मौसम पर अल-नीनो प्रभाव का खतरा

Submitted by Hindi on Fri, 10/17/2014 - 10:18
Source
द सी एक्सप्रेस, 23 जून 2014

.दुनिया के मौसम पर अल-नीनो प्रभाव का खतरा मंडरा रहा है। इस प्रभाव से मौसम के विषम रूप देखने में आते हैं। कहीं भयानक सूखा पड़ता है और कहीं भयानक बाढ़ आती है। ताजा अनुमानों के मुताबिक इस साल अल-नीनो से मौसम के प्रभावित होने की संभावना 90 प्रतिशत है। अल-नीनो की शुरुआत उष्ण प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से से होती है, जहां गर्म पानी का एक विशाल तालाब सा बन जाता है। इस गर्म पानी से उत्पन्न चेन रिएक्शन पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करने लगता है।

कुछ जगह ये प्रभाव विनाशकारी सिद्ध होते हैं और आश्चर्यजनक रूप से कुछ जगह अल-नीनो के प्रभाव लाभकारी भी सिद्ध होते हैं। अल-नीनो प्रभाव भारत के लिए अच्छी खबर नहीं है। अल-नीनो का पहला असर भारत पर ही दिखने की आशंका है। इसके प्रभाव से यदि मानसून कमजोर पड़ा, तो हमारी खाद्य आपूर्ति डगमगा सकती है जो पहले से ही बहुत नाज़ुक है। भारत के अलावा इसके दुष्प्रभाव आस्ट्रेलिया और दक्षिणी अमेरिका में देखे जाएंगे। दूसरी तरफ, अमेरिका जैसे कुछ देशों में इसके प्रभाव से अच्छी वर्षा हो सकती है।

अल-नीनो के बारे में ताजा भविष्यवाणी ब्रिटेन स्थित यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम रेंज वेदर फोरकास्ट्स (ईसीएमडब्ल्यूएफ) ने की है। इस सेंटर की गिनती दुनिया के 15 प्रतिष्ठित मौसम पूर्वानुमान केंद्रों में होती है। इनकी भविष्यवाणी को आम तौर पर विश्वसनीय माना जाता है। ईसीएमडब्ल्यूएफ के प्रमुख वैज्ञानिक टिम स्टॉकडेल के अनुसार अभी तक 90 प्रतिशत संकेत अल-नीनो के पक्ष में जा रहे हैं। प्रशांत महासागर में इस वक्त गर्म जल की मात्रा काफी ज्यादा है।

यह संभवत: 1997-98 के अल-नीनो प्रभाव के बाद जमा हुए पानी की सबसे ज्यादा मात्रा है। अल-नीनो के विकट रूप की वजह से उस साल सबसे ज्यादा तापमान रिकार्ड किया गया था। अल-नीनो के प्रभाव से पूरी दुनिया में समुद्री तूफानों, सूखे, बाढ़ और जंगलों की आग से 23,000 लोग मारे गए थे और खाद्य उत्पादन में 2100 अरब से लेकर 2800 अरब रुपये का नुकसान हुआ था। स्टॉकडेल का कहना है कि अभी यह बताना मुश्किल है कि इस बार अल-नीनो एक साधारण मौसमीय घटना बन कर रह जाएगा या सचमुच विकराल रूप धारण करेगा।

अगले एक-दो महीने बाद ही पूरी तस्वीर साफ होगी। हवा के प्रवाह की दिशा से पता चलेगा कि आगे क्या होगा। दूसरी बात यह है कि हवा के प्रवाह में हमेशा एक अनिश्चितता का तत्व होता है। पूर्वी प्रशांत महासागर में गर्म वर्षादायक जल की हलचल से समुद्र के उस छोर से सटे हुए देशों में मूसलाधार बारिश की संभावना बढ़ जाती है जबकि पश्चिमी छोर सूखने लगता है। विभिन्न सरकारों और राहत एजेंसियों को इन मौसमीय घटनाओं पर पैनी नजर रखनी पड़ती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई के समुद्र वैज्ञानिक एक्सेल टिमरमन का मानना है कि प्रशांत में हवाओं के मिजाज और गर्म पानी की मात्रा को देखते हुए एक बड़े अल-नीनो प्रभाव की आशंका बहुत ज्यादा है। अतीत में ऐसी स्थितियों से शक्तिशाली अल-नीनो उत्पन्न हो चुके हैं। अल-नीनो प्रभाव हर पांच साल बाद उत्पन्न होता है। दिसंबर में यह अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचता है। इसका पहला और सबसे बड़ा प्रभाव भारत में पड़ता है।

ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के अल-नीनो विशेषज्ञ डॉ. निक क्लिंगेमन का कहना है कि अल-नीनो भारत में कृषि और जल आपूर्ति के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। भारत की एक अरब से ज्यादा की आबादी मानसून पर निर्भर है। दो तिहाई भारतीय खेतों में सिंचाई सुविधा नहीं है। ये खेत सिर्फ मानसून की वर्षा पर निर्भर हैं। यदि मानसून की वर्षा में पांच प्रतिशत की कमी का सरकारी अनुमान सही साबित होता है, तो इसका असर व्यापक होगा।

दस प्रतिशत की गिरावट को सरकारी तौर पर सूखे की स्थिति माना जाता है। भारतीय मौसम वैज्ञानिक और अल-नीनो विशेषज्ञ डॉ. कृष्ण कुमार का विचार है कि प्रशांत महासागर में एक खास जगह गर्म पानी की उपस्थिति से 2014 का अल-नीनो भारतीय मानसून पर बड़ा असर डाल सकता है, भले ही उसका प्रभाव मध्यम स्तर का हो। 2002 और 2009 में अल-नीनो के प्रभाव मध्यम स्तरीय थे, लेकिन उन्होंने 1997 की बड़ी अल-नीनो घटना की तुलना में भारतीय मानसून को ज्यादा प्रभावित किया था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
 

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