मध्य प्रदेश में पानी का निजीकरण

Submitted by admin on Thu, 01/09/2014 - 10:42
Source
मंथन अध्ययन केंद्र

प्रस्तावना


प्रदेश में नए जलप्रदाय ढांचे के पुनर्वास की जरूरत के संबंध में योजना दस्तावेजों में कहा गया है कि नगरीय क्षेत्रों में पेयजल प्रदाय की पाईप लाइनें करीब 40-50 वर्ष से लेकर कहीं-कहीं 70-80 वर्ष तक पुरानी है। इन पुनानी पाईप लाइनों से जल रिसाव होता है। कई स्थानों पर ये लाइनें जल-मल निकास लाइनों के साथ होने के कारण इससे पेयजल प्रदूषित होता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खड़ी होती हैं। साथ ही जलप्रदाय संबंधी पुरानी मशीनरी की क्षमता में कमी आदि कारणों से अधिकांश नगरीय क्षेत्रों में पूरे पेयजल तंत्र के पुनर्वास की जरूरत महसूस की जा रही है। 1990 के दशक की शुरुआत से भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के प्रयोग शुरू किए गए थे। बिजली के क्षेत्र में ये बदलाव शुरू से ही लागू हो गए थे लेकिन जल क्षेत्र में कुछ वर्षों बाद प्रारंभ हुए।

इन वर्षों में निजीकरण की प्रक्रियाओं में बड़ा बदलाव आया है। पहला प्रयास सीधे निजीकरण का था, जिसकी बोलीविया, अर्जेंटीना, ब्राजील, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका समेत दुनिया भर में कड़ी राजनैतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया हुई। इसी निजीकरण को अब जन निजी भागीदारी (Public Private Partnership) के नए नाम से प्रस्तुत किया गया है। यह सीधे निजीकरण से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि यह निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने और उन्हें सामाजिक जवाबदेही और जोखिमों से मुक्त करने की एक तिकड़म मात्र है इस तिकड़म का खामियाजा निम्न मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों को शायद पीढ़ियों तक भुगतना पड़ेगा।

सीधे निजीकरण में निजी कंपनियां बुनियादी ढाँचा खड़ा करने के लिए कम से कम धन तो निवेश करती है। लेकिन, जन-निजी भागीदारी में तो वे जनता के धन से ही खुद मुनाफा कमाती है। खंडवा और शिवपुरी की निजीकृत जलप्रदाय योजनाओं के लिए लगने वाला 90% धन इस देश की जनता का है लेकिन छोटा सा निवेश करने वाली कंपनियों को सारे मुनाफे का मालिक बना दिया गया है।

प्रदेश में नए जलप्रदाय ढांचे के पुनर्वास की जरूरत के संबंध में योजना दस्तावेजों में कहा गया है कि नगरीय क्षेत्रों में पेयजल प्रदाय की पाईप लाइनें करीब 40-50 वर्ष से लेकर कहीं-कहीं 70-80 वर्ष तक पुरानी है। इन पुनानी पाईप लाइनों से जल रिसाव होता है। कई स्थानों पर ये लाइनें जल-मल निकास लाइनों (sewage) के साथ होने के कारण इससे पेयजल प्रदूषित होता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं खड़ी होती हैं। साथ ही जलप्रदाय संबंधी पुरानी मशीनरी की क्षमता (efficiency) में कमी आदि कारणों से अधिकांश नगरीय क्षेत्रों में पूरे पेयजल तंत्र के पुनर्वास की जरूरत महसूस की जा रही है। खंडवा और शिवपुरी की योजनाओं के बारे में भी यही कहा गया है।

“जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन” या JnNURM में प्रदेश के इंदौर, भोपाल, उज्जैन और जबलपुर शामिल है। इसी के अंतर्गत ‘छोटे तथा मझौले नगरों की अधोसंरचना विकास योजना’ या UIDSSMT पर भी काम जारी है। UIDSSMT के प्रति मध्य प्रदेश ने अच्छा उत्साह दिखाया है। प्रदेश के 50 शहरों में 1230 करोड़ रुपए की 68 योजनाएं जारी है जिनमें से 990 करोड़ रुपए की लागत वाली 47 योजनाएं पानी संबंधित है। डबरा, देवास, मलाजखंड, रेहली, सनाबद, दमोह, जावरा, रतलाम, आगर, कटनी और सिरोंज आदि भले ही केंद्रीय अनुदान की संपूर्ण राशि हो चुकी है लेकिन, क्रियान्वयन के मामले में सारी योजनाएं पीछे चल रही हैं। ब्यावरा, बुधनी, इटारसी, पिपरिया, मंदसौर, पन्ना, रीवा, शाजापुर, टीकमगढ़, सीहोर, होशंगाबाद, सागर, छिंदवाड़ा, बीना, सीधी आदि को प्रगति में पिछड़ने के कारण अभी तक अनुदान ही मिल पाया है। UIDSSMT में जलप्रदाय योजनाओं का पीपीपी के तहत क्रियान्वयन किए जाने को शिवपुरी और खंडवा के समुदाय ने स्वीकार नहीं किया है तथा वहां इसका विरोध जारी है।

UIDSSMT का पहला चरण (2005-2012) समाप्ति की ओर है। अतः जलप्रदाय व्यवस्था के निजीकरण को छोटे-बड़े हर नगरीय निकाय तक सुनिश्चित करने हेतु मध्य प्रदेश सरकार ने पूरी तैयारी कर ली है। UIDSSMT की शर्तों में तो पीपीपी को प्रोत्साहित करने का प्रावधान रहा है लेकिन, मध्य प्रदेश की ‘मुख्यमंत्री शहरी पेयजल योजना’ में तो पहले से ही तय है कि एक लाख से अधिक आबादी वाले नगरों में पीपीपी के माध्यम से ही जलप्रदाय योजनाएं संचालित की जाएगी। पानी के लिए हर परिवार को नल कनेक्शन लेना होगा तथा बिल भरना जरूरी होगा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सस्ते अनाज की बात करते हुए दावा करते हैं कि गरीब लोग मनरेगा की एक दिन की मजदूरी से पूरे महीने का अनाज खरीद सकते हैं लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पानी का बिल भरने के लिए कितने दिनों तक मजदूरी करनी पड़ेगी? मुख्यमंत्री शहरी योजना पहले चरण में 37 नगरों में लागू की जा रही है जिनमें तरीचर कला, टोंक खुर्द और नामली जैसे ग्रामीण क्षेत्र, भीकनगांव, कुक्षी, बदनावर और बड़वानी जैसे छोटे निकाय और धार, शहडौल और नीमच जैसे मझोले नगर शामिल हैं।

वर्ष 2012 में मध्य प्रदेश सरकार ने ग्रामीण में जलप्रदाय योजनाएं संचालित करने हेतु ‘मध्य प्रदेश जल निगम’ का गठन किया गया है। इसके तहत अभी कुछ समूह योजनाओं पर काम जारी है। योजना का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्र के प्रत्येक घर में नल कनेक्शन देकर जलप्रदाय किया जाना है। जल निगम के उद्देश्यों में उद्योगपतियों, व्यवसायिकों, डिबेलपरों और वित्तीय संस्थाओं को जलप्रदाय योजना निर्माण हेतु आकर्षित किया जाना तथा नागरिक से बिल वसूली का काम निजी कंपनियों को दिया जाना आदि शामिल है।

जुलाई 2013 में प्रदेश सरकार ने म.प्र. जल विनियमन कानून पारित किया है। इस कानून के तहत बनने वाला जल विनियामक आयोग प्रदेश में बाजार के सिद्धांतों के अनुसार पानी का उपयोग निर्धारित करेगा। निमायक आयोग की कार्रवाई न्यायलयीन कार्रवाई की तरह होगी जिसके लिए बड़े वकीलों/सलाहकारों की सेवाएं लेने की क्षमता पानी की लूट करने वाली कंपनियों और उद्योग समूहों के पास ही होगी। समुदाय के पास इस प्रकार के कौशल का अभाव बिजली क्षेत्र की तरह जलक्षेत्र को भी उनकी पहुंच से दूर कर देगा। संक्षेप में निजीकरण द्वारा संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित जीने के अधिकारों के तहत नागरिकों के जल अधिकारों को नकार दिया जाएगा।

प्रदेश में क्रियान्वित इसी प्रकार की योजनाओं पर नजर डालने से मोटे तौर पर समझ में आया कि वे योजनाएं नगरीय निकायों की वित्तीय हैसियत से काफी बड़े बजट की है। 12,891 जनसंख्या वाले मूंदी को 4.80 करोड़ की 16,215 जनसंख्या वाले भीकनगांव को 7.29 करोड़ की, 28,345 जनसंख्या वाले कुक्षी को 18.46 करोड़ की जलप्रदाय योजना सौंप दी गई है जो इन नगरीय निकायों के सालाना बजट की अपेक्षा कई गुना अधिक है। बड़ा बजट होने के प्रमुख कारणों में जलप्रदाय के मानक बढ़ा-चढ़ा कर इस्तेमाल करना तथा स्थानीय जलस्रोतों की उपेक्षा कर दूर से पानी लाने को प्राथमिकता देना शामिल है। निकायों के स्तर पर योजना संबंधी तकनीकी दस्तावेज़ों का अध्ययन कर उचित निर्णय लेने में सक्षम मानव संसाधनों की कमी भी सामने आई है। लेकिन, निजी सलाहकारों फर्मों की उपस्थिति से योजनाओं के बारे में सही निर्णय लेने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हुई है और गैरजरूरी योजनाओं को आगे बढ़ाने के हरसंभव प्रयास किए गए हैं।

प्रस्तुत पुस्तिका मध्य प्रदेश की पीपीपी के तहत निजीकृत की जा रही खंडवा और शिवपुरी की जलप्रदाय योजनाओं पर आधारित है जिसके पहले खंड में खंडवा की निजीकृत जलप्रदाय योजना तथा मार्च 2012 के बाद वहां घटित घटनाक्रम शामिल है। दूसरी खंड शिवपुरी की पीपीपी जलप्रदाय योजना पर आधारित है।

पानी के निजीकरण से प्रभावित समुदायों को सच्चाई से अवगत करवाने के प्रयास के रूप में य पुस्तिका प्रस्तुत है। मंथन अध्ययन केंद्र की एक पुस्तिका ने खंडवा में पानी के निजीकरण के खिलाफ अभियान हेतु जनजागृति में अहम भूमिका अदा की है। उस पुस्तिका की मांग इतनी बढ़ गई थी कि हमारे लिए इसकी पूर्ति करना मुश्किल हो गया था। आशा है पानी का हक छीनने के दौर में यह पुस्तिका अन्य स्थानों के लिए भी समान रूप से उपयोगी साबित होगी।

प्रस्तुत अध्ययन के दौरान हमें खंडवा और शिवपुरी के संवेदनशील नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नागरिक समूहों से काफी सहयोग मिला। उनके साथ हुई लंबी चर्चाओं तथा उपलब्ध करवाई गई जानकारियों के कारण हमारे लिए इन नगरों और उनकी जलप्रदाय व्यवस्था को समझना संभव हो पाया। अध्ययन में सहयोग प्रदान करने वाले खंडवा और शिवपुरी के सभी महानुभावों का आभार। इस पुस्तिका तथा इस मुद्दे पर आपके सवालों, सुझावों, टिप्पणियों और आलोचनाओं का स्वागत है।

Disqus Comment