रतीकात्मक अलंकार योजना, मानवीकरण लोकशिक्षा और दूती के रूप में प्रकृति चित्रित की जाती है। समस्त पर्यावरणीय बाह्य वृतियों के अध्ययन के साथ-साथ पर्यावरणीय अंतवृतियों का अध्ययन भी आवश्यक है, जो साहित्य में ही संभव है,

पर्यावरण मनुष्य के जीवन को संतुलित एवं नियंत्रित रखता है। प्रकृति प्रदत्त समस्त उपादानों के साथ खेलकर मनुष्य आनंद ले रहा है, वह भूलकर कि हमारे इस अन्याय के लिए प्रकृति हमें क्या दंड देगी, हमारे बाह्य एवं आंतरिक भाव के वातावरण को प्रकृति ही संतुलित करती है। वनस्पति, जीव-जंतुओं, धरती, पानी, हवा, प्रकाश का दोहन अंधाधुध हो रहा है। साथ ही मानवीय भाव, प्रेम, संवेदना, उदात्तता का भी दोहन दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। प्रकृति प्रदत्त पर्यावरण मानवजाति के अस्तित्व के लिए जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी मानवीय भाव और संवेदना भी है। कवियों ने प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर मानवीय भाव-भूमि के पर्यावरणीय उद्बोधनों को नया आयाम प्रदान किया है। धरती को मां स्वरूप मानकर सुमित्रानंदन पंत प्रकृति में ही अपनी ममतामयी मां का स्नेह ढूंढते हुए घोंसला नामक कविता में कहते है-

यहां मिली,
मां के आंचल की छांव
शाश्वत स्नेह, निश्छल प्यार
देवकी नहीं मिली तो क्या?
प्रकृति रही सदा उनके साथ
यशोदा बनकर
बांहों के हिंडोले पर
झुलाती रही उनका बालपन
सहलाती रही उनके कोमल गाल,
आहत मन को देती रही सहारा,
बहलाती रही उनका बालपन
दूर भगाती रही अकेलापन
प्रकृति को तन-मन कर अर्पण
जिए सदा प्रकृति दर्पण बन।


पंतजी की अनुभूति का दायरा प्रकृति के इर्द-गिर्द ही था। आरंभिक कवि जीवन की शुरूआत की प्रेरणा भी प्रकृति ही रही। प्रकृति निर्मित पर्यावरणीय भावनाओं को छायावादी कवियों ने कोमल भावनाओं के साथ विभिन्न रूपों में चित्रित किया है। जहां प्रकृति अपने पारिभाषिक रूप में वायु, जल, मृदा, पादप तथा प्राणी को समेटकर संपूर्ण जैविक परिस्थितियों को जोड़कर जीवों की अनुक्रियाओं को प्रभावित करती हैं, वहीं प्रकृति मानसिक अनुक्रियाओं को संपूर्ण भावों के साथ भी प्रभावित करती है। इन्हीं प्रभावों को कवियों ने कल्पना सुंदर भावनाओं के साथ संवेदना के उच्चतम स्तर पर उद्दीपक के रूप में प्रस्तुत किया है।

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत की कल्पनाशक्ति के विषय पर आचार्य नंददुलारे वाजपेयी कहते हैं कल्पना ही पंतजी की कविता की विशेषता, उसके आकर्षण का रहस्य है। ...कल्पना पंतजी की कविता का मेरूदंड है और न उसकी काव्य सृष्टि का मापदंड है। कोरी कल्पना की बाल्य-सुलभ रंगीन उड़ानों से लेकर अत्यंत तल्लीन और गहन कल्पना-अनुभूतियों के चित्रण में पंतजी का विकास-क्रम देखा जा सकता है।

कल्पना तत्व प्रकृति प्रेमी कवियों को जैविक परिस्थितियां प्रदान करता है। पंतजी ने प्रकृति के संवेदनात्मक रूप का चित्रण मनुष्य के उल्लास, मनोरंजन, ह्रास के समय उल्लसित रूप में किया है। इस समय प्रकृति स्वयं उल्लसित नजर आती है। कवि अपनी कविता ‘मिलन’ में आनंद उल्लास में निमग्न प्रकृति का अंकन करते हुए लिखते हैं-

जब मिलते मौन नयन पल भर, खिल-खिल अपलक कलियां निर्भर,
देखती मुग्ध, विस्मित, नभ पर तुम मदिराधर पर मधुर अधर।


इसके ठीक विपरीत प्रकृति शोक, विषाद, रूदन एवं अवसाद के क्षणों में स्वयं अश्रुपात करती अथवा शोकमग्न रूदन करती हुई दिखाई देती है।

खोलता इधर जन्म लोचन, मूंदती उधर क्षण-क्षण,
अभी उत्सव और हास-हुलास, अभी अवसाद, अश्रु उच्छवास।


अवसाद और उल्लास मानव-जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। विभिन्न सकारात्मक तथा नकारात्मक परिस्थितियां संवेदना के स्तरों के निर्माण में सहायक होती हैं। पर्यावरणीय समस्याएं संवेदनात्मक वातावरण के लिए प्रेरक का कार्य करती हैं।

छायावादी कवियों का प्रकृति से गहरा नाता रहा है। छायावादी कवि जगत् के अणु-अणु एवं कण-कण में एक अलौकिक सौंदर्य की छटा देखता है। जयशंकर प्रसाद अपनी कालजयी रचना कामायनी में समस्त प्रकृतिप्रदत्त शक्तियों का भौतिकवादी मानवों द्वारा शोषण का वर्षन करते हुए कहते है-

प्रकृत शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छीनी,
शोषण कर जीवनी बना दी जर्जर झीनी।


भावात्मक संवेदना और भावात्मक वृत्तियों के योग को मानव-जीवन के विकास में संघर्ष और कल्पना को, प्रसादजी ने कामायनी में सर्वत्र प्रकृति सुंदरी की सचेतन झांकी के रूप में अंकित किया है। इस पर टिप्पणी करते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं,

“कामायनी में उन्होंने नर-जीवन के विकास में भिन्न-भिन्न भावात्मक वृत्तियों का योग और संघर्ष बड़ी प्रगल्भ और रमणीय कल्पना द्वारा चित्रित करके मानवता का रसात्मक इतिहास प्रस्तुत किया है।

कवि प्रसाद ने आंसु काव्य में वियोग-जन्य पीड़ा उत्कट वेदना, असीम संताप के साथ संयोग के क्षणों में भी आनंद और विषाद दोनों ही रूप में प्रकृति के सचेतन रूप का वर्णन किया है। आंसु की प्रकृति का मानसिक पर्यावरणीय रूप का दोहन तथा दूषण दोनों ही मानवीय भावों को प्रभावित करती है। आचार्य विनय मोहन शर्मा आंसु पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं, यदि आंसु का प्रकाश न होता तो छायावाद की भूमि ही अनिर्दिष्ट रह जाती। अंतर्भावनाओं की उन भावनाओं की जो यौवन को झकझोरा करती हैं, अभिव्यक्ति स्पष्ट न हो पाती।”

प्रकृति और मानव का गहरा संबंध है। प्रकृति मानव की चिर सहचरी है। जन्म लेते ही मानव प्रकृति की गोद में क्रीड़ा करता है। आरंभ से ही मानव प्रकृति के प्रति अद्भुत आकर्षण एवं अलौकिक अपनत्व का भाव रखता है। यही अपनत्व संवेदना के रूप में जाहिर होता है। महादेवी वर्मा ने अपने काव्य चित्र में प्रकृति को संवेदनात्मक रूप में अधिक देखा है। महादेवी की प्रकृति मानव की गहन पीड़ा को देखकर आंसु बहाती है तो साथ में तारे भी आंसु बहाते हैं।

आंसु बन-बन तारक आते, सुमन ह्दय में सेज बिछाते।

प्रिय के आगमन की हर्ष बेला में आकाश, सागर सभी मुस्कराते हैं, सभी ओर प्रकृति में हर्षोल्लास दिखाई देता है।

मुस्कराता संकेत भरा नभ, अलि क्या प्रिय आने वाले हैं?

मानवीय संवेदनाओं से ह्दय के भाव उद्दीप्त होते हैं और प्रकृति भावों की पर्यावरणीय भूमि को संवेदना के स्तर पर उद्दीप्त करती है। महादेवी ने प्रकृति की भावोद्दीपक एवं मार्मिक व्यंजना की है-

कोकिल गान ऐसा राग! मधु की चिर प्रिया यह राग!
उठता मचल सिंधु अतीत, लेकर सुप्त सुधि का ज्वर।


कोकिल के इस गीत में मादकता, सरसता के साथ भावोद्दीपकता भी भरी हुई है। कवि अज्ञेय ने प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम एवं अनन्य आस्था प्रकट करते हुए उसके विविध रूपों की झांकियां अंकित की हैं। कवि प्रकृति के सचेतन रूप का चित्रण करते हुए उद्दीप्त भावों के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए कहते हैं-

मैं सोते के साथ बहता हूं
पक्षी के साथ गाता हूं।


कवि नागार्जुन ने प्रकृति के उद्दीपन रूप का सुंदर चित्रण करते हुए प्रकृति के चेतन एवं अचेतन दोनों रूपों का वर्णन किया है। कवि गिरिजाकुमार माथुर ने प्रकृति को विविध रूपों देखा है। मिट्टी, वन, सुंदर दृश्य का वर्णन ढाकवनी कविता में बुंदेलखंड की प्रकृति का जीता-जागता चित्र अंकित किया है।

उद्दीपन के रूप में प्रकृति कभी सुखद क्षणों में अथवा संयोग के अवसर पर भावों को उद्दीप्त करती है तो कभी वियोग के क्षणों में भावों को उद्दीप्त कर उद्दीपन का कार्य करती है। कवि दोनों ही रूपों में प्रकृति चित्रण करता है। कविवर पंत ने मधुस्मिति, मधुवन, गृह-काज, गुंजन, मिलन, प्रथम मिलन आदि कविताओं में प्रकृति की उन्मद छवि का अंकन किया है। मधुवन कविता में संयोग के क्षणों में भावों को उद्दीप्त करती हुई प्रकृति का मनोरम चित्र अंकित करते हुए कवि कहते हैं-

डोलने लगी मधुर मधुवात, हिला तृण व्रतति कुंज तरूपात
डोलने लगी प्रिये! मृदुवात गुंज-मधु गध-धुल हिमगात।


वियोग के क्षणों में प्रकृति विरही ह्दय को और अधिक व्याकुल बना देती है, तब प्रकृति निर्मम एवं निष्ठुर गति से निष्ठुर प्रतीत होती है। विरह में मानव के संपूर्ण अस्तित्व में समाहित हो जाती है। निष्ठुर प्रियतम के वियोग में जलकर नागमती की दशा चिंतनीय हो गई है। नागमती के इस कातर विरह और विलाप से घोंसलों में बैठे पक्षी भी व्याकुल हैं,प्रकृति पर विरह की व्यापकता का इस कदर प्रभाव है कि नागमती के विरह-व्यथित हृदय का भाव सूर्य, चंद्रमा, पेड़, पक्षी सब में दिखाई देता है।

सूरूज बूड़ि उठा होई ताता। और मजीठ टेसू बन राता।।

नागमती के आंसुओं से सारी प्रकृति भीग जाती है।

कुहुकि-कुहुकि जस कोइल रोई। रकत आंसू घुंघुची बन बोई।
तहि दुःख भये परास निपाते। लोह बूड़ि उठे होई राते।


प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने से वर्णन में सजीवता और संवेदनशीलता का समावेश सहज ही हो जाता है। विरह को और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए कवि ने बारहमासा का वर्णन किया है। वर्ष के बारह महीने विरहणी नायिका के विप्रलंभ श्रृंगार के उद्दीपन रूप में हैं, जिसमें प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों का सजीव वर्णन है। प्रकृति के साथ विरह, दुःख के अनेक रूपों के साथ पाठक के समक्ष चित्रित होता है। कार्तिक का शरतचंद्र सारे संसार को शीतलता देता है,किंतु वह नागमती को और जलाता है-

कार्तिक सरदचंद्र उजियारी। जग सीतल हौ विरहै जारी।
चौदह करा चांद परगासा। जनहुं जरै सब धरति अकासा।


प्रकृति के साथ गहरी आत्मीयता के कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने नागमती विरह वर्णन को हिंदी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु कहा है।”

कविजन प्रकृति का प्रयोग कर प्रकृति की विविध गतिविधियों द्वारा जनसाधारण को शिक्षा दिया करते हैं, वहां पर प्रकृति चित्रण का लोकशिक्षा रूप दृष्टिगोचर होता है। प्रायः प्राचीनकाल से ही कवि जन-मानवों को प्रकृति द्वारा शिक्षा देते आए हैं। आधुनिक कवियों में पंतजी ने अपनी कितनी ही कविताओं में प्रकृति के परिवर्तनों के द्वारा उपदेश देने का कार्य किया है। जीवन और जगत् की अस्थिरता, अचिरता एवं क्षण-भंगुरता का उपदेश परिवर्तन नामक कविता में दिया है। वहीं पतझर कविता में पुराने पत्तों के निरंतर झड़ने तथा नूतन पत्तों के आगमन की बात कहकर संसार के आवागमन, आत्मा की अमरता का शिक्षाप्रद उपदेश दिया। प्रकृति निर्मित पर्यावरण को कवियों ने सचेतन रूप में देखा। पंतजी नें प्रकृति सचेतना का मन, आत्मा तथा हृदय से अनन्य संबंध स्थापित किया।

श्री विश्वंभरनाथ मानव के ये शब्द समीचीन हैं कि पंतजी ने प्रकृति की एक-एक वस्तु में चेतना पहचानी है। प्रकृति का उन्होंने शरीर ही नहीं देखा, मन भी देखा है और देखी है उस मन की भावनाएं भी। सरिता, सुमन, नक्षत्र, बादल आदि के संपर्क में वे आते हैं तो उनके रूप निहारने की अपेक्षा उन्हें उनके हृदय की बात सुनना अधिक भाता है।”

प्रकृति निर्मित पर्यावरण का उद्दीपक, संवेदनात्मक, उपदेशात्मक रूपों का चित्रण आधुनिक कवियों ने चेतना के स्तर पर किया है। उन्होंने प्राकृतिक पर्यावरण का भौतिक रूप देखने के साथ-साथ उसके मन के तहों को भी टटोला है। पर्यावरण में भावनाओं का आरोपण करके मानव के लिए प्रकृति और पर्यावरण के महत्व को स्पष्ट किया है। प्राकृतिक पर्यावरण के सीमित दृष्टिकोण जिसमें प्रकृति के बाह्य रूपों का ही अध्ययन अध्यापन आवश्यक है, को साहित्य व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। साहित्य दर्पण का कार्य करते हुए ये बताता है कि पर्यावरण का स्वच्छ, निर्मल रूप मानव के लिए कितना आवश्यक है।

साहित्य आईना दिखाता है कि आज का भोगवादी, मानव समुदाय, जो सिर्फ और सिर्फ प्रकृति का उपभोग कर रहा है, मन की आंखों से, आत्मा की गहराई से देखने पर, महसूस करने पर, प्रकृति के चेतन रूप को समझकर प्रकृति के साथ मानवोचित व्यवहार कर सकता है। जरूरत है अपने अंदर के जड़-तत्वों को बाहर निकाल फेंकने की। प्रकृति में निहित जीवन-दर्शन को समझने के लिए साहित्य के करीब आना आवश्यक है। आवश्यकता है प्रकृति के मन को देखने की। जिस दिन मानव प्रकृति में अपनी भावनाओं का अक्स देखेगा, उस दिन पर्यावरण स्वमेव परिष्कृत और परिशोधित हो जाएगा।

संदर्भ


1. घोंसला, सुमित्रानंदन पंत।
2. हिंदी साहित्य 20वी शताब्दी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, पृ. 145
3. मिलन, सुमित्रानंजन पंत।
4. परिवर्तन, सुमित्रानंदन पंत।
5. कामायनी, जयशंकर प्रसाद, पृ. 299
6. हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृ. 977-978
7. आंसू तथा अन्य कृतियां, कवि प्रसाद, पृ. 76-77
8. जायसी ग्रंथावली, भूमिका, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृ. 44
9. सुमित्रानंदन पंत, श्री विश्वंभरनाथ मानव, पृ. 158

सहायक प्राध्यापक (हिंदी)
सल्याण स्नातकोतर महाविधालय,
भिलाई (छ.ग.)

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